भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1313, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1313

[ 12/18–29 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला कुछ निवेदन करना चाहते हैं, कहे बिना रह नहीं पा रहे हैं और कहनेमें भय हो रहा है। योग्य हो या अयोग्य हो, हम सब आपसे निवेदन करना चाहते हैं कि अगर आप राजासे नहीं मिलेंगे, तो वे योगी बन जायेंगे। उन्होंने कहा हैं कि श्रीगौरहरिके बिना मुझे राज्य-भोगकी इच्छा नहीं है, इसलिये मैं कानोंमें मुद्रा धारणकर भिखारी बन जाऊँगा। तब मैं महाप्रभुके मुखचन्द्रको अपने नेत्रोंसे जी भरकर देखूँगा और उनके श्रीचरणकमलोंको उठाकर अपने हृदयपर धारण करूँगा॥”18-21॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'काणे मुद्रा'—पश्चिम भारतमें योगियोंको 'कान-फाटा योगी' कहते हैं। योगी लोग कानमें घोंघेकी हड्डीके द्वारा एक चिह्न धारण करते हैं। राजाने कहा,–श्रीगौरहरिके दर्शन बिना राज्य-भोग चित्तमें नहीं है, अर्थात् अच्छा नहीं लगता॥20॥ महाप्रभुका आचार्योचित कठोर संन्यास-धर्मपरक वाक्य :- यद्यपि शुनिया प्रभुर कोमल हय मन। तथापि बाहिरे कहे निष्ठुर वचन॥22॥ भक्तोंकी राजदर्शनरूपी इच्छा जानकर प्रभुका आरोप :- “तोमा-सबार इच्छा,—एइ आमारे लञा। राजाके मिलह इँह कटकेते गिया॥23॥ विधिके उल्लङ्घनके कारण लोकनिन्दा और श्रीदामोदर पण्डितके वाक्य-दण्डकी सम्भावना :- परमार्थ थाकुक्, लोके करिबे निन्दन। लोके रहु—दामोदर करिबे भर्त्सन॥24॥ मर्यादा प्रदर्शनके छलसे श्रीदामोदरकी अनधिकार चर्चाके प्रति कटाक्ष :- तोमा-सबार आज्ञाय आमि ना मिलि राजारे। दामोदर कहे यबे, मिलि तबे ताँरे ॥"25॥ अनुवाद—यद्यपि यह सब सुनकर महाप्रभुका मन कोमल हो गया, तथापि बाहरसे कठोर होकर उन्होंने निष्ठुर वचन कहे,—“आप सबकी इच्छा यह है कि आप सब मुझे कटकमें ले जाकर राजासे मिलवायेंगे। परमार्थकी बात तो दूर रहे, लोग भी निन्दा करेंगे। यदि लोक-निन्दाकी बातको भी छोड़ दें, तो यह दामोदर ही मेरी भर्त्सना करेगा। आप सबके कहनेपर भी मैं राजासे नहीं मिलूँगा, किन्तु यदि दामोदर कह दे, तो मैं राजासे मिल सकता हूँ॥”22-25॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पारमार्थिक-विचारसे संन्यासीके लिये राजाका दर्शन करना दोषपूर्ण है। उस दोषकी तो बात ही नहीं—लोग तो संन्यासीके अति छोटेसे दोषको देखनेसे ही निन्दा करते हैं। लोकनिन्दा परित्यागका कुछ तात्पर्य है,—जगत्में धर्म-प्रचार ही संन्यासीका कर्म है। जगत्में यदि निन्दा हुई, तो धर्म-प्रचारकार्य ठीकसे नहीं होता; इसलिये लोक-रक्षा करना भी आवश्यक है। लोक-निन्दाकी बात दूर रहे—मेरे निकट यह जो दामोदर पण्डित बैठा है, इसके हाथों छुटकारा पाना कठिन है, यह अवश्य ही मेरी भर्त्सना करेगा। केवल आपकी आज्ञासे राजाके साथ साक्षात्कार नहीं कर सकता; यदि दामोदर उनसे मिलनेके लिये कहे, तभी मैं ऐसा कर सकता हूँ।' महाप्रभुके इस वाक्यके अनेक गूढ़ अर्थ हैं,—दामोदरकी भक्तिके वशीभूत होनेपर भी उसका वाक्यरूपी दण्ड बहुत बार महाप्रभुके लिये अयोग्य होता है। इस बातसे दामोदरको वह प्रवृत्ति छोड़नी होगी॥24-25॥ श्रीदामोदरका अभिमान और आरोप :- दामोदर कहे,—“तुमि स्वतन्त्र ईश्वर। कर्त्तव्याकर्त्तव्य सब तोमार गोचर ॥26॥ आमि कोन् क्षुद्रजीव, तोमाके विधि दिब? आपनि मिलिबे ताँरे, ताहाओ देखिब ॥ 27 ॥ राजा तोमारे स्नेह करे, तुमि—स्नेहवश। ताँर स्नेहे कराबे ताँरे तोमार परश॥28॥ यद्यपि ईश्वर तुमि परम-स्वतन्त्र। तथापि स्वभावे हओ प्रेम-परतन्त्र ॥ 29 ॥ अनुवाद—श्रीदामोदरने कहा,—“आप स्वतन्त्र ईश्वर 468 ।