भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1336

बारहवाँ अध्याय 12/188-204 ] अणुभाष्य- 'दुइँजने क्रीड़ा-कलह' - मध्यलीला 3/93-101 संख्या देखें ॥ 188-196 ॥ महाप्रभुके द्वारा सभी भक्तोंको महाप्रसाद देना :- तबे प्रभु सर्व वैष्णवेर नाम लञा। महाप्रसाद देन महा-अमृत सिञ्चिया ॥ 197 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने सभी वैष्णवोंका नाम पुकारकर उन्हें महाप्रसाद दिलवाया और उसपर अपनी कृपारूपी महा-अमृतका सिञ्चन किया ॥ 197 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुने वैष्णवोंको महाप्रसाद दिलवाया; उसपर महाप्रभुका कृपारूप अमृत सिञ्चित होनेके कारण वह और अधिक आस्वाद्यनीय हो गया ॥ 197 ॥ प्रसाद-सम्मानके बाद हरिध्वनि देकर उठना और आचमन :- भोजन करि' उठे सबे हरिध्वनि करि'। हरिध्वनि उठिल सब स्वर्गमर्त्त्य भरि' ॥ 198 ॥ भक्तोंको अपने हाथोंसे माला और चन्दन देना :- तबे महाप्रभु सब निज-भक्तगणे। सबाकारे श्रीहस्ते दिला माल्य-चन्दने ॥ 199 ॥ अनुवाद—उसके बाद सभी भोजन करके हरिध्वनि करते हुए उठ खड़े हुए और उस हरिध्वनिसे स्वर्गलोक और मर्त्यलोक गूँज उठे। तब महाप्रभुने अपने समस्त भक्तोंको अपने श्रीहस्तकमलोंसे माला पहनायी और चन्दन लगाया ॥ 198-199 ॥ श्रीस्वरूपादि सात परिवेशक करनेवाले भक्तोंको सबसे अन्तमें प्रसादकी प्राप्ति :- तबे परिवेशक स्वरूपादि सातजन। गृहेर भितरे कैल प्रसाद भोजन ॥ 200 ॥ श्रीगोविन्दकी सहायतासे श्रीहरिदासको महाप्रभुके उच्छिष्टकी प्राप्ति :- प्रभुर अवशेष गोविन्द राखिल धरिया। सेइ अन्न हरिदासे किछु दिल लञा ॥ 201 ॥ श्रीगोविन्दको सबसे अन्तमें महाप्रभुके उच्छिष्टकी प्राप्ति :- भक्तगण गोविन्द-पाश किछु मागि' निल। सेइ प्रसादान्न गोविन्द आपनि पाइल ॥ 202 ॥ अनुवाद—उसके बाद परिवेशक करनेवाले श्रीस्वरूप दामोदर आदि सात भक्तोंने घरके भीतर बैठकर प्रसाद ग्रहण किया। श्रीगोविन्दने महाप्रभुके अवशिष्ट प्रसादको रख लिया और उसमेंसे कुछ अन्न प्रसाद लेकर श्रीहरिदास ठाकुरको दिया। भक्तोंने भी श्रीगोविन्दसे महाप्रभुके अवशिष्ट प्रसादमेंसे थोड़ा-थोड़ा माँगकर ले लिया और अन्तमें जो बचा, उसे श्रीगोविन्दने स्वयं ग्रहण किया ॥ 200-202 ॥ गुण्डिचा-मार्जन-लीलाका ही नामान्तर 'धोयापाखला'-लीला :- स्वतन्त्र ईश्वर प्रभु करे नाना खेला। 'धोयापाखला' नाम कैल एइ एक लीला ॥ 203 ॥ अनुवाद—महाप्रभु स्वतन्त्र ईश्वर हैं, इसलिये वे अनेक प्रकारकी लीलाएँ करते हैं। उन्होंने 'धोयापाखला' नामक यह एक लीला भी की ॥ 203 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'धोयापाखला' - इस गुण्डिचा-मार्जन- लीलाको उड़िया भाषामें 'धोयापाखला' कहते हैं ॥ 203 ॥ अनवसरके अन्तमें नेत्रोत्सव या अङ्गरागोत्सव :- आर दिने जगन्नाथेर 'नेत्रोत्सव' - नाम। महोत्सव हैल भक्तेर प्राण समान ॥ 204 ॥ अनुवाद-अगले दिन श्रीजगन्नाथका 'नेत्रोत्सव' - नामक उत्सव हुआ। यह महोत्सव भक्तोंके लिये प्राणोंके समान है ॥ 204 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'नेत्रोत्सव'-स्नानके समय श्रीजगन्नाथका रङ्ग धुलनेके कारण 'अनवसर'-कालमें तीनों मूर्तियोंका 'अङ्गराग' होता है। नवयौवन दिवसमें प्रातःकालमें नेत्रोत्सव अर्थात् नेत्रोंका अङ्गराग होता है ॥ 204 ॥ । 491