श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २/२-४ श्रीकृष्णकीर्त्तनके लिये श्रीचैतन्यकी दया भिक्षा :- कृष्णोत्कीर्त्तन-गान-नर्त्तनकला-पाथोजनि-भ्राजिता सद्भक्तावलि-हंस-चक्र-मधुपश्रेणी-विहारास्पदम्। कर्णानन्दि-कलध्वनिर्वहतु मे जिह्वा-मरुप्राङ्गणे श्रीचैतन्यदयानिधे तव लसल्लीलासुधास्वर्धुनी ॥ २ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥२॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे दयाके समुद्र श्रीचैतन्यदेव! श्रीकृष्ण विषयक उच्च स्वरसे कीर्त्तन-गीत-नृत्यादि कमलोंसे सुशोभित और हंस-चक्रवाक-भ्रमररूपी सभी साधुभक्तोंका विहार-स्थान एवं सभीके कानोंको आनन्द प्रदान करनेवाले जलस्रोतकी भाँति मधुर कलकल ध्वनिरूप आपकी देदीप्यमान् लीलामृत-भागीरथी मेरी मरुस्थलरूपी जिह्वापर निरन्तर बहती रहे॥२॥ अनुभाष्य-हे दयानिधे श्रीचैतन्य! कृष्णोत्कीर्त्तनगाननर्त्तन-कलापाथोजनि-भ्राजिता (कृष्णस्य नामरूपगुण- लीलादीनां उत्कीर्त्तनम् उच्चैर्भाषणं गानं नर्त्तनञ्च तद्रूपाः कलाः ता एव पाथोजनीनि पद्मानि तैर्भ्राजिता शोभिता) सद्भक्तावलि-हंसचक्र-मधुपश्रेणीविहारास्पदं (हंसचक्रवाक-भ्रमरश्रेणीभेदप्रतिमानां भाव-भेदावस्थितानां सद्भक्तावलीनां शुद्धभक्तवृन्दानां विहारास्पदं विलासक्षेत्रं, यस्यां लीलायां शुद्धभक्तवृन्दानां परमामोदो भवतीति भावः) कर्णानन्दिकलध्वनिः (कर्णानन्दी भक्तानां कर्णरसायनः कलध्वनिः हंसचक्रवाक-भ्रमरोपम-हरिजनैः गीत-हरिलीला-प्रवाहाणामस्फुटमधुरनिनादः) [एवम्भूता] तव लसल्लीलासुधास्वर्धुनी (लसती दीव्यती गौरलीलारूपामृतमयी स्वर्धुनी स्वर्गङ्गा मन्दाकिनी) मे (मम) जिह्वामरु-प्राङ्गणे (गौरलीलारसास्वादवञ्चिते रसवर्जिते जिह्वारूपे नीवृति) वहतु। श्लोक-भावानुवाद-हे दयाके भण्डार श्रीचैतन्य! श्रीकृष्णका उच्च स्वरसे नाम-रूप-गुण- लीलादिका कीर्त्तन-गान-नर्तन कलारूपी कमलोंसे सुशोभित, हंस-चक्रवाक-भ्रमरादि विविध प्राणियोंके समान भिन्न-भिन्न भावोंवाले शुद्धभक्तोंका विलासक्षेत्र अर्थात् आपकी जिस लीलामें शुद्धभक्तोंको परमानन्द प्राप्त होता है अथवा हंस-चक्रवाक-भ्रमर सदृश हरिजनोंके द्वारा गान की गयी हरिलीला जलप्रवाहकी मधुर कलकल ध्वनिके समान भक्तोंके लिये कर्णरसायन अर्थात् उनके कानोंको आनन्द प्रदान करनेवाली है, इस प्रकारकी उपरोक्त तीन विशेषणोंसे शोभित गौरलीलारूप अमृतमयी मन्दाकिनी मेरी (गौरलीलाके रसास्वादनसे वञ्चित) मरुभूमि सदृश जिह्वारूपी राज्यमें बहती रहे॥२॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥३॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव की जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौर भक्तवृन्दकी जय हो॥३॥ प्रथम चौदह श्लोकोंमेंसे तीसरे श्लोककी व्याख्या; वस्तु निर्देश :- तृतीय श्लोकेर अर्थ करि विवरण। वस्तु-निर्देशरूप मङ्गलाचरण॥४॥ अनुवाद-अब मैं तृतीय श्लोककी व्याख्या कर रहा हूँ जिसके द्वारा वस्तु-निर्देश (ग्रन्थके प्रतिपाद्य विषय) के रूपमें मङ्गलाचरण किया गया है॥४॥ ४४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत