भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1321

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[ 12/86-95 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अश्रुओंके जलसे मन्दिरका मार्जन :- धूलि-धूसर तनु देखिते शोभन। काँहा काँहा अश्रुजले करे सम्मार्जन॥86॥ अनुवाद—महाप्रभुका शरीर धूल-धूसरित होनेपर अधिक शोभायुक्त दिखलायी दे रहा था। मन्दिरका मार्जन करते हुए कभी-कभी उनके नेत्रोंसे अश्रु प्रवाहित हो रहे थे और कहीं-कहीं तो वे उन अश्रुओंसे ही धुलाई कर रहे थे॥86॥ सर्वत्र सम्पूर्णरूपसे शोधन-मार्जन :- भोगमन्दिर शोधन करि' शोधिल प्राङ्गन। सकल आवास क्रमे करिल शोधन॥87॥ अनुवाद—महाप्रभुने जहाँ भोग रखा जाता है, उस भोग-मन्दिरकी सफाई करके बाहर मन्दिरके प्राङ्गणकी सफाई की। और फिर महाप्रभुने क्रमशः सभी आवास-स्थानोंकी सफाई की॥87॥ अनुभाष्य—'भोग मन्दिर'—इसकी लम्बाई 40 हाथ और चौड़ाई 17 हाथ है॥87॥ भक्तोंके द्वारा तृण-धूलि आदिको बाहर फेंकना :- तृण, धूलि, झिँकुर, सब एकत्र करिया। बहिर्वासे लञा फेलाय बाहिर करिया॥88॥ एइमत भक्तगण करि' निज-वासे। तृण, धूलि बाहिरे फेलाय परम-हरिषे॥89॥ अनुवाद—महाप्रभुने तिनके, धूल और छोटे-छोटे कङ्कड़ आदिको एकत्रित कर लिया तथा उन्हें अपने बहिर्वासमें भरकर बाहर फेंक दिया। इसी प्रकार सभी भक्तोंने भी तिनके, धूल आदिको एकत्रित करके अपने वस्त्रोंमें भरकर परम-हर्षके साथ बाहर फेंक दिया॥88-89॥ मलके परिमाणके अनुसार मार्जनका तारतम्य :- प्रभु कहे,—"के कत करियाछ सम्मार्जन। तृण, धूलि देखिलेइ जानिब परिश्रम॥"90॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—"एकत्रित तिनके, धूलको देखनेसे ही पता चलेगा कि किसने कितना परिश्रम किया है और कितनी सफाई की है॥"90॥ सबकी अपेक्षा महाप्रभुके मार्जन-फलस्वरूप गुण्डिचाका अधिक निर्मल होना :- सबार झाँयाटान बोझा करिल एकत्र। सबा हैते प्रभुर बोझा अधिक हइल॥91॥ अनुवाद—सभी भक्तोंने झाडू लगाकर जो धूलि-कङ्कड़ आदि एकत्रित किये थे, उनका एक-एक ढेर लगाया, परन्तु महाप्रभुका ढेर सबसे बड़ा था॥91॥ सेवकोंके साथ सेव्यका सेवा-निर्वाह :- एइमत अभ्यन्तर करिल मार्जन। पुनः सबाकारे दिल करिया वण्टन॥92॥ मन्दिरको गन्दगी रहित करनेकी महाप्रभुकी आज्ञा :- "सूक्ष्म धूलि, तृण, काँकर, सब करह दूर। भालमते शोधन करह प्रभुर अन्तःपुर॥"93॥ अनुवाद—इस प्रकार मन्दिरको भीतरसे साफ करके महाप्रभुने पुनः सभीको मन्दिरके भीतर एक-एक खण्डको सफाईके लिये भक्तोंमें बाँटकर उनसे कहा,—"आप सब सूक्ष्म धूलि, तृण और कङ्कड़ादि सबको बाहर फेंककर श्रीजगन्नाथके अन्तःपुरको अच्छेसे साफ कर दो॥"92-93॥ दो बार मन्दिरकी सफाई :- सब वैष्णव लञा यबे दुइबार शोधिल। देखि' महाप्रभुर मने सन्तोष हइल॥94॥ अनुवाद—सभी वैष्णवोंको साथ लेकर जब मन्दिरकी दो बार सफाई कर ली, तब मन्दिरको साफ देखकर महाप्रभुका मन सन्तुष्ट हुआ॥94॥ अन्य मण्डलीकी मन्दिर मार्जनमें सहायता :- आर शत-जन शत-घटे जल भरि'। प्रथमेइ लञा आछे काल अपेक्षा करि'॥95॥ 476 ।