भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1297

ग्यारहवाँ अध्याय 11/141–150 ] वासुदेवको स्वरूप दामोदरसे 'ब्रह्मसंहिता' और 'कर्णामृत' लेकर उनकी नकल करनेका आदेश :- पुनः प्रभु कहे, — "आमि तोमार निमित्ते। दुइ पुस्तक आनियाछि 'दक्षिण' हइते ॥ 141 ॥ स्वरूपेर काछे आछे, लह ता लिखिया।" वासुदेव आनन्दित पुस्तक पाञा ॥ 142 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने पुनः कहा,—"मैं तुम्हारे लिये दक्षिण भारतसे दो पुस्तकें लाया हूँ। ये पुस्तकें स्वरूप दामोदरके पास हैं, तुम उनसे लेकर उनकी नकल कर लो।" श्रीवासुदेव दत्त उन पुस्तकोंको प्राप्त करके बहुत आनन्दित हुए ॥ 141-142 ॥ अनुभाष्य— 'दुइ पुस्तक'—श्रीब्रह्मसंहिता और श्रीकृष्णकर्णामृत ॥ 141 ॥ वासुदेवादि सभी गौड़ीयके द्वारा नकल करके ग्रन्थोंकी रक्षाके फलस्वरूप इन दोनों ग्रन्थोंका सर्वत्र प्रचार :- प्रत्येक वैष्णव सबे लिखिया लइल। क्रमे क्रमे दुइ ग्रन्थ सर्वत्र व्यापिल ॥ 143 ॥ अनुवाद—प्रत्येक वैष्णवने उन दोनों पुस्तकोंकी नकल करके रख ली। इस प्रकार क्रमशः उनकी प्रतियाँ बननेसे दोनों ग्रन्थ सर्वत्र व्याप्त हो गये ॥ 143 ॥ श्रीवासादिक प्रशंसा :- श्रीवासाद्ये कहे प्रभु करि' महाप्रीत। “तोमार चारि-भाइर आमि हइनु विक्रीत ॥" 144 ॥ श्रीवासका दैन्य :- श्रीवास कहेन, — "केने कह विपरीत। कृपा-मूल्ये चारि-भाइ हइ तोमार क्रीत ॥" 145 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु श्रीवासादि चार भाइयोंसे अति प्रीतिपूर्वक कहने लगे,—"आप चारों भाइयोंने मुझे खरीद लिया है।" यह सुनकर श्रीवास पण्डितने महाप्रभुसे कहा, — "आप विपरीत बात क्यों कह रहे हैं? अपितु हम चारों भाई तो आपकी कृपाके द्वारा खरीदे गये हैं॥" 144-145 ॥ महाप्रभुकी दामोदरके प्रति गौरवप्रीति, शङ्करके प्रति शुद्धप्रेम :- शङ्करे देखिया प्रभु कहे दामोदरे। "सगौरव-प्रीति आमार तोमार उपरे ॥ 146 ॥ शुद्ध केवल-प्रेम शङ्कर-उपरे। अतएव तोमार सङ्गे राखह शङ्करे ॥" 147 ॥ अमानी और मानद दामोदर-पण्डितका कनिष्ठ शङ्करको महाप्रभुका प्रिय जानकर अपनेसे श्रेष्ठ मानना :- दामोदर कहे, — "शङ्कर छोट आमा हैते। एबे आमार बड़ भाइ तोमार कृपाते ॥" 148 ॥ अनुवाद—श्रीशङ्कर पण्डितको देखकर महाप्रभुने श्रीदामोदर पण्डितसे कहा,—"तुम्हारे प्रति मेरी प्रीति गौरवयुक्त है, परन्तु शङ्करके प्रति मेरी शुद्ध प्रीति है। इसलिये शङ्करको तुम अपने साथ ही रखना।" श्रीदामोदरने कहा,—"शङ्कर आयुमें मुझसे छोटा है, परन्तु आपकी कृपाके कारण अब वह मेरा बड़ा भाई बन गया है ॥ 146-148 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'दामोदर पण्डित'-बड़े भाई हैं और 'शङ्कर पण्डित'-छोटे भाई। महाप्रभुने कहा, — 'दामोदर ! तुम्हारे प्रति मेरी सगौरव-प्रीति अर्थात् सम्मानके साथ प्रीति है; किन्तु शङ्करके प्रति मेरा केवल शुद्धप्रेम है। तुम अब शङ्करको अपने साथ रखना।' दामोदरने कहा,—'प्रभो, आपके अधिक स्नेहको प्राप्त करनेके कारण शङ्कर मेरा छोटा भाई होनेपर भी बड़ा भाई हो गया है॥' 146-148 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीशिवानन्दकी प्रशंसा :- शिवानन्दे कहे प्रभु,— "तोमार आमाते। गाढ़ अनुराग हय, जानि आगे हैते ॥" 149 ॥ श्रीशिवानन्दका दैन्य :- शुनि' शिवानन्द-सेन प्रेमाविष्ट हञा। दण्डवत् हञा पड़े श्लोक पड़िया ॥ 150 ॥ । 451