श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1332, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबारहवाँ अध्याय 12/173-184 ] अनुवाद—तब श्रीस्वरूप दामोदरने उत्तम मिठाई प्रसाद लेकर महाप्रभुके सामने खड़े होकर निवेदन किया,—"इस थोड़ेसे महाप्रसादका आस्वादन कीजिये, देखो ! भगवान् श्रीजगन्नाथने कैसा भोजन किया है॥" 173-174 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीस्वरूपकी इच्छा पूर्ण :- एत बलि' आगे किछु करे समर्पण। ताँर स्नेहे प्रभु किछु करेन भोजन ॥ 175 ॥ अनुवाद—इतना कहकर श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुके पत्तलमें कुछ मीठा प्रसाद दे दिया और उनके स्नेहके कारण महाप्रभुने उसमेंसे कुछ ग्रहण कर लिया ॥ 175 ॥ श्रीस्वरूप और श्रीजगदानन्दके विचित्र-प्रेमवश महाप्रभु :- एइमत दुइजने करे बारबार। विचित्र एइ दुइ भक्तेर स्नेह-व्यवहार ॥ 176 ॥ दोनोंकी महाप्रभु-प्रीतिको देखकर श्रीसार्वभौमका हास्य :- सार्वभौमे प्रभु बसाइयाछेन वाम-पाशे। दुइ भक्तेर स्नेह देखि' सार्वभौम हासे ॥ 177 ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीजगदानन्द पण्डित, दोनों ही बार-बार आकर महाप्रभुको कुछ-न-कुछ परोस देते। महाप्रभुके प्रति इन दोनों भक्तोंका अद्भुत स्नेहपूर्ण व्यवहार है। महाप्रभुने श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यको अपने बायीं ओर बैठाया था और इन दोनों भक्तोंके स्नेहको देखकर श्रीसार्वभौम मुस्कराने लगे ॥ 176-177 ॥ श्रीसार्वभौमके प्रति महाप्रभुका स्नेह :- सार्वभौमे देयान प्रभु प्रसाद उत्तम। स्नेह करि' बारबार करान भोजन ॥ 178 ॥ महाप्रभुकी आज्ञासे श्रीगोपीनाथके द्वारा श्रीभट्टाचार्यको उत्तम प्रसाद-दान :- गोपीनाथाचार्य उत्तम महाप्रसाद आनि'। सार्वभौमे देन प्रसाद प्रभु-आज्ञा मानि' ॥ 179 ॥ श्रीसार्वभौमके पूर्व और वर्तमान आचरणकी तुलना :- "काँहा भट्टाचार्येर पूर्व जड़-व्यवहार। काँहा एइ परमानन्द,—करह विचार ॥" 180 ॥ अनुवाद—महाप्रभु श्रीसार्वभौमको भी उत्तम प्रसाद खिलाना चाह रहे थे, इसलिये वे स्नेहके कारण परिवेशण करनेवालोंके द्वारा उनके पत्तलमें उत्तम व्यञ्जन बार-बार डलवा रहे थे। श्रीगोपीनाथाचार्यने भी उत्तम महाप्रसाद लाकर श्रीसार्वभौमको परिवेशण किया और कहा,—"थोड़ा विचार कीजिये कि कहाँ तो भट्टाचार्यका पहलेवाला जड़ व्यवहार ! और कहाँ अब ये परमानन्द ॥" 178-180 ॥ अनुभाष्य—श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य पहले स्मार्त्त विचारवाले थे और प्राकृत जगत्की सब वस्तुएँ जड़ हैं, ऐसा उनका दृढ़ विश्वास था। इसलिये उनको प्रसादमें, श्रीगोविन्द-नाममें और वैष्णवोंमें अप्राकृत-श्रद्धा नहीं थी, अर्थात् इन्हें वे अप्राकृत नहीं मानते थे। अब महाप्रभुकी कृपासे इन सबमें अप्राकृत-दर्शनमें विश्वास प्राप्त करके उन्होंने प्रसाद आदि ग्रहण करनेमें परमानन्द प्राप्त किया—यही विचारका विषय है॥ 180 ॥ श्रीभट्टाचार्यका दैन्य और श्रीगोपीनाथके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन :- सार्वभौम कहे,—"आमि तार्किक कुबुद्धि। तोमार प्रसादे मोर ए सम्पत्-सिद्धि ॥ 181 ॥ महाप्रभुकी अहैतुकी कृपा-महिमाका वर्णन :- महाप्रभु बिना केह नाहि दयामय। काकेरे गरुड़ करे,—ऐछे कौन हय ॥ 182 ॥ अपनी पूर्व और वर्तमान अवस्थापर विचार :- तार्किक-शृगाल-सङ्गे भेउ-भेउ करि। सेइ मुखे एबे सदा कहि 'कृष्ण' 'हरि' ॥ 183 ॥ काँहा बहिर्मुख तार्किक-शिष्यगण-सङ्गे। काँहा एइ सङ्गसुधा-समुद्र-तरङ्गे ॥" 184 ॥ । 487