श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय 11/157–168 ] दीनता मत प्रकाश करो। तुम्हारी दीनता देखकर मेरा हृदय फट रहा है", इतना कहकर महाप्रभुने श्रीमुरारि गुप्तका आलिङ्गन किया और अपने पास बैठाकर अपने हाथोंसे उनके शरीरका मार्जन करने लगे॥ 157-158 ॥ श्रीचन्द्रशेखर, श्रीपुण्डरीक और श्रीगदाधरादिकी महाप्रभुके द्वारा प्रशंसा एवं आलिङ्गन :- आचार्यरत्न, विद्यानिधि, पण्डित गदाधर। गङ्गादास, हरिभट्ट, आचार्य पुरन्दर ॥ 159 ॥ प्रत्येक्षे सबार प्रभु करि' गुणगान। पुनः पुनः आलिङ्गिया करिल सम्मान ॥ 160 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीआचार्यरत्न, श्रीविद्यानिधि, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीगङ्गादास, श्रीहरिभट्ट और श्रीपुरन्दर आचार्य,—सभी भक्तोंका गुणगान किया और बार-बार उनका आलिङ्गन करके उनका सम्मान किया ॥ 159-160 ॥ श्रीहरिदासको ढूँढना :- सबारे सम्मानि' प्रभुर हइल उल्लास। हरिदासे ना देखिया कहे,—"काँहा हरिदास ॥" 161 ॥ अनुवाद—इस प्रकार सभी भक्तोंका सम्मान करके महाप्रभु उल्लसित हुए, परन्तु श्रीहरिदास ठाकुरको न देखकर महाप्रभु कहने लगे, —"हरिदास कहाँ हैं ॥" 161 ॥ ठाकुर हरिदासका दैन्यवशतः दूर रहना :- दूर हैते हरिदास गोसाञे देखिया। राजपथ-प्रान्ते पड़ि' आछे दण्डवत् हञा ॥ 162 ॥ मिलन-स्थाने आसि' प्रभुरे ना मिलिला। राजपथ-प्रान्ते दूरे पड़िया रहिला ॥ 163 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुर दूर राजमार्गके किनारे भूमिपर पड़े दण्डवत् प्रणाम कर रहे थे। वे महाप्रभुसे भक्तोंके मिलन स्थानपर नहीं आये, बल्कि वहाँसे दूर राजपथके किनारे ही पड़े रहे ॥ 162-163 ॥ भक्तोंके द्वारा श्रीहरिदासको महाप्रभुकी आज्ञा बताना :- भक्त सब धाञा आइल हरिदासे निते। "प्रभु तोमाय मिलिते चाहे, चलह त्वरिते ॥" 164 ॥ अनुवाद—सब भक्त दौड़ते हुए श्रीहरिदासको ले जानेके लिये आये और कहा,—"शीघ्र चलो! महाप्रभु आपसे मिलना चाहते हैं ॥" 164 ॥ मर्यादा-विधिकी रक्षाके लिये श्रीहरिदासकी दैन्यपूर्ण उक्ति :- हरिदास कहे,—"आमि नीच-जाति छार। मन्दिर-निकटे याइते मोर नाहि अधिकार ॥ 165 ॥ निभृते टोटा-मध्ये स्थान यदि पाङ। ताँहा पड़ि' रहो, एकले काल गोङाङ ॥ 166 ॥ जगन्नाथ-सेवकेर मोर स्पर्श नाहि हय। ताँहा पड़ि' रहौं,—मोर एइ वाञ्छा हय ॥" 167 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—"मैं नीच जातिका अधम व्यक्ति हूँ। मन्दिरके निकट जानेका मेरा अधिकार नहीं है। यदि मुझे एकान्तमें किसी उद्यानमें कोई स्थान मिल जाय, तो वहीं रहकर मैं अकेले ही समय व्यतीत कर लूँगा। मेरी यही इच्छा है कि मैं वहीं पड़ा रहूँ, जिससे श्रीजगन्नाथके सेवकोंको मेरा स्पर्श न हो॥" 165-167 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'टोटा-मध्ये'—उद्यानमें ॥ 166 ॥ लोगोंके मुखसे श्रीहरिदासकी दैन्योक्ति सुनकर महाप्रभुको आनन्द :- एइ कथा लोक गिया प्रभुरे कहिल। शुनिया प्रभुर मने बड़ सुख हइल ॥ 168 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदासकी यह बात भक्तोंने जाकर महाप्रभुसे कही, जिसे सुनकर महाप्रभु मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए ॥ 168 ॥ । 453