भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1325

[ 12/125-135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला स्वयं भगवान् हैं, इसलिये उनके ऊपर किसी अपराधादिका आरोप पूर्णतः असम्भव और वेद-विरुद्ध है। तथापि वे बाहरसे जगद्गुरु, लोकशिक्षक और आचार्यका कार्य कर रहे हैं, इसलिये उन्होंने अपने आपको भगवान्‌का एक विभिन्नांश जीवमात्र मानकर निर्बोध तथाकथित गुरुओंको सेवापराधसे सतर्क करनेके लिये शिक्षा दी॥ 125-127॥ श्रीस्वरूपके द्वारा उस 'गौड़ीय'को गुण्डिचासे बाहर निकालना :- तबे स्वरूपगोसाञि तार घाड़े हात दिया। ढेका मारि' पुरीर बाहिर राखिलेन लञा॥ 128॥ महाप्रभुके चरणोंमें क्षमा-भिक्षा :- पुनः आसि' प्रभु पाय करिल विनय। “अज्ञे अपराध क्षमा करिते युयाय॥” 129॥ अनुवाद—तब श्रीस्वरूप दामोदरने हाथसे उसकी गर्दनको पकड़कर उसे धक्का मारकर मन्दिरसे बाहर कर दिया और फिर महाप्रभुके चरणोंमें विनती की,— “वह अज्ञानी है, इसलिये उसके अपराधको क्षमा करना ही उचित है॥” 128-129॥ अनुभाष्य—'ढेका'—धक्का; 'पुरीर'—गुण्डिचा- पुरीके॥ 128॥ महाप्रभुका क्षमा करना; सभीको अपने दोनों ओर बैठाना :- तबे महाप्रभुर मने सन्तोष हइल। सारि करि' दुइ पाशे सबारे बसाइल॥ 130॥ बीचमें महाप्रभुका तिनके आदि एकत्रित करना :- आपने बसिया माझे, आपनार हाते। तृण, काँकर, कुटा लागिला कुड़ाइते॥ 131॥ कम इकट्ठा करनेवाले व्यक्तियोंसे प्रसाद-ग्रहणरूप दण्ड :- “के कत कुड़ाय, सब एकत्र करिब। यार अल्प, तार ठाञि पिठा-पाना लइब॥” 132॥ अनुवाद—तब महाप्रभु सन्तुष्ट हो गये। उन्होंने पंक्ति बनवाकर सभी भक्तोंको अपने दोनों ओर बैठा लिया और महाप्रभु स्वयं उनके बीचमें बैठ गये। फिर महाप्रभु अपने हाथोंसे तिनके, कङ्कड़ और कूड़ेको एकत्रित करने लगे और उन्होंने कहा,—“मैं सबको बुलाकर देखूँगा कि किसने कितना कूड़ा एकत्रित किया है। जिसका कम होगा, उससे मैं पिठा-पाना लूँगा॥” 130-132॥ गुण्डिचा मन्दिरको सम्पूर्णरूपसे निर्मल करना :- एइमत सब पुरी करिल शोधन। शीतल, निर्मल कैल—येन निज-मन॥ 133॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने अपने भक्तोंके साथ सम्पूर्ण गुण्डिचा मन्दिरकी सफाई की। मन्दिरको उन्होंने ऐसा शीतल और निर्मल बना दिया, जैसा उनका मन है॥ 133॥ नालीके द्वारसे जलका निकलना :- प्रणालिका छाड़ि' यदि पानि बाहाइल। नूतन-नदी येन समुद्रे मिलिल॥ 134॥ अनुवाद—नालीसे पानीको छोड़नेपर उसके तेज प्रवाहको देखकर ऐसा लग रहा था मानो कोई नयी नदी समुद्रमें मिलने जा रही है॥ 134॥ गुण्डिचा मन्दिरके विभिन्न मार्गोंकी सफाई :- एइमत पुरद्वार-आगे पथ यत। सकल शोधिल, ताहा के वर्णिबे कत॥ 135॥ अनुवाद—इस प्रकार उन्होंने मन्दिरके मुख्य द्वारके आगे सभी मार्गोंकी भी सफाई की। यह सब कुछ कैसे हुआ, कौन इसका वर्णन कर सकता है॥ 135॥ अनुभाष्य—'गुण्डिचा-मार्जनलीला-रहस्य'—जगद्गुरु महाप्रभु इस लीलाके द्वारा यह शिक्षा दे रहे हैं कि यदि कोई सौभाग्यवान् जीव श्रीकृष्णको अपने हृदय-सिंहासनपर बैठानेकी इच्छा करता है, तो सबसे पहले उसे अपने 480 ।