श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1322, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबारहवाँ अध्याय 12/95-106 ] 'जल आन' बलि' यबे महाप्रभु कहिल। तबे शत घट आनि' प्रभु-आगे दिल ॥ 96 ॥ अनुवाद—पहलेसे अन्य सौ भक्त सौ घड़ोंमें जल भरकर अपनी सेवाके समयकी प्रतीक्षा कर रहे थे। जब महाप्रभुने जल लानेके लिये कहा, तभी उन्होंने सौ घड़े जल लाकर महाप्रभुके सामने रख दिया ॥ 95-96 ॥ मन्दिरमें सर्वत्र पानीसे धुलाई :- प्रथमे करिल प्रभु मन्दिर प्रक्षालन। ऊर्ध्व-अधो भित्ति, गृह-मध्य, सिंहासन ॥ 97 ॥ खापरा भरिया जल ऊर्ध्वे चालाइल। सेइ जले ऊर्ध्वे सब भित्ति प्रक्षालिल ॥ 98 ॥ अनुवाद—उस जलको लेकर पहले महाप्रभुने मुख्य मन्दिरको धोया, तब वहाँ मन्दिरकी दीवारोंको ऊपर-नीचे और मन्दिरके भीतरके सभी स्थानोंके साथ सिंहासनको भी साफ किया। महाप्रभु और सभी भक्त ठीकरोंमें पानी भरकर छतकी ओर फेंकने लगे। नीचे गिरते हुए जलसे दीवारें भी धुल गयीं ॥ 97-98 ॥ अपने हाथोंसे भगवान्के सिंहासनकी सफाई :- श्रीहस्ते करेन सिंहासनेर मार्जन। प्रभुर आगे जल आनि' देय भक्तगण ॥ 99 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु अपने हाथोंसे सिंहासनकी सफाई करने लगे और भक्त उनको जल लाकर देने लगे ॥ 99 ॥ भक्तोंकी विचित्र सेवा :- भक्तगण करे गृह-मध्य प्रक्षालन। निज निज हस्ते करे मन्दिर मार्जन ॥ 100 ॥ केह जल आनि' देय महाप्रभुर करे। केह जल देय ताँर चरण-उपरे ॥ 101 ॥ केह लुकाञा करे सेइ जलपान। केह मागि' लय, केह अन्ये करे दान ॥ 102 ॥ अनुवाद—भक्तगण अपने हाथोंमें झाडू लेकर मन्दिरके भीतर जलसे धुलाई करने लगे। कोई जल लाकर महाप्रभुके हाथोंमें दे रहा था, तो कोई जल लेकर उनके चरणोंमें डाल रहा था। कोई छिपकर महाप्रभुके चरणोंका जल पान कर रहा था। कोई किसीसे माँगकर उस जलका पान कर रहा था, तो कोई स्वयं ही दूसरेको दे रहा था ॥ 100-102 ॥ नालीसे जलका निकलना :- घर धुइ' प्रणालीकाय जल छाड़ि' दिल। सेइ जले प्राङ्गण सब भरिया रहिल ॥ 103 ॥ अनुवाद—मन्दिरके सभी कक्षोंको धोनेके बाद जलको नालीमें छोड़ दिया और उस जलसे बाहर प्राङ्गण भर गया ॥ 103 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'प्रणालिकाय'—नालीमें ॥ 103 ॥ अपने वस्त्रोंसे गृह और सिंहासनका मार्जन :- निज-वस्त्रे कैल प्रभु गृह सम्मार्जन। महाप्रभु निज-वस्त्रे माजिल सिंहासन ॥ 104 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने अपने वस्त्रसे कक्षोंको पोंछकर साफ किया और अपने वस्त्रसे ही सिंहासनको भी चमकाया ॥ 104 ॥ श्रीराधाके निर्मल मनके साथ स्वच्छ और धुले हुए मन्दिरकी उपमा :- शत घट जले हैल मन्दिर मार्जन। मन्दिर शोधिया कैल-येन निज मन ॥ 105 ॥ निर्मल, शीतल, स्निग्ध करिल मन्दिरे। आपन-हृदय येन धरिल बाहिरे ॥ 106 ॥ अनुवाद—इस प्रकार सौ घड़े जलसे मन्दिरके सभी कक्ष साफ हो गये। महाप्रभुने मन्दिरको अपने मनके समान स्वच्छ कर दिया। महाप्रभुने मन्दिरको ऐसा निर्मल, शीतल तथा स्निग्ध कर दिया, मानो उन्होंने । 477