भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1319

[ 12/66-77 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—महाप्रभुसे विदायी लेकर श्रीरामानन्द राय राजपुत्रको लेकर राजाके पास आ गये। अपने पुत्रकी चेष्टा (महाप्रभुका आलिङ्गन प्राप्त करना) सुनकर राजाको बहुत प्रसन्नता हुई। अपने पुत्रका आलिङ्गन करके राजा प्रतापरुद्र भी प्रेममें आविष्ट हो गये मानो उन्हें साक्षात् महाप्रभुका स्पर्श प्राप्त हो गया हो॥66-67॥ राजाके पुत्रकी गौरभक्तोंमें गणना :- सेइ हैते भाग्यवान् राजार नन्दन। प्रभुभक्तगण-मध्ये हैला एकजण॥68॥ अनुवाद—उस दिनसे भाग्यवान् राजपुत्र भी महाप्रभुके भक्तोंमें एक भक्त हो गया॥68॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुका कीर्तन-विलास :- एइमत महाप्रभु भक्तगण-सङ्गे। निरन्तर क्रीड़ा करे सङ्कीर्त्तन-रङ्गे॥69॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ सङ्कीर्त्तनका आनन्द लेते हुए निरन्तर लीलाएँ करते थे॥69॥ श्रीअद्वैतादिका सगण महाप्रभुको निमन्त्रण :- आचार्य्यादि भक्त करे प्रभुरे निमन्त्रण। ताँहा ताँहा भिक्षा करे लञा भक्तगण॥70॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य्यादि प्रमुख भक्त महाप्रभुको अपने-अपने स्थानपर निमन्त्रण करते और महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ वहाँ-वहाँ जाकर भोजन ग्रहण करते॥70॥ रथयात्रा निकटवर्ती :- एइमत नाना-रङ्गे कत दिन गेल। जगन्नाथेर रथयात्रा निकट हइल॥71॥ अनुवाद—इस प्रकार अनेक मधुर लीलाएँ करते- करते कुछ दिन बीत गये और श्रीजगन्नाथकी रथयात्राका समय निकट आ गया॥71॥ काशीमिश्र, पड़िछा और श्रीभट्टाचार्यसे महाप्रभुके द्वारा गुण्डिचा-मन्दिर-मार्जनके लिये अनुमतिकी याचना :- प्रथमेइ काशीमिश्रे प्रभु बोलाइल। पड़िछा-पात्र, सार्वभौमे बोलाञा आनिल॥72॥ तिनजन-पाशे प्रभु हासिया कहिल। गुण्डिचा-मन्दिर-मार्जन-सेवा मागि' निल॥73॥ अनुवाद—महाप्रभुने पहले श्रीकाशीमिश्रको और फिर पड़िछा और श्रीसार्वभौमको अपने पास बुलवाया। उन तीनोंसे महाप्रभुने मुस्कुराते हुए गुण्डिचा-मन्दिर- मार्जन-सेवा माँगी॥72-73॥ अनुभाष्य—'गुण्डिचा-मन्दिर'—श्रीजगन्नाथ मन्दिरसे पूर्व-उत्तर दिशामें एक कोसकी दूरीपर स्थित है। रथयात्राके समय श्रीजगन्नाथदेव एक सप्ताहके लिये वहाँ जाते हैं। बादमें पुनः रथमें लौट आते हैं। जनश्रुतिके आधारपर यह जाना जाता है कि श्रीइन्द्रद्युम्न राजाकी पत्नीका नाम 'गुण्डिचा' था। शास्त्रग्रन्थोंमें गुण्डिचा-मन्दिरका उल्लेख है। गुण्डिचा मन्दिरके प्राङ्गणकी लम्बाई 288 हाथ और चौड़ाई 215 हाथ है। मूल मन्दिरकी लम्बाई 36 हाथ, चौड़ाई 30 हाथ है। नाट्य-मन्दिरकी लम्बाई 32 हाथ और चौड़ाई 30 हाथ है॥73॥ पड़िछाकी दैन्योक्ति :- पड़िछा कहे,—“आमि-सब सेवक तोमार। ये तोमार इच्छा, सेइ कर्त्तव्य आमार॥74॥ राजाकी आज्ञासे महाप्रभुकी सेवाका अधिकार :- विशेषे राजार आज्ञा हञाछे आमारे। प्रभुर आज्ञा येइ, सेइ शीघ्र करिबारे॥75॥ पड़िछाकी गुण्डिचा-मन्दिर-मार्जनके तत्त्वमें अनभिज्ञता :- तोमार योग्य सेवा नहे मन्दिर-मार्जन। एइ एक लीला कर, ये तोमार मन॥76॥ महाप्रभुके द्वारा घड़े और झाडू संग्रह :- किन्तु घट, सम्मार्जनी बहुत चाहिये। आज्ञा देह—आजि सब इँहा आनि दिये॥”77॥ 474 ।