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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1302, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1302

[ 11/189-192 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला कृष्णभक्तमें प्रतिक्षण सभी तीर्थोंका स्नान और सभी (दैक्ष्य-विप्राभिधानात्) सः श्वपचः (शौक्रान्त्यजादि-नीचकुलोद्भूतः) प्रकारके तप-यज्ञ-दानादि विद्यमान :- अपि गरीयान् (श्रेष्ठः) अहो बत (इत्याश्चर्यम्)। ये ते (तव) क्षणे क्षणे कर तुमि सर्वतीर्थे स्नान। नाम गृणन्ति (उच्चारयन्ति), ते तपः तेपुः क्षणे क्षणे कर तुमि यज्ञ-तपो-दान ॥ 190 ॥ (अनुष्ठितवन्तः—तपस्विनोऽधिका इत्यर्थः) जुहुवुः (होमं कृतवन्तः), कृष्णभक्त ही अङ्गसहित वेद-वेदान्तका अध्ययन करनेवाले सस्नुः (सर्वेष्वेव तीर्थेषु स्नाताः), आर्याः (सदाचाराः), ब्रह्म और समस्त ब्राह्मणों तथा संन्यासियोंके गुरु :- (साङ्गं वेदम्) अनूचुः (अधीतवन्तः)। निरन्तर कर तुमि वेद-अध्ययन। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। द्विज-न्यासी हैते तुमि परम-पावन ॥ "191 ॥ इस श्लोकका तथ्य और पूर्ववर्ती श्लोककी विवृत्ति श्रीगौड़ीय भाष्य (श्रीमद्भागवतमें) देखें ॥ 192 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"मैं स्वयं पवित्र होनेके अमृताणुकणिका-(गरुड़पुराण)- लिये आपको स्पर्श कर रहा हूँ। आपके जैसा पवित्र ब्राह्मणानां सहस्रेभ्यः सत्रयाजी विशिष्यते। करनेका गुण मुझमें नहीं है। आप तो क्षण-क्षणमें सभी सत्रयाजि-सहस्रेभ्यः सर्ववेदान्तपारगः॥ तीर्थोंमें स्नान करते हैं और क्षण-क्षणमें आप यज्ञ, तप सर्ववेदान्तवित्कोट्या विष्णुभक्तो विशिष्यते। और दान करते हैं। आप निरन्तर वेदोंका अध्ययन वैष्णवानां सहस्रेभ्यः एकान्त्येको विशिष्यते॥ करते हैं। आप तो ब्राह्मण और संन्यासीसे भी परम अर्थात् "हजारों ब्राह्मणोंसे एक सावित्र्य ब्राह्मण पवित्र हैं॥"189-191 ॥ श्रेष्ठ है, सहस्र सावित्र्य ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक श्रीमद्भागवत (3/33/7)- वेदान्तविद् ब्राह्मण श्रेष्ठ है, कोटि-कोटि वेदान्तविद् अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् ब्राह्मणोंकी अपेक्षा एक विष्णु भक्त श्रेष्ठ है, सैंकड़ों यज्जिह्वाग्रे वर्त्तते नाम तुभ्यम्। विष्णु भक्तोंसे एक ऐकान्तिक वैष्णव श्रेष्ठ है।" तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्याः न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्द्वक्तः श्वपचः प्रियः। ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥ 192 ॥ तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथाह्यहम् ॥ अर्थात् “चतुर्वेदपाठी अर्थात् चारों वेदोंको जाननेवाला अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 192 ॥ ब्राह्मण होनेपर भी वह भक्त हो, ऐसा नहीं है। मेरा अमृतप्रवाह भाष्य-हे भगवन् ! जिनके मुखमें भक्त चाण्डाल कुलमें उत्पन्न होनेपर भी मेरा प्रिय है आपका नाम वर्तमान है, वे श्वपच (कुत्तेका मांस और भक्त ही यथार्थ दानपात्र एवं ग्रहणपात्र है। खानेवाले) होनेपर भी श्रेष्ठ हैं। जो आपका नाम चाण्डालकुलमें उत्पन्न होनेपर भी मेरा भक्त मेरी भाँति कीर्तन करते हैं, उन्होंने सब प्रकारकी तपस्या कर ली ब्राह्मणादि सभीका पूज्य है।” है, समस्त यज्ञ कर लिये हैं, सभी तीर्थोंमें स्नान कर गीता 9/32 श्लोक देखें। और भी (अन्त्यलीला, लिया हैं एवं अङ्गसहित समस्त वेदोंका पाठ कर लिया 4/66-68)- है, इसलिये उनकी आर्योंमें गणना होती है ॥ 192 ॥ "नीच जाति नहे कृष्णभजने अयोग्य। अनुभाष्य-देवहूतिके द्वारा भगवान् कपिलकी सत्कुल विप्र नहे भजनेर योग्य॥ स्तुति-वर्णनके प्रसङ्गमें समस्त गुणोंसे सम्पन्न उनके येइ भजे, सेइ बड़, अभक्त-हीन, छार। भक्तोंके माहात्म्यका वर्णन- कृष्णभजने नाहि जाति-कुलादि विचार॥ दीनेरे अधिक दया करे भगवान्। यत् (यस्य) जिह्वाग्रे तुभ्यं (तव) नाम वर्त्तते, अतः कुलीन, पण्डित, धनीर बड़ अभिमान॥" 456 ।

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