श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 88, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ २/५ भगवत्-विग्रहकी अङ्गकान्ति और अंशरूप दो प्रकाशमात्र हैं। वे सम्पूर्ण-सविशेष-शक्तिमान् स्वयं वस्तु अर्थात् भगवान् नहीं हैं]। इस श्लोकके साथ श्रील जीवगोस्वामीकृत तत्त्वसन्दर्भमें संख्या आठमें प्रदत्त श्लोक विचारणीय है— “यस्य ब्रह्मेति संज्ञां क्वचिदपि निगमे याति चिन्मात्रसत्ताप्यंशो यस्यांशकैः स्वैर्विभवति वशयन्नेव मायां पुमांश्च। एकं यस्यैव रूपं विलसति परमव्योम्नि नारायणाख्यं, स श्रीकृष्णो विधत्ते स्वयमिह भगवान् प्रेम तत्पाद-भाजाम्॥” अर्थात् “जिनकी चिन्मात्र-सत्ताको वेद किसी-किसी स्थानपर 'ब्रह्म' नामसे वर्णन करते हैं, जिनके एक अंश माया-नियन्ता 'पुरुष' अपने अंश (लीलावतार और गुणावतार) रूपोंमें वैभव प्रकाश करते हैं और जिनके एक रूप 'श्रीनारायण' नामसे परव्योममें विलास करते हैं, वे स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण अपने चरणकमलोंका भजन करनेवाले भक्तोंको प्रेम प्रदान करें।” सच्चिदानन्द भगवान्के सर्वदा आनन्दप्रद दर्शनसे वञ्चित रहकर जो उन चिन्मयलीलायुक्त तत्त्ववस्तुकी केवल सम्वित्-वृत्तिका अवलम्बन करते हैं, उन्हें ब्रह्मका ही दर्शन होता है और जो केवल उनकी सत्-चित्वृत्तिका अवलम्बन करते हैं, वे परमात्माका ही दर्शन करते हैं। इसलिये सच्चिदानन्द लीलावियह भगवान्की चिन्मय अङ्गकी ज्योति ही चित्-विलासहीन-निराकार -मायारहित ब्रह्म और उनके ऐश्वर्यकी अंश विभूति ही परमात्मा हैं॥५॥ अमृताणुकणिका—परम-सम्बन्ध निर्णयमें अखिल-रसामृतमूर्ति श्रीकृष्ण और उनकी ही औदार्य-मूर्ति श्रीचैतन्य निर्णीत हुए हैं। श्रीकृष्णके अतिरिक्त ब्रह्म, परमात्मा और किम्वा भगवान्के अन्य किसी भी अवतारमें समस्त रसोंका एकत्र युगपत् समावेश नहीं देखा जाता। श्रीचैतन्यदेव और श्रीकृष्ण एक ही अभिन्न वस्तु हैं और वे ही परतत्त्व हैं। इस जगत्में आरोह अथवा अधिरोह पथसे क्रमसे श्रेष्ठताके विचारसे ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्की अनुभूतिका पार्थक्य लक्षित होता है। बहिरङ्गा शक्तिके रहित-विचारसे अर्थात् नेति-नेति विचारसे 'ब्रह्म', तटस्थाशक्तिके सहित-विचारसे अर्थात् जीवोंके अन्तर्यामी विचारसे 'परमात्मा' और अन्तरङ्गा अथवा स्वरूपशक्तिके सहित-विचारसे वैकुण्ठविग्रह अधोक्षज 'भगवान्'का ज्ञान होता है। 'ब्रह्म'- ब्रह्ममें परब्रह्मका क्लीवत्व और निर्विशेष भाव मात्र प्रकाशित है। केवल क्लीव अथवा स्त्री (शक्ति)की उपासनासे मानवताका चरम विकास और आकाङ्क्षा परितृप्त नहीं होती। जहाँ अप्राकृत पुरुष और अप्राकृत प्रकृति एक साथ अर्थात् जहाँ चित्-लीला-युगलकी सेवा है, वहीं मानवका धर्म पूर्ण है। क्लीवत्व (ब्रह्म) सायुज्य लाभको 'मानवका परम धर्म' ना कहकर उसे चेतनताकी बन्धन-योग्य-वृत्ति अथवा चेतनताकी आत्महत्याका आराध्य धर्म कहा जा सकता है। ब्रह्म और जीवमें चेतनताके गुणका साम्य है, इसलिये श्रुतिमें “अहं ब्रह्मास्मि" मन्त्रका तात्पर्य यह है कि समजातीय ना होनेपर उपासना सुष्ठु रूपसे नहीं हो सकती। इसलिये स्मृति-शास्त्रमें देखा जाता है- “नादेवो देवमर्चयेत्" अर्थात् जो देवता नहीं हैं अर्थात् जिनमें देवताओंके समान गुण नहीं हैं, वे देवताओंकी अर्चना नहीं कर पाते। इसलिये मानवके परमधर्ममें भी परम मानव ही उपास्य हैं। वे- 'गूढं परं ब्रह्म मनुष्यलिङ्गम्'। वे ही 'भगवान् गूढ़ः कपटमानुषः'। वे ही अन्य श्रुति मन्त्रके 'रसो वै सः' अर्थात् रसस्वरूप हैं। क्लीवत्वमें कभी ४६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत