श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 12/144-153 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला आचार्यकी चिन्ता :- आस्ते-व्यस्ते आचार्य ताँरे कैल कोले। श्वास-रहित देखि' आचार्य हैला विकले ॥ 145 ॥ श्रीअद्वैताचार्यकी नृसिंहमन्त्रके द्वारा पुत्रकी चेतना लौटानेकी चेष्टा :- नृसिंहरे मन्त्र पड़ि' मारे जल छाँटि। हुँकारेरे शब्दे ब्रह्माण्ड याय फाटि' ॥ 146 ॥ फिर भी श्रीगोपालमें चेतनता न आना, आचार्यादि भक्तोंका दुःख :- अनेक करिल, तबु ना हय चेतन। आचार्य कान्देन, कान्दे सब भक्तगण ॥ 147 ॥ अनुवाद—प्रेमावेशमें नृत्य करते हुए श्रीगोपाल मूर्च्छित हो गये और अचेतन होकर भूमिपर गिर पड़े। श्रीअद्वैताचार्यने तुरन्त ही श्रीगोपालको अपनी गोदमें ले लिया और उसकी सांसको बन्द देखकर वे व्याकुल हो गये। श्रीअद्वैताचार्य अपने पुत्रकी रक्षाके लिये भगवान् श्रीनृसिंहके मन्त्र पढ़ते हुए श्रीगोपालके मुँहपर जलके छींटे मारने लगे। उनकी मन्त्रोंकी हुँकारसे ब्रह्माण्ड भी फटा जा रहा था। उनके अनेक प्रयत्न करनेपर भी जब श्रीगोपालको चेतना नहीं आयी, तो वे रोने लगे और उन्हें देखकर सब भक्त भी रोने लगे॥ 144-147 ॥ महाप्रभुकी कृपासे चेतनाकी वापिसी और भक्तोंमें हर्ष :- तबे महाप्रभु ताँर बुके हस्त दिल। 'उठह गोपाल' बलि' उच्चैःस्वरे कहिल ॥ 148 ॥ शुनितेइ गोपालेर हइल चेतन। 'हरि' बलि' नृत्य करे सर्वभक्तगण ॥ 149 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीगोपालके वक्षःस्थलपर अपना हस्तकमल रखा और उच्च स्वरसे कहा—'गोपाल उठो।' महाप्रभुकी वाणीको सुनते ही श्रीगोपालकी चेतना लौट आयी। तब आनन्दसे सभी भक्त 'हरि' बोलकर नृत्य करने लगे॥ 148-149 ॥ श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके द्वारा यह लीला वर्णित :- एइ लीला वर्णियाछेन दास-वृन्दावन। अतएव संक्षेपे करि' करिलुँ वर्णन ॥ 150 ॥ अनुवाद—इस लीलाका वर्णन श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने किया है, इसलिये मैंने (ग्रन्थकारने) संक्षेपमें ही इसका वर्णन किया है॥ 150 ॥ अनुभाष्य—श्रीगोपालका यह वृत्तान्त श्रीचैतन्यभागवतमें दिखायी नहीं देता ॥ 150 ॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुका स्नान :- तबे महाप्रभु क्षणेक विश्राम करिया। स्नान करिवारे गेला भक्तगण लञा ॥ 151 ॥ स्नानके बाद नृसिंहदेवको प्रणाम करके उद्यानमें जाकर बैठना :- तीरे उठि' परेन प्रभु शुष्क वसन। नृसिंहदेवे नमस्कारि' गेला उपवन ॥ 152 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु कुछ समय विश्राम करके अपने भक्तोंके साथ (इन्द्रद्युम्न सरोवरमें) स्नान करने गये। स्नान करनेके बाद महाप्रभुने तटपर आकर सूखे वस्त्र पहने। तब श्रीनृसिंहदेव मन्दिरमें उनको प्रणाम करके उद्यानमें चले गये॥ 151-152 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'इन्द्रद्युम्न सरोवर'—गुण्डिचा मन्दिरके निकट है। इस सरोवरमें स्नान करके महाप्रभु श्रीनृसिंहदेवको प्रणाम करके उद्यानमें चले गये॥ 151-152 ॥ श्रीवाणीनाथके द्वारा प्रसाद लाना :- उद्याने बसिला प्रभु भक्तगण लञा। तबे वाणीनाथ आइला महाप्रसाद लञा ॥ 153 ॥ अनुवाद—महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ उद्यानमें बैठ गये और तब श्रीवाणीनाथ वहाँपर सभीके लिये महाप्रसाद लेकर आ गये॥ 153 ॥ 484 ।