भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1324

बारहवाँ अध्याय 12/116-127 ] “तुमि भाल करियाछ, शिखाह अन्येरे। एइमत भाल कर्म सेइ येन करे॥” 117 ॥ ए-कथा शुनिया सबे सङ्कुचित हञा। भाल-मते कर्म करे सबे मन दिया ॥ 118 ॥ अनुवाद-किसीके अच्छे कार्यको देखकर महाप्रभु उसकी प्रशंसा करते और किसीके कार्यसे सन्तुष्ट नहीं होनेपर उसको मधुर वचनोंसे झिड़कते हुए कहते, - “अहो! तुम तो बहुत अच्छा कार्य कर रहे हो, तुम दूसरोंको भी ऐसा करना सिखाओ, जिससे वे भी अच्छी तरहसे कार्य करें।” महाप्रभुकी ऐसी बातको सुनकर वे सब लज्जित हो जाते और मन लगाकर अच्छी प्रकारसे सफाई करने लगते ॥ 116-118 ॥ मन्दिरमें सर्वत्र धुलाई :- तबे प्रक्षालन कैल श्रीजगमोहन। भोगमन्दिर-आदि तबे कैल प्रक्षालन ॥ 119 ॥ नाटशाला धुइ' धुइल चत्वर-प्राङ्गण। पाकशाला-आदि करि' करिल प्रक्षालन ॥ 120 ॥ मन्दिरेर चतुर्दिक् प्रक्षालन कैल। सब अन्तःपुर भालमते धोयाइल ॥ 121 ॥ अनुवाद-तब महाप्रभुने मन्दिरके जगमोहन और भोगमन्दिर आदिकी धुलाई की। नाटशालाकी धुलाईके बाद उन्होंने चारों ओरके प्राङ्गणकी भी धुलाई की तथा फिर रसोईघर आदिको भी धोया। इस प्रकार चारों ओरसे मन्दिर अन्दर-बाहरसे धुल गया ॥ 119-121 ॥ एक गौड़ीय-भक्तका महाप्रभुके चरणोंको धोकर चरणामृतका पान :- हेनकाले गौड़ीय एक सुबुद्धि सरल। प्रभुर चरण-युगे दिल घट जल ॥ 122 ॥ सेइ जल लञा आपने पान कैल। ताहा देखि' महाप्रभुर मने रोष हैल ॥ 123 ॥ अनुवाद-उसी समय एक बङ्गालसे आये एक बुद्धिमान सरल भक्तने महाप्रभुके दोनों चरणकमलोंपर घड़ेका जल डाल दिया और फिर उस जलको लेकर उसने पी लिया। ऐसा देखकर महाप्रभुके मनमें क्रोध आ गया ॥ 122-123 ॥ जगद्गुरु आचार्यकी लीला-प्रदर्शक महाप्रभुका क्रोध :- यद्यपि गोसाञि तारे हञाछे सन्तोष। धर्मसंस्थापन लागि' बाहिरे महारोष ॥ 124 ॥ माध्व-गौड़ीयेश्वरसे श्रीदामोदरस्वरूपसे महाप्रभुकी शिकायत :- शिक्षा लागि' स्वरूपे डाकि' कहिल ताँहारे। “एइ देख तोमार 'गौड़ीया'र व्यवहारे ॥ 125 ॥ भगवान्‌के मन्दिरमें चरण-धोना-जीवका सेवापराध :- ईश्वर-मन्दिरे मोर पद धोयाइल। सेइ जल आपनि लञा पान कैल ॥ 126 ॥ महाप्रभुकी सेवापराधके (?) भयसे कातरता :- एइ अपराधे मोर काँहा हबे गति। तोमार 'गौड़ीया' करे एतेक दुर्गति ॥” 127 ॥ अनुवाद-यद्यपि महाप्रभु भीतरसे उसके प्रति सन्तुष्ट थे, परन्तु धर्मकी स्थापना करनेके लिये बाहरसे बहुत रोष प्रकट कर रहे थे। महाप्रभुने अन्य लोगोंको शिक्षा देनेके लिये श्रीस्वरूप दामोदरको बुलाया और उनसे कहा, -“यह अपने 'गौड़ीया'का व्यवहार तो देखो। इसने भगवान्‌के मन्दिरमें मेरे चरणोंको धोया और उसी जलको लेकर स्वयं पान कर लिया। इस अपराधके कारण मेरी कहाँ गति होगी? तुम्हारे 'गौड़ीया'ने मेरी ऐसी दुर्गति कर दी है ॥” 124-127 ॥ अनुभाष्य - 'तोमार' - सभी गौड़ीय-वैष्णव ही श्रीदामोदर स्वरूपके अधीन हैं, इसलिये महाप्रभुने 'तोमार' (तुम्हारे)-शब्द प्रयोग किया। जीवोंके नित्यप्रभु भगवान्‌के मन्दिरमें पैर धोना आदि उनके नित्यदास जीवोंके लिये मर्यादाके उल्लङ्घनके कारण सेवापराध है (हः भः विः); किन्तु महाप्रभु तो । 479