भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1320, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1320

बारहवाँ अध्याय 12/74-85 ] अनुवाद-पड़िछाने कहा,—“हम सब आपके सेवक हैं। आपकी जो भी इच्छा होगी, उसका पालन करना हमारा कर्त्तव्य है। विशेषरूपसे राजाने हमें आज्ञा दी है कि महाप्रभुकी जो आज्ञा हो, उसका शीघ्र पालन किया जाय। मन्दिरकी सफाई करनेकी सेवा आपके योग्य नहीं है। यह तो आप एक लीला कर रहे हैं, इसलिये जैसी आपकी इच्छा। किन्तु मन्दिरकी सफाई करनेके लिये बहुतसे घड़ों और झाड़ुओंकी आवश्यकता होगी। आप आज्ञा दीजिये तो मैं आज ही वे सब कुछ लाकर रख दूँगा ॥” 74-77॥ नूतन एकशत घट, शत सम्मार्जनी। पड़िछा आनिया दिल प्रभुर इच्छा जानि' ॥ 78 ॥ अनुवाद—महाप्रभुकी इच्छा जानकर पड़िछाने उन्हें एक सौ नये घड़े और एक सौ झाडू लाकर दे दिये ॥ 78 ॥ प्रभातमें भक्तोंके साथ महाप्रभुका गुण्डिचामें जाना :— आर दिने प्रभाते लञा निजगण। श्रीहस्ते सबार अङ्गे लेपिला चन्दन ॥ 79 ॥ श्रीहस्ते दिल सबारे एक एक मार्जनी। सबगण लञा प्रभु चलिला आपनि ॥ 80 ॥ अनुवाद-अगले दिन प्रातःकालमें महाप्रभुने अपने भक्तोंको अपने साथ लिया और अपने श्रीहाथोंसे उन सबके अङ्गोंमें चन्दन लगाया। उसके बाद महाप्रभुने सबको अपने श्रीहाथोंसे एक-एक झाडू दिया। इस प्रकार स्वयं अपने भक्तोंको साथ लेकर महाप्रभु गुण्डिचा मन्दिरको चल दिये ॥ 79-80 ॥ पहले अपने आचरणके द्वारा आदर्श-प्रदर्शन :- गुण्डिचा-मन्दिरे गेला करिते मार्जन। प्रथमे मार्जनी लञा करिल शोधन ॥ 81 ॥ भितर मन्दिर उपर, – सकल माजिल। सिंहासन माजि' पुनः स्थापन करिल ॥ 82 ॥ छोट-बड़-मन्दिर कैल मार्जन-शोधन । पाछे तैछे शोधिल श्रीजगमोहन ॥ 83 ॥ अनुवाद-गुण्डिचा मन्दिरका मार्जन करनेके लिये भक्तोंके साथ महाप्रभु वहाँ पहुँचे। पहले झाडू लेकर महाप्रभुने वहाँ सफाई की। महाप्रभुने मन्दिरके भीतर सभी स्थानों और छतको भी अच्छेसे साफ किया। उन्होंने सिंहासनको हटाकर उसे पूरी तरहसे साफ करके उसे फिर उसी स्थानपर स्थापित कर दिया। गुण्डिचा-मन्दिरके अन्दर बने अन्यान्य सभी छोटे-बड़े मन्दिरोंका मार्जन करके उनको साफ किया। बादमें वैसे ही श्रीजगमोहनकी भी सफाई की ॥ 81-83 ॥ अनुभाष्य-गुण्डिचाके मूल मन्दिरमें बारह हाथ चौड़ी और दो हाथ ऊँची एक रत्नवेदी है,-यही सिंहासन है। 'श्रीजगमोहन'- मूलमन्दिर और नाट्य-मन्दिरके बीचका मन्दिर 32 हाथ लम्बा है ॥ 82-83 ॥ महाप्रभुके द्वारा स्वयं सफाई करके शिक्षा-दान :- चारिदिके शत भक्त सम्मार्जनी करे। आपनि शोधेन प्रभु, शिखा'न सबारे ॥ 84 ॥ अनुवाद-सैकड़ों भक्त हाथमें झाडू लेकर सभी ओरसे मन्दिरकी सफाई कर रहे थे और महाप्रभु स्वयं भी सफाई करते हुए सभीको शिक्षा दे रहे थे ॥ 84 ॥ भक्तोंके द्वारा महाप्रभुका अनुसरण :- प्रेमोल्लासे शोधेन, लयेन कृष्णनाम। भक्तगण 'कृष्ण' कहे, करे निज-काम ॥ 85 ॥ अनुवाद-महाप्रभु प्रेमोल्लाससे मन्दिरकी सफाई करते हुए साथमें मुखसे श्रीकृष्णनामका कीर्तन कर रहे थे। इसी प्रकार सभी भक्त भी हाथोंसे अपना सफाईका कार्य करते हुए 'कृष्ण' नामका उच्चारण कर रहे थे॥ 85 ॥ । 475