श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1303, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय 11/192-193 ] “नीच-जातिमें उत्पन्न व्यक्ति श्रीकृष्णभजनके अयोग्य नहीं होता, दूसरी ओर, केवलमात्र सत्कुलमें उत्पन्न ब्राह्मण होनेसे ही कोई श्रीकृष्णभजनके योग्य नहीं बन जाता। वास्तवमें जो श्रीकृष्णका भजन करता है, वही बड़ा है। अभक्त तो हीन है, घृणित है। श्रीकृष्णभजनमें जाति और कुल आदिका कोई विचार ही नहीं है। भगवान् दीन व्यक्तिपर अधिक कृपा करते हैं। क्योंकि श्रेष्ठ कुलमें जन्म लेनेवाले कुलीन, विद्वान तथा धनी व्यक्तियोंमें बहुत अभिमान होता है।” (मध्यलीला, 19/147-148)- “धर्माचारी-मध्ये बहुत 'कर्मनिष्ठ'। कोटि-कर्मनिष्ठ-मध्ये एक 'ज्ञानी' श्रेष्ठ॥ कोटिज्ञानी-मध्ये हय एकजण 'मुक्त'। कोटिमुक्त-मध्ये 'दुर्लभ' एक कृष्णभक्त॥” “धर्मका आचरण करनेवालोंमें भी बहुत कर्मनिष्ठ हैं। करोड़ों कर्मनिष्ठ व्यक्तियोंसे एक ज्ञानी श्रेष्ठ है। करोड़ों ज्ञानियोंमेंसे एक व्यक्ति ही मुक्त होता है। करोड़ों मुक्तोंमें भी एक कृष्णभक्त 'दुर्लभ' होता है।” कर्म करते हुए पापाचरणके फलसे रज-तमः स्वभावसम्पन्न होकर बद्धजीव सवनयज्ञके अधिकारसे च्युत होता है। ईशसेवासे विमुखता ही जीवको कर्मकाण्डमें प्रवृत्त कराती है। कर्म करते समय बद्धजीव ऊँचे-नीचेका विचार करते हुए प्रवृत्तिके क्रमसे सत्त्वगुणसे रजो-तमोगुणमें अवस्थितिकी अभिलाषा करता है। पापरहित सत्त्वगुणवाले व्यक्तियोंकी भगवान् विष्णुकी सेवामें स्वभावतः रुचि होती है। वे अधोपतित होकर सत्त्व-रजोके मिश्रित गुणसे क्षत्रिय, सत्त्व-तमोके मिश्रित गुणसे वैश्य, रजो-तमोके मिश्रित गुणसे शूद्र और तमोगुणमें अवस्थित होकर अन्त्यज आदि श्रेणीमें गिने जाते हैं। ब्राह्मण अधिकारसे च्युत होनेपर वे ब्राह्मणके अतिरिक्त अन्य कुलमें जन्म ग्रहण करते हैं। और पापरहित जीवकी भी ब्राह्मणकुलमें बीजगर्भसे उत्पन्न देह प्राप्त करके सत्त्वगुणसे च्युत होनेकी रुचि हो जाती है। उस रुचिसे जिन सब पापोंका उदय होता है, उसके प्रतिबन्धक स्वरूप गर्भाधान आदिसे लेकर उपनयन तक सभी संस्कार हैं। संस्कार-वर्जित ब्राह्मणकुलमें भी जन्में ब्राह्मण अपने रुचि-क्रमसे सत्त्वके अतिरिक्त मिश्र और दूसरे गुणोंमें अग्रसर होकर पतित होते हैं। ब्राह्मण कुलमें जन्म कर्मफलजनित निष्पाप होनेका सूचकमात्र है। उपरोक्त संस्कार ही निष्पाप जीवको पुनः पापमें प्रवृत्त होनेसे बचाते हैं। शूद्र आदिके लिये इन संस्कारोंकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि शूद्रने पूर्वजन्मके पापोंके प्रभावसे उस प्रकार कल्मष-प्रधान वंशमें जन्म ग्रहण किया है। अच्छेसे वर्णधर्मका पालन करनेवाले सत्कर्मोंके बलसे जन्म-जन्मान्तरमें उन्नति लाभ करते हैं। यह उन्नति गुण और कर्मजात है। जो श्वपच (कुत्तेका माँस खानेवाले) अन्त्यज कुलमें जन्म ग्रहण करके सारा जीवन संसारमें लिप्त रहते हैं, उनकी उन्नतिकी बात शास्त्रमें नहीं लिखी है। किन्तु ऐसे कुलमें जन्में जिन वैष्णवोंकी उस प्रकारके कुलमें आचारमें रुचि न होकर भगवद्-सेवामें लगनेकी योग्यता दिखायी दे, तो यह निश्चित है कि पूर्व जन्ममें उनका ब्राह्मणकुलके सत्त्वाधिकारमें अवस्थान था। “भगवद्भक्तिहीनस्य जातिः शास्त्रं जपस्तपः। अप्राणस्यैव देहस्य मण्डनं लोकरञ्जनम्॥ शुचिः सद्भक्तिदीप्ताग्निदग्धदुर्Defaultजातिकल्मषः। श्वपाकोऽपि-बुधैः श्लाघ्यो न वेदज्ञोऽपि नास्तिकः॥” अर्थात् “सच्चरित्र, सद्भक्तिरूपी दीप्ताग्नि द्वारा जिनके दुर्जातिके पाप क्षय हो चुके हैं, इस प्रकारका चाण्डाल भी पण्डितोंके द्वारा सम्मानित है, किन्तु नास्तिक व्यक्ति वेदज्ञ होनेपर भी सम्मानके योग्य नहीं है। भगवद्भक्तिहीन व्यक्तिकी सद्जाति, शास्त्रज्ञान, जप और तप मृतदेहके अलङ्कारके जैसे किसी कामके नहीं होते, वह तो केवल लोकरञ्जनमात्र है॥” 192॥ श्रीहरिदास ठाकुरको 'सिद्धबकुल' स्थान देना :- एत बलि ताँरे लञा गेला पुष्पोद्याने। अति निभृते ताँरे दिला वासा-स्थाने॥193॥ । 457