भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1318

बारहवाँ अध्याय 12/58-67 ] अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रका पुत्र श्याम वर्णका और देखनेमें अति सुन्दर था। उसकी किशोर अवस्था थी और कमलके समान सुन्दर बड़े नयन थे। उसने पीताम्बर पहन रखा था और उसके अङ्गोंमें अनेक रत्नोंके आभूषण शोभा पा रहे थे। उसे देखते ही श्रीकृष्ण-स्मरणका 'उद्दीपन'-भाव प्रकाशित हो जाता था, इसलिये उसे देखकर महाप्रभुको श्रीकृष्णकी स्मृति हो आयी। उससे मिलकर प्रेमावेशमें महाप्रभुने उसका आलिङ्गन किया और कहने लगे, —“यह तो महाभागवत है, इसे देखनेसे सभीको व्रजेन्द्रनन्दनकी स्मृति होती है। इसके दर्शनसे मैं कृतार्थ हो गया हूँ।” इतना कहकर महाप्रभुने उसे पुनः आलिङ्गन किया॥ 58-62॥ अनुभाष्य—महाप्रभुने राजपुत्रकी आत्माका दर्शन किया, उसके बाहरी अनात्म देह और भोग्य-अनुशीलनपर मनका दर्शन नहीं किया। महाप्रभुमें राजपुत्रको 'विषयीका पुत्र विषयी', इसलिये उसे 'स्त्री सङ्गी' एवं स्वयंको 'स्त्री-भोक्ता पुरुष' माननेकी धारणा बिल्कुल भी नहीं है। अर्थात् जिस प्रकार श्रीकृष्णबहिर्मुख मायावादी जीव निसर्गसुलभ जड़में चिद्का आरोप करते हैं अथवा भूमिमें पूज्यबुद्धि रखते हैं, उस प्रकारसे सच्चिदानन्दमय वास्तव-वस्तुके दर्शनमें महाप्रभुमें किसी प्रकारके मनोधर्मसे उत्पन्न कल्पना अथवा आरोपका लेशमात्र भी अवकाश नहीं है। यद्यपि महाप्रभु स्वयं अद्वयज्ञान विषय-विग्रह हैं, तथापि उन्होंने अपनेको 'आश्रय'-जातीय 'गोपी' मानकर राजपुत्रको साक्षात् 'व्रजेन्द्र-नन्दन' रूपमें देखा, यही शुद्ध जीवात्माका अद्वयज्ञान-दर्शन अथवा वैष्णव दर्शन है (मध्यलीला आठवें अध्यायकी 277 संख्या देखें)। (कठ और मुण्डकोपनिषद्)— “यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्” अर्थात् जब जीवात्मा भगवान्के प्रति सेवोन्मुख होकर परमात्माकी कृपायाचना करता है, तब उसीके निकट वे परमात्मा अपना स्वयंप्रकाश श्रीविग्रह प्रकट करते हैं। इस अभय-दर्शनके अभावके कारण ही जीवका अविद्याजनित सभी अनर्थोंका आह्वान अथवा संसार है। “संसारे आसिया प्रकृति भजिया 'पुरुष' अभिमाने मरि” (ठाकुर श्रीभक्तिविनोदकृत 'कल्याण कल्पतरु') अर्थात् संसारमें आकर जीव स्वयंमें पुरुष (भोक्ता) अभिमान रखकर प्रकृतिका (मायाका) भजन करनेसे जन्म-मृत्युके बन्धनमें जकड़ जाता है॥ 59-61॥ आलिङ्गनके फलस्वरूप राजपुत्रमें श्रीकृष्णप्रेमावेश :— प्रभुस्पर्शे राजपुत्रेर हैल प्रेमावेश। स्वेद, कम्प, अश्रु, स्तम्भ, पुलक विशेष॥ 63॥ उसके प्रेमका दर्शन करके भक्तोंके द्वारा प्रशंसा :— 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहे, नाचे, करये रोदन। ताँर भाग्य देखि' श्लाघा करे भक्तगण॥ 64॥ अनुवाद—महाप्रभुका स्पर्श पाते ही राजपुत्रमें प्रेमका आवेश हो गया और उसके शरीरमें स्वेद, कम्प, अश्रु, स्तम्भ तथा पुलकादि विशेष सात्त्विक विकार उदित होने लगे। वह 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहकर नाचने और रोने लगा। उसका ऐसा सौभाग्य देखकर सभी भक्त उसकी प्रशंसा करने लगे॥ 63-64॥ महाप्रभुके द्वारा राजाके पुत्रको आश्वासन और नित्य सङ्गकी याचना :— तबे महाप्रभु ताँरे धैर्य कराइल। 'नित्य आसि आमाय मिलिह'—एइ आज्ञा दिल॥ 65॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने उसे धैर्य धारण कराया और आदेश दिया,—'तुम नित्य आकर मुझसे मिला करो॥' 65॥ पुत्रके दर्शन और आलिङ्गनसे राजाको महाप्रभुके स्पर्शकी अनुभूति :— विदाय हञा राय आइल राजपुत्रे लञा। राजा सुख पाइल पुत्रेर चेष्टा देखिया॥ 66॥ पुत्रे आलिङ्गन करि' प्रेमाविष्ट हैला। साक्षात् स्पर्श येन महाप्रभुर पाइला॥ 67॥ । 473