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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

२/११०-११७ ]

केहो कहे, परव्योमे नारायण-हरि। सकल सम्भवे कृष्णे, याते अवतारी॥११५॥ अनुवाद—जो इस प्रकार श्रीचैतन्य महाप्रभुको क्षीरोदशायी विष्णु कहते हैं, वे भी भक्त हैं, उनका इस प्रकारका वाक्य भी मिथ्या नहीं है। श्रीचैतन्य महाप्रभुके लिये सब कुछ सम्भव है, क्योंकि वे स्वयं अवतारी हैं। सभी अवतार अवतारीके शरीरमें स्थित हैं, इसलिये जिसकी जैसी भावनाएँ हैं, वह वैसे ही कहता है। श्रीकृष्णको कोई नर-नारायण कहता है, तो कोई साक्षात् वामन कहता है। कोई यह भी कहता है कि श्रीकृष्ण क्षीरोदशायी विष्णुके अवतार हैं। यह सब असम्भव नहीं है और सभीके वचन सत्य हैं। कोई उनको वैकुण्ठके हरि या नारायण कहते हैं। वे अवतारी हैं, इसलिये उनके लिये सब कुछ सम्भव है॥१११-११५॥ अमृतप्रवाह भाष्य—किसी-किसी ग्रन्थमें श्रीचैतन्यमहाप्रभुका क्षीरोदशायी वैकुण्ठनाथ कहकर उल्लेख किया गया है। इसके द्वारा उनकी महिमा सम्पूर्णरूपसे वर्णित नहीं हुई है, किन्तु उन सब भक्तोंके वाक्य मिथ्या नहीं हैं; क्योंकि श्रीकृष्णसे अभिन्न श्रीकृष्णचैतन्य स्वयं अवतारी हैं, इसलिये सभी अवतार उनमें विद्यमान हैं॥११०-११२॥ अनुभाष्य—श्रीलघुभागवतामृतमें श्रीकृष्णके अवतारी रूपमें वर्णनके प्रसङ्गमें— “अतएव पुराणादौ केचिन्नरसखात्मताम्। महेन्द्रानुजतां केचित् केचित् क्षीराब्धिशायिताम्॥ सहस्रशीर्षतां केचित् केचित् वैकुण्ठनाथताम्। ब्रुयुः कृष्णस्य मुनयस्तत्तद्वृत्त्यनुगामिनः।” अर्थात् “इसलिये पुराणादिमें श्रीकृष्णको मुनियोंने अपने-अपने अधिकारके अनुसार किसीने नरसखा नारायण, तो किसीने उपेन्द्र, किसीने क्षीरोदशायी, किसीने सहस्रशीर्षा पुरुष अथवा किसीने वैकुण्ठनाथ कहकर कीर्तन किया है॥”११४॥ अमृतानुकणिका—अवतारी श्रीगौरसुन्दरमें सभी अवतार ही अन्तर्भुक्त हैं, इसलिये श्रीगौरसुन्दरको जिस किसी भी विष्णुके नामसे अभिहित करना दोषपूर्ण नहीं है। किन्तु यह कहकर जो वस्तुको (भगवान्‌को) अवस्तु या माया कहते हैं, उन समस्त अभक्त-सम्प्रदायके वाक्योंको मिथ्या ही मानना चाहिये। जैसे—श्रीगौरसुन्दर साधारण मनुष्य हैं, किंवा धर्मसंस्कारक जीव हैं अथवा पण्डित हैं, किंवा बहिरङ्गा मायाकी विभिन्न कल्पित मूर्तियों या जड़ीय नामोंके साथ श्रीगौराङ्गकी श्रीमूर्त्ति अथवा श्रीनाम समान है अर्थात् गौराङ्ग-मूर्ति या महामायाकी मूर्ति, गौराङ्गका नाम और मानवके द्वारा कल्पित काली-दुर्गा आदि नाम—सभी समान हैं; जो गौराङ्ग हैं, जड़जगत्में पूजिता काली-दुर्गा भी वही हैं, जो कोई भी एक मानवकी रुचिके अनुसार ग्रहण कर लें,—ये सब विचार जिनके भीतर हैं (अर्थात् उनके मोहन पर्देके भीतर निर्विशेषवादके अग्निकुण्ड छिपे हैं), उनके वचनोंको मिथ्या ही जानना होगा। इस प्रकार विचार तत्त्ववस्तु श्रीगौरसुन्दरके अन्वयभावसे समन्वित नहीं होता है॥१११-११५॥ वैध एवं रागानुग, सभी भक्तोंको ही भक्तिसिद्धान्त जानना नितान्त आवश्यक है :— सब श्रोतागणेर करि चरण वन्दन। ए सब सिद्धान्त शुन, करि' एक मन॥११६॥ सिद्धान्त बलिया चित्ते ना कर अलस। इहा हैते कृष्णे लागे सुदृढ़ मानस॥११७॥

दूसरा अध्याय | ८३

[ २/११६-११७

अनुवाद-मैं सभी श्रोताओंके चरणोंकी वन्दना करता हूँ और उनसे यह निवेदन करता हूँ कि वे इन सब सिद्धान्तोंको ध्यानपूर्वक श्रवण करें। सिद्धान्त कहकर उसे सुनने और समझनेमें चित्तमें आलस्य मत लाओ, इन सब सिद्धान्तोंको जाननेसे ही श्रीकृष्णमें मन दृढ़तापूर्वक लगता है॥११६-११७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कोई-कोई भक्तिपिपासु व्यक्ति इन सब सिद्धान्तोंको भक्तिका अङ्ग ना कहकर इनमें प्रवेश करनेमें आलस्य दिखलाते हैं, किन्तु यह मङ्गलका विषय नहीं है। क्योंकि श्रीकृष्णसे सम्बन्धज्ञान जाननेपर उनके चरणकमलोंमें चित्त दृढ़रूपसे संलग्न होता है। इसलिये इस प्रकारके सत्-सिद्धान्त शुद्धभक्तिके मूल हैं॥११७॥ इति अमृतप्रवाह-भाष्ये द्वितीय परिच्छेद। दूसरे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ। अनुभाष्य-जातरुचि भक्तोंके आदर्शको देखकर अनेक लोग सोचते हैं कि हमें इनके समान सिद्धान्तके विषयमें प्रवेश करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। इस प्रकारके आलस्यसे अनेक लोग भजनके विषयमें अभावग्रस्त होकर श्रीकृष्ण-विमुखता संग्रह करते हैं और भक्ति-विरोधी जड़ीय भावोंको ही भक्ति समझकर अनर्थग्रस्त हो जाते हैं। जिनकी अभी भक्तिमें रुचि जाग्रत नहीं हुई है, ऐसे भक्तोंके लिये विचारप्रधान-मार्ग यद्यपि उपयोगी है, तथापि रुचि जाग्रत करनेके लिये उन लोगोंके लिये नवधा भक्तिका प्रथम अङ्ग 'श्रवण' विशेष आवश्यक है। श्रीकृष्णविषयक सिद्धान्त श्रवण नहीं करनेसे रुचिमें वृद्धि नहीं होती है। नवधा भक्तिके प्रारम्भमें ही कीर्त्तनके पूर्व ही 'श्रवण' की व्यवस्था है। श्रवण-कीर्त्तनरूपी जलसे सींचनेसे भक्तिलता सुष्ठु (सुन्दर) रूपसे बढ़ती है। ब्रह्माजीने श्रीकृष्णकी स्तुति करते हुए जिस श्लोक (भाः १०/१४/३) में ज्ञानके प्रयासको त्याग करनेवाले भक्तोंकी अवस्थाका वर्णन किया है, उसी श्लोकमें ही 'सन्मुखरितां भवदीयवार्त्तां श्रुतिगतां' अर्थात् सत् पुरुषोंके मुखसे श्रीकृष्णकथाको श्रवण करनेकी महिमा कही है। परमहंसोंके अमल-ज्ञानको प्रदान करनेवाले श्रीमद्भागवतके विचारोंके अनुसार पठन-श्रवणादि करनेसे ही जीवको महाभागवत बननेका अधिकार प्राप्त होता है। श्रीमन्महाप्रभुकी सनातन-शिक्षामें हम लोग सुनते हैं- "शास्त्रयुक्त्ये सुनिपुण दृढ़श्रद्धा याँर। उत्तम अधिकारी तिँह तारये संसार॥" अर्थात् “भक्तिशास्त्रोंमें निपुण और भक्तिके इतर मार्गको त्याग करनेवालेको उत्तम अधिकारी कहते हैं तथा वह संसारका उद्धार करनेमें सक्षम है।" श्रीरूपगोस्वामीपादने भी कहा है- “उत्साहान्निश्चयाद्धैर्यात् तत्त्कर्मप्रवर्त्तनात्। सङ्गत्त्यागात् सतोवृत्तेः षड्भिर्भक्तिः प्रसिद्ध्यति॥" अर्थात् “आलस्य त्याग करके भक्तिवर्द्धक नियमोंमें उत्साह रखना, शास्त्र एवं शास्त्रानुकूल श्रीगुरुदेवके वचनोंमें दृढ़ विश्वास रखना; अनेक विघ्न-बाधा आनेपर भी अथवा अभीष्ट-सिद्धिमें विलम्ब होनेपर भी भक्तिके साधनोंमें धैर्य रखना; श्रवण, कीर्त्तन आदि भक्तिके अङ्गोंका पालन तथा श्रीकृष्ण-प्रीतिके लिये अपने भोग-विलासका वर्जन करना; भक्तिविरोधी अवैध स्त्रीसङ्ग, स्त्री-सङ्गीका सङ्ग, मायावादी, निरीश्वरवादी और धर्मध्वजी लोगोंका सङ्ग छोड़ देना; भक्तजनोंका-सा सदाचार और उनकी जैसी वृत्ति ग्रहण करना-इन छः प्रकारके साधनोंसे भक्तिकी सिद्धि होती है।" स्वयंमें भक्त होनेका अभिमान रखनेवाले सिद्धान्तहीन लोग

८४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

मूर्खतावशतः अनेक बार कृत्रिमरूपसे सात्त्विक-विकारोंका अभ्यासकर लोगोंकी दृष्टिमें वैष्णव-पदवीको हीन बनाते हैं। उनके इस प्रकार असत् अभ्यासकी निन्दास्वरूप उन्हें पाषाण-हृदयकी संज्ञा देते हुए श्रीमद्भागवत (२/३/२४) में “तदश्मसारं” श्लोक कहा गया है। इस श्लोककी टीकामें श्रीपाद चक्रवर्त्ती ठाकुरने कहा है,–“बहिरश्रुपुलकयोः सतोरपि यद्धृदयं न विक्रियेत, तदश्मसारमिति कनिष्ठाधिकारिणामेव अश्रुपुलकादिमत्त्वेऽपि अश्मसारहृदयतया निन्दैषा।” अर्थात् “यदि किसी व्यक्तिमें बाहरसे अश्रु-पुलक आदि विकार दिखायी दें, परन्तु हृदय विगलित नहीं हो, तो उसे पाषाण-हृदय ही समझना चाहिये। तथा कनिष्ठ अधिकारीके बाहरसे अश्रु-पुलकादि सात्त्विक विकारोंका प्रदर्शन करनेपर शास्त्र उन्हें पाषाण-हृदय कहकर निन्दा करते हैं।” सिद्धान्तका अनादर करनेपर जो कृत्रिम भक्ति देखी जाती है, उसका चित्रण श्रीरूप गोस्वामीप्रभुने भक्तिरसामृतसिन्धुमें इस प्रकार किया है,–“निसर्गापिच्छिलस्वान्ते तदभ्यासपरेऽपि च। सत्त्वाभासं बिनापि स्युः क्वाप्यश्रुपुलकादयः॥” अर्थात् “जिनका हृदय बाहरसे कोमल, परन्तु भीतरसे कठोर है और जो अश्रु-कम्पादिके अभ्यास परायण भी हैं, सत्त्वाभासके बिना भी उनमें कभी अश्रु-पुलकादि दिखायी देते हैं, ऐसे भाव ‘निःसत्त्व सात्त्विकाभास’ कहे जाते हैं।” कृत्रिमभक्त सिद्धान्तके अभावमें किस प्रकार मायिक विकारको अप्राकृत सोचते हैं, यह इसका ज्वलन्त उदाहरण है। अनेक लोग भक्तिविरोधी अद्वैतवादियोंके ग्रन्थोंकी आलोचनाके समान ही श्रीरामानुज-मध्वाचार्य-निम्बार्क-विष्णुस्वामी आदि वैष्णवाचार्योंके द्वारा लिखित सिद्धान्त-ग्रन्थोंके पठनकी निन्दा करते हैं। श्रीजीव गोस्वामीपादने इन वैष्णवाचार्योंके सुसिद्धान्तोंको वैष्णवोंके मङ्गलके लिये षट्सन्दर्भमें उद्धृत किया है। निर्विशेषवादी लोग जिस प्रकार भक्तिके अङ्गोंको भ्रमवशतः कर्मका अङ्ग समझते हैं, उसी प्रकार सिद्धान्तहीन वैष्णव-नामधारी लोग भक्तिके अनुकूल-सिद्धान्तोंको भी प्रतिकूल मानकर श्रीकृष्णभक्तिसे विच्युत हो जाते हैं॥११७॥ अमृताणुकणिका—जगत्में हम दो प्रकारके लोगोंको देखते हैं—सारग्राही और भारवाही। जो लोग किसी भी विषयमें भली-भाँति विचार ना करके केवल असार भागको ही ग्रहण करते हैं, उन्हें भारवाही कहते हैं। और जो किसी भी विषयमें सूक्ष्मरूपसे विचार करके सारभागको ही ग्रहण करते हैं, उन्हें सारग्राही कहा जाता है। सारग्राही व्यक्ति ही अपना परम कल्याण लाभ करके अन्तमें श्रीहरिके चरणकमलोंको प्राप्त करते हैं। किन्तु शास्त्रोंके सिद्धान्तोंको शास्त्रानुगत विचारोंके द्वारा हृदयमें दृढ़तासे धारण ना होनेसे विपरीत प्राकृत बुद्धि आकर हमें वास्तव तत्त्व वस्तुसे विच्युत कर देती है। इसलिये इस पयारमें श्रील कविराज गोस्वामीने सिद्धान्तको ठीकसे समझनेके लिये बल दिया है जिसके द्वारा भजनमें दृढ़ता आती है। इसी प्रकारसे श्रीगीता, श्रीमद्भागवत, वेदान्त, उपनिषद् आदि शब्द प्रमाणोंको यदि कोई सारग्राही होकर विचार करे, तो वह देखेगा कि भगवद्भक्तिको उक्त सभी शास्त्रोंमें चरम सिद्धान्तके रूपमें कहा गया है। जो शब्द-प्रमाणके इस प्रकार सुसिद्धान्तको भी मतवाद मानते हैं, वे देवीमायासे मोहित होकर स्वयं ही मतवादी हो जाते हैं। वैदिक मीमांसा शास्त्र दो भागोंमें विभक्त है। एक ही मीमांसा शास्त्रमें जैमिनीने पूर्व मीमांसा नाम देकर “अथातो धर्मजिज्ञासा” सूत्रकी अवतारणा

[ २/११७-११८ करके जिसके अभ्युदयको ही धर्मसिद्धान्त स्थापित किया है, उत्तर मीमांसामें वेदव्यासने उसीको पूर्वपक्ष करके "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" सूत्रकी अवतारणाके द्वारा परमेश्वर-भजनरूप कल्याणको ही सिद्धान्त कहकर स्थापित किया है। और सबसे अन्तमें "अनावृत्ति शब्दात्” सूत्रके द्वारा कल्याण-प्राप्त व्यक्तिकी पुनरावृत्ति नहीं होती, ऐसा शब्द-प्रमाणके द्वारा दिखलाया है। इसीके साथ ही सभी मतवादोंका भी खण्डन हो गया है। इसलिये सनातन धर्म सत्-सिद्धान्त अथवा सत्य-विचारमें सुप्रतिष्ठित है और तभी श्रील कविराज गोस्वामी यहाँ सिद्धान्त जाननेकी आवश्यकतापर बल दे रहे हैं। इसलिये जो अन्धविश्वासका ही अधिक सम्मान करते हैं, वे प्राकृत सहजिया अथवा वेषोपजीवीके दलमें सम्मिलित होकर अपने लिये नरकमें जानेका मार्ग ही प्रशस्त करते हैं। और कोई-कोई मनोधर्मके वशीभूत होकर जड़समन्वयवादी अथवा भारवाही साम्प्रदायिक होकर वास्तव सत्यसे बहुत दूर हो जाते हैं। भार्गवीय मनुसंहिताके अन्तमें भृगु ऋषियोंको कहा है- “आर्षं धर्मोपदेशञ्च वेदशास्त्राविरोधिना। यन्तर्केणानुसन्धत्ते सधर्मं वेद नेतरः ॥” अर्थात् “जो वेद और वेदमूलक स्मृति आदि धर्मोपदेशोंका वेदशास्त्र-अविरोधी तर्कके द्वारा अनुसन्धान करते हैं, वे ही धर्मको जानते हैं।” श्रील नरोत्तमदास ठाकुर महाशय कहते हैं- “मध्यस्थ श्रीभागवत पुराण। 'साधु शास्त्र गुरुवाक्य, हृदये करिया ऐक्य, आर ना करिह मने आशा ॥" ११७ ॥ चैतन्य-महिमा जानि ए सब सिद्धान्ते । चित्त दृढ़ हञा लागे महिमा-ज्ञान हैते ॥ ११८ ॥ अनुवाद-इन सब सिद्धान्तोंको जाननेसे ही श्रीचैतन्य महाप्रभुकी महिमाका ज्ञान होता है। उनकी महिमाका ज्ञान होनेसे चित्त उनके चरणकमलोंमें दृढ़तासे लगता है ॥ ११८ ॥ अनुभाष्य-पञ्चरात्रमें- “माहात्म्यज्ञानयुक्तस्तु सुदृढ़ं सर्वतोऽधिकः । स्नेहो भक्तिरिति प्रोक्तस्तया सार्ष्यादिर्नान्यथा ॥” “महिमज्ञानयुक्तः स्याद्विधिमार्गानुसारिणाम्। रागानुगाश्रितानास्तु प्रायशः केवलो भवेत्।” अर्थात् “जो भगवत्-महिमाके ज्ञानसे युक्त हैं, उनका स्नेह सभी प्रकारसे अधिक और सुदृढ़ है-इसीको भक्ति कहते हैं, जिसके द्वारा साष्टिं आदि चार प्रकारकी मुक्ति प्राप्त होती है, अन्यथा नहीं। विधिमार्गमें भजन करनेवालोंका स्नेह भगवत्-महिमाके ज्ञानसे युक्त होता है, किन्तु रागानुग-आश्रित भक्तोंका स्नेह प्रायः केवल अर्थात् भगवत्-महिमाके ज्ञानपर निर्भर ना रहकर स्वाभाविक होता है ॥" ११८ ॥ इति अनुभाष्ये द्वितीय परिच्छेद । दूसरे अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। ८६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

२/११९-१२१ ] श्रीचैतन्यमें निष्ठा उत्पन्न करानेके लिये ही श्रीकृष्णतत्त्वका वर्णन :- चैतन्यप्रभुर महिमा कहिबार तरे। कृष्णेर महिमा कहि करिया विस्तारे॥११९॥ जो श्रीकृष्ण, वे ही श्रीचैतन्य :- चैतन्य-गोसाञिर एइ तत्त्व निरूपण। स्वयं भगवान् कृष्ण व्रजेन्द्रनन्दन॥१२०॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी महिमाको प्रकाश करनेके लिये ही मैंने श्रीकृष्णकी महिमाका विस्तारसे वर्णन किया। श्रीचैतन्य महाप्रभुका तत्त्व-निरूपण यही है कि वे स्वयं भगवान् व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ही हैं॥११९-१२०॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥१२१॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे वस्तुनिर्देशमङ्गलाचरणे श्रीकृष्णचैतन्यतत्त्वनिरूपणं नाम द्वितीयः परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥१२१॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके आदिखण्डके मङ्गलाचरणमें वस्तुनिर्देशके अन्तर्गत श्रीकृष्णचैतन्यके तत्त्व-निरूपण नामक दूसरे अध्यायका अनुवाद समाप्त। ꩜ ꩜ ꩜ ꩜ ꩜ ꩜ ꩜ दूसरा अध्याय | ८७

तुलसीदलमात्रेण जलस्य चुलुकेन वा। विक्रीणीते स्वमात्मानं भक्तेभ्यो भक्तवत्सलः॥

तीसरा अध्याय तीसरे अध्यायका कथासार—इस अध्यायमें श्रीचैतन्य महाप्रभुके अवतारके कारणका विचार हुआ है। द्वापरके अन्तमें भगवान् श्रीकृष्ण अपनी लीला संवरण करनेके बाद यह चिन्तन करने लगे कि मैंने अपने भक्तोंके साथ दास्य, सख्य, वात्सल्य और शृङ्गार रसकी जो लीलाएँ पृथ्वीपर प्रकाशित की थीं, उनका आस्वादन जगत्‌के लोग किस प्रकार करेंगे? इसलिये प्रेमभक्ति-विषयक इन रसोंके आस्वादनकी प्रक्रियाको जगत्‌के लोगोंको दिखलानेके लिये वे स्वयं भक्तरूपमें अवतीर्ण हुए। नामसङ्कीर्तन कलियुगका प्रधान धर्म है, जिसे युगावतार भी प्रकाशित कर सकते हैं, किन्तु पूर्वोक्त चार प्रकारकी रसमय प्रेमभक्तिको साक्षात् श्रीकृष्णके अतिरिक्त उनके कोई भी अंशादि अवतारकी भी दान करनेकी क्षमता नहीं है। इसलिये साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्रने नवद्वीपमें जन्म ग्रहण किया। साक्षात् श्रीकृष्ण जो जन्म ग्रहण करेंगे, उसके प्रमाणस्वरूप ग्रन्थकारने श्रीमद्भागवतके वचनादिको उद्धृत किया है। महापुरुषोंके लक्षणोंके द्वारा श्रीचैतन्य महाप्रभुकी साक्षात् भगवत्ताको स्थापित किया गया है। श्रीकृष्णचैतन्यने अपने अङ्गों और उपाङ्गों अर्थात् श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीवासादि भक्तोंके साथ अवतीर्ण होकर जगत्‌में हरिभक्तिका प्रचार किया। श्रीचैतन्यावतार अन्य सभी अवतारोंकी अपेक्षा जगत्‌के लिये उपादेय (कल्याण करनेवाला) है, इसलिये यह सर्वाधिक गूढ़ है। केवल भक्त ही भक्तिके द्वारा उनके स्वरूपका दर्शन करने योग्य हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभुने अपने उपादेय तत्त्वको गोपन रखनेके अनेक उपाय किये, किन्तु उनके परम भक्तोंके सामने उनके अवतारका रहस्य गोपनीय नहीं रह सका। वेद-पुराणादि शास्त्रोंमें भी उनके अवतारको गोपन रखनेके लिये केवल इङ्गित वाक्यके द्वारा ही उनके भावी उदयका उल्लेख किया गया है। इस बातसे प्रच्छन्नावतारकी गूढ़ता और विशेष उपादेयता ही स्पष्ट होती है। श्रीअद्वैताचार्यने महाप्रभुके गुरुवर्ग (नाना और पिता) के समकालीन जगत्‌में प्रकट होकर देखा कि जगत्‌के लोग श्रीकृष्णभक्तिसे विहीन हो रहे हैं और ऐसी स्थितिमें कोई अंशावतार अवतीर्ण होकर जगत्‌के मङ्गलका विधान नहीं कर सकेंगे। साक्षात् श्रीकृष्णको यदि इस जगत्‌में अवतीर्ण करा सकूँ, तभी जगत्‌का कल्याण होगा। निरुपाधिक श्रीकृष्णतत्त्वको अवतीर्ण करानेके लिये वे श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें गङ्गाजल और तुलसीपत्र अर्पण करके हुङ्कार करने लगे। शुद्ध और सरल भक्तकी प्रार्थनापर श्रीकृष्णने उनके ध्येयकी पूर्तिके लिये अपने परम स्वरूपको प्रकट किया। इसलिये शुद्धभक्त श्रीअद्वैताचार्यकी प्रेमहुङ्कारसे जगत्‌में प्रेम-दान करनेके लिये गौराङ्ग महाप्रभुका अवतार हुआ। (अमृतप्रवाह भाष्य) भक्तिसिद्धान्त-सङ्कलनके लिये महाप्रभुकी वन्दना :— श्रीचैतन्यप्रभुं वन्दे यत्पादाश्रयवीर्यतः। संगृह्णात्याकरव्रातादज्ञः सिद्धान्तसन्मणीन्॥१॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह-भाष्य द्रष्टव्य है॥१॥ अमृतप्रवाह-भाष्य—जिनके चरणकमलोंके आश्रयकी शक्तिसे मूर्ख व्यक्ति भी शास्त्ररूपी

[ ३/१-३

खानोंसे सिद्धान्तरूपी उत्कृष्ट मणियोंको संग्रह करनेमें समर्थ होते हैं, उन श्रीचैतन्यप्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ॥१॥ अनुभाष्य-यह ग्रन्थकारके द्वारा स्वरचित श्लोक है- अज्ञः (मूर्खोऽपि) यत्पादाश्रय-वीर्यतः (यस्य श्रीचैतन्यस्य पादाश्रयप्रभावात्) आकरव्रातात् (धातूत्पत्तिस्थान- समूहात्) सिद्धान्त-सन्मणीन् (मीमांसारूप-सद्रत्नान्) संगृह्णाति (सम्यग् ग्रहणे समर्थो भवति) [तं] श्रीचैतन्यप्रभुम् [अहं] वन्दे। श्लोक-भावानुवाद-मूर्ख होनेपर भी व्यक्ति जिनके चरणकमलोंका आश्रय ग्रहण करनेके प्रभावसे धातु उत्पत्तिके स्थान (शास्त्ररूपी खानों) से सिद्धान्तरूप (मीमांसारूप) सुन्दर रत्नोंको सम्पूर्णरूपसे ग्रहण करनेमें समर्थ होते हैं, उन श्रीचैतन्य महाप्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ॥१॥ अमृतानुकणिका-इस अध्यायमें श्रीचैतन्य महाप्रभुके अवतारके गूढ़ कारणोंका विवेचन किया गया है। उन गूढ़ कारणोंके तात्पर्यका निर्णय करनेके लिये गम्भीर शास्त्रज्ञानकी आवश्यकता है। यहाँ ग्रन्थकार श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामीने दैन्यवशतः अपनेको 'अज्ञ' कहा है, अर्थात् मुझमें वैसा गम्भीर शास्त्रज्ञान नहीं है। तथापि 'यत्पादाश्रय-वीर्यतः'-इस पदके उल्लेखके द्वारा वे श्रीचैतन्यदेवके श्रीचरणकमलोंकी शरण ग्रहणकर उनके अवतरणके गूढ़ कारणोंका निर्णय करनेकी चेष्टा करेंगे। श्रीचैतन्यदेवके श्रीचरणोंकी शरण लेनेकी एक ऐसी अचिन्त्य-महिमा है, जिसके प्रभावसे अत्यन्त मूर्ख व्यक्ति भी विविध प्रकारके शास्त्रोंकी विवेचनाकर समस्त प्रकारके सार स्वरूप भक्ति-सिद्धान्तोंका संग्रह करनेमें समर्थ हो सकता है। महाप्रभुके श्रीचरणकमलोंका आश्रय लेनेकी महिमाको प्रकाशित करनेके लिये ही ग्रन्थकारने इस श्लोककी अवतारणाकी है। 'आकरव्रात' का अर्थ हैं-समस्त खानें जिनमें रत्नादि उत्पन्न होते हैं; इस श्लोकमें 'शास्त्रों' की खानोंसे और 'सिद्धान्तों' की मणियोंसे तुलनाकी गयी है। जिस प्रकार खानोंमें मणि-माणिक्य रहते हैं, किन्तु उन्हें ढूँढकर निकालना होता है, उसी प्रकार शास्त्रोंमें भी सार अर्थात् भक्ति-सिद्धान्त विद्यमान रहते हैं, जिन्हें शास्त्रोंकी विवेचनाके द्वारा प्राप्त किया जाता है। किन्तु स्वतन्त्ररूपसे शास्त्रोंकी आलोचना करने मात्रसे ही शास्त्र-सिद्धान्तोंको ढूँढ निकालना सम्भव नहीं है, इसलिये श्रीचैतन्य महाप्रभुके श्रीचरणोंमें शरणागत होकर अर्थात् श्रीचैतन्य अनुगत श्रीस्वरूप-रूपानुग-भक्तिविनोद-सारस्वत धाराका आश्रय लेनेसे अनायास ही शास्त्रोंके समस्त सार-सिद्धान्त तथा श्रीमन्महाप्रभुके अवतरणके गूढ़ रहस्य बोधगम्य हो सकते हैं॥१॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥२॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव की जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौर भक्तवृन्दकी जय हो॥२॥ तृतीय श्लोकेर अर्थ कैल विवरण। चतुर्थ श्लोकेर अर्थ शुन भक्तगण॥३॥ अनुवाद-तीसरे श्लोकके अर्थका विवरण मैंने पूर्व अध्यायमें दिया। हे भक्तजनों ! अब चौथे श्लोकका अर्थ सुनो॥३॥

९० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

३/४ ] प्रथम चौदह श्लोकोंमें चतुर्थ श्लोककी व्याख्या :— विदग्धमाधव (१/२)— अनर्पितचरीं चिरात् करुणयावतीर्णः कलौ समर्पयितुमुन्नतोज्ज्वलरसां स्वभक्तिश्रियम्। हरिः पुरटसुन्दरद्युतिकदम्बसन्दीपितः सदा हृदयकन्दरे स्फुरतु वः शचीनन्दनः॥४॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सुवर्ण कान्तिसमूहके द्वारा देदीप्यमान् शचीनन्दन श्रीगौरहरिकी सदा तुम्हारे हृदय-कन्दरामें स्फूर्ति हो। उन्होंने जिस सर्वोत्कृष्ट उज्ज्वलरसका दान कभी जगत्को नहीं किया, उसी निजभक्तिरूपी सम्पत्तिका दान करनेके लिये वे परमकुरुणावशतः कलियुगमें अवतीर्ण हुए हैं॥४॥ अनुभाष्य—श्रीरूपगोस्वामीने विदग्धमाधव-नाटकके प्रारम्भमें इस श्लोकके द्वारा जगत्के प्रति आशीर्वादपूर्वक मङ्गलाचरण किया है। श्रीरूपानुगवर ग्रन्थकार श्रील कविराज गोस्वामी भी यहाँ अपने अभीष्ट गुरुदेवके चरणकमलोंका अनुसरण कर रहे हैं— चिरात् (चिरकालं व्याप्य) अनर्पितचरीं (अदत्तपूर्वां) उन्नतोज्ज्वलरसां (उन्नत सम्बर्द्धितः उज्ज्वलः शृङ्गाररसो यस्यां तां) स्वभक्तिश्रियं (निजप्रेमशोभां) समर्पयितुं (सम्यक् दातुं) कलौ करुणयावतीर्णः (कृपया प्रपञ्चागतः) पुरटसुन्दरद्युतिकदम्बसन्दीपितः (सुवर्णोत्थसौन्दर्यकान्तिपुञ्जेन सम्यक् प्रकाशित यः सः) शचीनन्दन हरिः वः (युष्माकं) हृदयकन्दरे (चित्तगुहायां) सदा (सर्वस्मिन् काले अहर्निशं) स्फुरतु (प्रकाशयतु)। श्लोक-भावानुवाद—चिरकालसे अर्थात् ब्रह्माके एक दिनमें जिसको दान नहीं किया गया, उस सम्बर्द्धित शृङ्गाररसरूप अपने प्रेमकी शोभाको सम्पूर्णरूपसे दान करनेके लिये (कलियुगमें) जो करुणापूर्वक अवतीर्ण हुए हैं, स्वर्णसे उदित सौन्दर्यकान्तिके पुञ्जसे भलीभाँति प्रकाशित वे शचीनन्दन तुम लोगोंकी (चित्त) हृदयरूपी गुफामें रात-दिन अर्थात् निरन्तर प्रकाशित हों॥४॥ अमृतानुकणिका—ग्रन्थ लिखनेके प्रारम्भमें मङ्गलाचरण प्रयोजनीय है। मङ्गलाचरण करते हुए नमस्काररूप और वस्तुनिर्देशरूप मङ्गलाचरणकी भाँति आशीर्वादरूप मङ्गलाचरण भी आवश्यक है, अन्यथा मङ्गलाचरण सम्पूर्ण नहीं होता है। यह श्लोक श्रीरूपगोस्वामीके विदग्धमाधव नाटकके मङ्गलाचरणसे उद्धृत किया गया है। श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने नमस्कार रूप मङ्गलाचरण और वस्तु निर्देशरूप मङ्गलाचरणके श्लोकोंकी स्वयं रचना की, किन्तु आशीर्वादरूप मङ्गलाचरणके लिये स्वयं किसी श्लोककी रचना ना करके श्रीरूप गोस्वामीके रचित श्लोकको उद्धृत किया है। श्रीरूप गोस्वामीके इस श्लोकके द्वारा ही आशीर्वादरूप मङ्गलाचरण करनेका एक कारण है। श्रीरूप गोस्वामीने इस श्लोकमें श्रीमन्महाप्रभुके अवतारके एक कारणका उल्लेख किया है—उन्नत और उज्ज्वल रसमयी भक्तिकी शोभा दान करनेके लिये महाप्रभु अवतीर्ण हुए हैं। नीलाचलमें जब महाप्रभु अपने परिकरोंके साथ विदग्धमाधव नाटकका श्रवण और आस्वादन कर रहे थे, उस समय श्रीरूप गोस्वामीने इस श्लोकका उल्लेख किया था। इस श्लोकको सुनकर महाप्रभुने स्वाभाविक दैन्यवशतः इसे अपनी अति-स्तुति कहा था, किन्तु श्रीरूप तीसरा अध्याय | ९१

[ ३/४

गोस्वामीकी यह उक्ति भ्रान्त है, ऐसा महाप्रभुने नहीं कहा। महाप्रभुके सभी पार्षदोंने इस श्लोककी उक्तिका अनुमोदन किया था। महाप्रभु और उनके परिकरोंके द्वारा अनुमोदित महाप्रभुके अवतारके इस कारणका श्रीरूप गोस्वामीने इस श्लोकमें उल्लेख किया है। प्रसङ्गानुसार सङ्गत मानकर श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने श्रीरूप गोस्वामीके इस श्लोकको ही यहाँपर उद्धृत किया है। इस श्लोकमें महाप्रभुको श्रीकृष्णचैतन्य ना कहकर शचीनन्दन कहा गया है, वे श्रीशचीदेवीके गर्भसे प्रकट हुये हैं। सन्तानके प्रति माताका जैसा वात्सल्य रहता है, जीवोंके प्रति महाप्रभुका वैसा वात्सल्य है। माताके गुण सन्तानमें भी सञ्चारित होते हैं, इसलिये शचीमाता जो वात्सल्यकी परावधि हैं, उनकी सन्तान श्रीचैतन्यमें भी यह वात्सल्य प्रेम अत्यधिक होगा—ऐसा स्वाभाविक ही है। माताके नामसे इनका परिचय देनेपर उनके माताके गुणोंके समान या उनसे अधिक वात्सल्य ही यहाँ सूचित हो रहा है। 'अनर्पितचरीं चिरात्'—सहस्र चतुर्युग पर्यन्त ब्रह्माके एक दिनमें एक बार द्वापरके अन्तमें श्रीकृष्ण अवतार ग्रहण करते हैं। उसी द्वापरके परवर्ती कलियुगमें श्रीचैतन्य महाप्रभु अवतीर्ण होते हैं। पूर्वकल्पमें जब स्वयं-भगवान् श्रीकृष्णचैतन्य रूपमें अवतीर्ण हुए थे, तब एक बार यह उन्नत-उज्ज्वल रस दिया गया था। उसके बाद सैंकड़ों-सैंकड़ों अवतार रूपोंमें वे जगत्में अवतीर्ण हुए, किन्तु तब इस वस्तुको कभी भी नहीं दिया। यहाँ तक, द्वापरके श्रीकृष्णावतारमें भी इस असाधारण वस्तुको उन्होंने दान नहीं किया। स्वभावतः ही परम आस्वादनीय भक्ति वस्तुको एक अनिर्वचनीय आस्वादन चमत्कारिताके रसरूपमें सराबोर करके श्रीगौरसुन्दरने जीवोंके प्रति करुणावश होकर कलियुगमें श्रीचैतन्य महाप्रभुने इस उन्नत-उज्ज्वल रसका पात्र-अपात्रका विचार किये बिना यहाँ-तहाँ वितरण किया। हम लोग उनके चरणकमलोंमें एकान्त भावसे शरणागत होकर अनर्थ निवृत्तिके पश्चात् स्वरूपमें स्थित होकर इस रसका आस्वादन कर सकते हैं। महाप्रभुके आनेके पूर्व पाँच रसोंमें वैकुण्ठमें शान्त, दास्य और गौरवमिश्रित सख्य (निम्न-अर्द्ध)—इन अढ़ाई रसोंका विषय भगवद्भक्तोंको ज्ञात था। आत्माकी स्वाभाविक वृत्ति श्रीकृष्णका नित्य दास्य है। वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर हैं। जागतिक विचार-प्रणालीका अवलम्बन करके पहले भगवान्की सेवा होती थी, किन्तु जीवन्मुक्त पुरुष किस प्रकार भगवान्में अहैतुकी भक्ति विधान करते हैं, वह जगत्में अज्ञात था। उन्नत उज्ज्वल रसमें भगवान् हमारे निजजन हैं, इस विषयमें पहले नहीं जानकर भक्त लोग भगवान्की गौरव और मन्त्रोंके साथ सेवा करते थे। भगवान्की सख्य, वात्सल्य और मधुररसमें सेवा की जाती है, यह श्रीगौरसुन्दरके आविर्भावके पूर्व अज्ञात था। विश्रम्भ-सख्य (उच्च-अर्द्ध), वात्सल्य और मधुररसमें भगवान् श्रीकृष्णकी सेवाका किस प्रकारसे भली-भाँति रूपसे अनुशीलन करना चाहिये, उसका श्रीगौरसुन्दरने स्वयं आचरण करके सेवाभिलाषी जीवोंको शिक्षा प्रदान की है। मधुररसमें सेवाका उत्कर्ष एकमात्र श्रीगौरसुन्दरकी शिक्षामें ही प्राप्त होता है। भगवान्के मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन और राम अवतारोंमें जो सेवा प्रचलित है, उसके मूलमें गौरव मिश्रित सम्भ्रम सेवा है। इसलिये उसमें आत्माका सीमाबद्ध विकास ही है।

९२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

३/४ ] चिन्मय धामके विकृत प्रतिफलन इस जड़-जगत्में भी पाँच रसोंमें पाँच प्रकारकी सेवा देखी जाती है, किन्तु यह असम्पूर्ण और हेय अर्थात् तुच्छ है। श्रीकृष्ण ही सभी रसोंके मूल हैं। हम इन पाँच रसोंमें किसी रसमें अपने सिद्ध स्वरूपसे उनकी सेवा कर सकते हैं। किन्तु श्रीकृष्णके अन्य अवतारोंकी उस प्रकार विश्रम्भ सेवा सम्भवपर नहीं है। 'उन्नत-उज्ज्वल रस'—चित्-जगत्में भक्तोंका श्रीकृष्णके साथ पाँच भावोंमें सम्बन्ध है—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर अथवा शृङ्गार। इन्हें स्थायी भाव कहा जाता है। स्थायीभावके ऊपर सामग्रीका संयोग होनेपर कृष्णभक्तिरस होता है। साधारणतः भावरूपा भक्ति ही कृष्णरति है, जो भक्तोंके पूर्व और आधुनिक संस्कारोंके द्वारा हृदयमें उदित होकर स्वयं आनन्दरूपा होनेपर भी रसावस्थाको प्राप्त करती है। सामग्री चार प्रकारकी होती है—(१) विभाव, (२) अनुभाव, (३) सात्त्विक और (४) व्यभिचारी या सञ्चारी। रस एक अतुलनीय तत्त्व है। इसे साक्षात् परब्रह्म श्रीकृष्णका लीला-विकाशरूप चन्द्रोदय कहा जा सकता है। जिस समय कृष्णभक्ति पूर्ण शुद्ध होनेपर क्रियाकारता लाभ करती है, उस समय उसे भक्तिरस कहा जाता है। उन्नतका अर्थ है—उच्च। परन्तु किससे उन्नत, यह नहीं कहा गया है। इसलिये व्यापक अर्थमें ही उन्नत शब्दका अर्थ करना होगा अर्थात् जो सर्वापेक्षा उन्नत है, उसकी ही बात इस श्लोकमें कही गयी है। सर्वापेक्षा उन्नत यह रस क्या है? शान्तरसमें इष्टके प्रति ऐश्वर्य बुद्धिसे निष्ठा होती है, परन्तु ममता नहीं होती। वैकुण्ठ, अयोध्या, द्वारका और मथुरामें शान्तरस है, परन्तु ब्रजमें शान्तरसकी स्थिति नहीं है। दास्यरस वैकुण्ठ, अयोध्या, द्वारका, मथुरा एवं ब्रजमें निरन्तर प्रवाहित होता रहता है, परन्तु इन धामोंके सभी प्रकोष्ठोंमें एक विशेष प्रकारका तारतम्य है। ऐश्वर्य-परम्परामें वैकुण्ठसे अयोध्या, अयोध्यासे द्वारका और द्वारकासे ब्रजमें आते-आते ऐश्वर्यभाव क्षीण होता जाता है अर्थात् वैकुण्ठके दास्यभक्तोंमें जो ऐश्वर्य है, वह ब्रज तक आते-आते धूमिल हो जाता है। परन्तु प्रेम-माधुर्य और ममता अभिवर्द्धित होते जाते हैं। ब्रजके दास्यभक्तोंके मनको श्रीव्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णकी सेवाके अतिरिक्त कुछ भी आकर्षित नहीं कर सकता, जब कि वैकुण्ठ, अयोध्या, द्वारका एवं मथुराके दास्यभक्त ब्रजवासी दास्यभक्तोंकी सेवा देखकर लालायित हो उठते हैं। ऐसा भी नहीं कह सकते कि ब्रजमें ऐश्वर्य ही नहीं है, ब्रजमें अपितु सर्वाधिक ऐश्वर्य है, परन्तु असीम माधुर्यके द्वारा वह आच्छादित रहता है। ब्रजके दास्यभक्तों रक्तक-पत्रकादिमें शुद्ध दास्य होता ही नहीं, उसमें सख्य या वात्सल्यभाव मिश्रित रहता है। ब्रजके दास्यभक्तोंका एक वैशिष्ट्य यह भी है कि उनमें अन्य स्थानोंके दासोंकी भाँति शुद्ध सम्भ्रम नहीं रहता। ऐश्वर्य भावापन्न दास्यभक्त सेवा-अपराधका विचार करते हैं—अतः प्रेमकी बाढ़ वहाँ नहीं होती। दास्यप्रेममें सेवाका सम्यक् विकास नहीं होता। अयोध्याके सभी भक्तोंमें प्रायः दास्यभाव है, परन्तु इन दासोंमें हनुमानजी सर्वश्रेष्ठ हैं। जब अहिरावण छलकपटसे श्रीराम-लक्ष्मणकी बलि देनेके लिये उन्हें पातालमें ले आया, तब हनुमानजी उसका वहीं वधकर अपने प्रभुको अपने कन्धोंपर बिठाकर ले आये। परन्तु ब्रजके दास्यभक्तोंके समान वे अपने प्रभुको ना तो गोदीमें ले सकते हैं, ना ही उनका चुम्बन कर सकते हैं। द्वारकाके दास्यभक्तोंको अयोध्याके दास्यभक्तोंसे श्रेष्ठ माना जाता है, परन्तु इनमें भी सख्यताकी गन्ध भी नहीं होती। तीसरा अध्याय | ९३

[ ३/४ जो भक्त प्रेमकी अधिकतामें श्रीकृष्णको अपने समान समझते हैं, किसी भी प्रकार श्रीकृष्णको अपनेसे श्रेष्ठ नहीं मानते, वे श्रीकृष्णके सखा कहे जाते हैं। शान्तकी निष्ठा, दास्यभावकी ममतायुक्त सेवा और सख्यभावकी विश्रम्भ सेवा इस सख्यप्रेममें विद्यमान है। तुलनात्मक दृष्टिसे दास्यप्रेममें ममता होनेपर भी यह सम्भ्रम बना रहता है कि वे प्रभु हैं-मैं उनका सेवक हूँ और श्रीकृष्णमें भी प्रभुता बनी रहती है। वैकुण्ठ, अयोध्या, द्वारका, मथुरा आदिमें सभी सखागण श्रीकृष्ण और श्रीरामको भगवान् मानते हैं। जब कि व्रजके सख्यप्रेममें भक्तका यह विश्रम्भ भाव रहता है कि कृष्ण मेरे समान ही एक गोप बालक है, वह किसी भी प्रकार मुझसे श्रेष्ठ नहीं। सखा उनकी शय्यापर चढ़कर उन्हें जगा देते हैं और कहने लगते हैं-'कन्हैया ! तू अभी तक सो रहा है, देख गोचारणका समय निकला जा रहा है।' यही विश्रम्भ सख्यके समभावका प्रतीक है। सखा तो द्वारकामें अर्जुन आदि भी हैं, परन्तु वे ऐसा कभी नहीं कर सकते। श्रीकृष्ण जैसे ही अपना विराट् स्वरूप दिखलाते हैं, अर्जुन काँप जाते हैं, हाथ जोड़ने लगते हैं। इसी प्रकार अयोध्यामें सुग्रीव, विभीषण, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न सखा और भाई होनेपर भी श्रीरामके साथ ऐसा कभी नहीं कर सकते। भरत-लक्ष्मण-शत्रुघ्न श्रीरामके साथ एक आसनपर भी नहीं बैठ सकते, श्रीरामके प्रति सम्भ्रम एवं गौरवबुद्धिके कारण उनमें व्रजके सखाओं जैसा आत्मीयतापूर्ण विश्रम्भ भाव सम्भव ही नहीं है। व्रजमें सख्य है, प्रीति है, ममता है, माधुर्य है। शान्त एवं दास्यभक्त भगवान्‌के अधीन होते हैं, परन्तु सख्यरससे भगवान् भक्तके अधीन होने लगते हैं। नित्यसिद्ध-परिकरोंमें माता-पिताके रूपमें जो परिकर स्वयंको श्रीकृष्णसे बड़ा मानते हैं और श्रीकृष्णको अपना लाल्य या अनुग्रहका पात्र समझते हैं—उनके इसी लाल्य-भावको वात्सल्यप्रेम कहा जाता है। इसमें सख्यरससे भी अधिक ममता होती है। वात्सल्यमें शान्तकी निष्ठा, दास्यकी सेवा और सख्यका निःसङ्कोच सख्यभाव तो रहता ही है, अधिकन्तु श्रीकृष्णको पाल्य और अपनेमें पालकका ज्ञान भी रहता है, जो ताड़न-भर्त्सन-बन्धन तक भी पहुँच जाता है। सर्वैश्वर्य पूर्ण स्वयं भगवान् होनेपर भी श्रीकृष्णने माँ यशोदाके बन्धनको स्वीकार किया था-केवल माँ यशोदाके प्रेमके वशीभूत होकर। जो विभु वस्तु हैं, जिनका बाहर-भीतर, ऊपर-नीचे कुछ भी नहीं—उन्हें कौन बाँध सकता है? परन्तु ममता बुद्धिकी अत्यधिकतासे श्रीकृष्णको अपना लाल्य और अपनेको लालक-पालक समझकर पुत्र कृष्णके मङ्गलके लिये उसे बाँध दिया। अथवा नहीं, वात्सल्यप्रेमके द्वारा वे स्वयं बँध गये। यही यशोदाके प्रति उनका अनुग्रह है। अपनी अगणित लीलाओंमें श्रीकृष्ण कहीं नहीं बँधे। जब वे शान्तिदूत बनकर हस्तिनापुर गये थे, तब दुर्योधनने उन्हें पाशमें बाँधनेका प्रयत्न किया था, परन्तु श्रीकृष्णका विराट् विश्वरूप देखकर वह स्वयं तथा सभी सभासद भयभीत हो गये। देवकी, कौशल्यादिके द्वारा भी भगवान्‌का बन्धन दिखायी नहीं देता। किन्तु माँ यशोदाके हाथोंसे रस्सीसे उनका बँध जाना यह सूचित करता है कि नन्द-यशोदा जैसा लौकिक सद्बन्धुवत् सम्बन्ध कहीं भी नहीं है। शान्तमें ममताका अभाव, दास्यमें विश्रम्भ या विश्वासका अभाव, सख्यमें लालन-पालनका ९४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

३/४ ] अभाव और वात्सल्यरसमें निःसङ्कोच सर्वाङ्गसे सेवाभावका अभाव होनेके कारण प्रेमकी पूर्णता उन-उन रसोंमें नहीं होती। मधुररसमें जब श्रीकृष्णके प्रति कान्ताभाव हृदयमें उदित हो जाता है, तब सारे अभावोंका अभाव हो जाता है अर्थात् सारे अभाव पूर्ण हो जाते हैं, और अखण्ड प्रेमतत्त्वका स्रोत अहर्निश बहने लगता है। कान्ताप्रेमसे तात्पर्य है-व्रजगोपियोंका श्रीकृष्णके प्रति प्रेम। शान्तका गुण श्रीकृष्ण-निष्ठा, दास्यादिकी भाँति सेवा, सख्यकी विश्रम्भ सेवा एवं वात्सल्यकी मङ्गलकामना एवं प्रेमाधीन होकर कृष्णका लालन-पालन आदि सभी गुण तो इसमें होते ही हैं, अधिकन्तु मधुरभावसे युक्त होकर सर्वांगके द्वारा सेवाका अवसर इसी रसके द्वारा उपलब्ध हो सकता है। इन सब कारणोंसे दास्यकी अपेक्षा सख्य और सख्यकी अपेक्षा वात्सल्य और वात्सल्यकी अपेक्षा मधुररसमें रसास्वादनकी चमत्कारिता और प्रेमवशियता अधिक है, इसलिये मधुररस सर्वोन्नत है। इस कान्ताप्रेमके मध्य श्रीराधाका प्रेम सर्वशिरोमणि है जिसकी महिमा सम्पूर्ण शास्त्रोंमें वर्णित है। साधकोंके लिये इस मुकुटमणि राधाप्रेमको ग्रहण करना असम्भव है, लेकिन इसके अनुगत कृष्णप्रेमके अत्युच्च भावको जीव सिद्धावस्थामें प्राप्त करने योग्य हो जाता है। इसी भावको इस श्लोकमें 'स्वभक्तिश्रियं' कहा गया है। स्वभक्तिश्रियं - निज भक्तिकी शोभा। निजभक्ति अर्थात् श्रीराधिकाकी श्रीकृष्णके प्रति प्रेमरूपी लता। पत्ते-मञ्जरियाँ आदि रहनेसे ही लताकी शोभा होती है। इसी प्रकार ही जो सदा श्रीराधिकाका श्रीकृष्णसे मिलनकी चेष्टापरायण हैं और उनके मिलनमें सभी प्रकारसे निसङ्कोच सेवारत हैं, ऐसी सखियाँ (मञ्जरियाँ) ही श्रीराधिका प्रेमकी शोभा हैं। साधनावस्थामें राधिकाकी सखियाँ (मञ्जरीभाव) ही अनुसरणीय है। जीव स्वरूपतः श्रीकृष्णका दास है। आनुगत्यमयी सेवामें ही दासका अधिकार है, स्वातन्त्र्यमयी सेवामें दासका अधिकार नहीं है। श्रीराधिकादि व्रजसुन्दरियोंकी श्रीकृष्णसेवा स्वातन्त्र्यमयी है; इस प्रकार सेवामें जीवका अधिकार नहीं है। तो भी श्रीकृष्णकी कान्ताभाववती व्रजसुन्दरियोंके आनुगत्यमें-उनकी अनुगत दासीरूपमें श्रीकृष्णकी प्रीति विधानोपयोगी लीलाको आनुकूल्य करके जीव श्रीकृष्णकी सेवा कर पाता है। इस जातीय सेवाके अनुकूल उन्नत-उज्ज्वल-रसस्वरूपा जो प्रेमभक्ति है, उसे ही श्रीकृष्णचैतन्यने जीवोंको प्रदान किया। इस आनुगत्यमयी सेवामें जो सुख है, उसकी कहीं भी तुलना नहीं है। श्रीकृष्णके साथ व्रजसुन्दरियोंके सङ्गम-सुखकी अपेक्षा भी श्रीकृष्ण सेवाका सुख अनेक गुणा लोभनीय है। (अन्त्य २०/६०)- “कान्त-सेवा-सुखपूर, सङ्गम हैते सुमधुर, ताते साक्षी-लक्ष्मी ठाकुराणी। नारायण-हृदि स्थिति, तबु पादसेवाय मति, सेवा करे 'दासी'-अभिमानी॥” अर्थात् “कान्तकी सेवामें ही पूर्ण आनन्द है। सङ्गमसे भी यह अति सुमधुर है, इस बातकी साक्षी स्वयं लक्ष्मी ठाकुरानी हैं। यद्यपि नारायणका उनसे अपार प्रेम होनेके कारण उनकी स्थिति सदा नारायणके हृदयमें है, तथापि उनकी रति-मति नारायणके पादसेवनमें ही है और वे सदा दासी अभिमानसे उनकी सेवा करती हैं।” इस श्लोकमें ग्रन्थकारके आर्शीवादका मर्म इस प्रकार है- श्रीकृष्णचैतन्य सभीके हृदयमें तीसरा अध्याय | ९५

[ ३/४-७ स्फुरित होकर ब्रजसुन्दरियोंके आनुगत्यमें श्रीकृष्ण-सेवा करनेके निमित्त सभीकी लालसा जागृत करें ॥४॥ अवतारकाल वर्णन :- पूर्ण भगवान् कृष्ण व्रजेन्द्रकुमार। गोलोके ब्रजेर सह नित्य विहार ॥५॥ ब्रह्मार एकदिने तिँहो एकबार। अवतीर्ण हञा करेन प्रकट विहार ॥६॥ अनुवाद-व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ही पूर्ण भगवान् हैं। व्रजधाम समन्वित गोलोकमें वे नित्य विहार करते हैं। ब्रह्माके एक दिनमें वे एक बार इस जगत्में अवतीर्ण होकर प्रकट-लीला करते हैं॥५-६॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिन व्रजेन्द्रकुमार श्रीकृष्णको पिछले अध्यायमें पूर्ण भगवान् कहकर प्रमाणित किया गया है, वे गोकुलके वैभवरूप गोलोकमें व्रजरस (दास्य-सख्य-वात्सल्य-शृङ्गाररस) के सभी उपकरणों (धाम-परिकरादि) के साथ नित्य विहार करते हैं। इसीका नाम अप्रकट-विहार है, क्योंकि यह बद्धजीवोंको दृष्टिगोचर नहीं है। जगत्में अवतीर्ण होकर प्रतिकल्पमें अर्थात् ब्रह्माके एक-एक दिनमें वे एक बार प्रकट-विहार करते हैं॥५-६॥ अमृतानुकणिका-स्वयं भगवान् श्रीगोविन्दका सर्वोपरि-स्थित, नित्यानन्द-लीलापूर्ण परमधाम गोलोक है। इस स्वधाम गोलोकमें वे स्वयंरूप, स्वयंप्रकाश और परिकरोंके साथ सतत विविध प्रेमलीलामें मग्न होकर परमानन्दसे विराज करते हैं। इस गोलोकके अन्य नाम-श्वेतद्वीप, श्रीवृन्दावन, श्रीगोकुल और व्रजधाम हैं (आदि ५/१७)। गोलोक और गोकुलमें कोई भी भेद नहीं है। श्रीकृष्णकी अचिन्त्य शक्तिसे गोलोक जब प्रपञ्चमें प्रकटित होता है, तब उसे ही भौम-गोकुलादि कहते हैं। प्रपञ्चमें प्रकाशित होनेपर भी गोकुल चिन्मयधामरूपमें वर्तमान होता है। वह किसी प्रकारसे जड़-देश-कालादिके द्वारा कुण्ठित होकर अपने वैकुण्ठ-तत्त्व-रूप अविकुण्ठ अवस्थासे च्युत नहीं होता। किन्तु मायिक जीव जड़ेन्द्रियोंसे उसके उस अविकुण्ठ स्वरूपका दर्शन नहीं कर पाते, उसको भी सदोष प्रपञ्चके समान ही देखते हैं। इसलिये प्रपञ्चागत गोकुल-नायक श्रीकृष्णको भी वे साधारण मनुष्य रूपमें देखते हैं। किन्तु विज्ञानयुक्त बुद्धिमान् महात्मा दोनोंको एक समान प्रत्यक्ष दर्शन करते हैं। श्रील रूपगोस्वामीने लघुभागवतामृतम्में कहा है- “यत्त गोलोकनाम स्यात् तच्च गोकुल-वैभवम्।” अर्थात् गोलोक गोकुलका वैभव है। किन्तु ऐसा होनेपर भी, बद्धजीवके पक्षमें भौम-गोकुलकी उपयोगिता ही अधिक है। उसका प्रभाव साक्षात् सम्बन्धसे हमारे जैसे जीवोंके ऊपर अधिक कार्यकारी है। भूलोक-अवतरित गोकुल-वृन्दावन ही हमारा परम आशा-स्थल है॥५-६॥ सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि-चारियुग जानि। सेइ चारियुगे दिव्य एकयुग मानि ॥७॥ ९६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

३/७-१० ] एकात्तर चतुर्युगे एक मन्वन्तर। चौद्द मन्वन्तर ब्रह्मार दिवस भितर ॥८॥ अनुवाद—सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि, ये चार युग होते हैं। ये चारों युग मिलकर एक दिव्य-युग कहलाते हैं। इकहत्तर चतुर्युगोंका एक मन्वन्तर होता है और ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मन्वन्तर होते हैं॥७-८॥ अनुभाष्य—[“चतुर्युगमुदाहृतम्। सूर्याब्दसंख्यया द्वित्रिसागरैरयुताहतैः। युगानां सप्ततिः सैका मन्वन्तरमिहोच्यते॥ ससन्ध्यस्ते मनवः कल्पे ज्ञेयाचतुर्दश। कृतप्रमाणः कल्पादौ सन्धिः पञ्चदशः स्मृतः॥ इत्थं युगसहस्रेण भूतसंहारकारकः। कल्पो ब्राह्ममहः प्रोक्तं शर्वरी तस्य तावती॥”—सूर्यासिद्धान्ते मध्यमाधिकारः] अर्थात् “चार लाख बत्तीस हजार (४,३२,०००) सौरवर्षोंका एक कलियुग होता है। कलियुगसे दो गुणा द्वापरयुगका [८,६४,००० सौरवर्षोंका], तीन गुणा त्रेतायुगका [१२,९६,००० सौरवर्षोंका] और चार गुणा सत्ययुगका [१७,२८,००० सौरवर्षोंका] काल है। इसलिये चतुर्युग (सत्य, त्रेता, द्वापर और कलियुग) का कुल परिमाण तैंतालीस लाख बीस हजार (४३,२०,०००) सौरवर्ष है; इसीको एक महायुग कहा जाता है। इस महायुगको दिव्ययुग भी कहते हैं। इकहत्तर महायुगोंका एक मन्वन्तर होता हैं। चौदह मन्वन्तरोंका काल (१४x७१=) नौ सौ चौरानवे (९९४) महायुग है। इन चौदह मन्वन्तरोंके अन्तर्गत पन्द्रह सत्ययुगके परिमाणका सन्धिकाल होता है। यह सन्धिकाल अर्थात् पन्द्रह सत्ययुगोंके परिमाणका काल [१५x१७,२८,०००=२,५९,२०,००० सौरवर्ष] छह महायुगोंके काल [६x४३,२०,०००=२,५९,२०,००० सौरवर्ष] के बराबर होता है। इस प्रकार चौदह मन्वन्तरों और तदन्तर्गत सन्धिकालको मिलाकर एक हजार महायुगोंके कालके बराबर ब्रह्माका एक दिन अथवा एक कल्प होता है और इतने ही कालके बराबर ब्रह्माकी रात्रि होती है॥”७-८॥ ‘वैवस्वत’-नाम एइ सप्तम मन्वन्तर। साताइश चतुर्युग गेले ताहार अन्तर ॥९॥ अनुवाद—वर्तमान सप्तम मन्वन्तरका नाम ‘वैवस्वत’ है और इसके सत्ताईस चतुर्युग बीत चुके हैं॥९॥ अनुभाष्य—वैवस्वत-नामके सातवें मनुके मन्वन्तरमें श्रीमन्महाप्रभुका आविर्भाव होता है। “स्वायम्भुवाख्यो मनुराद्य आसीत्, स्वारोचिषश्चोत्तम-तामसाख्यौ। जातौ ततो रैवतचाक्षुषौ च वैवस्वतः सम्प्रति सप्तमोऽयम्॥ सावर्णिर्दक्षसावर्णिर्ब्रह्मसावर्णिकस्ततः। धर्मसावर्णिको रुद्रपुत्रो रौच्यश्च भौत्यकः॥” (१) स्वायम्भुव, (२) स्वारोचिष, (३) उत्तम, (४) तामस, (५) रैवत, (६) चाक्षुष, (७) वैवस्वत, (८) सावर्णि, (९) दक्षसावर्णि, (१०) ब्रह्मसावर्णि, (११) धर्मसावर्णि, (१२) रुद्रपुत्र (सावर्णि), (१३) रौच्य (देवसावर्णि) और (१४) भौत्यक (इन्द्रसावर्णि)—ये चौदह मनु हैं। प्रत्येक मनुका भोगकाल इकहत्तर महायुग है॥९॥ अष्टाविंश चतुर्युगे द्वापरेर शेषे। व्रजेर सहिते हय कृष्णेर प्रकाशे ॥१०॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१०॥ तीसरा अध्याय | ९७

[ ३/१०-१३ अमृतप्रवाह भाष्य-वैवस्वत-मन्वन्तरके अट्ठाइसवें चतुर्युगमें द्वापरके अन्तमें श्रीकृष्ण अपने ब्रजतत्त्वके समस्त उपकरणों (धाम-परिकरादि) को लेकर प्रकट होते हैं॥१०॥ अनुभाष्य-वैवस्वत मन्वन्तरके इकहत्तर महायुगोंमें सत्ताइस महायुग पूर्ण होनेके बाद अट्ठाइसवें चतुर्युगमें सत्य और त्रेतायुगके बाद द्वापरके अन्तमें श्रीकृष्णका आविर्भाव होता है। उस समय तक ब्रह्माका दिन प्रारम्भ होनेसे लेकर सन्धिसहित छह मनुओंके पूर्ण भोगकाल और वैवस्वत मनुके सत्ताईस महायुग तथा सत्य, त्रेता एवं द्वापरयुगके अन्ततक कुल (सृष्टिकालको छोड़कर) सौरवर्षकी संख्यासे एक अरब सत्तानवे करोड़ तिरपन लाख बीस हजार (१,९७,५३,२०,०००) वर्ष व्यतीत हो चुके होते हैं॥१०॥ शान्तरसके अतिरिक्त चार प्रकारके मुख्यरस :- दास्य, सख्य, वात्सल्य, शृङ्गार-चारि रस। चारि भावे भक्त यत, कृष्ण तार वश ॥ ११॥ अनुवाद-दास्य, सख्य, वात्सल्य और शृङ्गार-ये चार प्रकारके रस हैं। इन चार भावोंके जितने भक्त हैं, श्रीकृष्ण उनके द्वारा वशीभूत होते हैं॥११॥ अमृतप्रवाह भाष्य-रस ही कृष्णलीलाके प्रकरण (मूल आधार) हैं। शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और शृङ्गार नामक पाँच प्रकारके रस हैं। उसमेंसे दास्य, सख्य, वात्सल्य और शृङ्गाररस-इन चार प्रकारके रसोंके भक्तोंके द्वारा ही श्रीकृष्ण सम्पूर्णरूपसे वशीभूत होते हैं॥११॥ अनुभाष्य-यहाँपर 'शान्त' रसका उल्लेख नहीं करनेका कारण यह है-यद्यपि जड़जगत्में शान्तरस सबसे उच्चस्थानमें अवस्थित है, तथापि चित् जगत्में इसका स्थान सबसे निम्न है। शान्तरस अप्राकृत होनेपर भी इस रसके आलम्बन विषय (भगवान्) और आश्रय (भक्त) में परस्पर ज्ञेय और ज्ञातृ-भावका विनिमय नहीं है। इसलिये दास्यसे सख्यमें, सख्यसे वात्सल्यमें और वात्सल्यसे मधुर रसमें श्रीकृष्णप्रीतिके उत्कर्षका तारतम्य विद्यमान है॥११॥ दास-सखा-पिता-माता-प्रेयसीगण लञा। व्रजे क्रीड़ा करे कृष्ण प्रेमाविष्ट हञा॥१२॥ अनुवाद-व्रजमें श्रीकृष्ण प्रेममें आविष्ट होकर अपने दास, सखा, पिता-माता तथा प्रेयसियोंके साथ लीलाएँ करते हैं॥१२॥ अमृतानुकणिका-'दास'-श्रीकृष्णके दास्यभावके भक्त नन्द महाराजके सेवक रक्तक-पत्रकादि; 'सखा'-सख्यभावके भक्त सुबल-मधुमङ्गलादि; 'पिता-माता'-वात्सल्य भावके भक्त, नन्द महाराज श्रीकृष्णके नित्य पिता और यशोदा उनकी नित्य माता; 'प्रेयसीगण'-मधुर भावके भक्त, श्रीराधादि व्रजसुन्दरियाँ ॥ १२ ॥ औदार्यप्रधान गौर-अवतारकी सूचना :- यथेष्ट विहरि' कृष्ण करे अन्तर्धान। अन्तर्धान करि' मने करे अनुमान ॥ १३ ॥ ९८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

३/१३-१६ ] चिरकाल नाहि करि प्रेमभक्ति दान। भक्तिबिना जगतेर नाहि अवस्थान॥१४॥ जगत् वैधीभक्तिके द्वारा ही परिचालित; इसलिये श्रीकृष्णप्रेमसे अनभिज्ञ :- सकल जगते मोरे करे विधि भक्ति। विधि-भक्त्ये व्रजभाव पाइते नाहि शक्ति॥१५॥ ऐश्वर्य-ज्ञाने सब जगत् मिश्रित। ऐश्वर्य-शिथिल-प्रेमे नाहि मोर प्रीत॥१६॥ अनुवाद- श्रीकृष्ण प्रकटलीलामें यथेष्ट विहार करके जब अन्तर्धान हो गये, तब वे मनमें कुछ विचार करने लगे, - “मैंने चिरकालसे इस प्रेमभक्तिका दान जगत्में नहीं किया है, भक्तिके बिना जगत्के अस्तित्त्वका कोई प्रयोजन नहीं है, अर्थात् भक्तिके बिना जीवोंका इस संसारसे उद्धार नहीं होगा। सारा जगत् मेरी वैधी अर्थात् शास्त्रके शासनानुसार भक्ति करता है, किन्तु वैधी-भक्तिसे व्रजभावको प्राप्त करना सम्भव नहीं है। सारे जगत्की भक्ति मेरे ऐश्वर्य-ज्ञानसे मिश्रित है, किन्तु इस ऐश्वर्यज्ञानसे शिथिल प्रेममें मेरी प्रीति नहीं है॥१३-१६॥ अमृतप्रवाह भाष्य- [श्रीकृष्ण विचार कर रहे हैं]- अभी तक मैंने जगत्को अपनी प्रेमभक्तिका दान नहीं किया है। शास्त्रोंका अध्ययनकर जगत्में सभी लोग वैधीभक्तिके द्वारा मेरा भजन करते हैं। किन्तु मेरा परमभाव जो व्रजभाव है, उसे वैधीभक्तिके द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। वैधीभक्तिमें ऐश्वर्यज्ञान ही प्रबल है। ऐश्वर्यभावसे प्रेम शिथिल हो जाता है अर्थात् प्रेममें गाढ़ता नहीं रहती। इसलिये ऐसे प्रेममें मेरी प्रीति नहीं है॥१४-१६॥ अमृताणुकणिका- अप्रकट गोकुलका ही एक प्रकाश मायिक-ब्रह्माण्डमें जब लोगोंके दृष्टिगोचर होता है, तब उसे प्रकट-प्रकाश कहते हैं। इस प्रकट प्रकाशमें सभी लीलाएँ करनेके बाद श्रीकृष्ण जब अप्रकट-प्रकाशके साथ प्रकट-प्रकाशको एकीभूत करते हैं, तब मायिक ब्रह्माण्डमें लीला दिखायी नहीं देती; यही प्रकट-लीलाका अन्तर्धान होना है। श्रीकृष्ण जब ब्रह्माण्डमें लीला प्रकट करते हैं, तब भी अप्रकट गोकुलमें एक स्वरूपसे नित्य परिकरोंके साथ लीला करते हैं। परिकर भी एक स्वरूपसे अप्रकट गोकुलमें और एक स्वरूपसे प्रकट लीलामें रहते हैं। बृहद्भागवतामृतम् (२/५/५२, २/५/५४) में श्रीसनातन गोस्वामीने भी श्रीनारदकी उक्तिमें यह प्रकाश किया है- “यथा हि भगवानेकः श्रीकृष्णो बहुमूर्त्तिभिः। बहुस्थानेषु वर्त्तत तथा तत्सेवका वयम्॥५२॥ सर्वेऽपि नित्यं किल तस्य पार्षदाः, सेवापराः क्रीड़नकानुरूपाः। प्रत्येकमेते बहुरूपवन्तोऽ- प्यैक्यं भजामो भगवान् यथासौ ॥” ५४॥ अर्थात् “जिस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण एक होते हुए भी भिन्न-भिन्न स्थानोंपर भिन्न-भिन्न मूर्तियोंमें विराजमान रहते हैं, उसी प्रकार उनके सेवक हम भी अनेक स्थानोंपर अनेक स्वरूपोंसे रहते हैं। हम सभी भगवान्के नित्य पार्षद हैं और सर्वदा उनकी सेवामें तत्पर रहते हैं। प्रभु तीसरा अध्याय | ९९

[ ३/१३-१६

जब जैसी क्रीड़ा करनेकी इच्छा करते हैं, हम भी प्रभुकी उस क्रीड़ाके अनुरूप स्वरूप धारण करते हैं। इसलिये भगवान्‌की भाँति हमारा भी एक स्वरूप होते हुए भी हम अनेक स्वरूप धारण करते हैं।” एक ही पार्षदकी इस प्रकार बहुमूर्ति होनेपर भी ऐक्यकी हानि नहीं होती। प्रकट-व्रजके परिकरोंका अप्रकट-गोकुलमें स्थित उस-उस स्वरूपके साथ एकीभूत हो जाना ही प्रकट-लीलाका अन्तर्धान है। 'भक्तिबिना जगतेर नाहि अवस्थान' - मायिक वस्तुओंमें अभिनिवेशके कारण ही जीव नाना योनियोंमें भ्रमण करते हुए अनेक दुःख भोग करता है। इसलिये किसी भी एक अवस्थामें तब तक जीव नित्य अवस्थान नहीं कर पाता। केवल ज्ञान-कर्म-योगादिसे अनावृत शुद्धभक्तिके द्वारा ही मायिक अभिनिवेश दूर होनेपर जीव अपने स्वरूपमें अवस्थित हो सकता है। भक्तिकी सहायतासे योग-ज्ञानादिके द्वारा मोक्ष प्राप्त करने पर भी जीवका आत्यन्तिक कल्याण नहीं होता। मुक्त होनेपर भी जीवकी तब प्रेमभक्तिसहित श्रीकृष्ण सेवाकी भावना उत्पन्न हो सकती है, क्योंकि उसे अपनी उस मुक्तावस्थामें भी परितृप्ति नहीं होती। श्रीकृष्ण सेवाके निमित्त मुक्त जीवोंमें वे किसी-किसीकी भजन करनेकी बात सुनी जाती है। 'मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भगवन्तं भजन्ते'। - नृसिंहतापनी २/५/१६का शङ्करभाष्य। इसलिये अपनी-अपनी अवस्थामें मुक्त पुरुषोंका भी ऐकान्तिक अवस्थान नहीं दिखायी देता है। (भागवत १०/८९/५९) कारणोदशायी विष्णु-वचन-'द्विजात्मजा मे युवयोर्दिदृक्षुणा मयोपनीता' अर्थात् 'श्रीकृष्ण और अर्जुन ! मैं तुम दोनोंके दर्शनके लिये ही ब्राह्मणके बालक अपने पास लाया था।' और (भागवत १०/१६/३६) नागपत्नियोंके वचन- 'यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाचरत् तपो, विहाय कामान् सुचिरं धृतव्रता' अर्थात् 'हे देव ! जिस पद-रेणुकी प्राप्तिकी आशासे ललना लक्ष्मीजीने समस्त विषय-भोगोंका परित्याग करके बहुत दिनोंतक व्रत-नियमोंको धारण करते हुए तपस्या की थी'; इन श्लोकोंसे यह समझा जाता है कि व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णका सर्वचित्तहारी माधुर्य परव्योममें स्थित भगवत्-स्वरूपों और उनकी लक्ष्मियोंको भी आकर्षित करता है। तब जिन्होंने ऐश्वर्यज्ञानमिश्रा भक्तिके साधनसे सालोक्यादि चार प्रकारकी मुक्ति प्राप्त करके परव्योममें वास करनेका सौभाग्य प्राप्त किया है, श्रीकृष्ण-माधुर्यकी कथा सुनकर उसके आस्वादनका लोभ उनके भी चित्तको चञ्चल करेगा, यह सहज ही अनुमान किया जा सकता है। किन्तु जिन्होंने व्रजके श्रीकृष्णकी प्रेमसेवाका अधिकार प्राप्त किया है, उनकी भगवान्‌के अन्य किसी भी स्वरूपकी सेवा अथवा अन्य किसी भी धाममें अवस्थानके निमित्त उनकी कोई भी वासना जाग्रत होती देखी नहीं जाती। व्रजमें श्रीकृष्णकी प्रेमसेवा प्राप्त होनेपर जीवकी आत्यन्तिकी स्थिरता सिद्ध होती है॥१३-१४॥ शास्त्रोंमें जीवोंके लिये जो कर्त्तव्य निर्धारित किये गये हैं, उसे विधि कहते हैं और जिन्हें करनेके लिये मना किया गया है, उसे निषेध कहते हैं। विधिको पालन और निषेधका त्याग ही जीवोंके लिये वैध धर्म है। भगवान् विष्णुको सर्वदा स्मरण करना चाहिये - यही मूलविधि है। वर्ण और आश्रमकी समस्त विधियाँ इस मूलविधिके अनुगत हैं। भगवान्‌को कभी मत भूलो - यही मूल निषेध है। पापोंका निषेध, विमुखताका वर्जन, पापोंका प्रायश्चित्तादि उक्त मूल निषेध-विधिके अनुगत हैं। इन विधि-निषेधोंका पालन करना ही शास्त्रोंका शासन मानना है।

१०० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

शास्त्र-विहित कर्मोंको करनेसे और साथ ही शास्त्र-निषिद्ध कर्मोंके त्यागसे जीवका कल्याण होता है; इसका विपरीत आचरण जीवके लिये नरकके मार्गको प्रशस्त करता है। शास्त्रोंके इस शासन-भयसे भक्तिमें जीवोंकी प्रवृत्ति होनेपर उसे वैधीभक्ति कहते हैं। भगवान्‌को चित्-अचित् जगत्‌का स्वामी और नियन्ता जानकर उनके ऐश्वर्यज्ञानके कारण जीव स्वयंको अति क्षुद्र मानता है। इस कारण उसका भगवान्‌के प्रति सम्भ्रम भाव और अपराधकी सम्भावनाका भय उसके हृदयमें रहता है। इस कारण उसका प्रेम सङ्कुचित हो जाता है। (भागवत १०/४४/५०-५१)—कंसके वधके पश्चात् देवकी-वसुदेवको कारागारसे मुक्त कराकर जब श्रीकृष्ण-बलरामने उनके चरणोंमें प्रणामकर वन्दना की, तब देवकी और वसुदेव उन प्रणत पुत्रोंको जगदीश्वर जानकर शङ्कित होकर उनको आलिङ्गन नहीं कर सके, परन्तु हाथ जोड़कर उनके सम्मुख खड़े रहे। इस प्रकार देवकी-वसुदेवका वात्सल्य भाव सङ्कुचित हो गया था। (गीता ११/४१-४२)—कुरुक्षेत्रमें श्रीकृष्णके विश्वरूपके दर्शन करके श्रीकृष्णसखा अर्जुनका सख्यभाव सङ्कुचित हो गया और वे श्रीकृष्णसे क्षमा याचना करने लगे—'आपकी इस महिमाको नहीं जानकर मैंने सखा मानकर प्रमादवश अथवा प्रणयवश हठपूर्वक आपको जो हे कृष्ण! हे यादव ! हे सखे ! आदिसे सम्बोधित किया है तथा हे अच्युत ! परिहासके लिये एकान्तमें अथवा अन्यान्य बन्धुओंके समक्ष विहार, शयन, आसन, भोजनादिके समय आप मेरे द्वारा जो असम्मानित हुए हैं, उन सबके लिये मैं आपसे अपरसीम क्षमा-याचना करता हूँ।' (भागवत १०/६०/१०-२४)—एक समय द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्णने परिहासमें रुक्मिणीजीसे कहा—“राजकुमारी! बड़े-बड़े राजा, जिनके पास लोकपालोंके समान ऐश्वर्य है, सुन्दरता और बलमें भी बहुत आगे बढ़े हुए हैं, तुमसे विवाह करना चाहते थे और तुम्हारे पिता-भ्राताने उनके साथ विवाहके लिये वाग्दान भी कर दिया था। तुमने उनको छोड़कर मेरे जैसे व्यक्तिको, जो किसी प्रकारसे तुम्हारे समान नहीं है, अपना पति स्वीकार किया। सुन्दरी! मैं तो सदासे अकिञ्चन हूँ। ऐसे ही अकिञ्चन लोगोंसे मैं प्रेम भी करता हूँ और वे लोग भी मुझसे प्रेम करते हैं। जिनका धन, कुल, ऐश्वर्य, सौन्दर्य अपने समान होता है, उन्हींसे विवाह और मित्रताका सम्बन्ध करना चाहिये। अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है, तुम अपने अनुरूप किसी श्रेष्ठ क्षत्रियका वरण कर लो।” जब रुक्मिणीजीने अपने परम प्रियतम पतिकी यह अप्रिय वाणी सुनी—जो पहले कभी नहीं सुनी थी, तब वे अत्यन्त भयभीत हो गयीं और वियोगकी सम्भावनासे वे तत्क्षण इतनी दुबली हो गयीं कि उनकी कलाईका कङ्कन खिसक गया, हाथका चँवर गिर गया और वे एकाएक अचेत हो गयीं। अर्थात् उनका कान्ताप्रेम भी शिथिल हो गया। इसलिये जब भी कुछ सङ्कोच, भय अथवा गौरव-बुद्धि आकर भक्तके हृदयमें उपस्थित होती है, तभी श्रीकृष्णका आनन्द भी सङ्कुचित हो जाता है। भगवान् श्रीकृष्णकी प्रेमाभक्तिमें ही प्रीति होती है। उस प्रेमाभक्तिको पाकर भक्तगण सालोक्य, तीसरा अध्याय | १०१

सार्ष्टि, सामीप्य और सारूप्य मुक्तियोंका भी आदर नहीं करते हैं, वे श्रीकृष्णके सेवासुखको ही चरम प्राप्य मानते हैं। यह प्रेमाभक्ति रागमार्गमें ही साध्य है। श्रीकृष्णलीलाके माधुर्यके द्वारा रागमार्गमें रुचि सिद्ध होती है; इसमें ऐश्वर्य ज्ञानका कोई स्थान नहीं है। इसलिये प्राक्तन और आधुनिक, दोनों प्रकारके लोभविशिष्ट भक्तजन जब श्रीकृष्णके नित्य परिकरोंके भाव-प्राप्ति हेतु उपाय जाननेके लिये जिज्ञासु होते हैं, तब उसी अवस्थामें शास्त्र और तदनुकूल युक्तिकी अपेक्षा देखी जाती है; क्योंकि केवल शास्त्र-प्रतिपादित युक्तिके द्वारा निर्दिष्ट उपायसे ही उक्त लोभनीय भावकी प्राप्ति हो सकती है। इसके अतिरिक्त उक्त भावको पानेके लिये कोई दूसरा मार्ग ही नहीं है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर उदाहरण स्वरूप कह रहे हैं— “जैसे किसी व्यक्तिको दूध पीनेके लिये लोभ हुआ, तब दूध कैसे मिले? इसके लिये उपाय जाननेके लिये इच्छा होती है। उसी समय दूध-लोभी व्यक्तिको एक ऐसे विश्वसनीय व्यक्तिके उपदेशकी आवश्यकता होती है, जिससे वह सहज ही दूध प्राप्त कर सके। तदनन्तर गाय खरीद करे, उसे खिलाये-पिलाये, फिर बच्चा होनेपर गायका दूध दोहन करे और फिर उस दूधको पिये। इस प्रकार उस विश्वसनीय व्यक्तिके उपदेशानुसार लोभी व्यक्तिको गाय खरीदने, घास-भूसा खिलाने तथा गो-दोहन आदिके विषयमें विविध प्रकारकी शिक्षाओंको सीखना होता है। इसी प्रकार लोभ-विशिष्ट साधकको शिक्षा लाभ करनी होती है। उपदेश श्रवणके बिना स्वतः ज्ञान लाभ नहीं होता। श्रीमद्भागवतम् (८/६/१२ श्लोक)में ब्रह्माजीने ऐसा ही कहा है—मनुष्य जैसे उपाय परम्पराके द्वारा लकड़ीसे अग्नि, गायसे दूध, पृथ्वीसे अन्न और जल, वाणिज्य-व्यवसायसे अपनी जीविका प्राप्त करता है, उसी प्रकार हे विष्णो! पण्डितगण बुद्धिके द्वारा सत्त्वादि गुणोंसे आप निर्गुणको प्राप्त होते हैं।” उसी प्रकार हरिभजनमें लोभोत्पत्ति होनेपर उसके लिये उपाय जाननेके लिये शास्त्रोंके उपदेशोंकी और साधु-गुरु पदाश्रयकी अपेक्षा दिखलायी देती है। साधुमार्गका अनुसरण एकान्त आवश्यक है, उसका उल्लङ्घन करनेसे हरिभजनका उपाय नहीं जाना जा सकता। कोई-कोई व्यक्ति साधुमार्गका उल्लङ्घन करके कहते हैं कि मुझे अनुराग हो गया है और वे नयी-नयी प्रणाली प्रवर्तन करके उसके द्वारा प्रतिष्ठा अर्जनमें तत्पर हो जाते हैं। वे अपने अनुगत लोगोंको कहते है कि वे सिद्ध हो गये हैं और ऐसा प्रचार करके सरल लोगोंको भ्रान्त पथमें ले जाते है। अपनी (पुरुष) जड़देहको स्त्री रूपमें सजाकर निजभजन-प्रणालीको उदाहरण स्वरूपमें निर्देश करते हैं। ऐसे साधुमार्गके उल्लङ्घनकारियोंको लक्ष्य करके शास्त्रमें उपदेश दिया गया है (भक्तिसन्दर्भ २८४)— “श्रुतिस्मृतिपुराणादिपञ्चरात्रविधिं बिना। ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातयैव केवलं॥” अर्थात् “श्रुति-स्मृति पुराणादि एवं पञ्चरात्रकी विधिका त्याग करके ऐकान्तिकी हरिभक्ति भी विघ्न ही उत्पादन किया करती है।” ऐकान्तिकी हरिभक्ति ही तो प्रार्थनीय वस्तु है, तो शास्त्रोंमें इसे किस प्रकार उत्पातका कारण बतलाया गया है? इस श्लोकका उद्दिष्ट मर्म इस प्रकार है—यदि कोई शास्त्रशासन ना मानकर