श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबारहवाँ अध्याय 12/26-34 ] हैं। क्या कर्त्तव्य है और क्या अकर्त्तव्य, यह आप भली-भाँति जानते हैं। मैं एक क्षुद्र जीव कौन होता हूँ जो आपको विधि-नियम बतलाऊँगा ? आप स्वयं ही राजासे मिलेंगे, मैं यह देखूँगा। राजा आपसे स्नेह करते हैं और आप भी उनके स्नेहके वशीभूत हैं। राजाका स्नेह ही उन्हें आपका स्पर्श प्राप्त करायेगा। यद्यपि आप ईश्वर हैं, इसलिये परम-स्वतन्त्र हैं, तथापि अपने स्वभावके कारण आप प्रेमके अधीन रहते हैं।"26-29॥ अनुभाष्य-यद्यपि आप ईश्वर हैं, इसलिये किसीके भी द्वारा किसी प्रकारसे बँधे नहीं है, तथापि अपने स्वभावके कारण आप अपने ऐकान्तिक भक्तोंकी प्रीतिसे ही बँधे हैं॥ 29 ॥ महाप्रभुके मतका समर्थन करते हुए श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा राजाके अनुरागका समर्थन :- नित्यानन्द कहे, - 'ऐछे हय कोन् जन। ये तोमारे कहे, 'कर राजदरशन' ॥ 30 ॥ कृष्णानुरागीका स्वभाव और याज्ञिक-ब्राह्मणोंकी पत्नियोंके कृष्णानुरागका दृष्टान्त :- किन्तु अनुरागी लोकेर स्वभाव एक हय। इष्ट ना पाइले निज-प्राण से छोड़य ॥ 31 ॥ याज्ञिक-ब्राह्मणी सब ताहाते प्रमाण। कृष्ण लागि' पति-आगे छाड़िलेक प्राण ॥ 32 ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,-'इस त्रिभुवनमें ऐसा कौन है जो आपसे राजाका दर्शन करनेके लिये कह सके ? किन्तु क्या यह अनुरागी व्यक्तियोंका स्वभाव नहीं है कि वे अपने इष्टको न पानेसे अपने प्राणोंका भी त्याग कर देते हैं। याज्ञिक ब्राह्मणियाँ सब इसका प्रमाण हैं, श्रीकृष्णके लिये वे अपने पतियोंके सामने ही अपने प्राण त्यागनेके लिये तत्पर हो गयीं थी॥ 30-32 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-एक दिन जब श्रीकृष्ण गोपबालकों और गैयाओंको लेकर मथुराके निकट पहुँचे, तब गोपबालकोंको भूख लगी। श्रीकृष्णने कहा, - 'यहाँ पासमें एक वनमें याज्ञिक ब्राह्मण यज्ञ कर रहे हैं, उनके पास जाकर मेरे नामसे भोजन माँग लो।' गोपबालकोंने जाकर जब भोजनकी याचना की, तब कर्मजड़ याज्ञिक ब्राह्मणोंने उन्हें भोजन नहीं दिया। उन ब्राह्मणोंकी पत्नियोंने श्रीकृष्णके प्रति स्वाभाविक अनुरागवशतः गोपबालकोंकी याचनाको सुनकर पतियोंके यज्ञका त्याग करके श्रीकृष्णको भोजन देनेके लिये अनेक विपत्तियोंको स्वीकार किया। तात्पर्य यह है कि भगवद्-तत्त्वमें अनुराग होनेपर उनकी सेवाके अभावमें भक्त प्राण त्यागनेके लिये भी तत्पर होता है॥ 31-32 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 2/28, 43 और 45 संख्या देखें। मध्यलीला 4/186 संख्या एवं अन्त्यलीला 4/61-64 संख्या इस प्रसङ्गमें विचारणीय हैं। याज्ञिक ब्राह्मण पत्नियोंको श्रीकृष्णप्राप्ति-प्रसङ्गके लिये भागवत दशम- स्कन्ध 23वाँ अध्याय देखें॥ 31-32 ॥ श्रीनित्यानन्द प्रभुकी युक्ति :- एक युक्ति आछे, यदि कर अवधान। तुमि ना मिलिलेह ताँरे, रहे ताँर प्राण ॥ 33 ॥ एक बहिर्वास यदि देह' कृपा करि'। ताहा पाञा प्राण राखे, तोमार आशा धरि' ॥ "34 ॥ अनुवाद-ऐसी एक युक्ति है, जिसपर आप विचार करें जिसके द्वारा आपके राजासे नहीं मिलनेपर भी उनके प्राण बचे रह सकते हैं। यदि आप कृपा करके अपना एक बहिर्वास दें, तो राजा उसे पाकर अपनी अभिलाषा पूर्ण होनेकी आशासे अपने प्राण धारण कर सकते हैं॥ "33-34 ॥ अनुभाष्य-राजाके भाग्यमें आपके दर्शनकी प्राप्ति किसी भी प्रकारसे नहीं होगी और आपके दर्शन न होनेके कारण उनके प्राण उत्कण्ठित हुए हैं। ऐसे समयमें यदि आपका एक पहना हुआ बहिर्वास कृपा करके उन्हें प्रदान करें, तभी उनके प्रति आपकी दया । 469