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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 12/125-135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला स्वयं भगवान् हैं, इसलिये उनके ऊपर किसी अपराधादिका आरोप पूर्णतः असम्भव और वेद-विरुद्ध है। तथापि वे बाहरसे जगद्गुरु, लोकशिक्षक और आचार्यका कार्य कर रहे हैं, इसलिये उन्होंने अपने आपको भगवान्‌का एक विभिन्नांश जीवमात्र मानकर निर्बोध तथाकथित गुरुओंको सेवापराधसे सतर्क करनेके लिये शिक्षा दी॥ 125-127॥ श्रीस्वरूपके द्वारा उस 'गौड़ीय'को गुण्डिचासे बाहर निकालना :- तबे स्वरूपगोसाञि तार घाड़े हात दिया। ढेका मारि' पुरीर बाहिर राखिलेन लञा॥ 128॥ महाप्रभुके चरणोंमें क्षमा-भिक्षा :- पुनः आसि' प्रभु पाय करिल विनय। “अज्ञे अपराध क्षमा करिते युयाय॥” 129॥ अनुवाद—तब श्रीस्वरूप दामोदरने हाथसे उसकी गर्दनको पकड़कर उसे धक्का मारकर मन्दिरसे बाहर कर दिया और फिर महाप्रभुके चरणोंमें विनती की,— “वह अज्ञानी है, इसलिये उसके अपराधको क्षमा करना ही उचित है॥” 128-129॥ अनुभाष्य—'ढेका'—धक्का; 'पुरीर'—गुण्डिचा- पुरीके॥ 128॥ महाप्रभुका क्षमा करना; सभीको अपने दोनों ओर बैठाना :- तबे महाप्रभुर मने सन्तोष हइल। सारि करि' दुइ पाशे सबारे बसाइल॥ 130॥ बीचमें महाप्रभुका तिनके आदि एकत्रित करना :- आपने बसिया माझे, आपनार हाते। तृण, काँकर, कुटा लागिला कुड़ाइते॥ 131॥ कम इकट्ठा करनेवाले व्यक्तियोंसे प्रसाद-ग्रहणरूप दण्ड :- “के कत कुड़ाय, सब एकत्र करिब। यार अल्प, तार ठाञि पिठा-पाना लइब॥” 132॥ अनुवाद—तब महाप्रभु सन्तुष्ट हो गये। उन्होंने पंक्ति बनवाकर सभी भक्तोंको अपने दोनों ओर बैठा लिया और महाप्रभु स्वयं उनके बीचमें बैठ गये। फिर महाप्रभु अपने हाथोंसे तिनके, कङ्कड़ और कूड़ेको एकत्रित करने लगे और उन्होंने कहा,—“मैं सबको बुलाकर देखूँगा कि किसने कितना कूड़ा एकत्रित किया है। जिसका कम होगा, उससे मैं पिठा-पाना लूँगा॥” 130-132॥ गुण्डिचा मन्दिरको सम्पूर्णरूपसे निर्मल करना :- एइमत सब पुरी करिल शोधन। शीतल, निर्मल कैल—येन निज-मन॥ 133॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभुने अपने भक्तोंके साथ सम्पूर्ण गुण्डिचा मन्दिरकी सफाई की। मन्दिरको उन्होंने ऐसा शीतल और निर्मल बना दिया, जैसा उनका मन है॥ 133॥ नालीके द्वारसे जलका निकलना :- प्रणालिका छाड़ि' यदि पानि बाहाइल। नूतन-नदी येन समुद्रे मिलिल॥ 134॥ अनुवाद—नालीसे पानीको छोड़नेपर उसके तेज प्रवाहको देखकर ऐसा लग रहा था मानो कोई नयी नदी समुद्रमें मिलने जा रही है॥ 134॥ गुण्डिचा मन्दिरके विभिन्न मार्गोंकी सफाई :- एइमत पुरद्वार-आगे पथ यत। सकल शोधिल, ताहा के वर्णिबे कत॥ 135॥ अनुवाद—इस प्रकार उन्होंने मन्दिरके मुख्य द्वारके आगे सभी मार्गोंकी भी सफाई की। यह सब कुछ कैसे हुआ, कौन इसका वर्णन कर सकता है॥ 135॥ अनुभाष्य—'गुण्डिचा-मार्जनलीला-रहस्य'—जगद्गुरु महाप्रभु इस लीलाके द्वारा यह शिक्षा दे रहे हैं कि यदि कोई सौभाग्यवान् जीव श्रीकृष्णको अपने हृदय-सिंहासनपर बैठानेकी इच्छा करता है, तो सबसे पहले उसे अपने 480 ।

बारहवाँ अध्याय [12/135 ]

हृदयके मलको धोना उचित है; हृदयको निर्मल, शान्त और भक्तिसे उज्ज्वल करना आवश्यक है। हृदयक्षेत्रमें काँटेयुक्त तिनके अथवा जङ्गली-घास, धूलि और कङ्कड़ादि-रूप अनर्थ थोड़ेसे रहनेपर भी परमसेव्य भगवान्‌को वहाँ बैठाया नहीं जा सकता। हृदयका यह मल अथवा कूड़ा-अन्याभिलाष, कर्म, ज्ञान और योग-चेष्टादिके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। श्रीलरूप गोस्वामी प्रभुने कहा है, - “अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्। आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ॥" जहाँ भक्तिके अतिरिक्त अन्य अभिलाषा, ज्ञान-कर्म- योग-तपस्या आदि अथवा भक्तिप्रतिकूल-भावके द्वारा आत्माकी नित्य स्वाभाविक वृत्ति 'भक्ति' ढक गयी है, वहाँ शुद्धभक्ति नहीं है। शुद्धसत्त्वमयी शुद्धभक्तिके बिना श्रीकृष्णका आविर्भाव नहीं होता। 'अन्य अभिलाषा' अर्थात् 'जगत्में जब तक रहूँगा, केवल अपनी इन्द्रियोंके द्वारा भोग ही करूँगा'-ऐसी अन्य अभिलाषा,—यह काँटेयुक्त तिनकेकी भाँति शुद्ध- जीवकी सुकोमल हृदयवृत्ति केवला-भक्तिको (शुद्धभक्तिको) छलनी करती है। कर्मचेष्टा अर्थात् याग, यज्ञ, दान, तपस्यादिके द्वारा 'स्वर्गादि उच्च लोकोंमें सुख अथवा इस लोकमें सुख भोग करूँगा', इस प्रकार जो वासनामयी क्रिया है, वह धूलिके समान है। कर्मके बवण्डरसे उड़ती हुई वायुके द्वारा वासनारूपी धूलिराशि हमारे स्वच्छ और निर्मल हृदय-दर्पणको ढक देती है। सत् और असत् कर्मोंकी वासनारूपी असंख्य धूलि- राशिने हरिविमुख-जीवके हृदयको अनेक जन्म-जन्मान्तर तक मलिन किया है, इसलिये उसकी कर्मवासना दूर नहीं हो रही। हरिविमुख जीव सोचता है, कर्मके द्वारा कर्मरूप काँटेको निकाला जा सकता है, अर्थात् पुण्य-कर्मके द्वारा पाप-कर्मके फलका नाश किया जा सकता है, किन्तु ऐसी धारणा गलत है। ऐसी धारणाके वशीभूत होकर जीव केवल अपनेसे ही छल करता है। हाथीको स्नान करा देनेपर जैसे वह फिरसे शरीरपर धूलि मल लेता है, उसी प्रकार कर्मके द्वारा कर्मकी वासना दूर नहीं होती। एकमात्र केवलाभक्तिके द्वारा ही जीवोंकी समस्त असुविधाएँ दूर होती हैं। तब उसके उस निर्मल हृदयरूपी सिंहासनपर ही श्रीभगवान् विश्राम- योग्य स्थान प्राप्त करते हैं। इसलिये भक्तकविने गान किया है,—“भक्तेर हृदये सदा गोविन्द विश्राम।” निर्विशेष और कैवल्ययोग अथवा ज्ञान-योगादिकी चेष्टाएँ-ठीक कङ्कड़के समान हैं। उसके द्वारा श्रीहरिकी सन्तुष्टि अथवा सेवा तो दूरकी बात है, अपितु यह श्रीहरिकी देहमें काँटा चुभानेका प्रयास है। यद्यपि निर्विशेष-ब्रह्मानुसन्धानमें पहले मुक्तिकी कामनाकी अवस्थामें श्रीहरिका नामादि गौणरूपमें स्वीकार किया जाता है, किन्तु मुक्त अथवा ब्रह्म-अभिमानके समय उनका स्वतन्त्र अस्तित्व स्वीकार नहीं किया जाता; इसलिये भगवान् वैसे दुर्भागे विमुक्त-अभिमानी जीवके हृदयमें आविर्भूत नहीं होते। इसलिये श्रीगौरसुन्दरने इन सब तिनकों, धूलि, छोटे-छोटे कङ्कड़ादि कूड़ेको भगवान्के मन्दिरकी चारदीवारीके भीतर भी नहीं रखा, परन्तु अपने वस्त्रमें भरकर उनको बाहर फेंक दिया-कहीं बादमें हवाके साथ उड़ते हुए ये सब जञ्जाल पुनः श्रीमन्दिरमें प्रवेश ना कर जाँय। बहुत बार कर्म-ज्ञानादिकी चेष्टाके दूर होनेपर भी हृदयमें सूक्ष्म-सूक्ष्म मल रह जाते हैं। उनकी 'कुटिनाटि', 'प्रतिष्ठाशा', 'जीवहिंसा', 'निषिद्धाचार', 'लाभ', 'पूजा' आदिके साथ तुलनाकी जा सकती है। 'कुटिनाटी'-शब्दका अर्थ कपटता है। 'प्रतिष्ठाशा'-शब्दसे-निर्जनभजनादि अथवा ढोंगके द्वारा 'अज्ञानी लोग मुझे एक बड़ा साधु अथवा महान्त कहेंगे'-ऐसी जड़्रीय-सम्मानादिकी आशा अथवा विषय- भोगसे स्वार्थको पूर्ण करनेके उद्देश्यसे कठोर हुए हृदयमें कृत्रिम विकारादि भावाभास-प्रदर्शनके द्वारा 'भक्त' अथवा 'अवतार'के रूपमें सजनेकी आशाको समझना चाहिये।

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[ 12/135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 'जीवहिंसा'-शब्दसे शुद्धभक्तिके प्रचारमें निराशा अथवा कृपणता करना, मायावादी, कर्मी और अन्याभिलाषीको आश्रय देना या उनके मनको रखनेवाली बात बोलना। 'लाभ-पूजा'-शब्दसे धर्मके नामपर हरिनाम, मन्त्र, विग्रह या भागवतके द्वारा जीविका अर्जित करनेके लिये सरल लोगोंको ठगकर धनादि अथवा सम्मानकी प्राप्तिको समझना चाहिये। 'निषिद्धाचार'-शब्दसे स्त्रीसङ्ग एवं कर्मी, ज्ञानी और अन्याभिलाषी आदि कृष्ण-अभक्तोंके सङ्गको समझना चाहिये। इस प्रकार एक बार बहुत दिनोंसे सञ्चित बड़े-बड़े कङ्कड़, तिनके, धूलिराशि आदिको झाड़कर फेंक देनेके बाद श्रीगौरसुन्दरने दो-दो बार मन्दिरको पूरी तरहसे साफ करके जलके द्वारा धो दिया। फिर भी कहीं कोई सूक्ष्म दाग-धब्बे आदि रह गये, तो महाप्रभु अपने पहने हुए सूखे वस्त्रके द्वारा उनको घिस-घिसकर श्रीमन्दिर और भगवान्‌के बैठने योग्यस्थान सिंहासनको साफ करने लगे। इस प्रकारसे धुलाई, सफाई और घिसने आदिके बाद श्रीमन्दिरमें धूलिकणोंका लेश, यहाँ तक कि एक छोटा सा दाग भी नहीं रहा। श्रीमन्दिर स्फटिक मणिकी भाँति निर्मल हो गया, केवल इतना ही नहीं, और सुशीतल भी हो गया। अर्थात् साधकका 'सूर्यतापसे तप्त मरुभूमिके समान' हृदय तापरहित अर्थात् विषयभोग- वासनासे उत्पन्न आध्यात्मिकादि तीनों तापोंकी अग्निकी ज्वालासे रहित हो गया। वास्तवमें उसके हृदयसे अन्याभिलाष और कर्म-ज्ञान-योगादि चेष्टारूपी भुक्ति- मुक्तिकी कामना दूर होकर आत्मवृत्ति शुद्धभक्ति प्रकटित होनेपर जीव इस प्रकार शान्त और सुशीतल हो जाता है। बहुत बार समस्त प्रकारकी कामनाओं और वासनाओंके दूर होनेपर भी हृदयके किसी-किसी अज्ञात कोनेमें एक छोटासा दाग रह जाता है, उसे अज्ञानी जीव समझ नहीं पाता; वह 'मुक्तिकी कामना' है। निर्विशेषवादियोंकी सायुज्य मुक्तिकी कामना तो दूरकी बात है—अन्यान्य चार प्रकारकी मुक्तियोंकी कामनारूप सूक्ष्म दागको भी श्रीमन्महाप्रभुने अपने वस्त्रके द्वारा घिसकर दूर किया। इस प्रकारसे श्रीगौरसुन्दर जीवोंके मङ्गलके लिये अपनेको जीव मानकर जगद्गुरुके रूपमें स्वयं शिक्षा देने लगे कि किस प्रकारसे साधक अपने हृदयको वृन्दावनरूपमें परिणत करके स्वराट् (स्वतन्त्र) श्रीकृष्णके स्वच्छन्द विहारका स्थल बनानेके लिये, श्रीकृष्णेन्द्रिय- प्रीतिवाञ्छाके लिये, अत्यधिक उत्साहपूर्वक उच्च स्वरसे श्रीकृष्णनाम करते-करते श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये अपने हृदयको साफ करेंगे। “यद्यप्यन्या भक्तिः कलौ कर्त्तव्या, तदा कीर्त्तनाख्या भक्ति-संयोगेनैव।” अर्थात् “यद्यपि भक्तिके अन्य अङ्गोंका पालन भी कलियुगमें कर्त्तव्य है, तथापि उन सबका पालन कीर्त्तनके संयोगसे करेंगे।” महाप्रभु प्रत्येक भक्तके निकट जाकर उसका हाथ पकड़कर मन्दिर-मार्जन-सेवाकी शिक्षा देने लगे। जिसका कार्य अच्छा हो रहा था, उसकी प्रशंसा की। और जिसका कार्य (श्रीकृष्णवाञ्छापूर्तिमयी श्रीराधाके भावयुक्त) महाप्रभुके मनकी इच्छानुसार नहीं हो रहा था, उसे भी मीठी डाँट देकर हाथ पकड़कर श्रीकृष्णसेवाकी प्रणालीकी शिक्षा दी। केवल इतना ही नहीं—श्रीचैतन्यशिक्षाके अनुगत होकर जिन्होंने भजनमें कौशल प्राप्त किया है, ऐसे अद्वयज्ञानमें भक्तियोगयुक्त शुद्धहृदयवाले भक्तोंको अन्य विमुख जीवोंके 'आचार्य'का कार्य करनेके लिये भी आदेश देकर उत्साहित किया। (117 संख्या)। पुनः, जो जितने अधिक परिमाणमें अभद्रराशि (मैल)को हृदयसे निकालकर सफाई करनेमें समर्थ होंगे, वे उतने अधिक महाप्रभुके प्रिय होंगे एवं जिनकी 482 ।

बारहवाँ अध्याय 12/135-144 ] अनर्थ-निवृत्ति सामान्य (बहुत कम) ही हुई है, उनके लिये दण्ड-स्वरूप श्रीहरि-गुरु-वैष्णव-सेवाको ही विधि कहकर निर्देश किया गया है॥135॥ नृसिंह मन्दिरकी सफाईके बाद सभीका विश्राम :- नृसिंहमन्दिर-भितर-बाहिर शोधिल। क्षणेक विश्राम करि' नृत्य आरम्भिल॥ 136 ॥ अनुवाद-उसके बाद महाप्रभुने श्रीनृसिंह मन्दिरको भी भीतर और बाहरसे स्वच्छ कर दिया। तब थोड़ासा विश्राम करनेके बाद नृत्य करना आरम्भ किया॥136॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'नृसिंह-मन्दिर'-गुण्डिचा मन्दिरके पासमें ही एक सुन्दर और पुराना नृसिंह मन्दिर है। वहाँ नृसिंह चतुर्दशीके दिन बहुत बड़ा महोत्सव होता है। श्रीमुरारिगुप्त-रचित श्रीचैतन्यचरित-ग्रन्थ में, श्रीनवद्वीपधाममें नृसिंह-मन्दिर अर्थात् श्रीनृसिंह-पल्लीका वर्णन है, जहाँपर भी उसी दिन एक बहुत बड़ा उत्सव होता है॥136॥ चारों ओर महासङ्कीर्त्तन और बीचमें महाप्रभुका नृत्य :- चारिदिके भक्तगण करेन कीर्त्तन। मध्ये नृत्य करेन प्रभु मत्तसिंह-सम॥ 137 ॥ अनुवाद-चारों ओर भक्तगण कीर्त्तन कर रहे थे और बीचमें महाप्रभु मत्त-सिंहकी भाँति नृत्य कर रहे थे॥ 137 ॥ महाप्रभुके अष्टसात्त्विक-विकार और अश्रुवर्षण :- स्वेद, कम्प, वैवर्ण, पुलक, हुँकार। निज-अङ्ग धुइ' आगे चले अश्रुधार॥ 138 ॥ चारिदिके भक्त-अङ्ग कैल प्रक्षालन। श्रावणेर मेघ येन करे वरिषण॥ 139 ॥ महा-उच्चसङ्कीर्त्तने आकाश भरिल। प्रभुर उद्दण्ड-नृत्ये भूमिकम्प हैल॥ 140 ॥ अनुवाद-नृत्य करते हुए महाप्रभुमें पसीना, कम्प, वर्ण-परिवर्तन, अश्रु, पुलक, हुँकारादि अष्ट-सात्त्विक विकार उदित होने लगे। उनके नेत्रोंसे ऐसी अश्रुओंकी धारा बहने लगी जो उनके अपने अङ्गोंके साथ-साथ सामनेवालोंको भी धो रही थी। उनकी अश्रुधारासे चारों ओर एकत्रित भक्तोंके शरीर ऐसे धुल गये मानो श्रावणके मेघ वर्षण कर रहे हों। भक्तोंके उच्च सङ्कीर्त्तनसे सम्पूर्ण आकाश भर गया और महाप्रभुके उद्दण्ड नृत्यसे मानो भूकम्प आ गया॥138-140॥ उच्च-स्वरसे स्वरूप दामोदरके कीर्त्तनसे महाप्रभुका आनन्दपूर्वक नृत्य :- स्वरूपेर उच्च-गान प्रभुरे सदा भाय। आनन्दे उद्दण्ड नृत्य करे गौरराय॥ 141 ॥ नृत्यके अन्तमें विश्राम :- एइमत कतक्षण नृत्य ये करिया। विश्राम करिला प्रभु समय जानिया॥ 142 ॥ अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरका उच्चस्वरमें गान महाप्रभुको सदैव प्रिय लगता था, इसलिये उनके गानको सुनकर श्रीगौरराय आनन्दपूर्वक उद्दण्ड नृत्य कर रहे थे। इस प्रकार कुछ देर तक नृत्य करनेके बाद महाप्रभुने परिस्थिति देखकर नृत्य करना बन्द कर दिया॥ 141-142॥ श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र श्रीगोपालको नृत्य करनेका आदेश :- आचार्य-गोसाञिर पुत्र श्रीगोपाल-नाम। नृत्य करिते ताँरे आज्ञा दिल गौरधाम॥ 143 ॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्यके पुत्र जिनका नाम श्रीगोपाल है, उनको तब गौरधाम महाप्रभुने नृत्य करनेका आदेश दिया॥ 143॥ अनुभाष्य-'श्रीगोपाल'-आदिलीला 12/19-26 संख्या देखें॥143॥ नृत्य करनेसे श्रीगोपालकी मूर्च्छा :- प्रेमावेशे नृत्य करि' हइला मूर्च्छिते। अचेतन हञा तैंह पड़िला भूमिते॥ 144 ॥ । 483

[ 12/144-153 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला आचार्यकी चिन्ता :- आस्ते-व्यस्ते आचार्य ताँरे कैल कोले। श्वास-रहित देखि' आचार्य हैला विकले ॥ 145 ॥ श्रीअद्वैताचार्यकी नृसिंहमन्त्रके द्वारा पुत्रकी चेतना लौटानेकी चेष्टा :- नृसिंहरे मन्त्र पड़ि' मारे जल छाँटि। हुँकारेरे शब्दे ब्रह्माण्ड याय फाटि' ॥ 146 ॥ फिर भी श्रीगोपालमें चेतनता न आना, आचार्यादि भक्तोंका दुःख :- अनेक करिल, तबु ना हय चेतन। आचार्य कान्देन, कान्दे सब भक्तगण ॥ 147 ॥ अनुवाद—प्रेमावेशमें नृत्य करते हुए श्रीगोपाल मूर्च्छित हो गये और अचेतन होकर भूमिपर गिर पड़े। श्रीअद्वैताचार्यने तुरन्त ही श्रीगोपालको अपनी गोदमें ले लिया और उसकी सांसको बन्द देखकर वे व्याकुल हो गये। श्रीअद्वैताचार्य अपने पुत्रकी रक्षाके लिये भगवान् श्रीनृसिंहके मन्त्र पढ़ते हुए श्रीगोपालके मुँहपर जलके छींटे मारने लगे। उनकी मन्त्रोंकी हुँकारसे ब्रह्माण्ड भी फटा जा रहा था। उनके अनेक प्रयत्न करनेपर भी जब श्रीगोपालको चेतना नहीं आयी, तो वे रोने लगे और उन्हें देखकर सब भक्त भी रोने लगे॥ 144-147 ॥ महाप्रभुकी कृपासे चेतनाकी वापिसी और भक्तोंमें हर्ष :- तबे महाप्रभु ताँर बुके हस्त दिल। 'उठह गोपाल' बलि' उच्चैःस्वरे कहिल ॥ 148 ॥ शुनितेइ गोपालेर हइल चेतन। 'हरि' बलि' नृत्य करे सर्वभक्तगण ॥ 149 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने श्रीगोपालके वक्षःस्थलपर अपना हस्तकमल रखा और उच्च स्वरसे कहा—'गोपाल उठो।' महाप्रभुकी वाणीको सुनते ही श्रीगोपालकी चेतना लौट आयी। तब आनन्दसे सभी भक्त 'हरि' बोलकर नृत्य करने लगे॥ 148-149 ॥ श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके द्वारा यह लीला वर्णित :- एइ लीला वर्णियाछेन दास-वृन्दावन। अतएव संक्षेपे करि' करिलुँ वर्णन ॥ 150 ॥ अनुवाद—इस लीलाका वर्णन श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने किया है, इसलिये मैंने (ग्रन्थकारने) संक्षेपमें ही इसका वर्णन किया है॥ 150 ॥ अनुभाष्य—श्रीगोपालका यह वृत्तान्त श्रीचैतन्यभागवतमें दिखायी नहीं देता ॥ 150 ॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुका स्नान :- तबे महाप्रभु क्षणेक विश्राम करिया। स्नान करिवारे गेला भक्तगण लञा ॥ 151 ॥ स्नानके बाद नृसिंहदेवको प्रणाम करके उद्यानमें जाकर बैठना :- तीरे उठि' परेन प्रभु शुष्क वसन। नृसिंहदेवे नमस्कारि' गेला उपवन ॥ 152 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु कुछ समय विश्राम करके अपने भक्तोंके साथ (इन्द्रद्युम्न सरोवरमें) स्नान करने गये। स्नान करनेके बाद महाप्रभुने तटपर आकर सूखे वस्त्र पहने। तब श्रीनृसिंहदेव मन्दिरमें उनको प्रणाम करके उद्यानमें चले गये॥ 151-152 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'इन्द्रद्युम्न सरोवर'—गुण्डिचा मन्दिरके निकट है। इस सरोवरमें स्नान करके महाप्रभु श्रीनृसिंहदेवको प्रणाम करके उद्यानमें चले गये॥ 151-152 ॥ श्रीवाणीनाथके द्वारा प्रसाद लाना :- उद्याने बसिला प्रभु भक्तगण लञा। तबे वाणीनाथ आइला महाप्रसाद लञा ॥ 153 ॥ अनुवाद—महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ उद्यानमें बैठ गये और तब श्रीवाणीनाथ वहाँपर सभीके लिये महाप्रसाद लेकर आ गये॥ 153 ॥ 484 ।

बारहवाँ अध्याय 12/154-164 ] श्रीकाशीमिश्र और तुलसी-पड़िछाके द्वारा पाँच सौ लोगोंके लिये पर्याप्त प्रसाद भेजना :- काशीमिश्र, तुलसी-पड़िछा—दुइजन। पञ्चशत लोक यत करये भोजन ॥ 154 ॥ तत अन्न-पिठा-पाना, सब पाठाइल। देखि' महाप्रभुर मने सन्तोष हइल ॥ 155 ॥ अनुवाद—श्रीकाशीमिश्र और तुलसी नामक पड़िछा—इन दोनोंने पाँच सौ भक्त जितना खा सकते हैं, उतना अन्न, पिठा-पाना आदि महाप्रसाद भिजवाया। इसे देखकर महाप्रभु मनमें बहुत सन्तुष्ट हुए॥ 154-155 ॥ निजगण सहित महाप्रभुका प्रसाद-सम्मानार्थ बैठना :- पुरी-गोसाञि, महाप्रभु, भारती ब्रह्मानन्द। अद्वैत-आचार्य, आर प्रभु-नित्यानन्द ॥ 156 ॥ आचार्यरत्न, आचार्यनिधि, श्रीवास, गदाधर। शङ्कर, नन्दनाचार्य, आर राघव, वक्रेश्वर ॥ 157 ॥ प्रभु-आज्ञा पाञा बैसे आपने सार्वभौम। पिण्डार उपरे प्रभु बैसे लञा भक्तगण ॥ 158 ॥ तार तले, तार तले करि' अनुक्रम। उद्यान भरि' बैसे भक्त करिते भोजन ॥ 159 ॥ अनुवाद—श्रीपरमानन्द पुरी, महाप्रभु, श्रीब्रह्मानन्द भारती, श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीआचार्यरत्न (श्रीचन्द्रशेखर), श्रीआचार्यनिधि (श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि), श्रीवास पण्डित, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीशङ्कर पण्डित, श्रीनन्दनाचार्य, श्रीराघव पण्डित, श्रीवक्रेश्वर पण्डित आदि सब प्रसाद पानेके लिये बैठ गये। महाप्रभुकी आज्ञा होनेपर श्रीसार्वभौम भी बैठ गये। महाप्रभु और सब भक्त लकड़ीकी चौकियोंपर क्रमानुसार बैठे और समस्त भक्तोंसे उद्यान भर गया॥ 156-159 ॥ अनुभाष्य—'पिण्डा'—उड़िया भाषामें लकड़ीके आसनको कहते हैं, बङ्गाली भाषामें इसे 'पीड़ि' कहते हैं॥ 158 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीहरिदास ठाकुरका आह्वान :- 'हरिदास' बलि' प्रभु डाके घने घन। दूरे रहि' हरिदास करे निवेदन ॥ 160 ॥ श्रीहरिदासका स्वाभाविक दैन्य और शुद्धभक्तके प्रति मर्यादा-बुद्धि :- “भक्त-सङ्गे प्रभु करुन प्रसाद अङ्गीकार। ए-सङ्गे बसिते योग्य नहि मुञि छार ॥ 161 ॥ सबसे अन्तमें प्रसाद ग्रहण करनेकी इच्छा; महाप्रभुके द्वारा सम्मति :- पाछे मोरे प्रसाद गोविन्द दिबे बहिद्वारे।” मन जानि' प्रभु पुनः ना बलिल ताँरे ॥ 162 ॥ अनुवाद—महाप्रभु बार-बार 'हरिदास' 'हरिदास' नाम लेकर उन्हें पुकारने लगे, परन्तु श्रीहरिदास ठाकुरने दूरसे ही निवेदन किया,—“आप अपने भक्तोंके साथ प्रसाद ग्रहण कीजिये। मैं अधम आप सबके साथ बैठनेके योग्य नहीं हूँ। बादमें श्रीगोविन्द उद्यानके द्वारके बाहर आकर मुझे महाप्रसाद दे देंगे।” उनके मनकी भावनाको समझकर महाप्रभुने उन्हें फिर नहीं पुकारा ॥ 160-162 ॥ श्रीस्वरूपादि सात भक्तोंके द्वारा परिवेशन :- स्वरूप-गोसाञि, जगदानन्द, दामोदर। काशीश्वर, गोपीनाथ, वाणीनाथ, शङ्कर ॥ 163 ॥ प्रसाद-सेवनके समय हरिध्वनि :- परिवेशन करे ताँहा एइ सातजन। मध्ये मध्ये हरिध्वनि करे भक्तगण ॥ 164 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीजगदानन्द, श्रीदामोदर पण्डित, श्रीकाशीश्वर, श्रीगोपीनाथ, श्रीवाणीनाथ और श्रीशङ्कर—इन सात भक्तोंने वहाँ प्रसादका परिवेशन किया। प्रसाद पाते हुए बीच-बीचमें भक्तलोग हरिध्वनि करने लगे ॥ 163-164 ॥ अनुभाष्य—'हरिध्वनि'—मध्यलीला 11/209 संख्या देखें ॥ 164 ॥ । 485

[ 12/165-174 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला द्वापरमें श्रीकृष्णकी पुलिन-भोजन-लीलाका उद्दीपन :- पुलिन-भोजन कृष्ण पूर्वे यैछे कैल। सेइ लीला महाप्रभुर मने स्मृति हैल ॥ 165 ॥ अनुवाद-द्वापरमें श्रीकृष्ण जैसे अपने सखाओंके साथ यमुना पुलिन-स्थित (तट-स्थित) वनमें भोजन करते थे, महाप्रभुके मनमें आज उसका स्मरण हो आया ॥ 165 ॥ महाप्रभुका धैर्य और भावोंका संवरण :- यद्यपि प्रेमावेशे प्रभु हैला अस्थिर। समय बुझिया प्रभु हैला किछु धीर ॥ 166 ॥ अनुवाद-यद्यपि श्रीकृष्णकी लीलाको स्मरण करते ही महाप्रभु प्रेमावेशमें अधीर हो गये, तथापि समय और परिस्थितिको देखकर उन्होंने कुछ धैर्य धारण किया ॥ 166 ॥ महाप्रभुकी वैराग्यलीला :- प्रभु कहे,-“मोरे देह' लाफ्रा-व्यञ्जने। पिठा-पाना, अमृत-गुटिका देह' भक्तगणे॥” 167 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "मुझे तो केवल लाफ्रा- व्यञ्जन दो और सब भक्तोंको पिठा-पाना, अमृत-गुटिका आदि दो॥" 167 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'लाफ्रा-व्यञ्जन' - सामान्य सूखी सब्जीके जैसा एक प्रकारका विशेष व्यञ्जन; उसे चावलमें मिलाकर दुःखी (गरीब) लोगोंको बाँटा जाता है। 'अमृतगुटिका' - दूधमें पकाई गयी मोटी 'पूड़ी', जिसको सभी 'अमृत-रसावली' कहते हैं ॥ 167 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला, 6/43-44 संख्या देखें ॥ 167 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा प्रत्येक भक्तको उसके मनके अनुसार प्रसाद-दान :- सर्वज्ञ प्रभु जानेन, याँरे येइ भाय। ताँरे ताँरे सेइ देओयाय स्वरूप-द्वाराय ॥ 168 ॥ अनुवाद-सर्वज्ञ महाप्रभु जानते थे कि किसे क्या अच्छा लगता है, इसलिये उन्होंने श्रीस्वरूप दामोदरके द्वारा सबको उनकी रुचिके अनुसार परिवेशन करवाया ॥ 168 ॥ श्रीजगदानन्दका महाप्रभुके प्रति प्रीतिका प्रदर्शन :- जगदानन्द बेड़ाय परिवेशन करिते। प्रभुर पाते भाल-द्रव्य देन आचम्बिते ॥ 169 ॥ महाप्रभुके न चाहनेपर भी उनका उत्तम भोग देनेपर सन्तोष :- यद्यपि दिले प्रभु ताँरे करेन रोष। बले-छले तबु देन, दिले से सन्तोष ॥ 170 ॥ श्रीजगदानन्दके मानके भयसे महाप्रभुके द्वारा थोड़ा-थोड़ा ग्रहण :- पुनरपि सेइ द्रव्य करे निरीक्षण। ताँर भये प्रभु किछु करेन भक्षण ॥ 171 ॥ ना खाइले जगदानन्द करिबे उपवास। ताँर आगे किछु खा'न-मने ऐ त्रास ॥ 172 ॥ अनुवाद-जब श्रीजगदानन्द परिवेशन करते हुए महाप्रभुके पास आये, तो उन्होंने अचानक अच्छे-अच्छे व्यञ्जन उनके पत्तलमें डाल दिये। उनके ऐसा करनेपर महाप्रभुने उनके प्रति क्रोध दिखलाया। परन्तु श्रीजगदानन्द कभी छलसे और कभी बलसे ऐसे परिवेशन करने लगे, तब महाप्रभुके मनमें सन्तोष ही हुआ। महाप्रभुने पुनः पत्तलमें पड़े हुए उन व्यञ्जनोंको देखा और श्रीजगदानन्दके भयसे उसमेंसे कुछ खा लिया। महाप्रभुके मनमें यह भय था कि उनके नहीं खानेसे श्रीजगदानन्द उपवास करेंगे, इसलिये उनके सामने उन व्यञ्जनोंमेंसे कुछ खा लेते ॥ 169-172 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुको मिठाई प्रसादका परिवेशन :- स्वरूप-गोसाञि भाल मिष्टप्रसाद लञा। प्रभुके निवेदन करे आगे दाण्डाञा ॥ 173 ॥ "एइ महाप्रसाद अल्प करह आस्वादन। देख, जगन्नाथ कैछे करयाछेन भोजन ॥" 174 ॥ 486 ।

बारहवाँ अध्याय 12/173-184 ] अनुवाद—तब श्रीस्वरूप दामोदरने उत्तम मिठाई प्रसाद लेकर महाप्रभुके सामने खड़े होकर निवेदन किया,—"इस थोड़ेसे महाप्रसादका आस्वादन कीजिये, देखो ! भगवान् श्रीजगन्नाथने कैसा भोजन किया है॥" 173-174 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीस्वरूपकी इच्छा पूर्ण :- एत बलि' आगे किछु करे समर्पण। ताँर स्नेहे प्रभु किछु करेन भोजन ॥ 175 ॥ अनुवाद—इतना कहकर श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुके पत्तलमें कुछ मीठा प्रसाद दे दिया और उनके स्नेहके कारण महाप्रभुने उसमेंसे कुछ ग्रहण कर लिया ॥ 175 ॥ श्रीस्वरूप और श्रीजगदानन्दके विचित्र-प्रेमवश महाप्रभु :- एइमत दुइजने करे बारबार। विचित्र एइ दुइ भक्तेर स्नेह-व्यवहार ॥ 176 ॥ दोनोंकी महाप्रभु-प्रीतिको देखकर श्रीसार्वभौमका हास्य :- सार्वभौमे प्रभु बसाइयाछेन वाम-पाशे। दुइ भक्तेर स्नेह देखि' सार्वभौम हासे ॥ 177 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीजगदानन्द पण्डित, दोनों ही बार-बार आकर महाप्रभुको कुछ-न-कुछ परोस देते। महाप्रभुके प्रति इन दोनों भक्तोंका अद्भुत स्नेहपूर्ण व्यवहार है। महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको अपने बायीं ओर बैठाया था और इन दोनों भक्तोंके स्नेहको देखकर श्रीसार्वभौम मुस्कराने लगे ॥ 176-177 ॥ श्रीसार्वभौमके प्रति महाप्रभुका स्नेह :- सार्वभौमे देयान प्रभु प्रसाद उत्तम। स्नेह करि' बारबार करान भोजन ॥ 178 ॥ महाप्रभुकी आज्ञासे श्रीगोपीनाथके द्वारा श्रीभट्टाचार्यको उत्तम प्रसाद-दान :- गोपीनाथाचार्य उत्तम महाप्रसाद आनि'। सार्वभौमे देन प्रसाद प्रभु-आज्ञा मानि' ॥ 179 ॥ श्रीसार्वभौमके पूर्व और वर्तमान आचरणकी तुलना :- "काँहा भट्टाचार्येर पूर्व जड़-व्यवहार। काँहा एइ परमानन्द,—करह विचार ॥" 180 ॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीसार्वभौमको भी उत्तम प्रसाद खिलाना चाह रहे थे, इसलिये वे स्नेहके कारण परिवेशण करनेवालोंके द्वारा उनके पत्तलमें उत्तम व्यञ्जन बार-बार डलवा रहे थे। श्रीगोपीनाथाचार्यने भी उत्तम महाप्रसाद लाकर श्रीसार्वभौमको परिवेशण किया और कहा,—"थोड़ा विचार कीजिये कि कहाँ तो भट्टाचार्यका पहलेवाला जड़ व्यवहार ! और कहाँ अब ये परमानन्द ॥" 178-180 ॥ अनुभाष्य—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य पहले स्मार्त्त विचारवाले थे और प्राकृत जगत्की सब वस्तुएँ जड़ हैं, ऐसा उनका दृढ़ विश्वास था। इसलिये उनको प्रसादमें, श्रीगोविन्द-नाममें और वैष्णवोंमें अप्राकृत-श्रद्धा नहीं थी, अर्थात् इन्हें वे अप्राकृत नहीं मानते थे। अब महाप्रभुकी कृपासे इन सबमें अप्राकृत-दर्शनमें विश्वास प्राप्त करके उन्होंने प्रसाद आदि ग्रहण करनेमें परमानन्द प्राप्त किया—यही विचारका विषय है॥ 180 ॥ श्रीभट्टाचार्यका दैन्य और श्रीगोपीनाथके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन :- सार्वभौम कहे,—"आमि तार्किक कुबुद्धि। तोमार प्रसादे मोर ए सम्पत्-सिद्धि ॥ 181 ॥ महाप्रभुकी अहैतुकी कृपा-महिमाका वर्णन :- महाप्रभु बिना केह नाहि दयामय। काकेरे गरुड़ करे,—ऐछे कौन हय ॥ 182 ॥ अपनी पूर्व और वर्तमान अवस्थापर विचार :- तार्किक-शृगाल-सङ्गे भेउ-भेउ करि। सेइ मुखे एबे सदा कहि 'कृष्ण' 'हरि' ॥ 183 ॥ काँहा बहिर्मुख तार्किक-शिष्यगण-सङ्गे। काँहा एइ सङ्गसुधा-समुद्र-तरङ्गे ॥" 184 ॥ । 487

[ 12/181-190 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने कहा,—“मैं तो तार्किक कुबुद्धिवाला था, किन्तु आपकी कृपासे मुझे यह सम्पत्ति प्राप्त हुई है। महाप्रभुके बिना और कोई भी ऐसा दयालु नहीं है, जो कौवेको भी गरुड़के समान बना सके। जिस मुखसे मैं पहले तार्किक-सियारोंके साथ भेउ-भेउ करता था, अब उसी मुखसे सदा 'कृष्ण' 'हरि' बोलता हूँ। मैं कहाँ तो पहले बहिर्मुख तार्कि क-शिष्योंके सङ्गमें रहता था और कहाँ अब ऐसे सङ्गरूपी अमृत-सिन्धुकी तरङ्गोंमें डूबा रहता हूँ॥ 181-184॥ अनुभाष्य—‘बहिर्मुख’—जो बाहरी रूप-रसादिमें अपनेको भोक्तारूपमें अभिमान करते हुए अपने इन्द्रिय-भोगमें व्यस्त है और श्रीकृष्णसेवा-विमुख है, वही 'बहिर्मुख' है। (भाः 7/5/31)— “मतिर्न कृष्णे परतः स्वतो वा मिथोऽभिपद्येत गृहव्रतानाम्। अदान्त गोभिर्विशतां तमिस्रं पुनः पुनश्चर्वितचर्वणानाम् ॥ न ते विदुः स्वार्थगतिं हि विष्णुं दुराशया ये बहिरर्थमानिनः । अन्धा यथान्धैरुपनीयमानास्तेऽपीशतन्त्र्यामुरुदाम्नि बद्धाः ॥” अर्थात् “श्रीप्रह्लादने कहा,—'हे पिताजी ! जो गृहव्रतधारी परस्पर आसक्तिसे आबद्ध हैं, उनकी कभी भी अपने प्रयाससे अथवा गुरुके कहनेसे श्रीकृष्णमें मति नहीं होती। वे अजितेन्द्रिय हैं, इसलिये वे पुनः पुनः इस क्लेशमय संसारमें प्रवेश करके चबाये गये विषयोंको ही फिरसे चबाते हैं। जो बाह्य जड़ विषयोंका ही आदर करते हैं, वे सब दूषित अन्तःकरणवाले व्यक्ति समस्त स्वार्थकी एकमात्र गति जो श्रीविष्णु हैं, उनको नहीं जान सकते हैं। एक अन्धा जैसे दूसरे अन्धे व्यक्तिको पकड़कर ले जाता है, उसी प्रकार वे भी (अन्ध-परम्परामें) वेदरूपी लम्बी रस्सीसे काम्यकर्मोंकी रस्सियोंसे बँधे हैं।” जड़ विषयोंके भोक्ताके अभिमानके कारण श्रीकृष्णसेवाके स्वरूपकी उपलब्धि नहीं होती। अप्राकृत राज्यके बाहरी भागमें यह देवीधाम अवस्थित है, इस राज्यकी सभी वस्तुएँ ही प्राकृत है। स्वरूप-भ्रमके कारण ये वस्तुएँ ही बद्धजीवको अपनी सेव्य वस्तुके रूपमें प्रतीत होती हैं॥ 184॥ श्रीसार्वभौमकी मानद महाप्रभुके द्वारा प्रशंसा :- प्रभु कहे,—“पूर्वे सिद्ध कृष्णे तोमार प्रीति। तोमा-सङ्गे आमा-सबार हैल कृष्णे मति ॥” 185॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“आपकी तो पिछले जन्मसे ही श्रीकृष्णमें प्रीति है। आपका श्रीकृष्णसे इतना प्रेम है कि अब आपके सङ्गसे हम सबकी भी श्रीकृष्णमें मति लग गयी है॥” 185॥ भक्तगुण-कीर्तन करनेमें भगवान् श्रीचैतन्य—अद्वितीय :- भक्त-महिमा बाड़ाइते, भक्ते सुख दिते। महाप्रभु बिना अन्य नाहि त्रिजगते ॥ 186॥ अनुवाद—भक्तोंकी महिमाको बढ़ाने तथा भक्तोंको सुख प्रदान करनेमें महाप्रभुके अतिरिक्त त्रिभुवनमें अन्य कोई नहीं है॥ 186॥ अनुभाष्य—भागवतके तीसरे स्कन्धका सोलहवाँ अध्याय इस प्रसङ्गमें विचारणीय है ॥ 186 ॥ सभी भक्तोंको प्रसाद देना :- तबे प्रभु प्रत्येके, सब भक्तेर नाम लञा। पिठा-पाना देओयाइल प्रसाद करिया ॥ 187 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने सारा प्रसाद एकत्रित करके प्रत्येक भक्तका नाम लेकर सबको पिठा-पाना आदि बाँटा ॥ 187 ॥ श्रीनिताइ और श्रीअद्वैत, परस्पर कौतुकपूर्ण कलह :- अद्वैत-नित्यानन्द बसियाछेन एक ठाञि। दुइजने क्रीड़ा-कलह लागिल तथाइ ॥ 188 ॥ श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा कलह आरम्भ :- अद्वैत कहे,—“अवधूतेर सङ्गे एक पंक्ति। भोजन करिलुँ, ना जानि हबे कोन् गति ॥ 189 ॥ संन्यासीको अन्नस्पर्शदोष नहीं :- प्रभु त' संन्यासी, उँहार नाहि अपचय। अन्न-दोषे संन्यासीर दोष नाहि हय ॥ 190 ॥ 488 ।

बारहवाँ अध्याय 12/188-195 ] “नान्नदोषेण मस्करी”-एइ शास्त्र-प्रमाण। आमि त' गृहस्थ-ब्राह्मण, आमार दोष-स्थान ॥191॥ 'अपनेको गृहस्थ-ब्राह्मण' कहकर श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा लौकिक स्मार्त्तसमाजके आनुगत्यकी छलना :- जन्मकुलशीलाचार ना जानि याहार। तार सङ्गे एक पंक्ति-बड़ अनाचार॥"192॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभु एक साथ बैठे थे और वहीं उन दोनोंमें प्रेम-कलह आरम्भ हो गयी। श्रीअद्वैताचार्यने कहा,-“मैंने इस अवधूतके साथ एक ही पंक्तिमें बैठकर भोजन किया है, न जाने मेरी क्या गति होगी? महाप्रभु तो संन्यासी हैं, उनको कोई अन्तर नहीं पड़ेगा, क्योंकि जहाँ कहींसे भी अन्न खानेसे संन्यासीको दोष नहीं लगता। 'नान्नदोषेण मस्करी' अर्थात् संन्यासीका किसीके घरमें भोजन करनेमें कोई असङ्गति नहीं है-यह शास्त्रका प्रमाण है। किन्तु मैं तो एक गृहस्थ ब्राह्मण हूँ, इसलिये मुझे दोष लगेगा। जिसके जन्म, कुल, स्वभाव और आचरणका पता नहीं है, गृहस्थ ब्राह्मणका उसके साथ एक पंक्तिमें बैठकर प्रसाद पाना बड़ा अनाचार है॥"188-192॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'नान्नदोषेण मस्करी'-अर्थात् संन्यासीको अन्नदोष नहीं लगता॥ 191॥ श्रीनित्यानन्दके द्वारा केवलाद्वैतवादकी निन्दा :- नित्यानन्द कहे,-"तुमि अद्वैत-आचार्य। 'अद्वैत-सिद्धान्ते' बाधे शुद्धभक्तिकार्य ॥ 193 ॥ श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा श्रीअद्वैताचार्यकी निन्दाके छलसे अद्वयज्ञानकी महिमाका वर्णन :- तोमार सिद्धान्त-सङ्ग करे येइ जने। 'एक' वस्तु बिना सेइ 'द्वितीय' नाहि माने ॥ 194 ॥ अद्वयज्ञान-विरोधी जड़-द्वैतज्ञानी या मायावादीके सङ्गकी निषिद्धताके विषयमें इङ्गित :- हेन तोमार सङ्गे मोर एकत्रे भोजन। ना जानि, तोमार सङ्गे कैछे हय मन ॥"195 ॥ अनुवाद-यह सुनकर श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,- “तुम अद्वैत-आचार्य अर्थात् अद्वैतवादके आचार्य हो। 'अद्वैत-सिद्धान्त'से शुद्धभक्तिके कार्यमें बाधा पहुँचती है। तुम्हारे सिद्धान्तको जो व्यक्ति ग्रहण करता है, वह केवल एक वस्तुके अतिरिक्त दूसरी वस्तुको नहीं मानता। ऐसे तुम्हारे साथ बैठकर मैं भोजन कर रहा हूँ, न जाने तुम्हारे सङ्गसे मेरे मनपर क्या प्रभाव होगा॥"193-195॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा,-तुम अद्वैत-आचार्य हो। तुम्हारे सिद्धान्त सब अद्वैतवाद हैं, जिससे शुद्ध भक्तिके कार्यमें बाधा पहुँचती है। तुम्हारे सिद्धान्तके प्रति जो आसक्त होता है, वह एक वस्तु (चिद्-विलास) ब्रह्मके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं देख पाता। इस प्रकार तुम्हारा सङ्ग द्वैतवादियोंके लिये त्याज्य होनेपर भी तुम्हारे साथ एक स्थानपर भोजन कर रहा हूँ-यह बात मेरे मनको अच्छी नहीं लग रही॥ 193-195॥ अनुभाष्य- 'अद्वैत-सिद्धान्त'-सेव्य-सेवक-लीला नित्य सत्य है, अद्वैतवादियोंका सिद्धान्त इस बातका अनुमोदन नहीं करता। वे श्रीकृष्णसेवारूप अप्राकृत भक्तिकार्यको भी मनुष्यके कामादि इन्द्रियवृत्तिसे उत्पन्न सुखदुःख-भोग अथवा कर्मफलके अन्तर्गत एक प्राकृत विषयभोग-चेष्टा समझते हैं। इसलिये अद्वैतवादियोंका सिद्धान्त-भगवान्‌से अभिन्न नाम, रूप, गुण एवं लीला-वैचित्र्यसेवामय निर्मल भक्तिकार्यका प्रतिबन्धक है। आदिलाला 1/7 श्लोक इस स्थानपर विशेषरूपसे विचारणीय है। असुरोंको मोहित करनेके लिये श्रीअद्वैताचार्यकी निन्दाके छलसे श्रीनित्यानन्द प्रभुने ऐसा कहा। प्राकृत लोगोंकी बाहरी दृष्टिमें मायावादी कैवलाद्वैतवादियोंके 'अद्वैत-सिद्धान्त' अथवा 'निर्भेद- ब्रह्मसायुज्य'वादके साथ श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा प्रचारित शुद्ध अद्वय-ज्ञान आपाततः 'एक' प्रतीत होनेपर भी वास्तवमें श्रीहरिके अभिन्न-विग्रह श्रीअद्वैताचार्यकी 'शुद्ध- । 489

[ 12/194-196 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भक्तिके प्रचार" हेतु ही 'आचार्य'-पदवी है। उनका जो 'अद्वैत-सिद्धान्त' है, - वह अद्वयज्ञान-उपासना अथवा शुद्धभक्तिके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इसलिये श्रीगौरकृष्णभक्तिकी महिमाके कीर्त्तनकारी होनेके कारण श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीअद्वैताचार्यकी निन्दाके छलसे उनकी 'व्याज-स्तुति' की है। वास्तवमें, शुद्धवैष्णव अथवा शुद्धभक्ति साधक भक्त (भाः 1/2/11)-वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥" अर्थात् “तत्त्वको जाननेवाले पण्डित लोग वास्तव-तत्त्ववस्तुको 'अद्वयज्ञान' कहते हैं, जो ब्रह्म, परमात्मा और भगवान् - इन तीन नामोंसे जानी जाती हैं।" अथवा (छाः उः 6/2/1)- “एकमेवाद्वितीयम्' अर्थात् “इस विश्वकी सृष्टिसे पूर्व एक, अद्वितीय सत्-वस्तुमात्र थी" आदि शास्त्रीय वाक्योंमें दृढ़ विश्वास रखते हैं। वे तत्त्ववस्तुको असम्मोर्द्ध मानकर भी उन्हें केवल निर्विशेष चिन्मात्र 'ब्रह्म' या सच्चिदात्मक 'भूमा', 'विराट' नामोंसे न कहकर उनका उद्देश्य 'चिद्विलासी रसमय भगवान्'से है। वे ये स्वीकार करते हैं कि शक्तिमान् विग्रह एक 'अद्वयज्ञान' होनेपर भी प्रभावके अनुसार उनकी एक ही शक्तिके बहुतसे भेद अथवा वैचित्र्य हैं। उनमें स्वगत-सजातीय-विजातीय भेद अथवा ज्ञेय-ज्ञान-ज्ञाता, - ये तीन अवस्थाएँ नित्य-वर्तमान हैं, एवं उनके स्वरूपविग्रहसे अभिन्न नित्य नाम, रूप, गुण, लीला और परिकरवैशिष्ट्य विद्यमान है। इसलिये भक्ति-मार्गीय वैष्णवगण कभी भी अहंग्रहोपासक मायावादी नहीं हैं। यह कहना अधिक होगा कि यदि ज्ञेय और ज्ञाता पृथक् न हों, तो परस्पर ज्ञान, विलास अथवा रस-वैचित्र्य नहीं रहता। इसलिये केवलाद्वैत-सिद्धान्त-प्रच्छन्न अवैदिक नास्तिक्यवाद-मात्र है। श्रीनित्यानन्द प्रभुने इसीकी निन्दा की है। परमार्थभूत वास्तव वस्तु 'एक' श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य वस्तुमें जो 'द्वितीय'-प्रतीति है - वही माया है। माया दो प्रकारकी है- 'जीव-माया' और 'गुण-माया'; गुणमाया भी 'प्रकृति' और 'प्रधान'के भेदसे दो प्रकारकी है। जहाँ श्रीकृष्णकी प्रतीति है, वहाँ 'द्वितीयकी' (मायाकी) प्रतीति नहीं है- (भाः 2/9/33 और 11/3/45 श्लोकोंके गौड़ीय-भाष्य देखें)। शुद्धभक्त प्रह्लादके समान महाभागवतको सर्वत्र 'एक' श्रीकृष्णकी प्रतीति होती है (भाः 7/4/37) – “कृष्णग्रह-गृहीतात्मा न वेद जगदीदृशम्।” अर्थात् “प्रह्लादका मनको श्रीकृष्णके अनुग्रहरूप ग्रहने इस प्रकार खींच लिया कि जगत् इस प्रकार श्रीकृष्णके बिना प्रतीतिमय है, यह वे नहीं जानते थे।”। इसलिये उनको द्वितीयाभिनिवेश-जनित मृत्यु या भय अर्थात् संसार (वृः आः 1/4/2) नहीं रहता। श्रीअद्वैताचार्यने आचार्यरूपमें इस 'अद्वयज्ञान-दर्शन'के आधारपर 'शुद्धभक्तिकी ही प्रशंसा' की है। श्रीनित्यानन्द प्रभुने द्वितीयाभिनिवेशकारी भोगोंमें रत जड़-द्वैतवादियोंका तिरस्कार करके श्रीअद्वैताचार्यके इस अद्वयज्ञान-दर्शनकी ही प्रशंसा की है। श्रीरूप प्रभुने 'उपदेशामृत'में लिखा है, - "ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति । भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम्॥” इस श्लोकके अनुसार भोजनादि सङ्गविषयक विचार- शुद्धभक्तोंके लिये अवश्य पालनीय है। परन्तु, प्रच्छन्न मायावादी अथवा द्वितीयाभिनिवेशमें रत प्राकृत-सहजियाओंके साथ शुद्धभक्तोंको कभी भी एकत्र भोजन करना उचित नहीं है, - यह भी श्रीनित्यानन्द प्रभुने इङ्गितके द्वारा बतलाया ॥ 194-195 ॥ निन्दाके छलसे दोनों प्रभुओंकी परस्पर स्तुति :- एइमत दुइजने करे बलाबलि। व्याज-स्तुति करे दुँहे, येन गालागालि ॥ 196 ॥ अनुवाद-इस प्रकार दोनों ही एक-दूसरेको कुछ-न-कुछ कहते रहे। दोनों ही एक दूसरेकी छलसे स्तुति कर रहे थे, परन्तु बाहरसे ये निन्दा प्रतीत हो रही थी ॥ 196 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'व्याज-स्तुति' - छल स्तुति अर्थात् बाहरसे निन्दा-वाक्य, भीतरसे माहात्म्यसूचक वचन ॥ 196 ॥ 490 ।

बारहवाँ अध्याय 12/188-204 ] अणुभाष्य- 'दुइँजने क्रीड़ा-कलह' - मध्यलीला 3/93-101 संख्या देखें ॥ 188-196 ॥ महाप्रभुके द्वारा सभी भक्तोंको महाप्रसाद देना :- तबे प्रभु सर्व वैष्णवेर नाम लञा। महाप्रसाद देन महा-अमृत सिञ्चिया ॥ 197 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने सभी वैष्णवोंका नाम पुकारकर उन्हें महाप्रसाद दिलवाया और उसपर अपनी कृपारूपी महा-अमृतका सिञ्चन किया ॥ 197 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने वैष्णवोंको महाप्रसाद दिलवाया; उसपर महाप्रभुका कृपारूप अमृत सिञ्चित होनेके कारण वह और अधिक आस्वाद्यनीय हो गया ॥ 197 ॥ प्रसाद-सम्मानके बाद हरिध्वनि देकर उठना और आचमन :- भोजन करि' उठे सबे हरिध्वनि करि'। हरिध्वनि उठिल सब स्वर्गमर्त्त्य भरि' ॥ 198 ॥ भक्तोंको अपने हाथोंसे माला और चन्दन देना :- तबे महाप्रभु सब निज-भक्तगणे। सबाकारे श्रीहस्ते दिला माल्य-चन्दने ॥ 199 ॥ अनुवाद—उसके बाद सभी भोजन करके हरिध्वनि करते हुए उठ खड़े हुए और उस हरिध्वनिसे स्वर्गलोक और मर्त्यलोक गूँज उठे। तब महाप्रभुने अपने समस्त भक्तोंको अपने श्रीहस्तकमलोंसे माला पहनायी और चन्दन लगाया ॥ 198-199 ॥ श्रीस्वरूपादि सात परिवेशक करनेवाले भक्तोंको सबसे अन्तमें प्रसादकी प्राप्ति :- तबे परिवेशक स्वरूपादि सातजन। गृहेर भितरे कैल प्रसाद भोजन ॥ 200 ॥ श्रीगोविन्दकी सहायतासे श्रीहरिदासको महाप्रभुके उच्छिष्टकी प्राप्ति :- प्रभुर अवशेष गोविन्द राखिल धरिया। सेइ अन्न हरिदासे किछु दिल लञा ॥ 201 ॥ श्रीगोविन्दको सबसे अन्तमें महाप्रभुके उच्छिष्टकी प्राप्ति :- भक्तगण गोविन्द-पाश किछु मागि' निल। सेइ प्रसादान्न गोविन्द आपनि पाइल ॥ 202 ॥ अनुवाद—उसके बाद परिवेशक करनेवाले श्रीस्वरूप दामोदर आदि सात भक्तोंने घरके भीतर बैठकर प्रसाद ग्रहण किया। श्रीगोविन्दने महाप्रभुके अवशिष्ट प्रसादको रख लिया और उसमेंसे कुछ अन्न प्रसाद लेकर श्रीहरिदास ठाकुरको दिया। भक्तोंने भी श्रीगोविन्दसे महाप्रभुके अवशिष्ट प्रसादमेंसे थोड़ा-थोड़ा माँगकर ले लिया और अन्तमें जो बचा, उसे श्रीगोविन्दने स्वयं ग्रहण किया ॥ 200-202 ॥ गुण्डिचा-मार्जन-लीलाका ही नामान्तर 'धोयापाखला'-लीला :- स्वतन्त्र ईश्वर प्रभु करे नाना खेला। 'धोयापाखला' नाम कैल एइ एक लीला ॥ 203 ॥ अनुवाद—महाप्रभु स्वतन्त्र ईश्वर हैं, इसलिये वे अनेक प्रकारकी लीलाएँ करते हैं। उन्होंने 'धोयापाखला' नामक यह एक लीला भी की ॥ 203 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'धोयापाखला' - इस गुण्डिचा-मार्जन- लीलाको उड़िया भाषामें 'धोयापाखला' कहते हैं ॥ 203 ॥ अनवसरके अन्तमें नेत्रोत्सव या अङ्गरागोत्सव :- आर दिने जगन्नाथेर 'नेत्रोत्सव' - नाम। महोत्सव हैल भक्तेर प्राण समान ॥ 204 ॥ अनुवाद-अगले दिन श्रीजगन्नाथका 'नेत्रोत्सव' - नामक उत्सव हुआ। यह महोत्सव भक्तोंके लिये प्राणोंके समान है ॥ 204 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'नेत्रोत्सव'-स्नानके समय श्रीजगन्नाथका रङ्ग धुलनेके कारण 'अनवसर'-कालमें तीनों मूर्तियोंका 'अङ्गराग' होता है। नवयौवन दिवसमें प्रातःकालमें नेत्रोत्सव अर्थात् नेत्रोंका अङ्गराग होता है ॥ 204 ॥ । 491

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[ 12/205-211 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला [बायाँ स्तम्भ] पन्द्रह दिनोंके बाद श्रीजगन्नाथदेवका मन भरके दर्शन :- पक्षदिन दुःखी लोक प्रभुर अदर्शने। दर्शन करिया लोक सुख पाइल मने ॥ 205 ॥ **अनुवाद—**श्रीजगन्नाथदेवके दर्शन न होनेके कारण पन्द्रह दिनोंसे सभी लोग बड़े दुःखी थे, परन्तु अब श्रीजगन्नाथके दर्शन करके सभीके मन प्रसन्न हो गये ॥ 205 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पक्ष-दिन'—पन्द्रह दिन ॥ 205 ॥ **अनुभाष्य—**पूर्णिमाकी स्नान-यात्राके बाद पन्द्रह दिनोंके लिये श्रीजगन्नाथ-मूर्तिके अदर्शनके कारण दर्शनार्थियोंके नेत्र आनन्दसे वञ्चित हो जाते हैं। दर्शनार्थी व्यक्ति पन्द्रह दिनोंके अदर्शनके बाद श्रीभगवान्‌के दर्शन करके अपने नेत्रोंको सफल बनाते हैं। इस वियोग-पक्षके बाद उस प्रथम दर्शनको ही 'नेत्रोत्सव' कहते हैं ॥ 205 ॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुकी जगन्नाथ-दर्शन यात्रा :- महाप्रभु सुखे लञा सब भक्तगण। जगन्नाथ-दरशने करिला गमन ॥ 206 ॥ महाप्रभुके आगे बलवान श्रीकाशीश्वर और पीछे श्रीगोविन्दका जाना :- आगे काशीश्वर याय लोक निवारिया। पाछे गोविन्द याय जल-करङ्ग लञा ॥ 207 ॥ **अनुवाद—**महाप्रभु आनन्दपूर्वक सभी भक्तोंको साथ लेकर श्रीजगन्नाथके दर्शनके लिये चल पड़े। महाप्रभुके आगे श्रीकाशीश्वर लोगोंकी भीड़को हटाते हुए चल रहे थे और महाप्रभुके पीछे श्रीगोविन्द जलका पात्र लेकर चल रहे थे ॥ 206-207 ॥ अनुभाष्य—'करङ्ग'—चतुर्थाश्रमी संन्यासीका जलपात्र (कमण्डलु) ॥ 207 ॥ महाप्रभुके आगे श्रीपुरी-भारतीके बगलमें श्रीस्वरूप-अद्वैत :- प्रभुर आगे पुरी, भारती,—दुँहार गमन। स्वरूप, अद्वैत,—दुँहेर पार्श्वे दुइजन ॥ 208 ॥ [दायाँ स्तम्भ] पीछे-पीछे अन्यान्य भक्त :- पाछे पाछे चलि' याय आर भक्तगण। उत्कण्ठाते गेला सब जगन्नाथ-भवन ॥ 209 ॥ कमलनयनके दर्शन करनेके लिये भक्तोंके अनुरागवशतः मर्यादाका उल्लङ्घन :- दर्शन-लोभेते करि' मर्यादा लङ्घन। भोग-मण्डपे याञा करे श्रीमुख दर्शन ॥ 210 ॥ **अनुवाद—**श्रीपरमानन्द पुरी एवं श्रीब्रह्मानन्द भारती महाप्रभुसे आगे जा रहे थे और श्रीस्वरूप दामोदर एवं श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुके दोनों ओर चल रहे थे। अन्य सब भक्तगण उत्कण्ठासे उनके पीछे चलते हुए श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें जा रहे थे। दर्शनके लोभसे मर्यादाका उल्लङ्घन करते हुए सभी भक्तोंने भोग-मण्डपमें जाकर श्रीजगन्नाथके श्रीमुखका दर्शन किया ॥ 208-210 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मर्यादा लङ्घन'—शास्त्रोंकी जिस विधिके अनुसार देव दर्शन करने चाहिये, उस विधिका नाम 'मर्यादा' है। दर्शनके लोभसे बहुतसे लोग उस मर्यादाका उल्लङ्घन करके नवयौवन-दर्शनके लिये गये ॥ 210 ॥ राधाभावमें भावित महाप्रभुका अपलक-नेत्रोंसे श्रीकृष्णके मुखका दर्शन :- तृष्णार्त्त प्रभुर नेत्र-भ्रमर-युगल। गाढ़ तृष्णाय पिये कृष्णेर वदन-कमल ॥ 211 ॥ **अनुवाद—**महाप्रभु श्रीजगन्नाथके दर्शनके बहुत प्यासे थे, उनके नेत्र दो भ्रमरोंकी भाँति प्रगाढ़ तृष्णासे श्रीकृष्णके (श्रीजगन्नाथके) मुखकमलका पान करने लगे ॥ 211 ॥ **अनुभाष्य—**श्रीमहाप्रभु जगमोहनके सबसे पिछले भागमें सदैव 'गरुड़ स्तम्भ'के पीछेसे श्रीजगन्नाथके दर्शन करते थे। पन्द्रह दिन तक दर्शन प्राप्त नहीं कर पानेके कारण प्रबल विप्रलम्भसे पुष्ट चेष्टाके कारण महाप्रभुने जगमोहन पार करके भोगमण्डपमें जाकर श्रीमुखका दर्शन किया। वरणीय वस्तुके अत्यन्त निकट जानेको 492 ।

बारहवाँ अध्याय 12/210-215 ] मर्यादाका उल्लङ्घन समझना चाहिये। प्याससे व्याकुल भ्रमर जिस प्रकार पुष्पके मधुपान करनेकी सुदृढ़ चेष्टा दिखलाता है, उसी प्रकार महाप्रभुके नेत्रोंकी दो भ्रमरोंसे और श्रीजगन्नाथके श्रीमुखकी कमल-पुष्पसे उपमा दी गयी है। गाढ़ तृष्णावश श्रीकृष्ण मुखकमल दर्शनरूप पान कार्यमें महाप्रभुकी अत्यधिक प्यास प्रकाशित हो रही थी॥ 210-211॥ श्रीविग्रहका असमोर्द्ध और नित्य नव-नवायमान और वर्द्धनशील माधुर्य :- प्रफुल्ल-कमल जिनि' नयन-युगल। नीलमणि-दर्पण-कान्ति गण्ड झलमल ॥ 212 ॥ बान्धुलीर फुल जिनि' अधर सुरङ्ग। ईषत् हसित कान्ति-अमृत-तरङ्ग ॥ 213 ॥ श्रीमुख-सुन्दरकान्ति बाढ़े क्षणे क्षणे। कोटिभक्त-नेत्र-भृङ्ग करे मधुपान ॥ 214 ॥ यत पिये, तत तृष्णा बाढ़े निरन्तर। मुखाम्बुज छाड़ि' नेत्र ना याय अन्तर ॥ 215 ॥ अनुवाद-श्रीजगन्नाथके दोनों नेत्र प्रफुल्लित कमलका भी तिरस्कार करनेवाले थे। नीलमणि-दर्पणकी कान्तिके समान उनके दोनों कपोल (गाल) झलमल कर रहे थे। लाल रङ्गके उनके अधर बान्धुली पुष्पकी शोभाको भी पराजित करनेवाले थे और उनकी मन्द मुस्कानकी कान्ति अमृतकी तरङ्गोंकी भाँति लहरा रही थी। उनके श्रीमुखकी सुन्दर कान्ति क्षण-क्षणमें बढ़ती जा रही थी और कोटि-कोटि भक्त अपने नेत्ररूपी भ्रमरोंके द्वारा उस मुखकमलके मधुका पान कर रहे थे। वे जितना उस मधुका पान करते थे, उनकी तृष्णा निरन्तर उतनी ही बढ़ती जाती थी। उनके नेत्र श्रीजगन्नाथके मुखकमलको छोड़कर और कहीं नहीं जा रहे थे ॥ 212-215 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- नीलमणि अर्थात् इन्द्रनीलमणिसे बने हुए दर्पणकी कान्तिकी भाँति श्रीजगन्नाथदेवके कपोल (गाल) झलमल कर रहे थे ॥ 212 ॥ बारहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य - 'बान्धुली' - यहाँ इस जातिके लाल रङ्गके पुष्पको समझना चाहिये। 'सुरङ्ग' - सिन्दूर रङ्गका। श्रीविग्रह-माधुरीके विषयमें श्रीरूपप्रभुने श्रीलघु- भागवतामृतमें लिखा है, - 'असमानोर्द्धमाधुर्य- तरङ्गामृतवारिधिः । जङ्गमास्थावरोल्लासिरूपो गोपेन्द्रनन्दनः।” अर्थात् "जिनके समान या जिनकी अपेक्षा अधिक नहीं है, इस प्रकारके जो माधुर्य-तरङ्गमय अमृतसिन्धु हैं, उन श्रीनन्दनन्दनका रूप स्थावर और जङ्गम, बिना भेदके सभी प्राणियोंके उल्लासको वर्द्धित करता है।” तन्त्रमें, - "कन्दर्प-कोट्यर्बुदरूप-शोभा-नीराज्य-पादाब्ज-नखाञ्चलस्य। कुत्राप्यदृष्टश्रुत-रम्यकान्तेर्ध्यानं परं नन्दसुतस्य वक्ष्ये ॥” अर्थात् "जिनके चरणकमलोंके नखके अग्रभाग असंख्य कामदेवोंकी रूपशोभाके द्वारा नित्य ही अर्चित होते हैं, जिनकी रम्यकान्ति और कहीं भी (यहाँ तक कि मथुरा-द्वारकाधीशमें भी) दिखायी या सुनायी नहीं देती, उन नन्दनन्दनके ध्यानकी विधि कहूँगा।” (भाः 10/29/40)- “का स्त्र्यङ्ग ते कलपदामृतवेणुगीत सम्मोहिताय्र्यचरितान्न चलेत्रिलोक्याम्। त्रैलोक्यसौभगमिदञ्च निरीक्ष्य रूपं यद् गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यविभ्रन्॥" अर्थात् गोपियोंने कहा, - "हे कृष्ण ! त्रिजगत्में ऐसी कौन स्त्री है, जो तुम्हारे सुमधुर पद और दीर्घ मूर्च्छनायुक्त अमृतमय सङ्गीतसे मोहित होकर आर्य धर्मसे विचलित ना हो जाय? तुम्हारी त्रिभुवन-मोहन दिव्यरूपके दर्शनसे गौएँ, पक्षी, वृक्ष और मृग आदि प्राणी भी परमानन्दसे पुलकित हो जाते हैं।” श्रीमहाप्रभु जितना ही श्रीमुखका दर्शन करने लगे, उतनी ही उनकी दर्शनकी प्यास उत्तरोत्तर वर्द्धित होने लगी। महाप्रभुके नेत्र और श्रीकृष्णका मुखकमल, दोनोंमें तब और कोई भेद अथवा दूरी नहीं रही ॥ 212-215 ॥ । 493

[ 12/216-222 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला दो प्रहर तक श्रीमुखदर्शन-लीला :- एइमत महाप्रभु लञा भक्तगण। मध्याह्न पर्यन्त कैल श्रीमुख दरशन ॥ 216 ॥ महाप्रभुका भावावेश होनेपर भी उसे सम्वरणकर दर्शन-सेवा-सुख :- स्वेद, कम्प, अश्रु-जल बहे सर्वक्षण। दर्शनेर लोभे प्रभु करे सम्वरण ॥ 217 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभुने अपने भक्तोंके साथ मध्याह्नकाल तक श्रीजगन्नाथके श्रीमुखका दर्शन किया। श्रीजगन्नाथके दर्शन करके महाप्रभुमें शरीरमें स्वेद, कम्प और नेत्रोंसे अश्रु-जल निरन्तर बह रहा था, परन्तु दर्शनके लोभसे महाप्रभु उन भावोंको छिपा रहे थे, क्योंकि इनके द्वारा दर्शनमें बाधा होती है॥216-217॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/201-203 संख्या विशेषरूपसे विचारणीय है॥217॥ बारहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। भोगके समय महाप्रभुका दर्शन-कीर्तन :- मध्ये मध्ये भोग लागे, मध्ये दरशन। भोगेरे समये प्रभु करेन कीर्त्तन ॥ 218 ॥ श्रीकृष्णदर्शन-सेवासुखमें महाप्रभुकी आत्मविस्मृति; अन्तमें घर लौट जाना :- दर्शन-आनन्दे प्रभु सब पासरिला। भक्तगण मध्याह्नेते प्रभुरे लञा गेला ॥ 219 ॥ अनुवाद-श्रीजगन्नाथको बीच-बीचमें जब भोग लगता तब दर्शन नहीं होते और भोग लग जानेके बाद दर्शन होते। भोगके समय महाप्रभु कीर्तन करने लगते। श्रीजगन्नाथके दर्शनके आनन्दमें महाप्रभु सब भूल गये। मध्याह्नकालमें भक्तगण महाप्रभुको दोपहरके प्रसादके लिये ले गये॥218-219॥ प्रातःकाले रथयात्रा हबेक जानिया। सेवक लागाय भोग द्विगुण कोरिया ॥ 220 ॥ अनुवाद-श्रीजगन्नाथके सेवक जानते थे कि अगले दिन प्रातःकालमें श्रीजगन्नाथकी रथयात्रा होगी, इसलिये वे दो-गुणा भोग लगाने लगे॥220॥ गुण्डिचा-मार्जन-लीलाके श्रवणसे अपवित्र व्यक्तिके भी चित्तकी शुद्धि :- गुण्डिचा-गृह-मार्जन संक्षेपे कहिल। याहा देखि' शुनि' पापीर कृष्णभक्ति हैल ॥ 221 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 222 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे गुण्डिचा-गृह-मार्जनं नाम द्वादश-परिच्छेदः। अनुवाद-इस प्रकार मैंने गुण्डिचा-मन्दिर-मार्जन लीलाका संक्षेपमें वर्णन किया है, जिसे देखकर और सुनकर पापी व्यक्तियोंको भी श्रीकृष्णभक्तिकी प्राप्ति हुई है। श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥221-222॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें गुण्डिचा-मन्दिर-मार्जन नामक बारहवें-अध्यायका अनुवाद समाप्त। 494 ।

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तेरहवाँ अध्याय कथासार-प्रातःकालमें स्नान करके महाप्रभुने श्रीजगन्नाथ, बलदेव और सुभद्राके पाण्डुविजयके साथ रथारोहणका दर्शन किया। उस समय राजा सोनेके झाड़ूके द्वारा मार्गकी सफाई कर रहे थे। लक्ष्मीजीकी अनुमति लेकर श्रीजगन्नाथ गुण्डिचा-मन्दिरकी ओर चल पड़े। वह मार्ग रेतीला और चौड़ा था, उसके दोनों ओर घर और उद्यान आदि थे। उस मार्गपर गौड़गण रथ खींचकर ले जाने लगे। महाप्रभुने अपने भक्तोंको सात मण्डलियोंमें विभक्त करके चौदह-मृदङ्गोंके साथ कीर्तन आरम्भ किया। कीर्तनके समयमें महाप्रभुके बहुत प्रकारके भाव उदित होने लगे। यहाँ तक कि, जैसे श्रीजगन्नाथ और महाप्रभु परस्पर भावोंके आदान-प्रदानका परिचय देने लगे। बलगण्डि तक रथ आनेपर वहाँ साधारण लोगोंके द्वारा एक भोग निवेदित होने लगा। उद्यानके निकटवर्ती उपवनमें महाप्रभुने नृत्यमें हुए परिश्रमको कुछ दूर किया। -(अमृतप्रवाह भाष्य) रथके आगे आश्चर्यपूर्ण नृत्य करनेवाले गौरहरिकी जय :- स जीयात् कृष्णचैतन्यः श्रीरथाग्रे ननर्त्त यः। येनासीज्जगतां चित्रं जगन्नाथोऽपि विस्मितः ॥ 1 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीजगन्नाथके रथके आगे जिन्होंने नृत्य किया था, वे श्रीकृष्णचैतन्य जययुक्त हों; उनका वह नृत्य देखकर समस्त जगत् और स्वयं श्रीजगन्नाथ भी विस्मित हो गये थे ॥ 1 ॥ अनुभाष्य- यः (महाप्रभुः) रथाग्रे (श्रीजगन्नाथदेवस्य रथस्य सम्मुखे) ननर्त्त, येन (नर्त्तनमाधुर्येण) जगतां (लोकानां) चित्रं (कुतूहलम्) आसीत्, जगन्नाथः अपि विस्मितः (बभूव), सः कृष्णचैतन्यः जीयात् (विजयेत)। श्लोक-भावानुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥ जय जय श्रीकृष्णचैतन्य नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो और श्रीगौरभक्तोंकी जय हो ॥ 2 ॥ श्रोताओंके चित्तका आकर्षण :- जय श्रोतागण, शुन, करि' एक मन। रथयात्राय नृत्य प्रभुर परम मोहन ॥ 3 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्यचरितामृतके श्रोताओंकी जय हो! आप एकाग्रचित्त होकर महाप्रभुके रथयात्रामें किये गये परम मनोहर नृत्यके विषयमें श्रवण कीजिये ॥ 3 ॥ पाहाण्डिके दर्शनके लिये प्रातः स्नानके बाद भक्तोंसहित महाप्रभुका गमन :- आर दिन महाप्रभु हञा सावधान। रात्रे उठि' गण-सङ्गे कैल प्रातःस्नान ॥ 4 ॥ पाण्डुविजय देखिबारे करिल गमन। जगन्नाथ यात्रा कैल छाड़ि' सिंहासन ॥ 5 ॥ अनुवाद-अगले दिन महाप्रभु और उनके परिकर रात समाप्त होनेसे पहले ही उठ गये और उन्होंने प्रातःकालका स्नान किया। श्रीजगन्नाथ अपने सिंहासनको छोड़कर जैसे यात्राके लिये रथपर आरूढ़ होते हैं, श्रीजगन्नाथकी उस पाण्डुविजयको देखनेके लिये महाप्रभु भक्तोंके साथ चल दिये ॥ 4-5 ॥ । 497

[ 13/5-11 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीजगन्नाथ, बलदेव और सुभद्रा, - इन तीन मूर्तियोंको रेशमकी डोरसे बाँधकर सेवकगण मन्दिरसे जिस प्रणालीके द्वारा सिंहद्वारके निकट रथपर चढ़ाते हैं, उसे 'पाण्डु-विजय' कहते हैं॥5॥ अनुभाष्य- 'पाण्डुविजय अथवा पाहाण्डि'-सिंहासनसे रथारोहण॥5॥ पाहाण्डिके दर्शनमें सपरिकर राजाकी सहायता :- आपनि प्रतारुद्र लञा पात्रगण। महाप्रभुर गणे कराय विजय-दर्शन ॥6॥ अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रने स्वयं और उनके परिचारकोंने महाप्रभुके भक्तोंके पाण्डु-विजयके दर्शनकी व्यवस्था की॥6॥ श्रीनिताइ-श्रीअद्वैतादिके साथ महाप्रभुका पाहाण्डि-दर्शन :- अद्वैत, निताइ आदि सङ्गे भक्तगण। सुखे महाप्रभु देखे ईश्वर-गमन ॥7॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि परिकरों और अन्य भक्तोंके साथ महाप्रभु आनन्दपूर्वक श्रीजगन्नाथकी यात्राका दर्शन करने लगे॥7॥ दयिताओंकी श्रीजगन्नाथदेवको रथपर चढ़ानेकी चेष्टा :- बलिष्ठ 'दयिता' गण-येन मत्त हाती। जगन्नाथ विजय कराय करि' हाताहाति ॥8॥ कतक दयिता करे स्कन्ध आलम्बन। कतक दयिता धरे श्रीपद्म-चरण ॥9॥ कटितटे बद्ध, दृढ़, स्थूल पट्टडोरी। दुइदिके दयितागण उठाया ताहा धरि' ॥10॥ उच्च दृढ़ तुली सब पाति' स्थाने स्थाने। एक तुली हैते त्वराय आर तुली आने ॥11॥ अनुवाद-मत्त हाथीकी भाँति बलवान् श्रीजगन्नाथके 'दयिता' सेवक श्रीजगन्नाथको अपने हाथोंपर उठाकर सिंहासनसे रथपर ले जा रहे थे। कुछ दयिता श्रीजगन्नाथके कन्धेके नीचे हाथका सहारा दे रहे थे और कुछ दयिता श्रीजगन्नाथके श्रीचरणकमलोंको पकड़कर उन्हें उठा रहे थे। श्रीजगन्नाथकी कमरमें रेशमकी मजबूत मोटी रस्सी बँधी थी और उनके दोनों ओरसे दयिता लोग उस रस्सीको पकड़कर उन्हें उठाकर चल रहे थे। सिंहासनसे रथ तक आनेके मार्गमें स्थान-स्थान पर मजबूत, मोटे रूईके गद्दे बिछाये हुए थे। दयिता लोग श्रीजगन्नाथको एक गद्देसे उठाकर जल्दीसे आगेवाले गद्दे तक ले जा रहे थे॥8-11॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'दयितागण'- 'दयित'-शब्दसे 'दयिता' शब्द बना है। श्रीजगन्नाथके दयिता-नामसे एक श्रेणीके सेवक हैं। ये जातिसे भद्र नहीं हैं, किन्तु इन्होंने श्रीजगन्नाथकी सेवा प्राप्त करके भद्र-वर्णका सम्मान प्राप्त किया है। स्नानके दिनसे आरम्भ करके रथके लौट आने तक दयिताओंका श्रीजगन्नाथपर (अर्थात् उनकी सेवामें) विशेष अधिकार रहता है। दयिताओंको 'क्षेत्रमाहात्म्य'में 'शबर' कहा गया है। उनमें जो ब्राह्मण हैं, उन्हें 'दयितापति' कहा जाता है। ये श्रीजगन्नाथदेवको अनवसर कालमें मिठाईका भोग देते हैं और प्रतिदिन प्रातःकालमें बालभोगमें मिठाई अर्पण करते हैं। ये अनवसर-कालमें 'श्रीजगन्नाथदेवको ज्वर हुआ है' कहकर उन्हें औषधि और पाँचन (मीठे रसका पाना) अर्पित करते हैं। मूल बात यह है कि श्रीजगन्नाथकी प्रतिष्ठासे पहले शबरोंके पास श्रीनीलमाधव-मूर्ति थी, उसी श्रीनीलमाधव-मूर्तिका बादमें 'श्रीजगन्नाथमें' परिणत होनेके कारण शबर-दयिताओंका श्रीजगन्नाथकी अन्तरङ्ग सेवामें अधिकार उत्पन्न हुआ है। 'तूली'-कपड़ेमें भरी हुई रूई, रूई की छोटी-छोटी गद्दियाँ (तकियेके समान)॥8-11॥ अनुभाष्य- 'पाति'-डालकर, बिछाकर; 'आर तुली'-अन्य गद्दीपर॥11॥ 498 ।

तेरहवाँ अध्याय 13/12-21 ] श्रीजगन्नाथका गुरुत्व :- प्रभु-पदाघाते तुली हय खण्ड खण्ड। तुला सब उड़ि' याय, शब्द हय प्रचण्ड ॥12॥ अनुवाद-दयितोंके द्वारा श्रीजगन्नाथको एक गद्देसे दूसरेपर ले जाते हुए श्रीजगन्नाथके चरणकमलोंकी चोटसे कुछ गद्दे फट जाते। उनके फटनेसे बहुत जोरसे शब्द होता और सारी रुई इधर-उधर उड़कर फैल जाती ॥12॥ अनुभाष्य- 'प्रभु'-श्रीजगन्नाथदेव ॥12॥ स्वेच्छामय प्रभु श्रीजगन्नाथ :- विश्वम्भर जगन्नाथे के चालाइते पारे? आपन-इच्छाय चले करिते विहारे ॥13॥ श्रीजगन्नाथका कातर भावसे आह्वान :- महाप्रभु 'मणिमा' 'मणिमा' करे ध्वनि। नाना-वाद्य-कोलाहले किछुइ ना शुनि ॥14॥ अनुवाद-विश्वम्भर अर्थात् विश्वका पालन करनेवाले श्रीजगन्नाथको कौन उठा और चला सकता है? वे तो विहार करनेके लिये अपनी इच्छासे चल रहे थे। महाप्रभु 'मणिमा' 'मणिमा' कहकर श्रीजगन्नाथको सम्बोधित कर रहे थे, परन्तु अनेक वाद्योंके कोलाहलके कारण किसीको वह सुनायी नहीं दे रहा था ॥13-14॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'मणिमा'-उड़ीसाके लोग पूजनीय व्यक्ति और राजाको 'मणिमा' कहकर सम्बोधन करते हैं॥14॥ स्वयं राजाकी झाडूदारके रूपमें सेवा :- तबे प्रतापरुद्र करे आपने सेवन। सुवर्ण-मार्जनी लञा करे पथ सम्मार्जन ॥15॥ चन्दन-जलेते करे पथ निषेचने। तुच्छ सेवा करे बसि' राज-सिंहासने ॥16॥ अनुवाद-तब श्रीजगन्नाथके आगे-आगे राजा प्रतापरुद्र स्वयं अपने हाथोंमें सोनेके हत्थेवाली झाडू लेकर मार्ग साफ करनेकी सेवा कर रहे थे और चन्दनसे युक्त जलका मार्गपर छिड़काव कर रहे थे। राजसिंहासनपर बैठनेवाले राजा प्रतापरुद्र श्रीजगन्नाथकी इस प्रकारकी तुच्छ सेवा कर रहे थे॥15-16॥ राजाकी दैन्यमयी सेवाको देखकर महाप्रभुकी कृपा :- उत्तम हञा राजा करे तुच्छ सेवन। अतएव जगन्नाथेर कृपार भाजन ॥17॥ महाप्रभु सुख पाइल से-सेवा देखिते। महाप्रभुर कृपा हैल से-सेवा हइते ॥18॥ अनुवाद-उत्तम व्यक्ति होते हुए भी राजा प्रतापरुद्र तुच्छ सेवा कर रहे थे, इसलिये वे श्रीजगन्नाथकी कृपाके अधिकारी हुए। राजाकी उन सेवाओँको देखकर महाप्रभु बहुत प्रसन्न हुए और उन्हीं सेवाओंके कारण राजापर महाप्रभुकी कृपा हुई॥17-18॥ रथकी शोभा :- रथेर साजनि देखि' लोके चमत्कार। नव हेममय रथ-सुमेरु-आकार ॥19॥ शत शत सु-चामर-दर्पणे उज्ज्वल। उपरे पताका शोभे चाँदौया निर्मल ॥20॥ घाघर, किङ्किणी बाजे, घण्टार क्वणित। नाना चित्र-पट्टवस्त्रे रथ विभूषित ॥21॥ अनुवाद-रथकी सजावटको देखकर लोग आश्चर्यचकित हो रहे थे। वह रथ ऐसा लग रहा था मानो नये सोनेका बना हो और आकारमें भी बहुत ऊँचा था, इसलिये वह सुमेरु पर्वतके समान प्रतीत हो रहा था। उस रथमें सैकड़ों सुन्दर चामर एवं उज्ज्वल दर्पण सुशोभित हो रहे थे। रथके ऊपर स्वच्छ चँदोवा और सुन्दर पताका शोभायमान हो रहे थे। रथ अनेक चित्रों और रङ्ग-बिरङ्गे रेशमी वस्त्रोंसे सजाया गया था। बहुतसे झाँझ (बड़ी करताल), घुँघरु और घण्टे बज रहे थे॥19-21॥ । 499

[ 13/19-29 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य- 'साजनि'-सजावट। 'घाघर'–झाँझ; मर्यादाका पालन करते हुए पन्द्रह दिनों तक निर्जनमें 'किङ्किणी'–घुँघरु; 'क्वणित'–ध्वनि ॥ 19-21 ॥ महालक्ष्मीके साथ बिना किसी बाधाके क्रीड़ा की थी। श्रीजगन्नाथ, बलराम और सुभद्राका रथारोहण :- अब लक्ष्मीकी सम्मतिसे अनुराग मार्गके श्रीकृष्णमें लीलाय चड़िल ईश्वर रथेर उपर। ऐकान्तिक-निष्ठ भक्तोंको आनन्द देनेके लिये रथपर आर दुइ रथे चड़े सुभद्रा, हलधर ॥ 22 ॥ चढ़कर स्वच्छन्द विहारके लिये बाहर निकले। यह कहना अधिक होगा कि स्वकीयाभाव यहाँ शिथिल हो अनुवाद-रथयात्राकी लीला करनेके लिये श्रीजगन्नाथ जाता है। रथके जानेका मार्ग यमुनाके तटके समान रथके ऊपर चढ़ गये। श्रीसुभद्रा और हलधर श्रीबलराम सूक्ष्म सफेद बालूसे ढ़का हुआ था। मार्ग दोनों ओरसे अन्य दो रथोंपर चढ़े ॥ 22 ॥ वृन्दावनके समान उपवनोंसे घिरा था ॥ 23-25 ॥ अनवसरकालके पन्द्रह दिन लक्ष्मीके साथ श्रीजगन्नाथका विलास :- रथे चड़ि' जगन्नाथ करिला गमन। पञ्चदश दिन ईश्वर महालक्ष्मी लञा। दुइपार्श्वे देखि' चले आनन्दित-मन ॥ 26 ॥ ताँर सङ्गे क्रीड़ा कैल निभृते बसिया ॥ 23 ॥ अनुवाद-रथपर चढ़कर श्रीजगन्नाथ चलने लगे विलासके बाद लक्ष्मीकी सहमतिसे रथारोहण :- और दोनों ओरके दृश्यको देखकर उनका मन ताँहार सम्मति लञा भक्ते सुख दिते। आनन्दित हो रहा था ॥ 26 ॥ रथे चड़ि' बाहिर हैल विहार करिते ॥ 24 ॥ गौड़गणोंके द्वारा रथकी रस्सीको खींचना, स्वेच्छामय अनुवाद-स्नानयात्राके बाद पन्द्रह दिनों तक भगवान्की इच्छाके अनुसार रथका चलना :- श्रीजगन्नाथने महालक्ष्मीके साथ एकान्तमें रहकर लीला 'गौड़' सब रथ टाने करिया आनन्द। विहार किया। उसके बाद महालक्ष्मीकी अनुमति लेकर क्षणे शीघ्र चले रथ, क्षणे चले मन्द ॥ 27 ॥ श्रीजगन्नाथ भक्तोंको सुख प्रदान करनेके उद्देश्यसे रथपर क्षणे स्थिर हञा रहे, टानिेलेह ना चले। चढ़कर विहार करनेके लिये बाहर आ गये ॥ 23-24 ॥ ईश्वर-इच्छाय चले, ना चले कारो बले ॥ 28 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीजगन्नाथदेव, स्नानके बाद जिन पन्द्रह दिनों तक एकान्तमें रहते हैं, उस समयको अनुवाद-सब 'गौड़' बड़े आनन्दसे रथको खींच 'अनवसर' अथवा निभृत-काल कहते हैं। उसके बाद रहे थे। कभी रथ तेजीसे चलता, तो कभी धीरे चलता वे लक्ष्मीकी अनुमति लेकर रथमें गमन करते हैं॥ 23 ॥ और कभी स्थिर होकर एक स्थानपर खड़ा हो जाता और पूरा बल लगाकर खींचनेपर भी आगे नहीं बढ़ता। रथके जानेके मार्गका वर्णन :- श्रीजगन्नाथकी इच्छासे ही रथ चलता है, किसीके बलसे सूक्ष्म श्वेतबालु पथे पुलिनेर सम। नहीं ॥ 27-28 ॥ दुइदिके तोटा, सब-येन वृन्दावन ॥ 25 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'गौड़'–उड़ीसावासी ग्वालोंको 'गौड़' अनुवाद-रथके मार्गपर यमुना तटके समान सूक्ष्म कहते हैं ॥ 27 ॥ श्वेत बालू फैली हुई थी और मार्गके दोनों ओर सुन्दर महाप्रभुका भक्तोंको अपने हाथोंसे माला-चन्दन देना :- उद्यान थे-इन सबको देखकर ऐसा प्रतीत होता था तबे महाप्रभु सब लञा भक्तगण। मानो यह वृन्दावन है ॥ 25 ॥ स्वहस्ते पराइल सबे माल्य-चन्दन ॥ 29 ॥ अनुभाष्य-अनवसर-कालमें श्रीजगन्नाथदेवने पतिकी 500 ।