भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 85

दूसरा अध्याय दूसरे अध्यायका कथासार— इस दूसरे अध्यायमें श्रीचैतन्य महाप्रभुका श्रीकृष्णके साथ एकत्व प्रकाशित करते हुए ब्रह्मको उनकी अङ्गज्योति और परमात्माको उनका अंश प्रमाणित किया है। श्रीकृष्णको पुरुषावतारोंका और समस्त जीवोंका परम आश्रय प्रमाणित करके उनका मूल नारायण होना स्थापित करते हुए श्रीकृष्णके स्वरूप और उनकी तीन प्रकारकी शक्तियोंके ज्ञानको जाननेकी आवश्यकतापर बल दिया गया है। श्रीकृष्णके स्वरूपके प्राभव-वैभव भेदसे दो प्रकारके प्रकाश, अंश-शक्त्यावेश भेदसे दो प्रकारके अवतार और बाल्य-पौगण्ड अवस्था भेदसे दो प्रकारादि लीलाओंका वर्णनकर किशोरस्वरूप श्रीकृष्ण स्वयं अवतारी हैं, यह सिद्धान्त स्थापित किया गया है। चित्शक्तिका वैभव वैकुण्ठादि लोक, मायाशक्तिका वैभव अनन्त ब्रह्माण्ड और जीवशक्तिका वैभव अनन्त जीव हैं, यह भी दिखलाया गया है। श्रीकृष्णचैतन्य ही सर्वकारणोंके कारण, सभीके आदि (मूल) और स्वयं अनादि नित्य-सच्चिदानन्द विग्रह साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र हैं, यह स्थिर किया है। भक्तिमें दृढ़ता लानेके लिये सभी भक्तोंको श्रीकृष्णका स्वरूपज्ञान, उनकी तीन शक्तियोंका ज्ञान और विलासज्ञानरूप सम्बन्धज्ञान होना आवश्यक है, यह भी सिद्ध किया गया है। (अमृतप्रवाह भाष्य) भक्तिसिद्धान्त-विचारसे श्रीगौरवन्दना :— श्रीचैतन्यप्रभुं वन्दे बालोऽपि यदनुग्रहात्। तरेत्रानामतग्राहव्याप्तं सिद्धान्तसागरम्॥ १॥ अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १॥ अमृतप्रवाह भाष्य— जिनकी कृपासे अज्ञ व्यक्ति भी नाना प्रकारके मतवादरूपी मगरमच्छादिसे परिपूर्ण सिद्धान्त-समुद्रको अनायास ही पार कर जाता है, उन श्रीचैतन्य महाप्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १॥ अनुभाष्य— यदनुग्रहात् (यस्य कृपया) बालोऽपि (अनभिज्ञोऽर्भकोऽपि) नानामतग्राहव्याप्तं (औलूक्यजिन-बुद्ध- जैमिनि-पतञ्जलि-गौतम-कणाद-कपिल-शङ्कर-दत्तात्रेय-कथित-मिथो-विवदमान-नक्रमकर-प्रतिम-जड़स्वार्थ- सङ्कुल-मतवादपूर्णं) सिद्धान्तसागरं (विचारसमुद्रं) तरेत् (तेषां सङ्कीर्णमतवादानि तृणीकृत्य अमलं कृष्णचरणं जानाति) [तं] श्रीचैतन्यप्रभुं [अहं] वन्दे। श्लोक-भावानुवाद— जिनकी कृपासे अनभिज्ञ बालक भी (औलूक्य और जैन दर्शन एवं बुद्ध-जैमिनि-पतञ्जलि-गौतम-कणाद-कपिल-शङ्कराचार्य-दत्तात्रेयके द्वारा प्रचारित परस्पर विरोधी, जड़स्वार्थसे व्याप्त मतरूपी) मगरमच्छोंसे परिपूर्ण विचारसमुद्रसे तर जाता है अर्थात् उनके विभिन्न मतोंको तुच्छ मानकर अमल श्रीकृष्णके चरणोंको जीवनका लक्ष्य जान जाता है, उन श्रीचैतन्यप्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १॥