श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२/५ ] यदद्वैतं ब्रह्मोपनिषदि तदप्यस्य तनुभा य आत्मान्तर्यामी पुरुष इति सोऽस्यांशविभवः। षडैश्वर्यैः पूर्णो य इह भगवान् स स्वयमयं न चैतन्यात् कृष्णाज्जगति परतत्त्वं परमिह॥५॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उपनिषदोंमें जिनको अद्वैत ब्रह्म कहा जाता है, वे मेरे प्रभुकी अङ्गकान्ति हैं। जिनको योगशास्त्रोंमें अन्तर्यामी पुरुष या परमात्मा कहते हैं, वे मेरे प्रभुके अंशस्वरूप हैं। जिनको ब्रह्म और परमात्माका आश्रय एवं अंशिस्वरूप षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् कहा जाता है, मेरे प्रभु वे स्वयं-भगवान् हैं। इसलिये श्रीकृष्णचैतन्यकी अपेक्षा जगत्में और कोई परतत्त्व नहीं है॥५॥ अनुभाष्य—उपनिषदि (ब्रह्मविद्याभिधान-सर्वोन्नत-वेदशाखाविशेषे, उप-नि-पूर्वकस्य विशरणगत्यवसादनाथर्स्य षद्लृधातोः क्विप् प्रत्ययान्तस्येदं—तत्र, उप उपगम्य गुरूपदेशाल्लब्धेति यावत्। उपस्थितत्वाद्व्रह्मविद्यां निश्चयेन तन्निष्ठतया ये दृष्टानुश्रविक-विषय-वितृष्णाः सन्तः तेषां संसारबीजस्य सद् विशरणकर्त्री शिथिलयित्री अवसादयित्री विनाशयित्री ब्रह्मगमयित्रीति तत्र) यद् अद्वैतं (द्वितीयरहितं) ब्रह्म [अभिधीयते] तदपि अस्य (गौरकृष्णस्य) तनुभा (अप्राकृतदेहस्य कान्तिः); यः आत्मा (परमात्मा सर्वजीवादि-नियन्ता) अन्तर्यामी पुरुषः सोऽस्य अंशविभवः (ऐश्वर्यस्यान्यतमः विभुत्वविशेषः); इह (अस्मिन् तत्त्वविचारे) यः षडैश्वर्यैः (षड्भिः समग्रैश्वर्यवीर्ययशःश्रीज्ञानवैराग्यैः ऐश्वर्यैः प्रभुत्वैः) पूर्णः (अपेक्षाशून्यः परिपूर्णः) सः अयं श्रीकृष्णचैतन्यः स्वयं भगवान्; इह (जगति तत्त्वविचारे कलौ वा) चैतन्यात् कृष्णात् (कृष्ण-चैतन्यात्) परं (अन्यत्) परतत्त्वं (श्रेष्ठाश्रयः) न (नास्तीत्यर्थः)। [ज्ञानशास्त्रप्रयोजनं ब्रह्मवस्तु, तथा योगशास्त्रलक्ष्यः परमात्मा भगवता सह तत्त्वसाम्येऽपि अधिकारोचित-दृष्टिभेदेन भगवद्विग्रहस्य चित्-प्रभांशरूपपुटद्वयमात्रम्, न तु सम्पूर्ण-सविशेष-शक्तिमत् स्वयं वस्तु यथा भगवान्]। श्लोक-भावानुवाद—उपनिषद् (ब्रह्मविद्या नामक सर्वोत्तम विद्या विशेष)—इसकी व्युत्पत्ति उप और नि उपसर्गपूर्वक विशरण (शिथिल), गति, अवसाद (विनाश) अर्थपरक षद्लृ धातुके अन्तमें क्विप् प्रत्यय लगानेसे हुई है। इस व्युत्पत्तिमें 'उप' शब्दका अर्थ है—गुरुके निकट जाकर उनसे उपदेश प्राप्त करना। गुरुके निकट उपस्थित होनेसे ब्रह्मविद्याको निश्चयपूर्वक अर्थात् निष्ठापूर्वक जाना जाता है। दृष्टानुश्रविक—दृष्ट अर्थात् इन्द्रियोंके द्वारा गोचर तथा आनुश्रविक अर्थात् अनुभव करनेवाले—जो इन दोनों प्रकारकी विषयतृष्णासे वैराग्य प्राप्त करना चाहते हैं, उपनिषद् उनके संसार बीजका सद्विशरण अर्थात् उसे शिथिल करनेवाली, अवसाद अर्थात् विनाश करनेवाली, गति अर्थात् ब्रह्मको प्राप्त करवाने वाली ब्रह्मविद्या है। जिसे अद्वैत ब्रह्म कहते हैं, वह भी श्रीगौरकृष्णकी अप्राकृत देहकी कान्ति है; जो सब जीवोंके नियन्ता परमात्मा हैं, वे उनके ऐश्वर्यके एक अंश सर्वव्यापकता गुणसे युक्त अंश विशेष हैं; इस तत्त्वविचारमें छह प्रकारके ऐश्वर्यों अर्थात् समस्त वैभव, बल, यश, सौन्दर्य, ज्ञान और वैराग्यसे स्वयं परिपूर्ण (किसी अन्यकी अपेक्षा ना रखते हुए) वे यही श्रीकृष्णचैतन्य स्वयं-भगवान् हैं अर्थात् इस जगत्में तत्त्व विचारसे अथवा कलिकालमें श्रीकृष्णचैतन्यसे श्रेष्ठ अन्य कोई आश्रय नहीं है (यह अर्थ है) [ज्ञानशास्त्रोंका प्रयोजन ब्रह्म है, योगशास्त्रोंका प्रयोजन परमात्मा है। तत्त्वकी दृष्टिसे यद्यपि ब्रह्म और परमात्माका भगवान्से साम्य है, तथापि अधिकारकी दृष्टिसे वे क्रमशः दूसरा अध्याय | ४५