भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1305, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1305

ग्यारहवाँ अध्याय 11/202-212 ] तोमा-सङ्गे रहे यत संन्यासीर गण। गोपीनाथाचार्य ताँरे करियाछे निमन्त्रण ॥ 203 ॥ आचार्य आसियाछेन भिक्षार प्रसादान्न लञा। पुरी, भारती आछेन तोमार अपेक्षा करिया ॥ 204 ॥ नित्यानन्द लञा भिक्षा करिते कैसे तुमि। वैष्णवेर परिवेश्न करितेछि आमि ॥” 205 ॥ अनुवाद-तब श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुको निवेदन किया,-“जब तक आप बैठकर भोजन नहीं करेंगे, तब तक कोई भी भोजन नहीं करेगा। आपके साथ जो सब संन्यासी रहते हैं, श्रीगोपीनाथाचार्य ने उन्हें भी निमन्त्रण दिया है। श्रीगोपीनाथाचार्य बहुतसा भिक्षाका प्रसाद-अन्न लेकर आ गये हैं। श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीब्रह्मानन्द भारती भी आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। आप श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ भोजन करनेके लिये बैठिये और मैं सभी वैष्णवोंको परिवेश्न करता हूँ॥” 202-205 ॥ महाप्रभुके द्वारा परिवेश्न छोड़ देना और श्रीगोविन्दके हाथों श्रीहरिदास ठाकुरके लिये प्रसाद भेजना :- तबे प्रभु प्रसादान्न गोविन्द-हाते दिला। यत्न करि' हरिदास-ठाकुरे पाठाइला ॥ 206 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभुने सावधानीपूर्वक कुछ प्रसाद श्रीहरिदास ठाकुरको देनेके लिये श्रीगोविन्दके हाथोंमें दिया ॥ 206 ॥ संन्यासियोंके साथ महाप्रभुका प्रसाद-सम्मान और आचार्यके द्वारा परिवेश्न :- आपने बसिला सब संन्यासीरे लञा। परिवेशन करे आचार्य हरषित हञा ॥ 207 ॥ अनुवाद-फिर महाप्रभु सभी संन्यासियोंके साथ बैठ गये और श्रीगोपीनाथाचार्य आनन्दपूर्वक परिवेश्न करने लगे ॥ 207 ॥ अनुभाष्य-‘आचार्य’-श्रीगोपीनाथ आचार्य ॥ 204-207 ॥ श्रीगोपीनाथाचार्य-श्रीस्वरूप-श्रीजगदानन्दके द्वारा परिवेश्न :- स्वरूप दामोदर आर जगदानन्द। वैष्णवेरे परिवेशे तिन जने-आनन्द ॥ 208 ॥ अनुवाद-श्रीगोपीनाथाचार्य, श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीजगदानन्द पण्डित-ये तीनों आनन्दपूर्वक सभी वैष्णवोंको परिवेश्न करने लगे ॥ 208 ॥ प्रसाद ग्रहण करते समय हरिध्वनि :- नाना पिठापाना खाय आनन्द करिया। मध्ये मध्ये ‘हरि’ कहे आनन्दित हञा ॥ 209 ॥ अनुवाद-सभी वैष्णव आनन्दपूर्वक अनेक प्रकारका पिठा-पाना खा रहे थे और आनन्दित होकर बीच-बीचमें 'हरि' 'हरि' कह रहे थे ॥ 209 ॥ अनुभाष्य-उस समयमें प्रसादके सम्मान करते समय शुद्धसम्प्रदायमें हरिध्वनि देनेकी रीति थी ॥ 209 ॥ ग्यारहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। सभी भक्तोंका आचमन :- भोजन समाप्त हैल, कैल आचमन। सबारे पराइल प्रभु, माल्य-चन्दन ॥ 210 ॥ अनुवाद-भोजन समाप्त होनेपर सभीने आचमन किया। तब महाप्रभुने सबको माला पहनायी और चन्दन लगाया ॥ 210 ॥ सभीका अपने स्थानपर जाना और सन्ध्यामें महाप्रभुके साथ फिरसे मिलन :- विश्राम करिते सबे निज-वासा गेला। सन्ध्याकाले आसि' पुन: प्रभुके मिलिला ॥ 211 ॥ अनुवाद-तब विश्राम करनेके लिये सभी अपने-अपने वासस्थानपर चले गये और सन्ध्यामें वे आकर पुनः महाप्रभुसे मिले ॥ 211 ॥ श्रीरामानन्दका आगमन और वैष्णवोंके साथ मिलन :- हेनकाले रामानन्द आइला प्रभुस्थाने। प्रभु मिलाइल ताँरे सब वैष्णवगणे ॥ 212 ॥ । 459

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