भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1327

[ 12/135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 'जीवहिंसा'-शब्दसे शुद्धभक्तिके प्रचारमें निराशा अथवा कृपणता करना, मायावादी, कर्मी और अन्याभिलाषीको आश्रय देना या उनके मनको रखनेवाली बात बोलना। 'लाभ-पूजा'-शब्दसे धर्मके नामपर हरिनाम, मन्त्र, विग्रह या भागवतके द्वारा जीविका अर्जित करनेके लिये सरल लोगोंको ठगकर धनादि अथवा सम्मानकी प्राप्तिको समझना चाहिये। 'निषिद्धाचार'-शब्दसे स्त्रीसङ्ग एवं कर्मी, ज्ञानी और अन्याभिलाषी आदि कृष्ण-अभक्तोंके सङ्गको समझना चाहिये। इस प्रकार एक बार बहुत दिनोंसे सञ्चित बड़े-बड़े कङ्कड़, तिनके, धूलिराशि आदिको झाड़कर फेंक देनेके बाद श्रीगौरसुन्दरने दो-दो बार मन्दिरको पूरी तरहसे साफ करके जलके द्वारा धो दिया। फिर भी कहीं कोई सूक्ष्म दाग-धब्बे आदि रह गये, तो महाप्रभु अपने पहने हुए सूखे वस्त्रके द्वारा उनको घिस-घिसकर श्रीमन्दिर और भगवान्‌के बैठने योग्यस्थान सिंहासनको साफ करने लगे। इस प्रकारसे धुलाई, सफाई और घिसने आदिके बाद श्रीमन्दिरमें धूलिकणोंका लेश, यहाँ तक कि एक छोटा सा दाग भी नहीं रहा। श्रीमन्दिर स्फटिक मणिकी भाँति निर्मल हो गया, केवल इतना ही नहीं, और सुशीतल भी हो गया। अर्थात् साधकका 'सूर्यतापसे तप्त मरुभूमिके समान' हृदय तापरहित अर्थात् विषयभोग- वासनासे उत्पन्न आध्यात्मिकादि तीनों तापोंकी अग्निकी ज्वालासे रहित हो गया। वास्तवमें उसके हृदयसे अन्याभिलाष और कर्म-ज्ञान-योगादि चेष्टारूपी भुक्ति- मुक्तिकी कामना दूर होकर आत्मवृत्ति शुद्धभक्ति प्रकटित होनेपर जीव इस प्रकार शान्त और सुशीतल हो जाता है। बहुत बार समस्त प्रकारकी कामनाओं और वासनाओंके दूर होनेपर भी हृदयके किसी-किसी अज्ञात कोनेमें एक छोटासा दाग रह जाता है, उसे अज्ञानी जीव समझ नहीं पाता; वह 'मुक्तिकी कामना' है। निर्विशेषवादियोंकी सायुज्य मुक्तिकी कामना तो दूरकी बात है—अन्यान्य चार प्रकारकी मुक्तियोंकी कामनारूप सूक्ष्म दागको भी श्रीमन्महाप्रभुने अपने वस्त्रके द्वारा घिसकर दूर किया। इस प्रकारसे श्रीगौरसुन्दर जीवोंके मङ्गलके लिये अपनेको जीव मानकर जगद्गुरुके रूपमें स्वयं शिक्षा देने लगे कि किस प्रकारसे साधक अपने हृदयको वृन्दावनरूपमें परिणत करके स्वराट् (स्वतन्त्र) श्रीकृष्णके स्वच्छन्द विहारका स्थल बनानेके लिये, श्रीकृष्णेन्द्रिय- प्रीतिवाञ्छाके लिये, अत्यधिक उत्साहपूर्वक उच्च स्वरसे श्रीकृष्णनाम करते-करते श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये अपने हृदयको साफ करेंगे। “यद्यप्यन्या भक्तिः कलौ कर्त्तव्या, तदा कीर्त्तनाख्या भक्ति-संयोगेनैव।” अर्थात् “यद्यपि भक्तिके अन्य अङ्गोंका पालन भी कलियुगमें कर्त्तव्य है, तथापि उन सबका पालन कीर्त्तनके संयोगसे करेंगे।” महाप्रभु प्रत्येक भक्तके निकट जाकर उसका हाथ पकड़कर मन्दिर-मार्जन-सेवाकी शिक्षा देने लगे। जिसका कार्य अच्छा हो रहा था, उसकी प्रशंसा की। और जिसका कार्य (श्रीकृष्णवाञ्छापूर्तिमयी श्रीराधाके भावयुक्त) महाप्रभुके मनकी इच्छानुसार नहीं हो रहा था, उसे भी मीठी डाँट देकर हाथ पकड़कर श्रीकृष्णसेवाकी प्रणालीकी शिक्षा दी। केवल इतना ही नहीं—श्रीचैतन्यशिक्षाके अनुगत होकर जिन्होंने भजनमें कौशल प्राप्त किया है, ऐसे अद्वयज्ञानमें भक्तियोगयुक्त शुद्धहृदयवाले भक्तोंको अन्य विमुख जीवोंके 'आचार्य'का कार्य करनेके लिये भी आदेश देकर उत्साहित किया। (117 संख्या)। पुनः, जो जितने अधिक परिमाणमें अभद्रराशि (मैल)को हृदयसे निकालकर सफाई करनेमें समर्थ होंगे, वे उतने अधिक महाप्रभुके प्रिय होंगे एवं जिनकी 482 ।