श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
ग्यारहवाँ अध्याय 11/157–168 ] दीनता मत प्रकाश करो। तुम्हारी दीनता देखकर मेरा हृदय फट रहा है", इतना कहकर महाप्रभुने श्रीमुरारि गुप्तका आलिङ्गन किया और अपने पास बैठाकर अपने हाथोंसे उनके शरीरका मार्जन करने लगे॥ 157-158 ॥ श्रीचन्द्रशेखर, श्रीपुण्डरीक और श्रीगदाधरादिकी महाप्रभुके द्वारा प्रशंसा एवं आलिङ्गन :- आचार्यरत्न, विद्यानिधि, पण्डित गदाधर। गङ्गादास, हरिभट्ट, आचार्य पुरन्दर ॥ 159 ॥ प्रत्येक्षे सबार प्रभु करि' गुणगान। पुनः पुनः आलिङ्गिया करिल सम्मान ॥ 160 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीआचार्यरत्न, श्रीविद्यानिधि, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीगङ्गादास, श्रीहरिभट्ट और श्रीपुरन्दर आचार्य,—सभी भक्तोंका गुणगान किया और बार-बार उनका आलिङ्गन करके उनका सम्मान किया ॥ 159-160 ॥ श्रीहरिदासको ढूँढना :- सबारे सम्मानि' प्रभुर हइल उल्लास। हरिदासे ना देखिया कहे,—"काँहा हरिदास ॥" 161 ॥ अनुवाद—इस प्रकार सभी भक्तोंका सम्मान करके महाप्रभु उल्लसित हुए, परन्तु श्रीहरिदास ठाकुरको न देखकर महाप्रभु कहने लगे, —"हरिदास कहाँ हैं ॥" 161 ॥ ठाकुर हरिदासका दैन्यवशतः दूर रहना :- दूर हैते हरिदास गोसाञे देखिया। राजपथ-प्रान्ते पड़ि' आछे दण्डवत् हञा ॥ 162 ॥ मिलन-स्थाने आसि' प्रभुरे ना मिलिला। राजपथ-प्रान्ते दूरे पड़िया रहिला ॥ 163 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुर दूर राजमार्गके किनारे भूमिपर पड़े दण्डवत् प्रणाम कर रहे थे। वे महाप्रभुसे भक्तोंके मिलन स्थानपर नहीं आये, बल्कि वहाँसे दूर राजपथके किनारे ही पड़े रहे ॥ 162-163 ॥ भक्तोंके द्वारा श्रीहरिदासको महाप्रभुकी आज्ञा बताना :- भक्त सब धाञा आइल हरिदासे निते। "प्रभु तोमाय मिलिते चाहे, चलह त्वरिते ॥" 164 ॥ अनुवाद—सब भक्त दौड़ते हुए श्रीहरिदासको ले जानेके लिये आये और कहा,—"शीघ्र चलो! महाप्रभु आपसे मिलना चाहते हैं ॥" 164 ॥ मर्यादा-विधिकी रक्षाके लिये श्रीहरिदासकी दैन्यपूर्ण उक्ति :- हरिदास कहे,—"आमि नीच-जाति छार। मन्दिर-निकटे याइते मोर नाहि अधिकार ॥ 165 ॥ निभृते टोटा-मध्ये स्थान यदि पाङ। ताँहा पड़ि' रहो, एकले काल गोङाङ ॥ 166 ॥ जगन्नाथ-सेवकेर मोर स्पर्श नाहि हय। ताँहा पड़ि' रहौं,—मोर एइ वाञ्छा हय ॥" 167 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—"मैं नीच जातिका अधम व्यक्ति हूँ। मन्दिरके निकट जानेका मेरा अधिकार नहीं है। यदि मुझे एकान्तमें किसी उद्यानमें कोई स्थान मिल जाय, तो वहीं रहकर मैं अकेले ही समय व्यतीत कर लूँगा। मेरी यही इच्छा है कि मैं वहीं पड़ा रहूँ, जिससे श्रीजगन्नाथके सेवकोंको मेरा स्पर्श न हो॥" 165-167 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'टोटा-मध्ये'—उद्यानमें ॥ 166 ॥ लोगोंके मुखसे श्रीहरिदासकी दैन्योक्ति सुनकर महाप्रभुको आनन्द :- एइ कथा लोक गिया प्रभुरे कहिल। शुनिया प्रभुर मने बड़ सुख हइल ॥ 168 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदासकी यह बात भक्तोंने जाकर महाप्रभुसे कही, जिसे सुनकर महाप्रभु मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए ॥ 168 ॥ । 453
[ 11/169-178 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला काशीमिश्रके द्वारा महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना :- हेनकाले काशीमिश्र, पड़िछा, — दुइ जन। आसिया करिल प्रभुर चरण वन्दन ॥ 169 ॥ सर्ववैष्णव देखि' सुख बड़ पाइला। यथायोग्य सबा-सने आनन्दे मिलिला ॥ 170 ॥ अनुवाद—इतनेमें काशीमिश्र और पड़िछा-ये दोनों वहाँ आये और उन्होंने महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना की। सभी वैष्णवोंका दर्शन करके वे दोनों बहुत प्रसन्न हुए और यथायोग्य सभीसे आनन्दपूर्वक मिले॥ 169-170 ॥ वैष्णवोंकी सेवाके लिये काशीमिश्रकी महाप्रभुसे आज्ञाके लिये प्रार्थना :- प्रभुपदे दुइ जने कैल निवेदने। “आज्ञा देह', — वैष्णवेर करि समाधाने ॥ 171 ॥ सबार करियाछि वासा-गृह-स्थान। महाप्रसाद सबाकारे करि समाधान ॥” 172 ॥ अनुवाद-दोनोंने महाप्रभुके चरणोंमें निवेदन किया,—“यदि आपकी आज्ञा हो तो हम सभी वैष्णवोंके लिये यथोचित व्यवस्था कर दें। सभीके लिये रहनेके स्थानकी व्यवस्था हो चुकी है। अब हमें उन सबके लिये महाप्रसादके परिवेशनकी आज्ञा दीजिये ॥” 171-172 ॥ श्रीगोपीनाथाचार्यको भक्तोंके सभी कार्योंको सम्पादन करनेके लिये महाप्रभुका आदेश :- प्रभु कहे,—“गोपीनाथ, याह' वैष्णव लञा। याँहा याँहा कहे वासा, ताँहा देह' लञा ॥ 173 ॥ श्रीवाणीनाथके ऊपर प्रसादकी व्यवस्थाका भार :- महाप्रसादान्न देह वाणीनाथ-स्थाने । सर्व वैष्णव इँहो करिबे समाधाने ॥ 174 ॥ श्रीकाशीमिश्रसे महाप्रभुके द्वारा बगीचेमें स्थित निर्जन कमरेके लिये प्रार्थना :- आमार निकटे एइ पुष्पेर उद्याने। एकखानि घर आछे परम-निर्जने ॥ 175 ॥ सेइ घर आमाके देह'-आछे प्रयोजन। निभृते बसिया ताँहा करिब स्मरण ॥” 176 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “हे गोपीनाथाचार्य ! आप सभी वैष्णवोंको अपने साथ लेकर जाइये और जहाँ-जहाँ ये काशीमिश्र और पड़िछा बतलायें, वहाँ उन भक्तोंको रहनेके लिये स्थान दे दीजिये। और आप (श्रीकाशीमिश्र और पड़िछा) जितना भी महाप्रसाद लाये हैं, सब वाणीनाथको दे दीजिये। वे सभी वैष्णवोंकी देखभाल करेंगे और सभीको महाप्रसाद भी वितरित कर देंगे। मेरे स्थानके पास पुष्पोंके उद्यानमें एक निर्जन कमरा है। वह कमरा मुझे दे दो, मुझे उसकी आवश्यकता है। मैं वहाँ एकान्तमें बैठकर भगवान्का स्मरण करूँगा ॥” 173-176 ॥ अनुभाष्य - अब यह स्थान 'सिद्धबकुल-मठ'के नामसे प्रसिद्ध है ॥ 175 ॥ महाप्रभुसे सभी वस्तुओंको इच्छानुसार ग्रहण करनेके लिये काशीमिश्रका आवेदन :- मिश्र कहे, — “सब तोमार, चाह कि-कारणे ? आपन-इच्छाय लह, येइ तोमार मने ॥ 177 ॥ काशीमिश्रका स्वयंको महाप्रभुके आज्ञाकारी दासके रूपमें स्वीकार करने हेतु प्रार्थना :- आमि-दुइ हइ तोमार दास आज्ञाकारी। ये चाह, सेइ आज्ञा देह' कृपा करि' ॥” 178 ॥ अनुवाद—श्रीकाशीमिश्रने कहा, — “प्रभो ! सब कुछ तो आपका ही है, फिर आप माँग क्यों रहे हैं? अपनी इच्छासे आप जो चाहें ले सकते हैं। हम दोनों तो आपकी आज्ञाका पालन करनेवाले दास हैं। आप जैसा जो भी चाहते हैं, कृपा करके हमें उसकी आज्ञा दीजिये ॥" 177-178 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - आपको जो चाहिये, कृपा करके उसकी आज्ञा दीजिये। हम दोनों आपके आज्ञा पालनकारी दास हैं ॥ 178 ॥ 454 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/179-189 विदायी लेकर श्रीगोपीनाथको गृह-निर्वाचन और श्रीवाणीनाथको प्रसादकी व्यवस्थाका भार-अर्पण :- एत कहि' दुइजने विदाय लइल। गोपीनाथ, वाणीनाथ-दुँहे सङ्गे निल॥ 179 ॥ गोपीनाथे देखाइल सब वासा-घर। वाणीनाथ-ठाञि दिल प्रसाद विस्तर॥ 180 ॥ वाणीनाथ आइला बहु प्रसाद पिठा लञा। गोपीनाथ आइला वासा संस्कार करिया॥ 181 ॥ अनुवाद-यह कहकर उन दोनोंने महाप्रभुसे विदायी ली। तब वे दोनों श्रीगोपीनाथाचार्य तथा श्रीवाणीनाथको अपने साथ ले गये। उन्होंने श्रीगोपीनाथाचार्यको सभी रहनेके स्थान दिखला दिये और श्रीवाणीनाथको बहुत सारा महाप्रसाद दिया। श्रीवाणीनाथ वह प्रसाद और पिठा-पाना लेकर आ गये। श्रीगोपीनाथाचार्य भी सभी रहनेके स्थानोंकी सफाई करके वहाँ आ गये॥ 179-181 ॥ महाप्रभुका सभी भक्तोंको स्नानके बाद चूड़ा दर्शन करके प्रसादका सम्मान करनेके लिये आमन्त्रण :- महाप्रभु कहे,—"शुन, सर्व वैष्णवगण। निज-निज-वासा सबे करह गमन॥ 182 ॥ समुद्रस्नान करि' कर चूड़ा दरशन। तबे आजि इँह आसि' करिबे भोजन॥" 183 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "सभी वैष्णव सुनो! आप सभी अपने-अपने रहनेके स्थानपर जाइये। फिर समुद्रस्नान करके श्रीजगन्नाथ मन्दिरके चूड़ाका (शिखरका) दर्शन कीजिये। तब यहाँ आकर महाप्रसाद सेवन कीजिये॥" 182-183 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'चूड़ा'- श्रीजगन्नाथ मन्दिरका चूड़ा॥ 183 ॥ महाप्रभुको प्रणाम करके सभी भक्तोंका श्रीगोपीनाथके द्वारा बतलाये अपने अपने वासस्थानको ग्रहण करना :- प्रभु नमस्करि' सबे वासाते चलिला। गोपीनाथाचार्य सबे वासास्थान दिला॥ 184 ॥ अनुवाद-महाप्रभुको प्रणाम करके सभी भक्त श्रीगोपीनाथाचार्यके साथ गये और उन्होंने सभीको उनके रहनेका स्थान दिया॥ 184 ॥ महाप्रभुका श्रीहरिदास ठाकुरके पास आना :- महाप्रभु आइला तबे हरिदास-मिलने। हरिदास करे प्रेमे नाम-सङ्कीर्त्तने॥ 184 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुरसे मिलने आये। उस समय श्रीहरिदास प्रेमपूर्वक नाम-सङ्कीर्तन कर रहे थे॥ 184 ॥ श्रीहरिदासका प्रणाम और महाप्रभुका आलिङ्गन :- प्रभु देखि' पड़े पाय दण्डवत् हञा। प्रभु आलिङ्गन कैल ताँरे उठाञा॥ 186 ॥ परस्पर गुणोंके स्मरणसे भक्त और भगवान्, दोनोंकी प्रेम-विह्वलता :- दुइजने प्रेमावेशे करेन क्रन्दने। प्रभु-गुणे भृत्य विकल, प्रभु भृत्य-गुणे॥ 187 ॥ अनुवाद-महाप्रभुको देखकर श्रीहरिदास ठाकुरने उनके चरणोंमें दण्डवत् प्रणाम किया और महाप्रभुने उन्हें उठाकर उनका आलिङ्गन किया। दोनों प्रेमके आवेशमें क्रन्दन करने लगे। प्रभुके गुणोंसे दास और दासके गुणोंसे प्रभु विह्वल हो रहे थे॥ 186-187 ॥ श्रीहरिदास ठाकुरका अपनेको अस्पृश्य मानना :- हरिदास कहे,—"प्रभु, ना छुँइओ मोरे। मुञि—नीच, अस्पृश्य, परम पामरे॥" 188 ॥ अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरने कहा, - 'हे प्रभो! आप मुझे स्पर्श मत कीजिये। मैं नीच, अस्पृश्य (अछूत) और सबसे अधिक पतित हूँ॥" 188 ॥ साक्षात् ब्रह्मण्यदेव-प्रभुके द्वारा श्रीहरिदासके आर्य होनेकी घोषणा :- प्रभु कहे,—"तोमा स्पर्शि पवित्र हइते। तोमार पवित्र धर्म नाहिक आमाते॥ 189 ॥ । 455
[ 11/189-192 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला कृष्णभक्तमें प्रतिक्षण सभी तीर्थोंका स्नान और सभी (दैक्ष्य-विप्राभिधानात्) सः श्वपचः (शौक्रान्त्यजादि-नीचकुलोद्भूतः) प्रकारके तप-यज्ञ-दानादि विद्यमान :- अपि गरीयान् (श्रेष्ठः) अहो बत (इत्याश्चर्यम्)। ये ते (तव) क्षणे क्षणे कर तुमि सर्वतीर्थे स्नान। नाम गृणन्ति (उच्चारयन्ति), ते तपः तेपुः क्षणे क्षणे कर तुमि यज्ञ-तपो-दान ॥ 190 ॥ (अनुष्ठितवन्तः—तपस्विनोऽधिका इत्यर्थः) जुहुवुः (होमं कृतवन्तः), कृष्णभक्त ही अङ्गसहित वेद-वेदान्तका अध्ययन करनेवाले सस्नुः (सर्वेष्वेव तीर्थेषु स्नाताः), आर्याः (सदाचाराः), ब्रह्म और समस्त ब्राह्मणों तथा संन्यासियोंके गुरु :- (साङ्गं वेदम्) अनूचुः (अधीतवन्तः)। निरन्तर कर तुमि वेद-अध्ययन। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। द्विज-न्यासी हैते तुमि परम-पावन ॥ "191 ॥ इस श्लोकका तथ्य और पूर्ववर्ती श्लोककी विवृत्ति श्रीगौड़ीय भाष्य (श्रीमद्भागवतमें) देखें ॥ 192 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"मैं स्वयं पवित्र होनेके अमृताणुकणिका-(गरुड़पुराण)- लिये आपको स्पर्श कर रहा हूँ। आपके जैसा पवित्र ब्राह्मणानां सहस्रेभ्यः सत्रयाजी विशिष्यते। करनेका गुण मुझमें नहीं है। आप तो क्षण-क्षणमें सभी सत्रयाजि-सहस्रेभ्यः सर्ववेदान्तपारगः॥ तीर्थोंमें स्नान करते हैं और क्षण-क्षणमें आप यज्ञ, तप सर्ववेदान्तवित्कोट्या विष्णुभक्तो विशिष्यते। और दान करते हैं। आप निरन्तर वेदोंका अध्ययन वैष्णवानां सहस्रेभ्यः एकान्त्येको विशिष्यते॥ करते हैं। आप तो ब्राह्मण और संन्यासीसे भी परम अर्थात् "हजारों ब्राह्मणोंसे एक सावित्र्य ब्राह्मण पवित्र हैं॥"189-191 ॥ श्रेष्ठ है, सहस्र सावित्र्य ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक श्रीमद्भागवत (3/33/7)- वेदान्तविद् ब्राह्मण श्रेष्ठ है, कोटि-कोटि वेदान्तविद् अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक विष्णु भक्त श्रेष्ठ है, सैंकड़ों यज्जिह्वाग्रे वर्त्तते नाम तुभ्यम्। विष्णु भक्तोंसे एक ऐकान्तिक वैष्णव श्रेष्ठ है।" तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्याः न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्द्वक्तः श्वपचः प्रियः। ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥ 192 ॥ तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथाह्यहम् ॥ अर्थात् “चतुर्वेदपाठी अर्थात् चारों वेदोंको जाननेवाला अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 192 ॥ ब्राह्मण होनेपर भी वह भक्त हो, ऐसा नहीं है। मेरा अमृतप्रवाह भाष्य-हे भगवन् ! जिनके मुखमें भक्त चाण्डाल कुलमें उत्पन्न होनेपर भी मेरा प्रिय है आपका नाम वर्तमान है, वे श्वपच (कुत्तेका मांस और भक्त ही यथार्थ दानपात्र एवं ग्रहणपात्र है। खानेवाले) होनेपर भी श्रेष्ठ हैं। जो आपका नाम चाण्डालकुलमें उत्पन्न होनेपर भी मेरा भक्त मेरी भाँति कीर्तन करते हैं, उन्होंने सब प्रकारकी तपस्या कर ली ब्राह्मणादि सभीका पूज्य है।” है, समस्त यज्ञ कर लिये हैं, सभी तीर्थोंमें स्नान कर गीता 9/32 श्लोक देखें। और भी (अन्त्यलीला, लिया हैं एवं अङ्गसहित समस्त वेदोंका पाठ कर लिया 4/66-68)- है, इसलिये उनकी आर्योंमें गणना होती है ॥ 192 ॥ "नीच जाति नहे कृष्णभजने अयोग्य। अनुभाष्य-देवहूतिके द्वारा भगवान् कपिलकी सत्कुल विप्र नहे भजनेर योग्य॥ स्तुति-वर्णनके प्रसङ्गमें समस्त गुणोंसे सम्पन्न उनके येइ भजे, सेइ बड़, अभक्त-हीन, छार। भक्तोंके माहात्म्यका वर्णन- कृष्णभजने नाहि जाति-कुलादि विचार॥ दीनेरे अधिक दया करे भगवान्। यत् (यस्य) जिह्वाग्रे तुभ्यं (तव) नाम वर्त्तते, अतः कुलीन, पण्डित, धनीर बड़ अभिमान॥" 456 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/192-193 ] “नीच-जातिमें उत्पन्न व्यक्ति श्रीकृष्णभजनके अयोग्य नहीं होता, दूसरी ओर, केवलमात्र सत्कुलमें उत्पन्न ब्राह्मण होनेसे ही कोई श्रीकृष्णभजनके योग्य नहीं बन जाता। वास्तवमें जो श्रीकृष्णका भजन करता है, वही बड़ा है। अभक्त तो हीन है, घृणित है। श्रीकृष्णभजनमें जाति और कुल आदिका कोई विचार ही नहीं है। भगवान् दीन व्यक्तिपर अधिक कृपा करते हैं। क्योंकि श्रेष्ठ कुलमें जन्म लेनेवाले कुलीन, विद्वान तथा धनी व्यक्तियोंमें बहुत अभिमान होता है।” (मध्यलीला, 19/147-148)- “धर्माचारी-मध्ये बहुत 'कर्मनिष्ठ'। कोटि-कर्मनिष्ठ-मध्ये एक 'ज्ञानी' श्रेष्ठ॥ कोटिज्ञानी-मध्ये हय एकजण 'मुक्त'। कोटिमुक्त-मध्ये 'दुर्लभ' एक कृष्णभक्त॥” “धर्मका आचरण करनेवालोंमें भी बहुत कर्मनिष्ठ हैं। करोड़ों कर्मनिष्ठ व्यक्तियोंसे एक ज्ञानी श्रेष्ठ है। करोड़ों ज्ञानियोंमेंसे एक व्यक्ति ही मुक्त होता है। करोड़ों मुक्तोंमें भी एक कृष्णभक्त 'दुर्लभ' होता है।” कर्म करते हुए पापाचरणके फलसे रज-तमः स्वभावसम्पन्न होकर बद्धजीव सवनयज्ञके अधिकारसे च्युत होता है। ईशसेवासे विमुखता ही जीवको कर्मकाण्डमें प्रवृत्त कराती है। कर्म करते समय बद्धजीव ऊँचे-नीचेका विचार करते हुए प्रवृत्तिके क्रमसे सत्त्वगुणसे रजो-तमोगुणमें अवस्थितिकी अभिलाषा करता है। पापरहित सत्त्वगुणवाले व्यक्तियोंकी भगवान् विष्णुकी सेवामें स्वभावतः रुचि होती है। वे अधोपतित होकर सत्त्व-रजोके मिश्रित गुणसे क्षत्रिय, सत्त्व-तमोके मिश्रित गुणसे वैश्य, रजो-तमोके मिश्रित गुणसे शूद्र और तमोगुणमें अवस्थित होकर अन्त्यज आदि श्रेणीमें गिने जाते हैं। ब्राह्मण अधिकारसे च्युत होनेपर वे ब्राह्मणके अतिरिक्त अन्य कुलमें जन्म ग्रहण करते हैं। और पापरहित जीवकी भी ब्राह्मणकुलमें बीजगर्भसे उत्पन्न देह प्राप्त करके सत्त्वगुणसे च्युत होनेकी रुचि हो जाती है। उस रुचिसे जिन सब पापोंका उदय होता है, उसके प्रतिबन्धक स्वरूप गर्भाधान आदिसे लेकर उपनयन तक सभी संस्कार हैं। संस्कार-वर्जित ब्राह्मणकुलमें भी जन्में ब्राह्मण अपने रुचि-क्रमसे सत्त्वके अतिरिक्त मिश्र और दूसरे गुणोंमें अग्रसर होकर पतित होते हैं। ब्राह्मण कुलमें जन्म कर्मफलजनित निष्पाप होनेका सूचकमात्र है। उपरोक्त संस्कार ही निष्पाप जीवको पुनः पापमें प्रवृत्त होनेसे बचाते हैं। शूद्र आदिके लिये इन संस्कारोंकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि शूद्रने पूर्वजन्मके पापोंके प्रभावसे उस प्रकार कल्मष-प्रधान वंशमें जन्म ग्रहण किया है। अच्छेसे वर्णधर्मका पालन करनेवाले सत्कर्मोंके बलसे जन्म-जन्मान्तरमें उन्नति लाभ करते हैं। यह उन्नति गुण और कर्मजात है। जो श्वपच (कुत्तेका माँस खानेवाले) अन्त्यज कुलमें जन्म ग्रहण करके सारा जीवन संसारमें लिप्त रहते हैं, उनकी उन्नतिकी बात शास्त्रमें नहीं लिखी है। किन्तु ऐसे कुलमें जन्में जिन वैष्णवोंकी उस प्रकारके कुलमें आचारमें रुचि न होकर भगवद्-सेवामें लगनेकी योग्यता दिखायी दे, तो यह निश्चित है कि पूर्व जन्ममें उनका ब्राह्मणकुलके सत्त्वाधिकारमें अवस्थान था। “भगवद्भक्तिहीनस्य जातिः शास्त्रं जपस्तपः। अप्राणस्यैव देहस्य मण्डनं लोकरञ्जनम्॥ शुचिः सद्भक्तिदीप्ताग्निदग्धदुर्Defaultजातिकल्मषः। श्वपाकोऽपि-बुधैः श्लाघ्यो न वेदज्ञोऽपि नास्तिकः॥” अर्थात् “सच्चरित्र, सद्भक्तिरूपी दीप्ताग्नि द्वारा जिनके दुर्जातिके पाप क्षय हो चुके हैं, इस प्रकारका चाण्डाल भी पण्डितोंके द्वारा सम्मानित है, किन्तु नास्तिक व्यक्ति वेदज्ञ होनेपर भी सम्मानके योग्य नहीं है। भगवद्भक्तिहीन व्यक्तिकी सद्जाति, शास्त्रज्ञान, जप और तप मृतदेहके अलङ्कारके जैसे किसी कामके नहीं होते, वह तो केवल लोकरञ्जनमात्र है॥” 192॥ श्रीहरिदास ठाकुरको 'सिद्धबकुल' स्थान देना :- एत बलि ताँरे लञा गेला पुष्पोद्याने। अति निभृते ताँरे दिला वासा-स्थाने॥193॥ । 457
[ 11/193–202 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महाप्रभुके द्वारा स्वयं ही भक्तके साथ मिलन स्वीकार :— “एइस्थाने रहि' कर नाम-सङ्कीर्त्तन। प्रतिदिन आसि' आमि करिब मिलन॥ 194॥ मन्दिरके सुदर्शनचक्रको प्रणाम करनेकी आज्ञा-दान :— मन्दिरेर चक्र देखि' करिह प्रणाम। एइ ठाञि तोमार आसिबे प्रसादान्न॥” 195॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुरको पुष्प उद्यानमें ले गये और उन्हें अति निर्जनमें एक रहनेका स्थान दिया। महाप्रभुने उनसे कहा,—“आप इसी स्थानपर रहकर नाम-सङ्कीर्तन कीजिये। मैं प्रतिदिन यहाँ आकर आपसे मिलूँगा। यहींसे श्रीजगन्नाथ मन्दिरके चक्रको देखकर प्रणाम कीजियेगा और यहींपर आपके लिये अन्न-प्रसाद आ जायेगा॥” 193-195॥ अनुभाष्य—श्रीहरिदास ठाकुरने लौकिक-स्मृति-विधानके मतानुसार श्रीमन्दिरमें प्रवेश करके श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनके लिये स्वयंको अयोग्य जाना है, ऐसा जानकर महाप्रभुने उन्हें दूरसे श्रीमन्दिरके चूड़ाके अग्रभागमें सुदर्शनचक्रको देखकर प्रणाम करनेकी व्यवस्था कर दी और कहा,—इस सिद्धबकुलमें तुम्हारे लिये महाप्रसाद आयेगा॥ 195॥ श्रीनित्यानन्द आदिको श्रीहरिदासके दर्शनसे आनन्द :— नित्यानन्द, जगदानन्द, दामोदर, मुकुन्द। हरिदासे मिलि' सबे पाइल आनन्द॥ 196॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीदामोदर और श्रीमुकुन्द—सभीको श्रीहरिदाससे मिलकर बहुत आनन्द हुआ॥ 196॥ महाप्रभुके समुद्रस्नानके बाद श्रीअद्वैतादिका समुद्रस्नान :— समुद्रस्नान करि' प्रभु आइला निज-स्थाने। अद्वैतादि गेला सिन्धु करिबारे स्नाने॥ 197॥ मन्दिर-चूड़ा दर्शनके बाद सभीके द्वारा प्रसाद-सम्मान :— आसि' जगन्नाथेर कैल चूड़ा दरशन। प्रभुर आवासे आइला करिते भोजन॥ 198॥ अनुवाद—जब महाप्रभु समुद्रस्नान करके अपने स्थानपर आ गये, तब श्रीअद्वैतादि भक्तगण समुद्रमें स्नान करने गये। समुद्रस्नान करके सभी भक्तों ने श्रीजगन्नाथ मन्दिरके चूड़ाका दर्शन किया और महाप्रभुके आवासपर प्रसाद पानेके लिये पहुँचे॥ 197-198॥ सभी भक्तोंका बैठना और महाप्रभुके द्वारा परिवेशन :— सबारे बसाइला प्रभु योग्य क्रम करि'। श्रीहस्ते परिवेशण कैल गौरहरि॥ 199॥ श्रीहस्तके द्वारा प्रचुर परिवेशन :— अल्प अन्न नाहि आइसे दिते प्रभुर हाते। दुइ-तिनेर अन्न देन एक-एक पाते॥ 200॥ अनुवाद—महाप्रभुने सभी भक्तोंको योग्यक्रमसे बैठा दिया और स्वयं श्रीगौरहरिने अपने श्रीहाथोंसे प्रसादका परिवेशण (वितरण) आरम्भ किया। प्रसाद बाँटनेके लिये महाप्रभुके हाथोंमें थोड़ा अन्न नहीं आता था, इसलिये एक-एक पत्तलपर दो-तीन व्यक्तियोंके भोजन करने जितना अन्न दे रहे थे॥ 199-200॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘योग्यक्रम करि’—जिसके बाद जिसका बैठना उचित है, उस प्रकारसे करके॥ 199॥ महाप्रभुके भोजन किये बिना सभी भक्तोंका भी प्रसाद ग्रहण न करना :— प्रभु ना खाइले केह ना करे भोजन। ऊर्द्ध-हस्ते बसि' रहे सर्व भक्तगण॥ 201॥ अनुवाद—महाप्रभु नहीं खा रहे थे, इसलिये कोई भी भोजन नहीं कर रहा था। सभी भक्त हाथ उठाकर ही बैठे रहे॥ 201॥ श्रीदामोदर-स्वरूपकी महाप्रभुको श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ भोजन करनेकी प्रार्थना एवं स्वयं भक्तोंको परिवेशन करना स्वीकार :— स्वरूप-गोसाञि प्रभुके कैल निवेदन। “तुमि ना बसिले केह ना करे भोजन॥ 202॥ 458 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/202-212 ] तोमा-सङ्गे रहे यत संन्यासीर गण। गोपीनाथाचार्य ताँरे करियाछे निमन्त्रण ॥ 203 ॥ आचार्य आसियाछेन भिक्षार प्रसादान्न लञा। पुरी, भारती आछेन तोमार अपेक्षा करिया ॥ 204 ॥ नित्यानन्द लञा भिक्षा करिते कैसे तुमि। वैष्णवेर परिवेश्न करितेछि आमि ॥” 205 ॥ अनुवाद-तब श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुको निवेदन किया,-“जब तक आप बैठकर भोजन नहीं करेंगे, तब तक कोई भी भोजन नहीं करेगा। आपके साथ जो सब संन्यासी रहते हैं, श्रीगोपीनाथाचार्य ने उन्हें भी निमन्त्रण दिया है। श्रीगोपीनाथाचार्य बहुतसा भिक्षाका प्रसाद-अन्न लेकर आ गये हैं। श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीब्रह्मानन्द भारती भी आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। आप श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ भोजन करनेके लिये बैठिये और मैं सभी वैष्णवोंको परिवेश्न करता हूँ॥” 202-205 ॥ महाप्रभुके द्वारा परिवेश्न छोड़ देना और श्रीगोविन्दके हाथों श्रीहरिदास ठाकुरके लिये प्रसाद भेजना :- तबे प्रभु प्रसादान्न गोविन्द-हाते दिला। यत्न करि' हरिदास-ठाकुरे पाठाइला ॥ 206 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभुने सावधानीपूर्वक कुछ प्रसाद श्रीहरिदास ठाकुरको देनेके लिये श्रीगोविन्दके हाथोंमें दिया ॥ 206 ॥ संन्यासियोंके साथ महाप्रभुका प्रसाद-सम्मान और आचार्यके द्वारा परिवेश्न :- आपने बसिला सब संन्यासीरे लञा। परिवेशन करे आचार्य हरषित हञा ॥ 207 ॥ अनुवाद-फिर महाप्रभु सभी संन्यासियोंके साथ बैठ गये और श्रीगोपीनाथाचार्य आनन्दपूर्वक परिवेश्न करने लगे ॥ 207 ॥ अनुभाष्य-‘आचार्य’-श्रीगोपीनाथ आचार्य ॥ 204-207 ॥ श्रीगोपीनाथाचार्य-श्रीस्वरूप-श्रीजगदानन्दके द्वारा परिवेश्न :- स्वरूप दामोदर आर जगदानन्द। वैष्णवेरे परिवेशे तिन जने-आनन्द ॥ 208 ॥ अनुवाद-श्रीगोपीनाथाचार्य, श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीजगदानन्द पण्डित-ये तीनों आनन्दपूर्वक सभी वैष्णवोंको परिवेश्न करने लगे ॥ 208 ॥ प्रसाद ग्रहण करते समय हरिध्वनि :- नाना पिठापाना खाय आनन्द करिया। मध्ये मध्ये ‘हरि’ कहे आनन्दित हञा ॥ 209 ॥ अनुवाद-सभी वैष्णव आनन्दपूर्वक अनेक प्रकारका पिठा-पाना खा रहे थे और आनन्दित होकर बीच-बीचमें 'हरि' 'हरि' कह रहे थे ॥ 209 ॥ अनुभाष्य-उस समयमें प्रसादके सम्मान करते समय शुद्धसम्प्रदायमें हरिध्वनि देनेकी रीति थी ॥ 209 ॥ ग्यारहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। सभी भक्तोंका आचमन :- भोजन समाप्त हैल, कैल आचमन। सबारे पराइल प्रभु, माल्य-चन्दन ॥ 210 ॥ अनुवाद-भोजन समाप्त होनेपर सभीने आचमन किया। तब महाप्रभुने सबको माला पहनायी और चन्दन लगाया ॥ 210 ॥ सभीका अपने स्थानपर जाना और सन्ध्यामें महाप्रभुके साथ फिरसे मिलन :- विश्राम करिते सबे निज-वासा गेला। सन्ध्याकाले आसि' पुन: प्रभुके मिलिला ॥ 211 ॥ अनुवाद-तब विश्राम करनेके लिये सभी अपने-अपने वासस्थानपर चले गये और सन्ध्यामें वे आकर पुनः महाप्रभुसे मिले ॥ 211 ॥ श्रीरामानन्दका आगमन और वैष्णवोंके साथ मिलन :- हेनकाले रामानन्द आइला प्रभुस्थाने। प्रभु मिलाइल ताँरे सब वैष्णवगणे ॥ 212 ॥ । 459
[ 11/212-223 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—उस समय श्रीरामानन्द राय महाप्रभुके वासस्थानपर आये और महाप्रभुने उन्हें सभी वैष्णवोंसे मिलवाया॥ 212 ॥ सन्ध्यामें मन्दिरके आङ्गनमें भक्तोंके साथ कीर्त्तनारम्भ :- सबा लञा गेला प्रभु जगन्नाथालय। कीर्त्तन-आरम्भ तथा कैल महाशय॥ 213 ॥ सभीको पड़िछाके द्वारा माल्यचन्दन प्रदान, चारों ओरसे चार मण्डलियोंमें भक्तोंके द्वारा महाकीर्त्तन आरम्भ :- सन्ध्या-धूप देखि' आरम्भिला सङ्कीर्त्तन। पड़िछा आसिं सबारे दिल माल्य-चन्दन॥ 214 ॥ चारिदिके चारि-सम्प्रदाय करेन कीर्त्तन। मध्ये नृत्य करे प्रभु शचीर नन्दन॥ 215 ॥ अष्ट मृदङ्ग बाजे, बत्रिश करताल। हरिध्वनि करे सबे, बोले,-भाल, भाल॥ 216 ॥ कीर्त्तनेर ध्वनि महामङ्गल उठिल। चतुर्दश लोक भेदि' ब्रह्माण्ड भेदिल॥ 217 ॥ अनुवाद—महाप्रभु सभी भक्तोंको साथ लेकर श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें गये और वहाँ उन्होंने कीर्त्तन आरम्भ किया। फिर सबने सन्ध्याकी धूप-आरतीके दर्शन किये और उसके बाद उन्होंने सङ्कीर्त्तन आरम्भ किया। पड़िछाने आकर सबको माला और चन्दन प्रदान किया। चार दिशाओंमें भक्त चार मण्डलियाँ बनाकर कीर्त्तन करने लगे और बीचमें श्रीशचीनन्दन नृत्य करने लगे। चार मण्डलियोंमें आठ मृदङ्ग और बत्तीस करताल बजने लगीं और सभी हरिध्वनि करते हुए 'अति सुन्दर', 'अति सुन्दर' कहने लगे। कीर्त्तनकी ध्वनिसे महामङ्गल होने लगा। वह ध्वनि चौदह लोकोंको भेदती हुई ब्रह्माण्डको भी भेदकर उसके बाहर गयी॥ 213-217 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पाठान्तरमें— “सन्ध्या-धूप देखि' आरम्भिला सङ्कीर्त्तन। पड़िछा आनिया दिल माल्य-चन्दन॥ चारिदिके चारिसम्प्रदाय करे सङ्कीर्त्तन। मध्ये नृत्य करे प्रभु शचीर नन्दन॥” अर्थात् “सन्ध्याकी धूप-आरतीके दर्शन करके उन्होंने सङ्कीर्त्तन आरम्भ किया। तभी पड़िछाने आकर सबको माला और चन्दन प्रदान किया। चार दिशाओंमें भक्त चार मण्डलियाँ बनाकर कीर्त्तन करने लगे और बीचमें श्रीशचीनन्दन नृत्य करने लगे॥” 214 ॥ कीर्त्तन श्रवण करके बहुत पुरीवासियोंका आना और उनको आश्चर्य :- कीर्त्तन-आरम्भे प्रेम उथलि' चलिल। नीलाचलवासी लोक धाञा आइल॥ 218 ॥ कीर्त्तन देखि' सबार मने हैल चमत्कार। कभु नाहि देखि ऐछे प्रेमेर विकार॥ 219 ॥ अनुवाद—जब कीर्त्तन आरम्भ हुआ, तब महाप्रभु और भक्तोंके हृदयसे निकलकर श्रीकृष्णप्रेम सब ओर फैलने लगा और नीलाचलवासी लोग दौड़कर आये। कीर्त्तनको देखकर सभीके मनमें बहुत आश्चर्य हुआ और वे कहने लगे कि उन्होंने कभी भी प्रेमके ऐसे विकार नहीं देखे॥ 218-219 ॥ 'बेड़ा-नृत्य'-कीर्त्तन या मन्दिरकी परिक्रमा करते हुए कीर्त्तन :- तबे प्रभु जगनाथेर मन्दिर बेड़िया। प्रदक्षिण करि' बुलेन नर्त्तन करिया॥ 220 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु नृत्य करते-करते श्रीजगन्नाथ मन्दिरके चारों ओर परिक्रमा करने लगे॥ 220 ॥ महाप्रभुके अष्ट-सात्त्विक विकार :- आगे-पाछे गान करे चारि-सम्प्रदाय। आछाड़ेर काले धरे नित्यानन्द-राय॥ 221 ॥ अश्रु, पुलक, कम्प, स्वेद, गम्भीर, हुँकार। प्रेमेर विकार देखि' लोके चमत्कार॥ 222 ॥ पिच्कारि-धारा जिनि' अश्रु नयने। चारिदिकेर लोक सब करये सिने॥ 223 ॥ 460 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/221-233 ] 'बेड़ानृत्य' महाप्रभु करि' कतक्षण। मन्दिरेर पाछे रहि' करये कीर्त्तन ॥ 224 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके आगे-पीछे चार मण्डलियाँ गान कर रही थी। महाप्रभु जब पछाड़ खाकर गिरने लगते, तब श्रीनित्यानन्द प्रभु उन्हें सम्भाल लेते। महाप्रभुमें अश्रु, पुलक, कम्प, स्वेद, गम्भीर हुँकार आदि प्रेमके अष्ट-सात्त्विक विकारोंको देखकर लोग आश्चर्यचकित हो रहे थे। महाप्रभुके नेत्रोंसे पिचकारीकी भाँति अश्रुधारा निकल रही थी, जो चारों ओर खड़े लोगोंको भिगो रही थी। महाप्रभु श्रीजगन्नाथ मन्दिरकी परिक्रमा करके कुछ समयके लिये मन्दिरके पीछे खड़े होकर कीर्त्तन करते रहे ॥ 221-224 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'लोक सब करये सिनाने'—चारों ओर सब लोगोंने अश्रुजलसे स्नान किया ॥ 222 ॥ चारों सम्प्रदायके बीचमें महाप्रभुका नृत्य :- चारिदिके नाचे, सम्प्रदाय उच्चैःस्वरे गाय। मध्ये ताण्डव-नृत्य करे गौरराय ॥ 225 ॥ बहुक्षण नृत्य करि' प्रभु स्थिर हैला। चारि महान्तेरे तबे नाचिते आज्ञा दिला ॥ 226 ॥ अनुवाद—चारों ओर चार मण्डलियोंमें भक्त उच्च स्वरसे गा रहे थे तथा उनके बीचमें श्रीगौरराय ताण्डव नृत्य कर रहे थे। बहुत समय तक नृत्य करनेके बाद जब महाप्रभु कुछ स्थिर हुए, तो उन्होंने चार महान्तोंको नृत्य करनेका आदेश दिया ॥ 225-226 ॥ अकेले पुरुषके नृत्यको ताण्डव नृत्य कहते हैं। चार महान्त-(1) श्रीनित्यानन्द, (2) श्रीअद्वैत :- एक सम्प्रदाये नाचे नित्यानन्द-राये। अद्वैत-आचार्य नाचे आर सम्प्रदाये ॥ 227 ॥ अनुवाद—एक मण्डलीमें श्रीनित्यानन्द प्रभुने नृत्य आरम्भ किया और दूसरी मण्डलीमें श्रीअद्वैताचार्य प्रभु नृत्य करने लगे ॥ 227 ॥ (3) श्रीवक्रेश्वर, (4) श्रीवास :- आर सम्प्रदाये नाचे पण्डित-वक्रेश्वर। श्रीवास नाचे आर सम्प्रदाय-भितर ॥ 228 ॥ अनुवाद—तीसरी मण्डलीमें श्रीवक्रेश्वर पण्डित नृत्य करने लगे और चौथी मण्डलीमें श्रीवास पण्डित नृत्य कर रहे थे ॥ 228 ॥ कीर्त्तनके बीचमें महाप्रभुका अवस्थान और चारों जनोंके नृत्य-दर्शनके लिये ऐश्वर्यका प्रकाश :- मध्ये रहि' महाप्रभु करेन दरशन। ताँहा एक ऐश्वर्य हइल प्रकटन ॥ 229 ॥ चारिदिके नृत्यगीत करे यत जन। सबे कहे,―प्रभु करे आमारे दरशन ॥ 230 ॥ चारिजनेर नृत्य देखिते प्रभुर अभिलाष। सेइ अभिलाषे करे ऐश्वर्य प्रकाश ॥ 231 ॥ दर्शने आवेश ताँर देखि' मात्र जाने। केमने चौदिके देखे,—इहा नाहि जाने ॥ 232 ॥ अनुवाद—महाप्रभु बीचमें रहकर इन सबको नृत्य करते देख रहे थे और वहाँ महाप्रभुका एक ऐश्वर्य प्रकट हो गया। चारों ओर जितने भक्त नृत्य-गीत कर रहे थे, वे सभी कह रहे थे,―महाप्रभु मेरी ओर ही देख रहे हैं। महाप्रभुकी इच्छा चारों महान्तोंके नृत्यका दर्शन करनेकी थी, इसी अभिलाषाके कारण उन्होंने अपना ऐश्वर्य प्रकाशित किया। दर्शनके आवेशमें चारों ओर भक्त महाप्रभुको अपने सामने देख रहे थे, किन्तु महाप्रभु कैसे एक साथ चारों ओर देख रहे हैं―इसे वे नहीं जानते थे ॥ 229-232 ॥ ब्रजलीलामें सखाओंके मध्यमें बैठे श्रीकृष्णके पुलिन भोजनके साथ उपमा :- पुलिन-भोजने येन कृष्ण मध्य-स्थाने। चौदिकेर सखा कहे,―आमारे नेहाने ॥ 233 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण यमुनाके तटपर भोजन करते । 461
[ 11/233-242 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला समय सभी सखाओंके बीचमें बैठते थे। उनके चारों ओर बैठे हुए सभी सखा यही अनुभव करते थे कि श्रीकृष्ण उन्हें देख रहे हैं॥ 233 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-व्रजमें श्रीकृष्ण जब यमुना-तटपर भोजन करते थे, तब उनके चारों ओर बैठकर प्रत्येक गोपबालक देखते थे कि श्रीकृष्ण उसकी ओर मुख करके ही भोजन कर रहे हैं। उसी प्रकार महाप्रभु भी जब नृत्य कर रहे थे, तब उनके चारों ओर स्थित भक्तोंने उनके सामने रहकर उनके मुखका दर्शन किया था। यह भी महाप्रभुका एक ऐश्वर्य प्रकाश है। 'नेहाने'-देखे ॥ 233 ॥ निकट नृत्यकारी भक्तको महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- नृत्य करिते येइ आइसे सन्निधाने। महाप्रभु करे तारे दृढ़ आलिङ्गने ॥ 234 ॥ महासङ्कीर्त्तन-नृत्य :- महानृत्य, महाप्रेम, महासङ्कीर्त्तन। देखि' प्रेमावेशे भासे नीलाचल-जन ॥ 235 ॥ अनुवाद-नृत्य करते हुए जो भी महाप्रभुके निकट आता, महाप्रभु उसे दृढ़तापूर्वक आलिङ्गन करते। इस प्रकार महानृत्य, महाप्रेम और महासङ्कीर्त्तनको देखकर नीलाचलवासी प्रेमावेशमें डूब गये ॥ 234-235 ॥ प्रतापरुद्रके द्वारा अट्टालिकापर चढ़कर कीर्त्तन-दर्शन :- गजपति राजा शुनि' कीर्त्तन-महत्त्व। अट्टालिका चड़ि' देखे स्वगण-सहित ॥ 236 ॥ राजाका आश्चर्य एवं महाप्रभु-चरण-दर्शनकी उत्कण्ठा :- कीर्त्तन देखिया राजार हैल चमत्कार। प्रभुके मिलिते उत्कण्ठा बाड़िल अपार ॥ 237 ॥ अनुवाद-गजपति राजाने भी जब कीर्त्तनकी महिमा सुनी, तो वे अपने लोगोंके साथ अट्टालिकापर चढ़कर उसे देखने लगे। कीर्त्तनको देखकर राजाको बहुत आश्चर्य हुआ और उनकी महाप्रभुसे मिलनेकी उत्कण्ठा और अधिक बढ़ गयी ॥ 236-237 ॥ कीर्त्तनके अन्तमें पुष्पाञ्जलि दर्शन करके भक्तोंके साथ महाप्रभुका अपने घरपर जाना :- कीर्त्तन-समाप्त्ये प्रभु देखि' पुष्पाञ्जलि। सर्व वैष्णव लञा प्रभु आइला वासा चलि' ॥ 238 ॥ अनुवाद-कीर्त्तन समाप्त होनेपर महाप्रभुने श्रीजगन्नाथदेवकी पुष्पाञ्जलीका दर्शन किया। तब महाप्रभु सभी वैष्णवोंको लेकर अपने वासस्थानपर चले आये॥ 238 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'पुष्पाञ्जलि'-जगन्नाथदेवकी पुष्पाञ्जलि ॥ 238 ॥ ग्यारहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। सभीका महाप्रभुके हाथोंसे वितरित प्रसादका सम्मान :- पड़िछा आनिया दिल प्रसाद विस्तर। सबारे बाँटिया ताहा दिलेन ईश्वर ॥ 239 ॥ सभी भक्तोंको विश्राम करनेकी अनुमति देना :- सबारे विदाय दिल करिते शयन। एइमत लीला करे शचीर नन्दन ॥ 240 ॥ अनुवाद-पड़िछाने आकर महाप्रभुको बहुत-सा महाप्रसाद दिया और महाप्रभुने उसे सभी वैष्णवोंमें बाँट दिया। तब महाप्रभुने सभी भक्तोंको शयन करनेके लिये विदायी दी। इस प्रकार श्रीशचीनन्दन ऐसी अद्भुत लीलाएँ करते हैं ॥ 239-240 ॥ महाप्रभुके साथ रहते हुए सभीको इस प्रकार कीर्त्तनके आनन्दकी प्राप्ति :- यावत् आछिला सबे महाप्रभु-सङ्गे। प्रतिदिन एइमत करे कीर्त्तन-रङ्गे ॥ 241 ॥ अनुवाद-जब तक सब भक्त महाप्रभुके साथ जगन्नाथपुरीमें रहे, प्रतिदिन महाप्रभु इसी प्रकार बड़े आनन्दसे कीर्त्तन करते थे ॥ 241 ॥ बेड़ा-नृत्य-कीर्त्तनके श्रवणसे चिद्वृत्तिकी स्फूर्त्ति :- एइ त' कहिलुँ प्रभुर कीर्त्तन-विलास। येबा इहा शुने, हय चैतन्येर दास ॥ 242 ॥ 462 ।
ग्यारहवाँ अध्याय 11/242-243 ] श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 243 ॥ करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 242-243 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे 'बेड़ा-कीर्त्तन'-विलास-वर्णनं नाम एकादश परिच्छेदः। अनुवाद-इस प्रकार मैंने महाप्रभुके कीर्त्तन-विलासका वर्णन किया। (ग्रन्थकार आशीर्वाद कर रहे हैं) जो श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें 'बेड़ा-कीर्त्तन'-विलास-वर्णन इसका श्रवण करेगा, वह महाप्रभुका दास बन जायेगा। नामक ग्यारहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। । 463
बारहवाँ अध्याय
**कथासार—**श्रीमहाप्रभुका दर्शन करनेके लिये राजाने बहुत चेष्टा की। सभी भक्तोंको अपने साथ लेकर श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुको राजाके चित्तके भाव बतलाये। महाप्रभुके तब भी (राजासे मिलना) अस्वीकार करनेपर श्रीनित्यानन्द प्रभुने महाप्रभुसे उनका एक बहिर्वास (वस्त्र) लेकर राजाके पास भिजवा दिया। किसी और दिन जब श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुको राजापर कृपा करनेके लिये कहा, तो महाप्रभु उनसे सम्मत नहीं हुए, किन्तु उन्होंने राजाके पुत्रको लानेकी आज्ञा दे दी; राजपुत्रके कृष्णोद्दीपक वेशको देखकर महाप्रभुने उसपर कृपा की। रथयात्रासे पहले ही अपने भक्तोंके साथ महाप्रभुने गुण्डिचा मन्दिरकी धुलायी और सफाई की। उसके बाद इन्द्रद्युम्न सरोवरमें स्नान करके उपवनमें समस्त वैष्णवोंको लेकर महाप्रभुने प्रसाद सेवा की। मन्दिर-मार्जनके समय जब किसी गौड़ीयने महाप्रभुके चरणोंमें जल देकर उस जलको पान किया, तब एक प्रेम-रहस्य उदित हुआ। दूसरी ओर, श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र श्रीगोपालके मूर्च्छित होनेपर उसकी मूर्च्छाको भङ्ग होते न देखकर महाप्रभुने उसे चेतन किया। प्रसाद सेवनके समय श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभुमें थोड़ा प्रेमकलह हुआ था। श्रीअद्वैत प्रभुने कहा,–'अज्ञात कुल-शील नित्यानन्दके साथ एक पंक्तिमें भोजन करना गृहस्थ-ब्राह्मणका कर्तव्य नहीं है'; उसके उत्तरमें श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,–“अद्वैताचार्य 'अद्वैत-सिद्धान्त'में निपुण हैं, इसके साथ भोजन करनेसे सज्जन लोगोंका चित्त ना जाने किस प्रकारका हो जाता है?” इन दोनों प्रभुओंकी बातमें अत्यन्त गूढ़ रहस्य है, उसे सद्भक्त ही अनायास समझ सकते हैं। वैष्णवोंकी सेवा होनेके बाद श्रीस्वरूप आदि सज्जनोंने घरके भीतर प्रसाद सेवा की। श्रीनवयौवन-दर्शनके दिन भक्तोंको लेकर महाप्रभुने जगद्बन्धु (जगन्नाथ)के दर्शनमें विशेष प्रसन्नता प्राप्त की।
—(अमृतप्रवाह भाष्य)
गुण्डिचा मार्जन करनेवाले श्रीगौरसुन्दर :— श्रीगुण्डिचा-मन्दिरमात्मवृन्दैः सम्मार्जयन् क्षालनतः स गौरः। स्वचित्तवच्छीतलमुज्ज्वलञ्च कृष्णोपवेशौपयिकं चकार ॥1॥
**अनुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥1॥
**अमृतप्रवाह भाष्य—**श्रीगौरचन्द्रने अपने आत्मीय भक्तों सहित श्रीगुण्डिचा मन्दिरको पोंछ और धो करके उसे अपने शीतल और उज्ज्वल चित्तकी भाँति स्वच्छ करके श्रीकृष्णके बैठने योग्य किया था॥1॥
अनुभाष्य— सः गौरः आत्मवृन्दैः (निजभक्तगणैः सह) श्रीगुण्डिचा-मन्दिरं सम्मार्जयन् (मलादि-विरहितं कुर्वन्) क्षालनतः (प्रक्षालनादिना) स्वचित्तवत् (आत्महृदयवत्) शीतलं (भोगवासनानलजनित-त्रितापविहीनम्) उज्ज्वलं (दीप्तिविशिष्टं) च कृष्णोपवेशौपयिकं (कृष्णस्य वासयोग्यं स्थानं) चकार।
**श्लोक-भावानुवाद—**अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥1॥
जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥2॥
**अनुवाद—**श्रीगौरचन्द्रकी जय हो जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो एवं समस्त श्रीगौरभक्तोंकी जय हो ॥2॥
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[ 12/3-11 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला गौरभक्तोंसे ग्रन्थकारकी श्रीकृष्णचैतन्यके गुण-लीला-वर्णन करनेकी शक्तिकी प्रार्थना :- जय जय श्रीवासादि गौरभक्तगण। शक्ति देह,—करि येन चैतन्य-वर्णन॥३॥ अनुवाद—श्रीवासादि गौरभक्तोंकी जय हो जय हो। आप सभी मुझे शक्ति प्रदान करें, जिससे मैं महाप्रभुकी लीलाओंका वर्णन कर सकूँ॥३॥ दक्षिण देशसे आनेके बाद राजा प्रतापरुद्रकी महाप्रभुके दर्शनकी उत्कण्ठा— पूर्वे दक्षिण हैते प्रभु यबे आइला। ताँरे मिलिते गजपति उत्कण्ठित हैला॥४॥ दर्शन करनेके लिये श्रीभट्टाचार्यको महाप्रभुकी अनुमतिके लिये पत्र भेजना :- कटक हैते पत्री दिल सार्वभौम-ठाञि। प्रभुर आज्ञा हय यदि, देखिवारे याइ॥५॥ अनुवाद—दक्षिण भारतसे जब महाप्रभु लौट आये, तब गजपति (राजा प्रतापरुद्र) उनसे मिलनेके लिये बड़े उत्कण्ठित हो गये। कटकसे राजाने श्रीसार्वभौमको पत्र लिखा कि यदि महाप्रभुकी आज्ञा हो, तो मैं उनके दर्शनके लिये आ जाऊँ॥४-५॥ श्रीभट्टाचार्यके द्वारा महाप्रभुकी निषेध आज्ञाका बताना और राजाके द्वारा पुनः लोभरूपी पत्र भेजना :- भट्टाचार्य लिखिल,—प्रभुर आज्ञा ना हैल। पुनरपि राजा ताँरे पत्री पाठाइल॥६॥ भक्तोंके पास अभीष्ट सिद्धि हेतु प्रार्थना :- 'प्रभुर निकटे आछे यत भक्तगण। मोर लागि' ताँ-सबारे करिह निवेदन॥७॥ सेइ सब दयालु मोरे हञा सदय। मोर लागि' प्रभुपदे करिबे विनय॥८॥ ताँ-सबार प्रसादे मिले श्रीप्रभुर पाय। प्रभुकृपा बिना मोर राज्य नाहि भाय॥९॥ महाप्रभुकी कृपाके अभावमें राजाका निर्वेद और राज्य त्याग करनेकी प्रतिज्ञा :- यदि मोरे कृपा ना करिबे गौरहरि। राज्य छाड़ि' योगी हइ' हइब भिखारी॥'१०॥ अनुवाद—श्रीभट्टाचार्यने उत्तरमें लिखा,—अभी महाप्रभुकी ऐसी आज्ञा नहीं हुई है। यह सुनकर राजाने फिरसे उन्हें एक पत्र लिखकर भेजा,—'महाप्रभुके पास जितने भक्त रहते हैं, उन सबसे मेरे ओरसे निवेदन करना कि वे सब दयालु भक्त मुझपर कृपा करके मेरे लिये महाप्रभुके श्रीचरणोंमें प्रार्थना करें। उन सबकी कृपासे ही मुझे महाप्रभुके श्रीचरणोंकी प्राप्ति हो सकती है। महाप्रभुकी कृपाके बिना अब मेरा राजपाटमें मन नहीं लगता। यदि श्रीगौरहरि मुझपर कृपा नहीं करेंगे, तो मैं राजपाट छोड़कर योगी बनकर घर-घर भिक्षा करूँगा॥'६-१०॥ अनुभाष्य—'कल्याणकल्पतरु' ग्रन्थमें श्रीमद्भक्तिविनोद ठाकुरने लिखा है— “काँदिया, काँदिया जानाइब दुःखग्राम। संसार-अनल ह'ते मागिब विश्राम॥ शुनिया आमार दुःख वैष्णव-ठाकुर। आमा लागि' कृष्णे आवेदिबेन प्रचुर॥ वैष्णवेर आवेदने कृष्ण दयामय। मो-हेन पामर-प्रति ह'बेन सदय॥” अर्थात् “मैं रोते-रोते अपने दुःखकी गाथा सुना रहा हूँ। अब मैं इस संसार-अग्निसे छुटकारा चाहता हूँ। हे वैष्णव-ठाकुर ! मेरे दुःखकी गाथाको सुनकर श्रीकृष्णसे मेरे लिये ज़ोर देकर प्रार्थना करना। वैष्णवकी प्रार्थना सुनकर दयामय श्रीकृष्ण मेरे जैसे पापीके प्रति भी दयाशील होंगे॥”७-९॥ सभी भक्तोंको राजाका पत्र दिखाना :- भट्टाचार्य पत्री देखि' चिन्तित हञा। भक्तगण-पाश गेला सेइ पत्री लञा॥११॥ 466 ।
बारहवाँ अध्याय 12/11-21 ] सबारे मिलिया कहिल राज-विवरण। पिछे सेइ पत्री सबारे कराइल दरशन ॥ 12॥ अनुवाद—राजाका पत्र पढ़कर श्रीभट्टाचार्य बड़े चिन्तित हो गये। वे उस पत्रको लेकर भक्तोंके पास गये। पहले श्रीभट्टाचार्यने सभी भक्तोंसे मिलकर उनको राजाकी महाप्रभुके दर्शनकी तीव्र उत्कण्ठाके विषयमें बतलाया और बादमें सबको राजाका पत्र भी दिखलाया ॥ 11-12 ॥ राजाकी महाप्रभुके प्रति भक्तिको देखकर सभी भक्तोंको विस्मय :- पत्री देखि' सबार मने हइल विस्मय। प्रभुपदे गजपतिर एत भक्ति हय !! 13 ॥ अनुवाद—राजाके पत्रको देखकर सभीके मनमें आश्चर्य हुआ कि गजपति राजाकी महाप्रभुके चरणोंमें इतनी भक्ति है॥ 13 ॥ सभीकी महाप्रभुके दृढ़ सङ्कल्पमें आस्थाके कारण भय और राजाको अप्रिय सत्य बात कहनेकी अनिच्छा :- सबे कहे, - "प्रभु ताँरे कभु ना मिलिबे। आमि सब कहि यदि, दुःख से मानिबे ॥" 14 ॥ अनुवाद—सभी भक्तोंने कहा,- "महाप्रभु राजासे कभी भी नहीं मिलेंगे, परन्तु यह बात यदि हम सब राजासे कहेंगे, तो उनको बहुत दुःख होगा॥" 14॥ श्रीसार्वभौमकी युक्ति - महाप्रभुको राजाकी भगवद्भक्तिकी निष्ठा वर्णन करनेकी इच्छा :- सार्वभौम कहे, - "सबे चल' एकबार। मिलिते ना कहिब, कहिब राज-व्यवहार ॥" 15 ॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौमने कहा- "आइये, हम सब एक बार महाप्रभुके पास चलते हैं। हम उन्हें राजासे मिलनेके लिये नहीं कहेंगे, केवल राजाके व्यवहारकी ही बात कहेंगे ॥" 15 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसार्वभौमने कहा, - हम सब मिलकर महाप्रभुके सामने राजाके सुवैष्णव-व्यवहारके बारेमें बतलायेंगे। राजाको दर्शन देनेके लिये अनुरोध नहीं करेंगे ॥ 15 ॥ महाप्रभुके निकट आकर भी सभीको राजाकी बात कहनेमें भय :- एत बलि' सबे गेला महाप्रभुर स्थाने। कहिते उन्मुख सबे, ना कहे वचने ॥ 16 ॥ अनुवाद—इतना कहकर श्रीसार्वभौम सबके साथ महाप्रभुके पास गये। वे सब कहनेके लिये महाप्रभुके सामने आये, परन्तु कुछ कह नहीं सके ॥ 16 ॥ सभीकी भय-चकित-दृष्टिको देखकर महाप्रभुके द्वारा उनके आगमनके कारणकी जिज्ञासा :- प्रभु कहे, - "कि कहिते सबार आगमन ? देखिये कहिते चाह, - ना कह, कि कारण ? ॥" 17॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा, - "आप क्या कहनेके लिये यहाँ आये हैं? मैं देख रहा हूँ कि आप कुछ कहना चाहते हैं, किन्तु कुछ कह नहीं रहे, क्या कारण है?" ॥ 17 ॥ नित्यानन्द प्रभुका भयभीत होकर निवेदन :- नित्यानन्द कहे, - "तोमाय चाहि निवेदिते। ना कहिले रहिते नारि, कहिते भय चित्ते ॥ 18 ॥ योग्यायोग्य तोमाय सब चाहि निवेदिते। तोमा ना मिलिले राजा चाहे योगी हैते ॥ 19 ॥ श्रीगौरकृपाके अभावमें राज-प्रतिज्ञाका निवेदन :- काणे मुद्रा लइ' मुञि हइब भिखारी। राज्यभोग नहे चित्ते बिना गौरहरि ॥ 20 ॥ राजाका गाढ़ गौर-अनुराग :- देखिब से मुखचन्द्र नयन भरिया। धरिब से पादपद्म हृदये तुलिया ॥" 21 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,- "हम आपसे । 467
[ 12/18–29 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला कुछ निवेदन करना चाहते हैं, कहे बिना रह नहीं पा रहे हैं और कहनेमें भय हो रहा है। योग्य हो या अयोग्य हो, हम सब आपसे निवेदन करना चाहते हैं कि अगर आप राजासे नहीं मिलेंगे, तो वे योगी बन जायेंगे। उन्होंने कहा हैं कि श्रीगौरहरिके बिना मुझे राज्य-भोगकी इच्छा नहीं है, इसलिये मैं कानोंमें मुद्रा धारणकर भिखारी बन जाऊँगा। तब मैं महाप्रभुके मुखचन्द्रको अपने नेत्रोंसे जी भरकर देखूँगा और उनके श्रीचरणकमलोंको उठाकर अपने हृदयपर धारण करूँगा॥”18-21॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'काणे मुद्रा'—पश्चिम भारतमें योगियोंको 'कान-फाटा योगी' कहते हैं। योगी लोग कानमें घोंघेकी हड्डीके द्वारा एक चिह्न धारण करते हैं। राजाने कहा,–श्रीगौरहरिके दर्शन बिना राज्य-भोग चित्तमें नहीं है, अर्थात् अच्छा नहीं लगता॥20॥ महाप्रभुका आचार्योचित कठोर संन्यास-धर्मपरक वाक्य :- यद्यपि शुनिया प्रभुर कोमल हय मन। तथापि बाहिरे कहे निष्ठुर वचन॥22॥ भक्तोंकी राजदर्शनरूपी इच्छा जानकर प्रभुका आरोप :- “तोमा-सबार इच्छा,—एइ आमारे लञा। राजाके मिलह इँह कटकेते गिया॥23॥ विधिके उल्लङ्घनके कारण लोकनिन्दा और श्रीदामोदर पण्डितके वाक्य-दण्डकी सम्भावना :- परमार्थ थाकुक्, लोके करिबे निन्दन। लोके रहु—दामोदर करिबे भर्त्सन॥24॥ मर्यादा प्रदर्शनके छलसे श्रीदामोदरकी अनधिकार चर्चाके प्रति कटाक्ष :- तोमा-सबार आज्ञाय आमि ना मिलि राजारे। दामोदर कहे यबे, मिलि तबे ताँरे ॥"25॥ अनुवाद—यद्यपि यह सब सुनकर महाप्रभुका मन कोमल हो गया, तथापि बाहरसे कठोर होकर उन्होंने निष्ठुर वचन कहे,—“आप सबकी इच्छा यह है कि आप सब मुझे कटकमें ले जाकर राजासे मिलवायेंगे। परमार्थकी बात तो दूर रहे, लोग भी निन्दा करेंगे। यदि लोक-निन्दाकी बातको भी छोड़ दें, तो यह दामोदर ही मेरी भर्त्सना करेगा। आप सबके कहनेपर भी मैं राजासे नहीं मिलूँगा, किन्तु यदि दामोदर कह दे, तो मैं राजासे मिल सकता हूँ॥”22-25॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पारमार्थिक-विचारसे संन्यासीके लिये राजाका दर्शन करना दोषपूर्ण है। उस दोषकी तो बात ही नहीं—लोग तो संन्यासीके अति छोटेसे दोषको देखनेसे ही निन्दा करते हैं। लोकनिन्दा परित्यागका कुछ तात्पर्य है,—जगत्में धर्म-प्रचार ही संन्यासीका कर्म है। जगत्में यदि निन्दा हुई, तो धर्म-प्रचारकार्य ठीकसे नहीं होता; इसलिये लोक-रक्षा करना भी आवश्यक है। लोक-निन्दाकी बात दूर रहे—मेरे निकट यह जो दामोदर पण्डित बैठा है, इसके हाथों छुटकारा पाना कठिन है, यह अवश्य ही मेरी भर्त्सना करेगा। केवल आपकी आज्ञासे राजाके साथ साक्षात्कार नहीं कर सकता; यदि दामोदर उनसे मिलनेके लिये कहे, तभी मैं ऐसा कर सकता हूँ।' महाप्रभुके इस वाक्यके अनेक गूढ़ अर्थ हैं,—दामोदरकी भक्तिके वशीभूत होनेपर भी उसका वाक्यरूपी दण्ड बहुत बार महाप्रभुके लिये अयोग्य होता है। इस बातसे दामोदरको वह प्रवृत्ति छोड़नी होगी॥24-25॥ श्रीदामोदरका अभिमान और आरोप :- दामोदर कहे,—“तुमि स्वतन्त्र ईश्वर। कर्त्तव्याकर्त्तव्य सब तोमार गोचर ॥26॥ आमि कोन् क्षुद्रजीव, तोमाके विधि दिब? आपनि मिलिबे ताँरे, ताहाओ देखिब ॥ 27 ॥ राजा तोमारे स्नेह करे, तुमि—स्नेहवश। ताँर स्नेहे कराबे ताँरे तोमार परश॥28॥ यद्यपि ईश्वर तुमि परम-स्वतन्त्र। तथापि स्वभावे हओ प्रेम-परतन्त्र ॥ 29 ॥ अनुवाद—श्रीदामोदरने कहा,—“आप स्वतन्त्र ईश्वर 468 ।
बारहवाँ अध्याय 12/26-34 ] हैं। क्या कर्त्तव्य है और क्या अकर्त्तव्य, यह आप भली-भाँति जानते हैं। मैं एक क्षुद्र जीव कौन होता हूँ जो आपको विधि-नियम बतलाऊँगा ? आप स्वयं ही राजासे मिलेंगे, मैं यह देखूँगा। राजा आपसे स्नेह करते हैं और आप भी उनके स्नेहके वशीभूत हैं। राजाका स्नेह ही उन्हें आपका स्पर्श प्राप्त करायेगा। यद्यपि आप ईश्वर हैं, इसलिये परम-स्वतन्त्र हैं, तथापि अपने स्वभावके कारण आप प्रेमके अधीन रहते हैं।"26-29॥ अनुभाष्य-यद्यपि आप ईश्वर हैं, इसलिये किसीके भी द्वारा किसी प्रकारसे बँधे नहीं है, तथापि अपने स्वभावके कारण आप अपने ऐकान्तिक भक्तोंकी प्रीतिसे ही बँधे हैं॥ 29 ॥ महाप्रभुके मतका समर्थन करते हुए श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा राजाके अनुरागका समर्थन :- नित्यानन्द कहे, - 'ऐछे हय कोन् जन। ये तोमारे कहे, 'कर राजदरशन' ॥ 30 ॥ कृष्णानुरागीका स्वभाव और याज्ञिक-ब्राह्मणोंकी पत्नियोंके कृष्णानुरागका दृष्टान्त :- किन्तु अनुरागी लोकेर स्वभाव एक हय। इष्ट ना पाइले निज-प्राण से छोड़य ॥ 31 ॥ याज्ञिक-ब्राह्मणी सब ताहाते प्रमाण। कृष्ण लागि' पति-आगे छाड़िलेक प्राण ॥ 32 ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,-'इस त्रिभुवनमें ऐसा कौन है जो आपसे राजाका दर्शन करनेके लिये कह सके ? किन्तु क्या यह अनुरागी व्यक्तियोंका स्वभाव नहीं है कि वे अपने इष्टको न पानेसे अपने प्राणोंका भी त्याग कर देते हैं। याज्ञिक ब्राह्मणियाँ सब इसका प्रमाण हैं, श्रीकृष्णके लिये वे अपने पतियोंके सामने ही अपने प्राण त्यागनेके लिये तत्पर हो गयीं थी॥ 30-32 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-एक दिन जब श्रीकृष्ण गोपबालकों और गैयाओंको लेकर मथुराके निकट पहुँचे, तब गोपबालकोंको भूख लगी। श्रीकृष्णने कहा, - 'यहाँ पासमें एक वनमें याज्ञिक ब्राह्मण यज्ञ कर रहे हैं, उनके पास जाकर मेरे नामसे भोजन माँग लो।' गोपबालकोंने जाकर जब भोजनकी याचना की, तब कर्मजड़ याज्ञिक ब्राह्मणोंने उन्हें भोजन नहीं दिया। उन ब्राह्मणोंकी पत्नियोंने श्रीकृष्णके प्रति स्वाभाविक अनुरागवशतः गोपबालकोंकी याचनाको सुनकर पतियोंके यज्ञका त्याग करके श्रीकृष्णको भोजन देनेके लिये अनेक विपत्तियोंको स्वीकार किया। तात्पर्य यह है कि भगवद्-तत्त्वमें अनुराग होनेपर उनकी सेवाके अभावमें भक्त प्राण त्यागनेके लिये भी तत्पर होता है॥ 31-32 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 2/28, 43 और 45 संख्या देखें। मध्यलीला 4/186 संख्या एवं अन्त्यलीला 4/61-64 संख्या इस प्रसङ्गमें विचारणीय हैं। याज्ञिक ब्राह्मण पत्नियोंको श्रीकृष्णप्राप्ति-प्रसङ्गके लिये भागवत दशम- स्कन्ध 23वाँ अध्याय देखें॥ 31-32 ॥ श्रीनित्यानन्द प्रभुकी युक्ति :- एक युक्ति आछे, यदि कर अवधान। तुमि ना मिलिलेह ताँरे, रहे ताँर प्राण ॥ 33 ॥ एक बहिर्वास यदि देह' कृपा करि'। ताहा पाञा प्राण राखे, तोमार आशा धरि' ॥ "34 ॥ अनुवाद-ऐसी एक युक्ति है, जिसपर आप विचार करें जिसके द्वारा आपके राजासे नहीं मिलनेपर भी उनके प्राण बचे रह सकते हैं। यदि आप कृपा करके अपना एक बहिर्वास दें, तो राजा उसे पाकर अपनी अभिलाषा पूर्ण होनेकी आशासे अपने प्राण धारण कर सकते हैं॥ "33-34 ॥ अनुभाष्य-राजाके भाग्यमें आपके दर्शनकी प्राप्ति किसी भी प्रकारसे नहीं होगी और आपके दर्शन न होनेके कारण उनके प्राण उत्कण्ठित हुए हैं। ऐसे समयमें यदि आपका एक पहना हुआ बहिर्वास कृपा करके उन्हें प्रदान करें, तभी उनके प्रति आपकी दया । 469
[ 12/34-42 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला है, ऐसा वे समझेंगे और भविष्यमें उनकी अभिलाषा पूर्ण हो सकती है,–इस आशासे राजा प्राण धारण कर सकेंगे ॥ 34 ॥ श्रीनित्यानन्दादिके वशीभूत महाप्रभु :– प्रभु कहे,–“तुमि-सब परम विद्वान्। येइ भाल हय, सेइ कर समाधान ॥”35 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,–“आप सब परम विद्वान हो। जैसा उचित समझते हैं, वैसा ही कीजिये ॥”35 ॥ श्रीनित्यानन्दके द्वारा श्रीगोविन्दसे महाप्रभुका बहिर्वास लेना :– तबे नित्यानन्द-गोसाञि गोविन्देर पाश। मागिया लइल प्रभुर एक बहिर्वास ॥ 36 ॥ श्रीसार्वभौमके द्वारा उस बहिर्वासको राजाके पास भेजना :– सेइ बहिर्वास सार्वभौम-पाश दिल। सार्वभौम सेइ वस्त्र राजारे पाठा'ल ॥ 37 ॥ अनुवाद—तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीगोविन्दसे महाप्रभुका एक बहिर्वास माँगकर ले लिया। उस बहिर्वासको उन्होने श्रीसार्वभौमको दिया और श्रीसार्वभौमने उस वस्त्रको राजाके पास भिजवा दिया॥ 36-37 ॥ महाप्रभुके वस्त्रको महाप्रभुसे अभिन्न जानकर राजाके द्वारा उसकी सेवा :– वस्त्र पाञा राजार हैल आनन्दित मन। प्रभुरूप करि' करे वस्त्रेर पूजन ॥ 38 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके वस्त्रको पाकर राजाके मनमें बहुत आनन्द हो गया। राजा उस वस्त्रको महाप्रभुका ही रूप जानकर उसकी पूजा करने लगे ॥ 38 ॥ अनुभाष्य—महाप्रभुकी जिस प्रकार आग्रहपूर्वक पूजा करनेकी बात राजाने सोची थी, महाप्रभुके द्वारा दिये गये बहिर्वासके खण्डको महाप्रभुके समान मानकर राजा उसी प्रकार पूजा करने लगे। महाप्रभुके श्रीअङ्गके साथ उनके द्वारा पहने गये वस्त्र-भूषणादिका नित्य अभेद हैं। सन्धिनी-शक्तिमान्-विग्रह श्रीबलदेवकी ही कला, 'शेष'-रूपी विष्णु-शय्या और वस्त्रादि विविधरूपोंमें अपने आराध्य श्रीकृष्णचन्द्रकी सेवा करती हैं। इसलिये वे सभी वस्तुएँ श्रीकृष्णसे अभिन्न रूपमें शुद्धसेवकोंके लिये सेव्य हैं। विशेषतः महाप्रभु अद्वयज्ञान सच्चिदानन्दविग्रह स्वयं भगवान् हैं। इस प्रकार सच्चिदानन्दमय गुरु-वैष्णवोंको और उनके द्वारा व्यवहार किये गये उपकरणोंको परस्पर अभिन्न अर्थात् जीवोंके नित्य परम-अर्चनीय विग्रहके रूपमें जानने होंगे ॥ 38 ॥ पुरीमें आकर महाप्रभुका सङ्ग प्राप्त करनेके लिये श्रीरायको राजकार्यसे निवृत्तिके लिये राजाकी अनुमति :– रामानन्द राय यबे 'दक्षिण' हैते आइला। प्रभुसङ्गे रहिते राजाके निवेदिला ॥ 39 ॥ रायको महाप्रभुके दर्शन कराने हेतु राजाका अनुरोध :– तबे राजा सन्तोषे ताँहारे आज्ञा दिला। आपनि मिलन लागि' कहिते लागिला ॥ 40 ॥ “महाप्रभु महाकृपा करेन तोमारे। मोरे मिलिबारे अवश्य साधिबे ताँहारे ॥”41 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द राय जब दक्षिण भारतसे आये, तो उन्होंने महाप्रभुके साथ रहनेके लिये राजासे निवेदन किया। तब राजाने प्रसन्नतापूर्वक उनको राजकार्य छोड़कर महाप्रभुके साथ रहनेके लिये अनुमति दे दी। फिर महाप्रभुके साथ अपने मिलनेके सम्बन्धमें कहने लगे,—“महाप्रभुकी आपपर अपार कृपा है। इसलिये मुझे उनसे मिलवानेके लिये आप भी यत्न करना ॥”39-41 ॥ राजाके साथ कटकसे पुरी आनेपर ही श्रीरायको महाप्रभुका दर्शन :– एकसङ्गे दुइ जन क्षेत्रे यबे आइला। रामानन्द राय तबे प्रभुरे मिलिला ॥ 42 ॥ 470 ।
बारहवाँ अध्याय 12/42-51 ] अनुवाद—श्रीरामानन्द राय और राजा प्रतापरुद्र, दोनों जब एक ही साथ नीलाचल आ गये, तब श्रीरामानन्द राय महाप्रभुसे मिले ॥ 42 ॥ महाप्रभुसे राजाके लिये आवेदन :— प्रभुपदे प्रेमभक्ति जानाइल राजार। प्रसङ्ग पाञा ऐछे कहे बारबार ॥ 43 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुको राजाकी उनके श्रीचरणोंमें प्रेमभक्तिको जनाया। और बादमें भी प्रसङ्ग पाकर उसी बातको बार-बार कहते ॥ 43 ॥ व्यवहारमें चतुर श्रीरामानन्द :— राजमन्त्री रामानन्द—व्यवहारे निपुण। राजप्रीति कहिं द्रवाइल प्रभुर मन ॥ 44 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द राय राजमन्त्री होनेके कारण व्यवहारमें निपुण थे। इसलिये राजाकी प्रीतिको बतलाते हुए धीरे-धीरे उन्होंने महाप्रभुके मनको द्रवीभूत कर दिया ॥ 44 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीरामानन्द राय राजमन्त्री होनेके कारण राजकीय-व्यवहारादि सभी विषयोंमें बड़े ही निपुण थे, इसलिये राजाकी महाप्रभुके प्रति जो प्रीति है, उसका वर्णन करके उन्होंने महाप्रभुके चित्तको द्रवीभूत कर दिया था ॥ 44 ॥ उत्कण्ठित राजाको दर्शन देनेके लिये महाप्रभुसे प्रार्थना :— उत्कण्ठाते प्रतापरुद्र नारे रहिबारे। रामानन्द साधिलेन प्रभुरे मिलिबारे ॥ 45 ॥ रामानन्द प्रभु-पाय कैल निवेदन। “एकबार प्रतापरुद्रे देखाह चरण॥” 46 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके दर्शनकी उत्कण्ठाके कारण राजा प्रतापरुद्रसे रहा नहीं जा रहा था, इसलिये श्रीरामानन्द रायने उन्हें महाप्रभुसे मिलानेका एक उपाय निकाला। श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुके चरणोंमें निवेदन किया,—“आप एकबार राजा प्रतापरुद्रको अपने श्रीचरणोंका दर्शन दे दीजिये ॥” 45-46 ॥ रायसे ही महाप्रभुकी सद्विचारकी याचना :— प्रभु कहे,—“रामानन्द, कह विचारिया। राजाके मिलिते युयाय संन्यासी हञा ? ॥ 47 ॥ राजार मिलने भिक्षुकेर दुइ कुल नाश। परलोक रहु, लोके करे उपहास ॥” 48 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“रामानन्द! तुम स्वयं ही विचार करके बतलाओ कि क्या संन्यासी होकर राजासे मिलना उचित है? राजासे मिलनेसे भिक्षुकके दोनों कुल नाश हो जाते हैं। परलोककी तो बात दूर रहे, इस लोकमें भी लोग उसका उपहास करते हैं ॥” 47-48 ॥ महाप्रभुमें श्रीरायका विधि-निषेधसे अतीत ‘ईश्वर’-ज्ञान :— रामानन्द कहे,—“तुमि ईश्वर स्वतन्त्र। कारे तोमार भय, तुमि नह परतन्त्र ॥” 49 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“आप तो स्वतन्त्र ईश्वर हैं। आपको किसीका भय नहीं है, क्योंकि आप किसीके अधीन नहीं हैं ॥” 49 ॥ स्वयंको विधिके द्वारा बाध्य दिखलाकर महाप्रभुकी छलनेकी चेष्टा :— प्रभु कहे,—“आमि मनुष्य, आश्रमे संन्यासी। कायमनोवाक्ये व्यवहारे भय वासि ॥ 50 ॥ वैध संन्यासीके लिये निष्कलङ्क आचरण ही कर्त्तव्य :— शुक्लवस्त्रे मसि-बिन्दु यैछे ना लुकाय। संन्यासीर अल्प छिद्र सर्वलोके गाय ॥” 51 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“मैं ईश्वर नहीं, एक साधारण मनुष्य हूँ और उसपर आश्रमसे संन्यासी हूँ। इसलिये मेरे तन, मन और वाक्यसे व्यवहारके विषयमें । 471
[ 12/50-62 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला लोग क्या कहेंगे, इसका भय करता हूँ। जिस प्रकार सफेद वस्त्रपर स्याहीका एक छोटासा भी बिन्दु छिपता नहीं है, उसी प्रकार संन्यासीके छोटेसे दोषकी भी सब लोग चर्चा करते हैं॥"50-51॥ अनुभाष्य-मैं चतुर्थ आश्रम अर्थात् संन्यासमें स्थित मनुष्य मात्र हूँ, ईश्वर नहीं। इसलिये तन-मन-वाक्यसे लौकिक व्यवहारके व्यभिचारकी आशङ्का करता हूँ अर्थात् दूसरोंकी अपेक्षा रखता हूँ॥ 50 ॥ महापापीके उद्धारके लिये भगवद्भक्त राजाका भी महाप्रभुके दर्शनका सौभाग्य प्राप्त करनेका अवश्य ही अधिकार :- राय कहे, - "यत पापी करियाछ अव्याहति । ईश्वर-सेवक तोमार भक्त गजपति ॥" 52 ॥ अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने कहा, - "आपने तो अनेक पापियोंका उद्धार किया है। गजपति राजा तो श्रीजगन्नाथके सेवक और आपके भक्त हैं॥" 52 ॥ महाप्रभुकी फिर भी राजाका दर्शन करनेकी अनिच्छा :- प्रभु कहे, - "पूर्ण यैछे दुग्धेर कलस। सुराबिन्दु-पाते केह ना करे परश ॥ 53 ॥ जड़ 'विषयी'-संज्ञा-सर्वगुण नाशक :- यद्यपि प्रतापरुद्र-सर्व गुणवान्। ताँहारे मलिन कैल एक 'राजा' नाम ॥ 54 ॥ अन्तमें श्रीरामानन्द रायके आग्रहसे महाप्रभुकी राजाके पुत्रके साथ मिलनेकी इच्छा :- तथापि तोमार यदि महाग्रह हय। तबे आनि' मिलाह तुमि ताँहार तनय ॥ 55 ॥ पिता और पुत्रमें दैहिक-धातुगत अभेद :- “आत्मा वै जायते पुत्रः" - एइ शास्त्रवाणी। पुत्रेर मिलने येन मिलिबे आपनि ॥ "56 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "जिस प्रकार दूधसे भरे कलशमें यदि मदिराकी एक बूँद भी गिर जाय, तो कोई भी उसे स्पर्श नहीं करता। यद्यपि राजा प्रतापरुद्रके सर्वगुणवान् होनेपर भी एक 'राजा' नामने ही उनको मलिन किया हुआ है, तथापि यदि आपका बहुत आग्रह है, तो उनके पुत्रको लाकर मुझसे मिलवा सकते हो। शास्त्रोंमें कहा गया है कि आत्मा ही पुत्रके रूपमें आता है, इसलिये पुत्रके मुझसे मिलनेसे जैसे उनका (राजाका) अपना मिलना हो जायेगा ॥" 53-56 ॥ अनुभाष्य - 'तनय' - पुरोषत्तम जाना (?) श्रीभगवदुक्ति (भाः 10/78/36)- "आत्मा वै पुत्र उत्पन्न इति वेदानुशासनम्" अर्थात् "जीव स्वयं ही पुत्रके रूपमें उत्पन्न होता है, इस प्रकारसे वेदोंका निर्देश है"; इस श्लोककी श्रीधर-स्वामीकी टीका - "आत्मा वै पुत्रनामासि स जीवः शरदः शतम्" इत्यादि वेदानुशासनम् ॥ 55-56 ॥ राजाको श्रीरायके द्वारा महाप्रभुकी कृपाका समाचार देना; राजपुत्रको महाप्रभुके पास लाना :- तबे राय याइ' सब राजारे कहिला। प्रभुर आज्ञाय ताँर पुत्र लञा आइला ॥ 57 ॥ अनुवाद-तब श्रीरामानन्द रायने जाकर महाप्रभुकी सारी बात राजाको बतला दी और महाप्रभुकी आज्ञा अनुसार राजाके पुत्रको अपने साथ ले आये ॥ 57 ॥ श्यामवर्ण किशोर राजपुत्रसे महाप्रभुको 'श्रीकृष्ण'की उद्दीपना :- सुन्दर, राजार पुत्र-श्यामल-वरण। किशोर वयस, दीर्घ कमलनयन ॥ 58 ॥ पीताम्बर, धरे अङ्गे रत्न-आभरण। श्रीकृष्ण-स्मरणे तँह हैला 'उद्दीपन' ॥ 59 ॥ ताँरे देखि' महाप्रभुर कृष्णस्मृति हैल। प्रेमावेशे ताँरे मिलि' कहिते लागिल ॥ 60 ॥ वैष्णवदर्शनकी चूड़ान्त कथा :- “एइ-महाभागवत, याँहार दर्शने। व्रजेन्द्रनन्दन-स्मृति हय सर्वजने ॥ 61 ॥ राजपुत्रको श्रीकृष्ण मानकर महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- कृतार्थ हइलाङ आमि इँहार दर्शने।" एत बलि' कैल तारे पुनः आलिङ्गने ॥ 62 ॥ 472 ।
बारहवाँ अध्याय 12/58-67 ] अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रका पुत्र श्याम वर्णका और देखनेमें अति सुन्दर था। उसकी किशोर अवस्था थी और कमलके समान सुन्दर बड़े नयन थे। उसने पीताम्बर पहन रखा था और उसके अङ्गोंमें अनेक रत्नोंके आभूषण शोभा पा रहे थे। उसे देखते ही श्रीकृष्ण-स्मरणका 'उद्दीपन'-भाव प्रकाशित हो जाता था, इसलिये उसे देखकर महाप्रभुको श्रीकृष्णकी स्मृति हो आयी। उससे मिलकर प्रेमावेशमें महाप्रभुने उसका आलिङ्गन किया और कहने लगे, —“यह तो महाभागवत है, इसे देखनेसे सभीको व्रजेन्द्रनन्दनकी स्मृति होती है। इसके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया हूँ।” इतना कहकर महाप्रभुने उसे पुनः आलिङ्गन किया॥ 58-62॥ अनुभाष्य—महाप्रभुने राजपुत्रकी आत्माका दर्शन किया, उसके बाहरी अनात्म देह और भोग्य-अनुशीलनपर मनका दर्शन नहीं किया। महाप्रभुमें राजपुत्रको 'विषयीका पुत्र विषयी', इसलिये उसे 'स्त्री सङ्गी' एवं स्वयंको 'स्त्री-भोक्ता पुरुष' माननेकी धारणा बिल्कुल भी नहीं है। अर्थात् जिस प्रकार श्रीकृष्णबहिर्मुख मायावादी जीव निसर्गसुलभ जड़में चिद्का आरोप करते हैं अथवा भूमिमें पूज्यबुद्धि रखते हैं, उस प्रकारसे सच्चिदानन्दमय वास्तव-वस्तुके दर्शनमें महाप्रभुमें किसी प्रकारके मनोधर्मसे उत्पन्न कल्पना अथवा आरोपका लेशमात्र भी अवकाश नहीं है। यद्यपि महाप्रभु स्वयं अद्वयज्ञान विषय-विग्रह हैं, तथापि उन्होंने अपनेको 'आश्रय'-जातीय 'गोपी' मानकर राजपुत्रको साक्षात् 'व्रजेन्द्र-नन्दन' रूपमें देखा, यही शुद्ध जीवात्माका अद्वयज्ञान-दर्शन अथवा वैष्णव दर्शन है (मध्यलीला आठवें अध्यायकी 277 संख्या देखें)। (कठ और मुण्डकोपनिषद्)— “यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्” अर्थात् जब जीवात्मा भगवान्के प्रति सेवोन्मुख होकर परमात्माकी कृपायाचना करता है, तब उसीके निकट वे परमात्मा अपना स्वयंप्रकाश श्रीविग्रह प्रकट करते हैं। इस अभय-दर्शनके अभावके कारण ही जीवका अविद्याजनित सभी अनर्थोंका आह्वान अथवा संसार है। “संसारे आसिया प्रकृति भजिया 'पुरुष' अभिमाने मरि” (ठाकुर श्रीभक्तिविनोदकृत 'कल्याण कल्पतरु') अर्थात् संसारमें आकर जीव स्वयंमें पुरुष (भोक्ता) अभिमान रखकर प्रकृतिका (मायाका) भजन करनेसे जन्म-मृत्युके बन्धनमें जकड़ जाता है॥ 59-61॥ आलिङ्गनके फलस्वरूप राजपुत्रमें श्रीकृष्णप्रेमावेश :— प्रभुस्पर्शे राजपुत्रेर हैल प्रेमावेश। स्वेद, कम्प, अश्रु, स्तम्भ, पुलक विशेष॥ 63॥ उसके प्रेमका दर्शन करके भक्तोंके द्वारा प्रशंसा :— 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहे, नाचे, करये रोदन। ताँर भाग्य देखि' श्लाघा करे भक्तगण॥ 64॥ अनुवाद—महाप्रभुका स्पर्श पाते ही राजपुत्रमें प्रेमका आवेश हो गया और उसके शरीरमें स्वेद, कम्प, अश्रु, स्तम्भ तथा पुलकादि विशेष सात्त्विक विकार उदित होने लगे। वह 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहकर नाचने और रोने लगा। उसका ऐसा सौभाग्य देखकर सभी भक्त उसकी प्रशंसा करने लगे॥ 63-64॥ महाप्रभुके द्वारा राजाके पुत्रको आश्वासन और नित्य सङ्गकी याचना :— तबे महाप्रभु ताँरे धैर्य कराइल। 'नित्य आसि आमाय मिलिह'—एइ आज्ञा दिल॥ 65॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने उसे धैर्य धारण कराया और आदेश दिया,—'तुम नित्य आकर मुझसे मिला करो॥' 65॥ पुत्रके दर्शन और आलिङ्गनसे राजाको महाप्रभुके स्पर्शकी अनुभूति :— विदाय हञा राय आइल राजपुत्रे लञा। राजा सुख पाइल पुत्रेर चेष्टा देखिया॥ 66॥ पुत्रे आलिङ्गन करि' प्रेमाविष्ट हैला। साक्षात् स्पर्श येन महाप्रभुर पाइला॥ 67॥ । 473