भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1317, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1317

[ 12/50-62 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला लोग क्या कहेंगे, इसका भय करता हूँ। जिस प्रकार सफेद वस्त्रपर स्याहीका एक छोटासा भी बिन्दु छिपता नहीं है, उसी प्रकार संन्यासीके छोटेसे दोषकी भी सब लोग चर्चा करते हैं॥"50-51॥ अनुभाष्य-मैं चतुर्थ आश्रम अर्थात् संन्यासमें स्थित मनुष्य मात्र हूँ, ईश्वर नहीं। इसलिये तन-मन-वाक्यसे लौकिक व्यवहारके व्यभिचारकी आशङ्का करता हूँ अर्थात् दूसरोंकी अपेक्षा रखता हूँ॥ 50 ॥ महापापीके उद्धारके लिये भगवद्भक्त राजाका भी महाप्रभुके दर्शनका सौभाग्य प्राप्त करनेका अवश्य ही अधिकार :- राय कहे, - "यत पापी करियाछ अव्याहति । ईश्वर-सेवक तोमार भक्त गजपति ॥" 52 ॥ अनुवाद-श्रीरामानन्द रायने कहा, - "आपने तो अनेक पापियोंका उद्धार किया है। गजपति राजा तो श्रीजगन्नाथके सेवक और आपके भक्त हैं॥" 52 ॥ महाप्रभुकी फिर भी राजाका दर्शन करनेकी अनिच्छा :- प्रभु कहे, - "पूर्ण यैछे दुग्धेर कलस। सुराबिन्दु-पाते केह ना करे परश ॥ 53 ॥ जड़ 'विषयी'-संज्ञा-सर्वगुण नाशक :- यद्यपि प्रतापरुद्र-सर्व गुणवान्। ताँहारे मलिन कैल एक 'राजा' नाम ॥ 54 ॥ अन्तमें श्रीरामानन्द रायके आग्रहसे महाप्रभुकी राजाके पुत्रके साथ मिलनेकी इच्छा :- तथापि तोमार यदि महाग्रह हय। तबे आनि' मिलाह तुमि ताँहार तनय ॥ 55 ॥ पिता और पुत्रमें दैहिक-धातुगत अभेद :- “आत्मा वै जायते पुत्रः" - एइ शास्त्रवाणी। पुत्रेर मिलने येन मिलिबे आपनि ॥ "56 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "जिस प्रकार दूधसे भरे कलशमें यदि मदिराकी एक बूँद भी गिर जाय, तो कोई भी उसे स्पर्श नहीं करता। यद्यपि राजा प्रतापरुद्रके सर्वगुणवान् होनेपर भी एक 'राजा' नामने ही उनको मलिन किया हुआ है, तथापि यदि आपका बहुत आग्रह है, तो उनके पुत्रको लाकर मुझसे मिलवा सकते हो। शास्त्रोंमें कहा गया है कि आत्मा ही पुत्रके रूपमें आता है, इसलिये पुत्रके मुझसे मिलनेसे जैसे उनका (राजाका) अपना मिलना हो जायेगा ॥" 53-56 ॥ अनुभाष्य - 'तनय' - पुरोषत्तम जाना (?) श्रीभगवदुक्ति (भाः 10/78/36)- "आत्मा वै पुत्र उत्पन्न इति वेदानुशासनम्" अर्थात् "जीव स्वयं ही पुत्रके रूपमें उत्पन्न होता है, इस प्रकारसे वेदोंका निर्देश है"; इस श्लोककी श्रीधर-स्वामीकी टीका - "आत्मा वै पुत्रनामासि स जीवः शरदः शतम्" इत्यादि वेदानुशासनम् ॥ 55-56 ॥ राजाको श्रीरायके द्वारा महाप्रभुकी कृपाका समाचार देना; राजपुत्रको महाप्रभुके पास लाना :- तबे राय याइ' सब राजारे कहिला। प्रभुर आज्ञाय ताँर पुत्र लञा आइला ॥ 57 ॥ अनुवाद-तब श्रीरामानन्द रायने जाकर महाप्रभुकी सारी बात राजाको बतला दी और महाप्रभुकी आज्ञा अनुसार राजाके पुत्रको अपने साथ ले आये ॥ 57 ॥ श्यामवर्ण किशोर राजपुत्रसे महाप्रभुको 'श्रीकृष्ण'की उद्दीपना :- सुन्दर, राजार पुत्र-श्यामल-वरण। किशोर वयस, दीर्घ कमलनयन ॥ 58 ॥ पीताम्बर, धरे अङ्गे रत्न-आभरण। श्रीकृष्ण-स्मरणे तँह हैला 'उद्दीपन' ॥ 59 ॥ ताँरे देखि' महाप्रभुर कृष्णस्मृति हैल। प्रेमावेशे ताँरे मिलि' कहिते लागिल ॥ 60 ॥ वैष्णवदर्शनकी चूड़ान्त कथा :- “एइ-महाभागवत, याँहार दर्शने। व्रजेन्द्रनन्दन-स्मृति हय सर्वजने ॥ 61 ॥ राजपुत्रको श्रीकृष्ण मानकर महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- कृतार्थ हइलाङ आमि इँहार दर्शने।" एत बलि' कैल तारे पुनः आलिङ्गने ॥ 62 ॥ 472 ।

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