श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1312, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबारहवाँ अध्याय 12/11-21 ] सबारे मिलिया कहिल राज-विवरण। पिछे सेइ पत्री सबारे कराइल दरशन ॥ 12॥ अनुवाद—राजाका पत्र पढ़कर श्रीभट्टाचार्य बड़े चिन्तित हो गये। वे उस पत्रको लेकर भक्तोंके पास गये। पहले श्रीभट्टाचार्यने सभी भक्तोंसे मिलकर उनको राजाकी महाप्रभुके दर्शनकी तीव्र उत्कण्ठाके विषयमें बतलाया और बादमें सबको राजाका पत्र भी दिखलाया ॥ 11-12 ॥ राजाकी महाप्रभुके प्रति भक्तिको देखकर सभी भक्तोंको विस्मय :- पत्री देखि' सबार मने हइल विस्मय। प्रभुपदे गजपतिर एत भक्ति हय !! 13 ॥ अनुवाद—राजाके पत्रको देखकर सभीके मनमें आश्चर्य हुआ कि गजपति राजाकी महाप्रभुके चरणोंमें इतनी भक्ति है॥ 13 ॥ सभीकी महाप्रभुके दृढ़ सङ्कल्पमें आस्थाके कारण भय और राजाको अप्रिय सत्य बात कहनेकी अनिच्छा :- सबे कहे, - "प्रभु ताँरे कभु ना मिलिबे। आमि सब कहि यदि, दुःख से मानिबे ॥" 14 ॥ अनुवाद—सभी भक्तोंने कहा,- "महाप्रभु राजासे कभी भी नहीं मिलेंगे, परन्तु यह बात यदि हम सब राजासे कहेंगे, तो उनको बहुत दुःख होगा॥" 14॥ श्रीसार्वभौमकी युक्ति - महाप्रभुको राजाकी भगवद्भक्तिकी निष्ठा वर्णन करनेकी इच्छा :- सार्वभौम कहे, - "सबे चल' एकबार। मिलिते ना कहिब, कहिब राज-व्यवहार ॥" 15 ॥ अनुवाद—श्रीसार्वभौमने कहा- "आइये, हम सब एक बार महाप्रभुके पास चलते हैं। हम उन्हें राजासे मिलनेके लिये नहीं कहेंगे, केवल राजाके व्यवहारकी ही बात कहेंगे ॥" 15 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीसार्वभौमने कहा, - हम सब मिलकर महाप्रभुके सामने राजाके सुवैष्णव-व्यवहारके बारेमें बतलायेंगे। राजाको दर्शन देनेके लिये अनुरोध नहीं करेंगे ॥ 15 ॥ महाप्रभुके निकट आकर भी सभीको राजाकी बात कहनेमें भय :- एत बलि' सबे गेला महाप्रभुर स्थाने। कहिते उन्मुख सबे, ना कहे वचने ॥ 16 ॥ अनुवाद—इतना कहकर श्रीसार्वभौम सबके साथ महाप्रभुके पास गये। वे सब कहनेके लिये महाप्रभुके सामने आये, परन्तु कुछ कह नहीं सके ॥ 16 ॥ सभीकी भय-चकित-दृष्टिको देखकर महाप्रभुके द्वारा उनके आगमनके कारणकी जिज्ञासा :- प्रभु कहे, - "कि कहिते सबार आगमन ? देखिये कहिते चाह, - ना कह, कि कारण ? ॥" 17॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा, - "आप क्या कहनेके लिये यहाँ आये हैं? मैं देख रहा हूँ कि आप कुछ कहना चाहते हैं, किन्तु कुछ कह नहीं रहे, क्या कारण है?" ॥ 17 ॥ नित्यानन्द प्रभुका भयभीत होकर निवेदन :- नित्यानन्द कहे, - "तोमाय चाहि निवेदिते। ना कहिले रहिते नारि, कहिते भय चित्ते ॥ 18 ॥ योग्यायोग्य तोमाय सब चाहि निवेदिते। तोमा ना मिलिले राजा चाहे योगी हैते ॥ 19 ॥ श्रीगौरकृपाके अभावमें राज-प्रतिज्ञाका निवेदन :- काणे मुद्रा लइ' मुञि हइब भिखारी। राज्यभोग नहे चित्ते बिना गौरहरि ॥ 20 ॥ राजाका गाढ़ गौर-अनुराग :- देखिब से मुखचन्द्र नयन भरिया। धरिब से पादपद्म हृदये तुलिया ॥" 21 ॥ अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,- "हम आपसे । 467