भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1315

[ 12/34-42 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला है, ऐसा वे समझेंगे और भविष्यमें उनकी अभिलाषा पूर्ण हो सकती है,–इस आशासे राजा प्राण धारण कर सकेंगे ॥ 34 ॥ श्रीनित्यानन्दादिके वशीभूत महाप्रभु :– प्रभु कहे,–“तुमि-सब परम विद्वान्। येइ भाल हय, सेइ कर समाधान ॥”35 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,–“आप सब परम विद्वान हो। जैसा उचित समझते हैं, वैसा ही कीजिये ॥”35 ॥ श्रीनित्यानन्दके द्वारा श्रीगोविन्दसे महाप्रभुका बहिर्वास लेना :– तबे नित्यानन्द-गोसाञि गोविन्देर पाश। मागिया लइल प्रभुर एक बहिर्वास ॥ 36 ॥ श्रीसार्वभौमके द्वारा उस बहिर्वासको राजाके पास भेजना :– सेइ बहिर्वास सार्वभौम-पाश दिल। सार्वभौम सेइ वस्त्र राजारे पाठा'ल ॥ 37 ॥ अनुवाद—तब श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीगोविन्दसे महाप्रभुका एक बहिर्वास माँगकर ले लिया। उस बहिर्वासको उन्होने श्रीसार्वभौमको दिया और श्रीसार्वभौमने उस वस्त्रको राजाके पास भिजवा दिया॥ 36-37 ॥ महाप्रभुके वस्त्रको महाप्रभुसे अभिन्न जानकर राजाके द्वारा उसकी सेवा :– वस्त्र पाञा राजार हैल आनन्दित मन। प्रभुरूप करि' करे वस्त्रेर पूजन ॥ 38 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके वस्त्रको पाकर राजाके मनमें बहुत आनन्द हो गया। राजा उस वस्त्रको महाप्रभुका ही रूप जानकर उसकी पूजा करने लगे ॥ 38 ॥ अनुभाष्य—महाप्रभुकी जिस प्रकार आग्रहपूर्वक पूजा करनेकी बात राजाने सोची थी, महाप्रभुके द्वारा दिये गये बहिर्वासके खण्डको महाप्रभुके समान मानकर राजा उसी प्रकार पूजा करने लगे। महाप्रभुके श्रीअङ्गके साथ उनके द्वारा पहने गये वस्त्र-भूषणादिका नित्य अभेद हैं। सन्धिनी-शक्तिमान्-विग्रह श्रीबलदेवकी ही कला, 'शेष'-रूपी विष्णु-शय्या और वस्त्रादि विविधरूपोंमें अपने आराध्य श्रीकृष्णचन्द्रकी सेवा करती हैं। इसलिये वे सभी वस्तुएँ श्रीकृष्णसे अभिन्न रूपमें शुद्धसेवकोंके लिये सेव्य हैं। विशेषतः महाप्रभु अद्वयज्ञान सच्चिदानन्दविग्रह स्वयं भगवान् हैं। इस प्रकार सच्चिदानन्दमय गुरु-वैष्णवोंको और उनके द्वारा व्यवहार किये गये उपकरणोंको परस्पर अभिन्न अर्थात् जीवोंके नित्य परम-अर्चनीय विग्रहके रूपमें जानने होंगे ॥ 38 ॥ पुरीमें आकर महाप्रभुका सङ्ग प्राप्त करनेके लिये श्रीरायको राजकार्यसे निवृत्तिके लिये राजाकी अनुमति :– रामानन्द राय यबे 'दक्षिण' हैते आइला। प्रभुसङ्गे रहिते राजाके निवेदिला ॥ 39 ॥ रायको महाप्रभुके दर्शन कराने हेतु राजाका अनुरोध :– तबे राजा सन्तोषे ताँहारे आज्ञा दिला। आपनि मिलन लागि' कहिते लागिला ॥ 40 ॥ “महाप्रभु महाकृपा करेन तोमारे। मोरे मिलिबारे अवश्य साधिबे ताँहारे ॥”41 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द राय जब दक्षिण भारतसे आये, तो उन्होंने महाप्रभुके साथ रहनेके लिये राजासे निवेदन किया। तब राजाने प्रसन्नतापूर्वक उनको राजकार्य छोड़कर महाप्रभुके साथ रहनेके लिये अनुमति दे दी। फिर महाप्रभुके साथ अपने मिलनेके सम्बन्धमें कहने लगे,—“महाप्रभुकी आपपर अपार कृपा है। इसलिये मुझे उनसे मिलवानेके लिये आप भी यत्न करना ॥”39-41 ॥ राजाके साथ कटकसे पुरी आनेपर ही श्रीरायको महाप्रभुका दर्शन :– एकसङ्गे दुइ जन क्षेत्रे यबे आइला। रामानन्द राय तबे प्रभुरे मिलिला ॥ 42 ॥ 470 ।