श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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भी रस नहीं है। पुरुषोत्तममें ही रस है और वह प्राकृत रस नहीं है, अप्राकृत रस-परम रस है। जिसके विषयमें गीता (२/५९) में कहा गया है— “रसवर्जं रसोऽपस्य परं दृष्ट्वा निवर्त्तते॥” “परम रस प्राप्त करके क्षुद्र प्राकृत रससमूह विलुप्त हो जाते हैं।” ‘परमात्मा’—वे परम रसस्वरूप भगवत्-वस्तुका आंशिक प्रकाश हैं; वे जीवान्तर्यामी तत्त्व मात्र हैं। व्यष्टि अथवा समष्टि अन्तर्यामीके मध्य मानवताके चरम विकासकी सभी आकाङ्क्षाएँ तृप्त नहीं हो सकती। ‘भगवान्’—चतुर्भुज नारायणके चार हाथ हैं, परन्तु वे तुरीय वस्तुका सन्धान देनेपर भी मानवके परम धर्मकी समस्त विश्रम्भ सेवाकी चमत्कारिता प्रकाश नहीं कर सकते। अर्द्ध-मानव और अर्द्ध-सिंह जो नित्य वैकुण्ठ-अवतीर्ण नृसिंह-मूर्ति प्रकाश करते हैं, उनकी लीलाके द्वारा वैकुण्ठ वस्तुका अचिन्त्य शक्तित्व प्रकाशित होनेपर भी उनके द्वारा भी मानव धर्मके पूर्णतम विकासकी बात नहीं देखी जाती। तत्पश्चात् जब क्षुद्र (बौने) मानवरूपमें वामनदेवने आत्मप्रकाश करके तीन पग भूमिकी भिक्षा माँगी, तब बलिने अतिमर्त्य लीलापुरुषोत्तमको अनुग्रह प्रार्थी क्षुद्र मानव ही समझा। परन्तु वामनदेवने अपना त्रिविक्रमरूप प्रकाशकर उसका समस्त राज्य मापकर अपनी त्रिपाद विभूतिका प्रकाश मात्र किया। तथाकथित सभ्यताके अभिमानमें क्षत्रिय-धर्मका अपव्यवहार करके सनातन ब्रह्मण्य-धर्म विष्णुभक्तिको विनाश करनेकी चेष्टा उदित होनेपर असभ्य-मानवरूपी श्रीपरशुरामादि भगवत्-आवेशावतार प्रकाशित होते हैं। इसके द्वारा सनातन धर्मकी कथञ्चित् प्रतिष्ठा होनेपर भी मानवके परम धर्मकी आकाङ्क्षा पूर्ण नहीं होती है। असभ्य नरावस्थाके बाद आदर्श सभ्य मानव और आदर्श क्षत्रिय-राजरूपी भगवान् श्रीरामचन्द्रने अवतीर्ण होकर मानवके नैतिक धर्मकी अकाङ्क्षाकी तृप्ति की। परन्तु मानवके परम नैतिक धर्मका अर्थात् स्वराट् लीलापुरुषोत्तमका अथवा निरङ्कुश स्वेच्छाचारिताका सुसमन्वय जिस आदर्शमें पूर्णतमरूपमें अभिव्यक्त होता है, वह उस समय प्रकाशित नहीं हुआ। मानव-चरित्रकी समग्रता जिन मानवरूपी स्वराट् लीलापुरुषोत्तमके चरित्रमें सम्यक् रूपसे प्रकाशित होती है, वे अप्राकृतिक परमतत्त्व अखिलरसामृतमूर्ति मनुष्यलिङ्ग परब्रह्म व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ही मानवके परमधर्मका विषय होकर नित्य विराजित हैं। परममुक्त आत्माकी सर्वाङ्गीण सेवावृत्तिका अभिसार दर्शन करके जो परमपुरुष आत्म-प्रकाश करते हैं, वे सर्वकारण-कारण द्विभुज मुरलीधर, श्रीराधानाथ श्यामसुन्दर हैं। वे जिस प्रकार परम विषय हैं, उनकी परमा शक्ति भी उसी प्रकार ही परम आश्रय हैं। “देवी कृष्णमयी प्रोक्ता राधिका परदेवता। सर्वलक्ष्मीमयी सर्वकान्तिः सम्मोहिनी परा॥” (बृहद्गौतमीयतन्त्र) “परदेवता राधिका देवी ‘साक्षात् कृष्णमयी’, ‘सर्वलक्ष्मीमयी’, ‘सर्वकान्ति’, ‘कृष्णसम्मोहिनी’ और ‘पराशक्ति’ कही गयी हैं।” वे परम विषय और परम आश्रय लीलास्वादनके लिये एक होकर भी दो रूप प्रकाश करते हैं और फिर दोनों मिलित होकर श्रीकृष्णचैतन्य रूप प्रकाश करते हैं॥५॥
दूसरा अध्याय | ४७