भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1296, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1296

[ 11/131-140 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला स्थान कम होनेपर भी काशीमिश्रके भवनमें सभी भक्तोंका उसमें समाना :- मिश्रेर आवास सेइ हय अल्प स्थान। असंख्य वैष्णव ताँहा हैल परिमाण ॥ 131 ॥ सभी भक्तोंको स्वयं महाप्रभुके द्वारा माला-गन्ध प्रदान :- आपन-निकटे प्रभु सबा बसाइला। आपनि स्वहस्ते सबारे माल्य-गन्ध दिला ॥ 132 ॥ अनुवाद—श्रीकाशीमिश्रके घरमें स्थान अपर्याप्त था, परन्तु असंख्य वैष्णव वहाँ समा गये। महाप्रभुने सब भक्तोंको अपने पास बैठा लिया और अपने हस्तकमलसे सबको माला एवं चन्दन प्रदान किया ॥ 131-132 ॥ श्रीसार्वभौमके साथ सभी भक्तोंका मिलन :- भट्टाचार्य आइला तबे महाप्रभुर स्थाने। यथायोग्य मिलिला सबाकार सने ॥ 133 ॥ अनुवाद—तब श्रीभट्टाचार्य महाप्रभुके वासस्थानपर आये और वे सभी भक्तोंसे यथोचित रूपसे मिले ॥ 133 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीअद्वैतकी स्तुति :- अद्वैतेरे कहेन प्रभु मधुर वचने। “आजि आमि पूर्ण हइलाङ तोमार आगमने ॥” 134 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यसे मधुर वचन कहे,—“आपके आनेसे आज मैं पूर्ण हो गया॥” 134 ॥ श्रीअद्वैतके द्वारा ईश्वरके भक्तवात्सल्य-स्वभावका वर्णन :- अद्वैत कहे,—“ईश्वरेर एइ स्वभाव हय। यद्यपि आपने पूर्ण, सर्वैश्वर्यमय ॥ 135 ॥ तथापिह भक्तसङ्गे हय सुखोल्लास। भक्त-सङ्गे करे नित्य विविध विलास ॥” 136 ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने कहा,—“ईश्वरका यह स्वभाव ही होता है। यद्यपि वे स्वयं ही पूर्ण और सर्वैश्वर्यमय हैं, तथापि भक्त-सङ्गमें उन्हें आनन्दोल्लास होता है। अपने भक्तोंके साथ वे नित्य अनेक प्रकारकी लीलाएँ करते हैं॥” 135-136 ॥ महाप्रभुकी बचपनके साथी श्रीमुकुन्दकी अपेक्षा श्रीवासुदेव दत्तमें अधिक प्रीति :- वासुदेव देखि’ प्रभु आनन्दित हञा। ताँरे किछु कहे ताँर अङ्गे हस्त दिया ॥ 137 ॥ “यद्यपि मुकुन्द—आमा-सङ्गे शिशु हैते। ताँहा हैते अधिक सुख तोमारे देखिते ॥” 138 ॥ अनुवाद—श्रीवासुदेव दत्तको देखकर महाप्रभु बहुत आनन्दित हुए और अपने हाथसे उन्हें स्पर्शकर उनसे कहा,—“यद्यपि मुकुन्द मेरे साथ बाल्यावस्थासे है, परन्तु उसकी अपेक्षा तुम्हें देखकर मुझे अधिक प्रसन्नता हो रही है॥” 137-138 ॥ अमानी और मानद वासुदेवदत्तका अपने कनिष्ठ मुकुन्दको महाप्रभुका प्रिय जानकर अपनेसे श्रेष्ठ मानना :- वासु कहे,—“मुकुन्द पाइल तोमार सङ्ग। तोमार चरण पाइल सेइ पुनर्जन्म ॥ 139 ॥ छोट हञा मुकुन्द एबे हैल आमार ज्येष्ठ। तोमार कृपाय ताते सर्वगुणे श्रेष्ठ ॥” 140 ॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीवासुदेव दत्तने कहा,— “मुकुन्दने आपका सङ्ग प्राप्त किया है। आपके चरणकमलोंका आश्रय प्राप्तकर उसका पुनर्जन्म हुआ है। यद्यपि मुकुन्द आयुमें मुझसे छोटा है, तथापि अब वह मुझसे बड़ा हो गया है। आपकी कृपा प्राप्तकर वह सभी गुणोंमें मुझसे श्रेष्ठ है॥” 139-140 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘वासु कहे मुकुन्द’—मकुन्द दत्त वासुदेव दत्तके छोटे भाई हैं। मुकुन्द (बचपनसे ही) महाप्रभुके साथ थे। वासुदेवने कहा,—मुकुन्दने मुझसे पहले ही आपके चरणोंका आश्रय किया है, मैंने तो बादमें किया। मुकुन्दका पारमार्थिक जन्म मुझसे पहले हुआ है, इसलिये मैं उससे छोटा हो गया हूँ॥ 139-140 ॥ 450 ।