श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1316, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबारहवाँ अध्याय 12/42-51 ] अनुवाद—श्रीरामानन्द राय और राजा प्रतापरुद्र, दोनों जब एक ही साथ नीलाचल आ गये, तब श्रीरामानन्द राय महाप्रभुसे मिले ॥ 42 ॥ महाप्रभुसे राजाके लिये आवेदन :— प्रभुपदे प्रेमभक्ति जानाइल राजार। प्रसङ्ग पाञा ऐछे कहे बारबार ॥ 43 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुको राजाकी उनके श्रीचरणोंमें प्रेमभक्तिको जनाया। और बादमें भी प्रसङ्ग पाकर उसी बातको बार-बार कहते ॥ 43 ॥ व्यवहारमें चतुर श्रीरामानन्द :— राजमन्त्री रामानन्द—व्यवहारे निपुण। राजप्रीति कहिं द्रवाइल प्रभुर मन ॥ 44 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द राय राजमन्त्री होनेके कारण व्यवहारमें निपुण थे। इसलिये राजाकी प्रीतिको बतलाते हुए धीरे-धीरे उन्होंने महाप्रभुके मनको द्रवीभूत कर दिया ॥ 44 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीरामानन्द राय राजमन्त्री होनेके कारण राजकीय-व्यवहारादि सभी विषयोंमें बड़े ही निपुण थे, इसलिये राजाकी महाप्रभुके प्रति जो प्रीति है, उसका वर्णन करके उन्होंने महाप्रभुके चित्तको द्रवीभूत कर दिया था ॥ 44 ॥ उत्कण्ठित राजाको दर्शन देनेके लिये महाप्रभुसे प्रार्थना :— उत्कण्ठाते प्रतापरुद्र नारे रहिबारे। रामानन्द साधिलेन प्रभुरे मिलिबारे ॥ 45 ॥ रामानन्द प्रभु-पाय कैल निवेदन। “एकबार प्रतापरुद्रे देखाह चरण॥” 46 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके दर्शनकी उत्कण्ठाके कारण राजा प्रतापरुद्रसे रहा नहीं जा रहा था, इसलिये श्रीरामानन्द रायने उन्हें महाप्रभुसे मिलानेका एक उपाय निकाला। श्रीरामानन्द रायने महाप्रभुके चरणोंमें निवेदन किया,—“आप एकबार राजा प्रतापरुद्रको अपने श्रीचरणोंका दर्शन दे दीजिये ॥” 45-46 ॥ रायसे ही महाप्रभुकी सद्विचारकी याचना :— प्रभु कहे,—“रामानन्द, कह विचारिया। राजाके मिलिते युयाय संन्यासी हञा ? ॥ 47 ॥ राजार मिलने भिक्षुकेर दुइ कुल नाश। परलोक रहु, लोके करे उपहास ॥” 48 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“रामानन्द! तुम स्वयं ही विचार करके बतलाओ कि क्या संन्यासी होकर राजासे मिलना उचित है? राजासे मिलनेसे भिक्षुकके दोनों कुल नाश हो जाते हैं। परलोककी तो बात दूर रहे, इस लोकमें भी लोग उसका उपहास करते हैं ॥” 47-48 ॥ महाप्रभुमें श्रीरायका विधि-निषेधसे अतीत ‘ईश्वर’-ज्ञान :— रामानन्द कहे,—“तुमि ईश्वर स्वतन्त्र। कारे तोमार भय, तुमि नह परतन्त्र ॥” 49 ॥ अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने कहा,—“आप तो स्वतन्त्र ईश्वर हैं। आपको किसीका भय नहीं है, क्योंकि आप किसीके अधीन नहीं हैं ॥” 49 ॥ स्वयंको विधिके द्वारा बाध्य दिखलाकर महाप्रभुकी छलनेकी चेष्टा :— प्रभु कहे,—“आमि मनुष्य, आश्रमे संन्यासी। कायमनोवाक्ये व्यवहारे भय वासि ॥ 50 ॥ वैध संन्यासीके लिये निष्कलङ्क आचरण ही कर्त्तव्य :— शुक्लवस्त्रे मसि-बिन्दु यैछे ना लुकाय। संन्यासीर अल्प छिद्र सर्वलोके गाय ॥” 51 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“मैं ईश्वर नहीं, एक साधारण मनुष्य हूँ और उसपर आश्रमसे संन्यासी हूँ। इसलिये मेरे तन, मन और वाक्यसे व्यवहारके विषयमें । 471