श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1308, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 11/233-242 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला समय सभी सखाओंके बीचमें बैठते थे। उनके चारों ओर बैठे हुए सभी सखा यही अनुभव करते थे कि श्रीकृष्ण उन्हें देख रहे हैं॥ 233 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-व्रजमें श्रीकृष्ण जब यमुना-तटपर भोजन करते थे, तब उनके चारों ओर बैठकर प्रत्येक गोपबालक देखते थे कि श्रीकृष्ण उसकी ओर मुख करके ही भोजन कर रहे हैं। उसी प्रकार महाप्रभु भी जब नृत्य कर रहे थे, तब उनके चारों ओर स्थित भक्तोंने उनके सामने रहकर उनके मुखका दर्शन किया था। यह भी महाप्रभुका एक ऐश्वर्य प्रकाश है। 'नेहाने'-देखे ॥ 233 ॥ निकट नृत्यकारी भक्तको महाप्रभुके द्वारा आलिङ्गन :- नृत्य करिते येइ आइसे सन्निधाने। महाप्रभु करे तारे दृढ़ आलिङ्गने ॥ 234 ॥ महासङ्कीर्त्तन-नृत्य :- महानृत्य, महाप्रेम, महासङ्कीर्त्तन। देखि' प्रेमावेशे भासे नीलाचल-जन ॥ 235 ॥ अनुवाद-नृत्य करते हुए जो भी महाप्रभुके निकट आता, महाप्रभु उसे दृढ़तापूर्वक आलिङ्गन करते। इस प्रकार महानृत्य, महाप्रेम और महासङ्कीर्त्तनको देखकर नीलाचलवासी प्रेमावेशमें डूब गये ॥ 234-235 ॥ प्रतापरुद्रके द्वारा अट्टालिकापर चढ़कर कीर्त्तन-दर्शन :- गजपति राजा शुनि' कीर्त्तन-महत्त्व। अट्टालिका चड़ि' देखे स्वगण-सहित ॥ 236 ॥ राजाका आश्चर्य एवं महाप्रभु-चरण-दर्शनकी उत्कण्ठा :- कीर्त्तन देखिया राजार हैल चमत्कार। प्रभुके मिलिते उत्कण्ठा बाड़िल अपार ॥ 237 ॥ अनुवाद-गजपति राजाने भी जब कीर्त्तनकी महिमा सुनी, तो वे अपने लोगोंके साथ अट्टालिकापर चढ़कर उसे देखने लगे। कीर्त्तनको देखकर राजाको बहुत आश्चर्य हुआ और उनकी महाप्रभुसे मिलनेकी उत्कण्ठा और अधिक बढ़ गयी ॥ 236-237 ॥ कीर्त्तनके अन्तमें पुष्पाञ्जलि दर्शन करके भक्तोंके साथ महाप्रभुका अपने घरपर जाना :- कीर्त्तन-समाप्त्ये प्रभु देखि' पुष्पाञ्जलि। सर्व वैष्णव लञा प्रभु आइला वासा चलि' ॥ 238 ॥ अनुवाद-कीर्त्तन समाप्त होनेपर महाप्रभुने श्रीजगन्नाथदेवकी पुष्पाञ्जलीका दर्शन किया। तब महाप्रभु सभी वैष्णवोंको लेकर अपने वासस्थानपर चले आये॥ 238 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'पुष्पाञ्जलि'-जगन्नाथदेवकी पुष्पाञ्जलि ॥ 238 ॥ ग्यारहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। सभीका महाप्रभुके हाथोंसे वितरित प्रसादका सम्मान :- पड़िछा आनिया दिल प्रसाद विस्तर। सबारे बाँटिया ताहा दिलेन ईश्वर ॥ 239 ॥ सभी भक्तोंको विश्राम करनेकी अनुमति देना :- सबारे विदाय दिल करिते शयन। एइमत लीला करे शचीर नन्दन ॥ 240 ॥ अनुवाद-पड़िछाने आकर महाप्रभुको बहुत-सा महाप्रसाद दिया और महाप्रभुने उसे सभी वैष्णवोंमें बाँट दिया। तब महाप्रभुने सभी भक्तोंको शयन करनेके लिये विदायी दी। इस प्रकार श्रीशचीनन्दन ऐसी अद्भुत लीलाएँ करते हैं ॥ 239-240 ॥ महाप्रभुके साथ रहते हुए सभीको इस प्रकार कीर्त्तनके आनन्दकी प्राप्ति :- यावत् आछिला सबे महाप्रभु-सङ्गे। प्रतिदिन एइमत करे कीर्त्तन-रङ्गे ॥ 241 ॥ अनुवाद-जब तक सब भक्त महाप्रभुके साथ जगन्नाथपुरीमें रहे, प्रतिदिन महाप्रभु इसी प्रकार बड़े आनन्दसे कीर्त्तन करते थे ॥ 241 ॥ बेड़ा-नृत्य-कीर्त्तनके श्रवणसे चिद्वृत्तिकी स्फूर्त्ति :- एइ त' कहिलुँ प्रभुर कीर्त्तन-विलास। येबा इहा शुने, हय चैतन्येर दास ॥ 242 ॥ 462 ।