भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1294, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1294

[ 11/114-121 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ताँहा उपवास, याँहा नाहि महाप्रसाद। प्रभु-आज्ञा-प्रसाद-त्यागे हय अपराध ॥114॥ भक्तोंकी उपवासकी विधिको त्यागनेका अन्य कारण :- विशेषे महाप्रभु करे आपने परिवेशन। एत लाभ छाड़ि' केने करिबे उपोषण ॥115॥ अनुवाद-उपवास वहाँ होता है, जहाँ महाप्रसाद उपलब्ध नहीं है। किन्तु महाप्रभुकी आज्ञाका उल्लङ्घन करके प्रसादका त्याग करनेसे अपराध होता है। विशेष रूपसे महाप्रभु जब स्वयं अपने हाथोंसे प्रसाद बाँट रहे हों, तब ऐसे सौभाग्यको छोड़कर कौन उपवासकी विधिका पालन करेगा? ॥114-115॥ अपने पूर्व-दृष्टान्तका वर्णन :- पूर्वे प्रभु मोरे प्रसाद-अन्न आनि' दिल। प्राते शय्याय बसि' आमि से अन्न खाइल ॥116॥ श्रीकृष्णकृपाके फलसे सेवान्मुखताके कारण फलभोग- काममूलक नित्य-नैमित्तिक और काम्य कर्मोंका त्याग :- याँरे कृपा करि' करेन हृदये प्रेरण। कृष्णाश्रय हय, छाड़े वेद-लोक-धर्म ॥"117॥ अनुवाद-एक बार महाप्रभुने मुझे अन्न प्रसाद लाकर दिया था। उस समय मैं प्रातः जागकर अपनी शय्यापर ही बैठा था और मैंने उसी अवस्थामें प्रसाद खा लिया था। कृपा करके भगवान् जिसके हृदयमें प्रेरणा करते हैं, वही श्रीकृष्णका आश्रय लेता है और सभी प्रकारके वेद-लोक धर्मका त्याग कर देता है॥"116-117॥ भागवतका प्रमाण :- श्रीमद्भागवत (4/29/46)- यदा यस्यानुगृह्णाति भगवान् आत्मभावितः। स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम् ॥118॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥118॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिस किसी व्यक्तिके सम्बन्धमें जब आत्मभावित भगवान् हृदयमें प्रेरणाके द्वारा अनुग्रह करते हैं, तब वह लोक और वेदोंके प्रति जो परिनिष्ठित बुद्धि होती है, उसे त्याग देता है॥118॥ अनुभाष्य-ब्रह्मनिष्ठ श्रीनारद गोस्वामीने राजा प्राचीनबर्हिको पुरञ्जनके उपाख्यानके द्वारा भोगी अथवा कर्मी-जीवोंकी और कर्मकाण्डकी दुर्गतिका वर्णन करके बतलाया कि ब्रह्मा, रुद्र, मनु, दक्षादि प्रजापति, नैष्ठिक चतुःसन, मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ठ और मैं, हम सबमेंसे कोई भी भगवद्-कृपाके बिना भगवद्-ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते। तब भगवद्-कृपाके फलका वर्णन करते हुए कह रहे हैं- भगवान् यदा आत्मभावितः (आत्मनि भावितः ध्यातः आराधितः प्रकटितः सन्) यस्य (यम् अनुगृह्णाति कृपायति), तदा सः लोके (लौकिकव्यवहारे) वेदे (वैदिककर्मानुष्ठाने) च परिनिष्ठिताम् (आसक्तां) मतिं जहाति (त्यजति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥118॥ नीचे उतरकर राजाकी काशीमिश्र और पड़िछा-पात्रको भक्तोंकी सेवाकी व्यवस्था करनेका आदेश :- तबे राजा अट्टालिका हैते तलेते आइला। काशीमिश्र, पड़िछा-पात्र, दुँहे आनाइला ॥119॥ प्रतापरुद्र आज्ञा दिल सेइ दुइ जने। “प्रभु-स्थाने आसियाछेन यत प्रभुर गणे ॥120॥ सबारे स्वच्छन्दे वासा, स्वच्छन्द प्रसाद। स्वच्छन्द दर्शन कराइह, नहे येन बाध ॥121॥ अनुवाद-तब राजा प्रतापरुद्र अट्टालिकासे उतरकर नीचे आये और काशीमिश्र और पड़िछा-पात्र-दोनोंको बुलाया। राजाने उन दोनोंको आज्ञा दी,-"महाप्रभुके पास जितने भी उनके भक्त आये हैं, उन सबको रहनेका अलग-अलग स्थान दो, उनकी इच्छानुसार उनके प्रसादकी व्यवस्था और मन्दिरमें दर्शन करनेकी व्यवस्था करो, जिससे उन्हें किसी भी प्रकारकी असुविधा न हो ॥119-121॥ 448 ।

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