श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबारहवाँ अध्याय [12/135 ]
हृदयके मलको धोना उचित है; हृदयको निर्मल, शान्त और भक्तिसे उज्ज्वल करना आवश्यक है। हृदयक्षेत्रमें काँटेयुक्त तिनके अथवा जङ्गली-घास, धूलि और कङ्कड़ादि-रूप अनर्थ थोड़ेसे रहनेपर भी परमसेव्य भगवान्को वहाँ बैठाया नहीं जा सकता। हृदयका यह मल अथवा कूड़ा-अन्याभिलाष, कर्म, ज्ञान और योग-चेष्टादिके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। श्रीलरूप गोस्वामी प्रभुने कहा है, - “अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्। आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ॥" जहाँ भक्तिके अतिरिक्त अन्य अभिलाषा, ज्ञान-कर्म- योग-तपस्या आदि अथवा भक्तिप्रतिकूल-भावके द्वारा आत्माकी नित्य स्वाभाविक वृत्ति 'भक्ति' ढक गयी है, वहाँ शुद्धभक्ति नहीं है। शुद्धसत्त्वमयी शुद्धभक्तिके बिना श्रीकृष्णका आविर्भाव नहीं होता। 'अन्य अभिलाषा' अर्थात् 'जगत्में जब तक रहूँगा, केवल अपनी इन्द्रियोंके द्वारा भोग ही करूँगा'-ऐसी अन्य अभिलाषा,—यह काँटेयुक्त तिनकेकी भाँति शुद्ध- जीवकी सुकोमल हृदयवृत्ति केवला-भक्तिको (शुद्धभक्तिको) छलनी करती है। कर्मचेष्टा अर्थात् याग, यज्ञ, दान, तपस्यादिके द्वारा 'स्वर्गादि उच्च लोकोंमें सुख अथवा इस लोकमें सुख भोग करूँगा', इस प्रकार जो वासनामयी क्रिया है, वह धूलिके समान है। कर्मके बवण्डरसे उड़ती हुई वायुके द्वारा वासनारूपी धूलिराशि हमारे स्वच्छ और निर्मल हृदय-दर्पणको ढक देती है। सत् और असत् कर्मोंकी वासनारूपी असंख्य धूलि- राशिने हरिविमुख-जीवके हृदयको अनेक जन्म-जन्मान्तर तक मलिन किया है, इसलिये उसकी कर्मवासना दूर नहीं हो रही। हरिविमुख जीव सोचता है, कर्मके द्वारा कर्मरूप काँटेको निकाला जा सकता है, अर्थात् पुण्य-कर्मके द्वारा पाप-कर्मके फलका नाश किया जा सकता है, किन्तु ऐसी धारणा गलत है। ऐसी धारणाके वशीभूत होकर जीव केवल अपनेसे ही छल करता है। हाथीको स्नान करा देनेपर जैसे वह फिरसे शरीरपर धूलि मल लेता है, उसी प्रकार कर्मके द्वारा कर्मकी वासना दूर नहीं होती। एकमात्र केवलाभक्तिके द्वारा ही जीवोंकी समस्त असुविधाएँ दूर होती हैं। तब उसके उस निर्मल हृदयरूपी सिंहासनपर ही श्रीभगवान् विश्राम- योग्य स्थान प्राप्त करते हैं। इसलिये भक्तकविने गान किया है,—“भक्तेर हृदये सदा गोविन्द विश्राम।” निर्विशेष और कैवल्ययोग अथवा ज्ञान-योगादिकी चेष्टाएँ-ठीक कङ्कड़के समान हैं। उसके द्वारा श्रीहरिकी सन्तुष्टि अथवा सेवा तो दूरकी बात है, अपितु यह श्रीहरिकी देहमें काँटा चुभानेका प्रयास है। यद्यपि निर्विशेष-ब्रह्मानुसन्धानमें पहले मुक्तिकी कामनाकी अवस्थामें श्रीहरिका नामादि गौणरूपमें स्वीकार किया जाता है, किन्तु मुक्त अथवा ब्रह्म-अभिमानके समय उनका स्वतन्त्र अस्तित्व स्वीकार नहीं किया जाता; इसलिये भगवान् वैसे दुर्भागे विमुक्त-अभिमानी जीवके हृदयमें आविर्भूत नहीं होते। इसलिये श्रीगौरसुन्दरने इन सब तिनकों, धूलि, छोटे-छोटे कङ्कड़ादि कूड़ेको भगवान्के मन्दिरकी चारदीवारीके भीतर भी नहीं रखा, परन्तु अपने वस्त्रमें भरकर उनको बाहर फेंक दिया-कहीं बादमें हवाके साथ उड़ते हुए ये सब जञ्जाल पुनः श्रीमन्दिरमें प्रवेश ना कर जाँय। बहुत बार कर्म-ज्ञानादिकी चेष्टाके दूर होनेपर भी हृदयमें सूक्ष्म-सूक्ष्म मल रह जाते हैं। उनकी 'कुटिनाटि', 'प्रतिष्ठाशा', 'जीवहिंसा', 'निषिद्धाचार', 'लाभ', 'पूजा' आदिके साथ तुलनाकी जा सकती है। 'कुटिनाटी'-शब्दका अर्थ कपटता है। 'प्रतिष्ठाशा'-शब्दसे-निर्जनभजनादि अथवा ढोंगके द्वारा 'अज्ञानी लोग मुझे एक बड़ा साधु अथवा महान्त कहेंगे'-ऐसी जड़्रीय-सम्मानादिकी आशा अथवा विषय- भोगसे स्वार्थको पूर्ण करनेके उद्देश्यसे कठोर हुए हृदयमें कृत्रिम विकारादि भावाभास-प्रदर्शनके द्वारा 'भक्त' अथवा 'अवतार'के रूपमें सजनेकी आशाको समझना चाहिये।
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