श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1306, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 11/212-223 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—उस समय श्रीरामानन्द राय महाप्रभुके वासस्थानपर आये और महाप्रभुने उन्हें सभी वैष्णवोंसे मिलवाया॥ 212 ॥ सन्ध्यामें मन्दिरके आङ्गनमें भक्तोंके साथ कीर्त्तनारम्भ :- सबा लञा गेला प्रभु जगन्नाथालय। कीर्त्तन-आरम्भ तथा कैल महाशय॥ 213 ॥ सभीको पड़िछाके द्वारा माल्यचन्दन प्रदान, चारों ओरसे चार मण्डलियोंमें भक्तोंके द्वारा महाकीर्त्तन आरम्भ :- सन्ध्या-धूप देखि' आरम्भिला सङ्कीर्त्तन। पड़िछा आसिं सबारे दिल माल्य-चन्दन॥ 214 ॥ चारिदिके चारि-सम्प्रदाय करेन कीर्त्तन। मध्ये नृत्य करे प्रभु शचीर नन्दन॥ 215 ॥ अष्ट मृदङ्ग बाजे, बत्रिश करताल। हरिध्वनि करे सबे, बोले,-भाल, भाल॥ 216 ॥ कीर्त्तनेर ध्वनि महामङ्गल उठिल। चतुर्दश लोक भेदि' ब्रह्माण्ड भेदिल॥ 217 ॥ अनुवाद—महाप्रभु सभी भक्तोंको साथ लेकर श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें गये और वहाँ उन्होंने कीर्त्तन आरम्भ किया। फिर सबने सन्ध्याकी धूप-आरतीके दर्शन किये और उसके बाद उन्होंने सङ्कीर्त्तन आरम्भ किया। पड़िछाने आकर सबको माला और चन्दन प्रदान किया। चार दिशाओंमें भक्त चार मण्डलियाँ बनाकर कीर्त्तन करने लगे और बीचमें श्रीशचीनन्दन नृत्य करने लगे। चार मण्डलियोंमें आठ मृदङ्ग और बत्तीस करताल बजने लगीं और सभी हरिध्वनि करते हुए 'अति सुन्दर', 'अति सुन्दर' कहने लगे। कीर्त्तनकी ध्वनिसे महामङ्गल होने लगा। वह ध्वनि चौदह लोकोंको भेदती हुई ब्रह्माण्डको भी भेदकर उसके बाहर गयी॥ 213-217 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पाठान्तरमें— “सन्ध्या-धूप देखि' आरम्भिला सङ्कीर्त्तन। पड़िछा आनिया दिल माल्य-चन्दन॥ चारिदिके चारिसम्प्रदाय करे सङ्कीर्त्तन। मध्ये नृत्य करे प्रभु शचीर नन्दन॥” अर्थात् “सन्ध्याकी धूप-आरतीके दर्शन करके उन्होंने सङ्कीर्त्तन आरम्भ किया। तभी पड़िछाने आकर सबको माला और चन्दन प्रदान किया। चार दिशाओंमें भक्त चार मण्डलियाँ बनाकर कीर्त्तन करने लगे और बीचमें श्रीशचीनन्दन नृत्य करने लगे॥” 214 ॥ कीर्त्तन श्रवण करके बहुत पुरीवासियोंका आना और उनको आश्चर्य :- कीर्त्तन-आरम्भे प्रेम उथलि' चलिल। नीलाचलवासी लोक धाञा आइल॥ 218 ॥ कीर्त्तन देखि' सबार मने हैल चमत्कार। कभु नाहि देखि ऐछे प्रेमेर विकार॥ 219 ॥ अनुवाद—जब कीर्त्तन आरम्भ हुआ, तब महाप्रभु और भक्तोंके हृदयसे निकलकर श्रीकृष्णप्रेम सब ओर फैलने लगा और नीलाचलवासी लोग दौड़कर आये। कीर्त्तनको देखकर सभीके मनमें बहुत आश्चर्य हुआ और वे कहने लगे कि उन्होंने कभी भी प्रेमके ऐसे विकार नहीं देखे॥ 218-219 ॥ 'बेड़ा-नृत्य'-कीर्त्तन या मन्दिरकी परिक्रमा करते हुए कीर्त्तन :- तबे प्रभु जगनाथेर मन्दिर बेड़िया। प्रदक्षिण करि' बुलेन नर्त्तन करिया॥ 220 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु नृत्य करते-करते श्रीजगन्नाथ मन्दिरके चारों ओर परिक्रमा करने लगे॥ 220 ॥ महाप्रभुके अष्ट-सात्त्विक विकार :- आगे-पाछे गान करे चारि-सम्प्रदाय। आछाड़ेर काले धरे नित्यानन्द-राय॥ 221 ॥ अश्रु, पुलक, कम्प, स्वेद, गम्भीर, हुँकार। प्रेमेर विकार देखि' लोके चमत्कार॥ 222 ॥ पिच्कारि-धारा जिनि' अश्रु नयने। चारिदिकेर लोक सब करये सिने॥ 223 ॥ 460 ।