श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1328, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबारहवाँ अध्याय 12/135-144 ] अनर्थ-निवृत्ति सामान्य (बहुत कम) ही हुई है, उनके लिये दण्ड-स्वरूप श्रीहरि-गुरु-वैष्णव-सेवाको ही विधि कहकर निर्देश किया गया है॥135॥ नृसिंह मन्दिरकी सफाईके बाद सभीका विश्राम :- नृसिंहमन्दिर-भितर-बाहिर शोधिल। क्षणेक विश्राम करि' नृत्य आरम्भिल॥ 136 ॥ अनुवाद-उसके बाद महाप्रभुने श्रीनृसिंह मन्दिरको भी भीतर और बाहरसे स्वच्छ कर दिया। तब थोड़ासा विश्राम करनेके बाद नृत्य करना आरम्भ किया॥136॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'नृसिंह-मन्दिर'-गुण्डिचा मन्दिरके पासमें ही एक सुन्दर और पुराना नृसिंह मन्दिर है। वहाँ नृसिंह चतुर्दशीके दिन बहुत बड़ा महोत्सव होता है। श्रीमुरारिगुप्त-रचित श्रीचैतन्यचरित-ग्रन्थ में, श्रीनवद्वीपधाममें नृसिंह-मन्दिर अर्थात् श्रीनृसिंह-पल्लीका वर्णन है, जहाँपर भी उसी दिन एक बहुत बड़ा उत्सव होता है॥136॥ चारों ओर महासङ्कीर्त्तन और बीचमें महाप्रभुका नृत्य :- चारिदिके भक्तगण करेन कीर्त्तन। मध्ये नृत्य करेन प्रभु मत्तसिंह-सम॥ 137 ॥ अनुवाद-चारों ओर भक्तगण कीर्त्तन कर रहे थे और बीचमें महाप्रभु मत्त-सिंहकी भाँति नृत्य कर रहे थे॥ 137 ॥ महाप्रभुके अष्टसात्त्विक-विकार और अश्रुवर्षण :- स्वेद, कम्प, वैवर्ण, पुलक, हुँकार। निज-अङ्ग धुइ' आगे चले अश्रुधार॥ 138 ॥ चारिदिके भक्त-अङ्ग कैल प्रक्षालन। श्रावणेर मेघ येन करे वरिषण॥ 139 ॥ महा-उच्चसङ्कीर्त्तने आकाश भरिल। प्रभुर उद्दण्ड-नृत्ये भूमिकम्प हैल॥ 140 ॥ अनुवाद-नृत्य करते हुए महाप्रभुमें पसीना, कम्प, वर्ण-परिवर्तन, अश्रु, पुलक, हुँकारादि अष्ट-सात्त्विक विकार उदित होने लगे। उनके नेत्रोंसे ऐसी अश्रुओंकी धारा बहने लगी जो उनके अपने अङ्गोंके साथ-साथ सामनेवालोंको भी धो रही थी। उनकी अश्रुधारासे चारों ओर एकत्रित भक्तोंके शरीर ऐसे धुल गये मानो श्रावणके मेघ वर्षण कर रहे हों। भक्तोंके उच्च सङ्कीर्त्तनसे सम्पूर्ण आकाश भर गया और महाप्रभुके उद्दण्ड नृत्यसे मानो भूकम्प आ गया॥138-140॥ उच्च-स्वरसे स्वरूप दामोदरके कीर्त्तनसे महाप्रभुका आनन्दपूर्वक नृत्य :- स्वरूपेर उच्च-गान प्रभुरे सदा भाय। आनन्दे उद्दण्ड नृत्य करे गौरराय॥ 141 ॥ नृत्यके अन्तमें विश्राम :- एइमत कतक्षण नृत्य ये करिया। विश्राम करिला प्रभु समय जानिया॥ 142 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरका उच्चस्वरमें गान महाप्रभुको सदैव प्रिय लगता था, इसलिये उनके गानको सुनकर श्रीगौरराय आनन्दपूर्वक उद्दण्ड नृत्य कर रहे थे। इस प्रकार कुछ देर तक नृत्य करनेके बाद महाप्रभुने परिस्थिति देखकर नृत्य करना बन्द कर दिया॥ 141-142॥ श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र श्रीगोपालको नृत्य करनेका आदेश :- आचार्य-गोसाञिर पुत्र श्रीगोपाल-नाम। नृत्य करिते ताँरे आज्ञा दिल गौरधाम॥ 143 ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र जिनका नाम श्रीगोपाल है, उनको तब गौरधाम महाप्रभुने नृत्य करनेका आदेश दिया॥ 143॥ अनुभाष्य-'श्रीगोपाल'-आदिलीला 12/19-26 संख्या देखें॥143॥ नृत्य करनेसे श्रीगोपालकी मूर्च्छा :- प्रेमावेशे नृत्य करि' हइला मूर्च्छिते। अचेतन हञा तैंह पड़िला भूमिते॥ 144 ॥ । 483