श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय 11/104-113 ] अन्वेषण करते हैं, उनमेंसे कोई भी उस तत्त्वको नहीं जान पाता॥ 104 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 6/84 संख्या देखें॥ 104॥ श्रीजगन्नाथ-दर्शनसे पहले महाप्रभुके दर्शनके कारणकी जिज्ञासा :- राजा कहे,-“सबे जगन्नाथ ना देखिया। चैतन्येर वासा-गृहे चलिला धाञा॥” 105 ॥ अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रने कहा,—“सभी भक्त श्रीजगन्नाथका दर्शन न करके क्यों श्रीचैतन्य महाप्रभुके वासस्थानकी ओर दौड़े चले जा रहे हैं॥” 105 ॥ गौड़ीय भक्तोंकी गौर-प्रीति :- भट्ट कहे,-“एइ त' स्वाभाविक प्रेम-रीत। महाप्रभु मिलिबारे उत्कण्ठित चित ॥ 106 ॥ आगे ताँरे मिलि' सबे ताँरे सङ्गे लञा। ताँर सङ्गे जगन्नाथ देखिबेन गिया॥” 107 ॥ अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यने कहा, -“यह तो स्वाभाविक प्रेमकी रीति है। इन सब भक्तोंका मन महाप्रभुसे मिलनेके लिये उत्कण्ठित हो रहा है। ये सब भक्त पहले महाप्रभुसे मिलकर उन्हें अपने साथ ले जाकर उनके साथ श्रीजगन्नाथका दर्शन करेंगे॥” 106-107 ॥ वाणीनाथको प्रचुर प्रसाद वहन करते देखकर उसके कारणकी जिज्ञासा :- राजा कहे,-“भवानन्देर पुत्र वाणीनाथ। प्रसाद लञा सङ्गे चले पाँच-सात ॥ 108 ॥ महाप्रभुर आलये करिल गमन। एत महाप्रसाद चाहि'-कह कि कारण?” ॥ 109 ॥ अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रने कहा, — “श्रीभवानन्द रायके पुत्र वाणीनाथ पाँच-सात लोगोंको साथ श्रीजगन्नाथजीका प्रसाद लेकर महाप्रभुके घरकी ओर जा रहे हैं। महाप्रभुको इतना महाप्रसाद क्यों चाहिये?” ॥ 108-109 ॥ श्रीभट्टका उत्तर-महाप्रभुकी इच्छा ही कारण :- भट्ट कहे,-“भक्तगण आइल जानिञा। प्रभुर इङ्गिते प्रसाद याय ताँरा लञा॥” 110 ॥ अनुवाद-श्रीभट्टाचार्यने कहा, - “भक्त लोग पुरीमें आ चुके है, ऐसा जानकर महाप्रभुके इङ्गितसे वाणीनाथ इतना सब प्रसाद लेकर जा रहे हैं॥” 110 ॥ उपवास और मुण्डनादि क्रियाके बिना ही प्रसाद ग्रहणके कारणकी जिज्ञासा :- राजा कहे,-“उपवास, क्षौर-तीर्थेर विधान। ताहा ना करिया केने खाइब अन्न-पान?” ॥ 111 ॥ श्रीभट्टके द्वारा रागमार्गमें आचरण बताना :- भट्ट कहे,-“तुमि येइ कह, सेइ विधि धर्म। एइ रागमार्गे आछे सूक्ष्मधर्म-मर्म ॥ 112 ॥ भगवान्के परोक्ष और साक्षात् आदेश :- ईश्वरेर परोक्ष आज्ञा-क्षौर, उपोषण। प्रभुर साक्षात् आज्ञा-प्रसाद-भोजन ॥ 113 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 111-113 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-राजाने कहा,- 'तीर्थमें प्रवेश करनेपर उस दिन उपवास करना होता है और वहाँ मुण्डन कराना होता है-शास्त्रोंका इस प्रकार विधान है। ये सब वैष्णव वैसा न कर कैसे अन्न-जल आदि ग्रहण करेंगे?' श्रीभट्टाचार्यने कहा, - 'आपने जो कहा है, वही वैध-धर्म है, किन्तु रागमार्गीय धर्मका और एक सूक्ष्म मर्म है,-भगवान्ने ऋषियोंके द्वारा ही परोक्षरूपसे शास्त्रोंमें मुण्डन कराने आदिकी आज्ञा दी है, किन्तु उन्होंने स्वयं प्रसाद-सेवनकी आज्ञाका प्रचार किया है।' 111-113 ॥ अनुभाष्य-तीर्थमें जाकर पापोंका विनाश करनेके उद्देश्यसे पूर्व दिवसमें संयम करके अगले दिन उपवास करेंगे। सिरपर चढ़े पापोंको ध्वंस करनेके लिये सिर आदिका मुण्डन करेंगे। ये सब तैर्थिक कर्मविधान त्याग करके भोजनादि करनेका क्या उद्देश्य है? ॥ 111 ॥ ॥ 447