श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २/६-९ तत्त्ववस्तुका विचार :- ब्रह्म, आत्मा, भगवान्-अनुवाद तिन। अङ्गप्रभा, अंश, स्वरूप-तिन विधेय-चिह्न॥६॥ अनुवाद आगे, पाछे विधेय स्थापन। सेइ अर्थ कहि, शुन शास्त्रविवरण॥७॥ श्रीकृष्ण और श्रीचैतन्यतत्त्व :- स्वयं भगवान् कृष्ण, विष्णु-परतत्त्व। पूर्णज्ञान पूर्णानन्द परम महत्त्व॥८॥ 'नन्दसुत' बलि' याँरे भागवते गाइ। सेइ कृष्ण अवतीर्ण चैतन्यगोसाञि॥९॥ अनुवाद-ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्-ये तीन 'अनुवाद' हैं। अङ्गकान्ति, अंश और स्वरूप-ये तीन 'विधेय' के चिह्न हैं। पहले 'अनुवाद' और बादमें 'विधेय' की स्थापना करते हुए मैं उनके शास्त्र-सम्मत अर्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ। समस्त ज्ञानसे परिपूर्ण, अखिल आनन्दमूर्ति और सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय-वस्तु स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ही विष्णुत्तत्त्वमें परतत्त्व हैं। जिनको श्रीमद्भागवतमें 'नन्दनन्दन' कहा गया है, वही श्रीकृष्ण श्रीचैतन्य महाप्रभुके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं॥६-९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अलङ्कार शास्त्रके अनुसार पहले 'अनुवाद' (ज्ञात विषय) कहनेके बाद 'विधेय' (अज्ञात विषय) कहा जाता है। वेदादि शास्त्रोंमें स्थान-स्थानपर ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्, इन तीन विषयोंका उल्लेख रहनेके कारण वे भली-भाँति ज्ञात तत्त्व हैं; इसलिये इनको 'अनुवाद' के रूपमें जानना होगा। श्रीकृष्ण-चैतन्यकी अङ्गकान्ति जो ब्रह्म, अंश जो परमात्मा और स्वरूप जो स्वयं-भगवान् हैं-यह विषय अभीतक ज्ञात नहीं है। इसलिये इन तीन अनुवादोंको सबसे पहले कहकर शास्त्रोंके अर्थका विचार करते हुए विधेयका निर्णय करेंगे। शास्त्र-सिद्धान्त यह कि विष्णुत्तत्त्वमें परतत्त्व स्वयं भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र हैं। श्रीमद्भागवतमें नन्दसुत (नन्दनन्दन) कहकर जिनका गुणगान सुना जाता है, वे ही श्रीकृष्ण-चैतन्य रूपमें अवतीर्ण हुए हैं। इसलिये श्रीकृष्ण और श्रीचैतन्य सम्पूर्ण रूपसे अभिन्न हैं, यह मैं विचारपूर्वक उल्लेख करूँगा। ब्रह्म, परमात्मा और स्वयं भगवान् कहनेसे उसी परतत्त्व-वस्तुके तीन प्रकाशोंको ही लक्षित किया जाता है, इसलिये मैं ऐसा कह सकता हूँ कि ये तीनों श्रीचैतन्यके प्रकाश-विशेष हैं॥६-९॥ अमृताणुकणिका-श्रीकृष्ण स्वयंसिद्ध भगवान् भी हैं और वे नन्दसुत भी हैं। श्रुतियाँ उन्हें रस स्वरूप कहती हैं-“रसो वै सः”। रस शब्दके दो अर्थ होते हैं-आस्वाद्य 'रस' और रस-आस्वादक 'रसिक'। वे रस-रूपमें आस्वाद्य हैं और रसिक-रूपमें वे आस्वादक हैं। वे लीलारसका आस्वादन करते हैं, श्रुति भी उनको लीला-पुरुषोत्तम कहती हैं-“कृष्णोवै परमं दैवतम्” (गोपालतापनी)। दिव् धातुका अर्थ क्रीड़ा अथवा लीला है। अनादि कालसे वे लीला पुरुषोत्तम हैं। किन्तु लीला अथवा क्रीड़ा अकेले नहीं हो सकती, उसके लिये लीलाके ४८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत