श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 11/193–202 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला महाप्रभुके द्वारा स्वयं ही भक्तके साथ मिलन स्वीकार :— “एइस्थाने रहि' कर नाम-सङ्कीर्त्तन। प्रतिदिन आसि' आमि करिब मिलन॥ 194॥ मन्दिरके सुदर्शनचक्रको प्रणाम करनेकी आज्ञा-दान :— मन्दिरेर चक्र देखि' करिह प्रणाम। एइ ठाञि तोमार आसिबे प्रसादान्न॥” 195॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुरको पुष्प उद्यानमें ले गये और उन्हें अति निर्जनमें एक रहनेका स्थान दिया। महाप्रभुने उनसे कहा,—“आप इसी स्थानपर रहकर नाम-सङ्कीर्तन कीजिये। मैं प्रतिदिन यहाँ आकर आपसे मिलूँगा। यहींसे श्रीजगन्नाथ मन्दिरके चक्रको देखकर प्रणाम कीजियेगा और यहींपर आपके लिये अन्न-प्रसाद आ जायेगा॥” 193-195॥ अनुभाष्य—श्रीहरिदास ठाकुरने लौकिक-स्मृति-विधानके मतानुसार श्रीमन्दिरमें प्रवेश करके श्रीजगन्नाथदेवके दर्शनके लिये स्वयंको अयोग्य जाना है, ऐसा जानकर महाप्रभुने उन्हें दूरसे श्रीमन्दिरके चूड़ाके अग्रभागमें सुदर्शनचक्रको देखकर प्रणाम करनेकी व्यवस्था कर दी और कहा,—इस सिद्धबकुलमें तुम्हारे लिये महाप्रसाद आयेगा॥ 195॥ श्रीनित्यानन्द आदिको श्रीहरिदासके दर्शनसे आनन्द :— नित्यानन्द, जगदानन्द, दामोदर, मुकुन्द। हरिदासे मिलि' सबे पाइल आनन्द॥ 196॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीदामोदर और श्रीमुकुन्द—सभीको श्रीहरिदाससे मिलकर बहुत आनन्द हुआ॥ 196॥ महाप्रभुके समुद्रस्नानके बाद श्रीअद्वैतादिका समुद्रस्नान :— समुद्रस्नान करि' प्रभु आइला निज-स्थाने। अद्वैतादि गेला सिन्धु करिबारे स्नाने॥ 197॥ मन्दिर-चूड़ा दर्शनके बाद सभीके द्वारा प्रसाद-सम्मान :— आसि' जगन्नाथेर कैल चूड़ा दरशन। प्रभुर आवासे आइला करिते भोजन॥ 198॥ अनुवाद—जब महाप्रभु समुद्रस्नान करके अपने स्थानपर आ गये, तब श्रीअद्वैतादि भक्तगण समुद्रमें स्नान करने गये। समुद्रस्नान करके सभी भक्तों ने श्रीजगन्नाथ मन्दिरके चूड़ाका दर्शन किया और महाप्रभुके आवासपर प्रसाद पानेके लिये पहुँचे॥ 197-198॥ सभी भक्तोंका बैठना और महाप्रभुके द्वारा परिवेशन :— सबारे बसाइला प्रभु योग्य क्रम करि'। श्रीहस्ते परिवेशण कैल गौरहरि॥ 199॥ श्रीहस्तके द्वारा प्रचुर परिवेशन :— अल्प अन्न नाहि आइसे दिते प्रभुर हाते। दुइ-तिनेर अन्न देन एक-एक पाते॥ 200॥ अनुवाद—महाप्रभुने सभी भक्तोंको योग्यक्रमसे बैठा दिया और स्वयं श्रीगौरहरिने अपने श्रीहाथोंसे प्रसादका परिवेशण (वितरण) आरम्भ किया। प्रसाद बाँटनेके लिये महाप्रभुके हाथोंमें थोड़ा अन्न नहीं आता था, इसलिये एक-एक पत्तलपर दो-तीन व्यक्तियोंके भोजन करने जितना अन्न दे रहे थे॥ 199-200॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘योग्यक्रम करि’—जिसके बाद जिसका बैठना उचित है, उस प्रकारसे करके॥ 199॥ महाप्रभुके भोजन किये बिना सभी भक्तोंका भी प्रसाद ग्रहण न करना :— प्रभु ना खाइले केह ना करे भोजन। ऊर्द्ध-हस्ते बसि' रहे सर्व भक्तगण॥ 201॥ अनुवाद—महाप्रभु नहीं खा रहे थे, इसलिये कोई भी भोजन नहीं कर रहा था। सभी भक्त हाथ उठाकर ही बैठे रहे॥ 201॥ श्रीदामोदर-स्वरूपकी महाप्रभुको श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ भोजन करनेकी प्रार्थना एवं स्वयं भक्तोंको परिवेशन करना स्वीकार :— स्वरूप-गोसाञि प्रभुके कैल निवेदन। “तुमि ना बसिले केह ना करे भोजन॥ 202॥ 458 ।