भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1335, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1335

[ 12/194-196 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भक्तिके प्रचार" हेतु ही 'आचार्य'-पदवी है। उनका जो 'अद्वैत-सिद्धान्त' है, - वह अद्वयज्ञान-उपासना अथवा शुद्धभक्तिके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इसलिये श्रीगौरकृष्णभक्तिकी महिमाके कीर्त्तनकारी होनेके कारण श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीअद्वैताचार्यकी निन्दाके छलसे उनकी 'व्याज-स्तुति' की है। वास्तवमें, शुद्धवैष्णव अथवा शुद्धभक्ति साधक भक्त (भाः 1/2/11)-वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥" अर्थात् “तत्त्वको जाननेवाले पण्डित लोग वास्तव-तत्त्ववस्तुको 'अद्वयज्ञान' कहते हैं, जो ब्रह्म, परमात्मा और भगवान् - इन तीन नामोंसे जानी जाती हैं।" अथवा (छाः उः 6/2/1)- “एकमेवाद्वितीयम्' अर्थात् “इस विश्वकी सृष्टिसे पूर्व एक, अद्वितीय सत्-वस्तुमात्र थी" आदि शास्त्रीय वाक्योंमें दृढ़ विश्वास रखते हैं। वे तत्त्ववस्तुको असम्मोर्द्ध मानकर भी उन्हें केवल निर्विशेष चिन्मात्र 'ब्रह्म' या सच्चिदात्मक 'भूमा', 'विराट' नामोंसे न कहकर उनका उद्देश्य 'चिद्विलासी रसमय भगवान्'से है। वे ये स्वीकार करते हैं कि शक्तिमान् विग्रह एक 'अद्वयज्ञान' होनेपर भी प्रभावके अनुसार उनकी एक ही शक्तिके बहुतसे भेद अथवा वैचित्र्य हैं। उनमें स्वगत-सजातीय-विजातीय भेद अथवा ज्ञेय-ज्ञान-ज्ञाता, - ये तीन अवस्थाएँ नित्य-वर्तमान हैं, एवं उनके स्वरूपविग्रहसे अभिन्न नित्य नाम, रूप, गुण, लीला और परिकरवैशिष्ट्य विद्यमान है। इसलिये भक्ति-मार्गीय वैष्णवगण कभी भी अहंग्रहोपासक मायावादी नहीं हैं। यह कहना अधिक होगा कि यदि ज्ञेय और ज्ञाता पृथक् न हों, तो परस्पर ज्ञान, विलास अथवा रस-वैचित्र्य नहीं रहता। इसलिये केवलाद्वैत-सिद्धान्त-प्रच्छन्न अवैदिक नास्तिक्यवाद-मात्र है। श्रीनित्यानन्द प्रभुने इसीकी निन्दा की है। परमार्थभूत वास्तव वस्तु 'एक' श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य वस्तुमें जो 'द्वितीय'-प्रतीति है - वही माया है। माया दो प्रकारकी है- 'जीव-माया' और 'गुण-माया'; गुणमाया भी 'प्रकृति' और 'प्रधान'के भेदसे दो प्रकारकी है। जहाँ श्रीकृष्णकी प्रतीति है, वहाँ 'द्वितीयकी' (मायाकी) प्रतीति नहीं है- (भाः 2/9/33 और 11/3/45 श्लोकोंके गौड़ीय-भाष्य देखें)। शुद्धभक्त प्रह्लादके समान महाभागवतको सर्वत्र 'एक' श्रीकृष्णकी प्रतीति होती है (भाः 7/4/37) – “कृष्णग्रह-गृहीतात्मा न वेद जगदीदृशम्।” अर्थात् “प्रह्लादका मनको श्रीकृष्णके अनुग्रहरूप ग्रहने इस प्रकार खींच लिया कि जगत् इस प्रकार श्रीकृष्णके बिना प्रतीतिमय है, यह वे नहीं जानते थे।”। इसलिये उनको द्वितीयाभिनिवेश-जनित मृत्यु या भय अर्थात् संसार (वृः आः 1/4/2) नहीं रहता। श्रीअद्वैताचार्यने आचार्यरूपमें इस 'अद्वयज्ञान-दर्शन'के आधारपर 'शुद्धभक्तिकी ही प्रशंसा' की है। श्रीनित्यानन्द प्रभुने द्वितीयाभिनिवेशकारी भोगोंमें रत जड़-द्वैतवादियोंका तिरस्कार करके श्रीअद्वैताचार्यके इस अद्वयज्ञान-दर्शनकी ही प्रशंसा की है। श्रीरूप प्रभुने 'उपदेशामृत'में लिखा है, - "ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति । भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम्॥” इस श्लोकके अनुसार भोजनादि सङ्गविषयक विचार- शुद्धभक्तोंके लिये अवश्य पालनीय है। परन्तु, प्रच्छन्न मायावादी अथवा द्वितीयाभिनिवेशमें रत प्राकृत-सहजियाओंके साथ शुद्धभक्तोंको कभी भी एकत्र भोजन करना उचित नहीं है, - यह भी श्रीनित्यानन्द प्रभुने इङ्गितके द्वारा बतलाया ॥ 194-195 ॥ निन्दाके छलसे दोनों प्रभुओंकी परस्पर स्तुति :- एइमत दुइजने करे बलाबलि। व्याज-स्तुति करे दुँहे, येन गालागालि ॥ 196 ॥ अनुवाद-इस प्रकार दोनों ही एक-दूसरेको कुछ-न-कुछ कहते रहे। दोनों ही एक दूसरेकी छलसे स्तुति कर रहे थे, परन्तु बाहरसे ये निन्दा प्रतीत हो रही थी ॥ 196 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'व्याज-स्तुति' - छल स्तुति अर्थात् बाहरसे निन्दा-वाक्य, भीतरसे माहात्म्यसूचक वचन ॥ 196 ॥ 490 ।