श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 12/165-174 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला द्वापरमें श्रीकृष्णकी पुलिन-भोजन-लीलाका उद्दीपन :- पुलिन-भोजन कृष्ण पूर्वे यैछे कैल। सेइ लीला महाप्रभुर मने स्मृति हैल ॥ 165 ॥ अनुवाद-द्वापरमें श्रीकृष्ण जैसे अपने सखाओंके साथ यमुना पुलिन-स्थित (तट-स्थित) वनमें भोजन करते थे, महाप्रभुके मनमें आज उसका स्मरण हो आया ॥ 165 ॥ महाप्रभुका धैर्य और भावोंका संवरण :- यद्यपि प्रेमावेशे प्रभु हैला अस्थिर। समय बुझिया प्रभु हैला किछु धीर ॥ 166 ॥ अनुवाद-यद्यपि श्रीकृष्णकी लीलाको स्मरण करते ही महाप्रभु प्रेमावेशमें अधीर हो गये, तथापि समय और परिस्थितिको देखकर उन्होंने कुछ धैर्य धारण किया ॥ 166 ॥ महाप्रभुकी वैराग्यलीला :- प्रभु कहे,-“मोरे देह' लाफ्रा-व्यञ्जने। पिठा-पाना, अमृत-गुटिका देह' भक्तगणे॥” 167 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - "मुझे तो केवल लाफ्रा- व्यञ्जन दो और सब भक्तोंको पिठा-पाना, अमृत-गुटिका आदि दो॥" 167 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'लाफ्रा-व्यञ्जन' - सामान्य सूखी सब्जीके जैसा एक प्रकारका विशेष व्यञ्जन; उसे चावलमें मिलाकर दुःखी (गरीब) लोगोंको बाँटा जाता है। 'अमृतगुटिका' - दूधमें पकाई गयी मोटी 'पूड़ी', जिसको सभी 'अमृत-रसावली' कहते हैं ॥ 167 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला, 6/43-44 संख्या देखें ॥ 167 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा प्रत्येक भक्तको उसके मनके अनुसार प्रसाद-दान :- सर्वज्ञ प्रभु जानेन, याँरे येइ भाय। ताँरे ताँरे सेइ देओयाय स्वरूप-द्वाराय ॥ 168 ॥ अनुवाद-सर्वज्ञ महाप्रभु जानते थे कि किसे क्या अच्छा लगता है, इसलिये उन्होंने श्रीस्वरूप दामोदरके द्वारा सबको उनकी रुचिके अनुसार परिवेशन करवाया ॥ 168 ॥ श्रीजगदानन्दका महाप्रभुके प्रति प्रीतिका प्रदर्शन :- जगदानन्द बेड़ाय परिवेशन करिते। प्रभुर पाते भाल-द्रव्य देन आचम्बिते ॥ 169 ॥ महाप्रभुके न चाहनेपर भी उनका उत्तम भोग देनेपर सन्तोष :- यद्यपि दिले प्रभु ताँरे करेन रोष। बले-छले तबु देन, दिले से सन्तोष ॥ 170 ॥ श्रीजगदानन्दके मानके भयसे महाप्रभुके द्वारा थोड़ा-थोड़ा ग्रहण :- पुनरपि सेइ द्रव्य करे निरीक्षण। ताँर भये प्रभु किछु करेन भक्षण ॥ 171 ॥ ना खाइले जगदानन्द करिबे उपवास। ताँर आगे किछु खा'न-मने ऐ त्रास ॥ 172 ॥ अनुवाद-जब श्रीजगदानन्द परिवेशन करते हुए महाप्रभुके पास आये, तो उन्होंने अचानक अच्छे-अच्छे व्यञ्जन उनके पत्तलमें डाल दिये। उनके ऐसा करनेपर महाप्रभुने उनके प्रति क्रोध दिखलाया। परन्तु श्रीजगदानन्द कभी छलसे और कभी बलसे ऐसे परिवेशन करने लगे, तब महाप्रभुके मनमें सन्तोष ही हुआ। महाप्रभुने पुनः पत्तलमें पड़े हुए उन व्यञ्जनोंको देखा और श्रीजगदानन्दके भयसे उसमेंसे कुछ खा लिया। महाप्रभुके मनमें यह भय था कि उनके नहीं खानेसे श्रीजगदानन्द उपवास करेंगे, इसलिये उनके सामने उन व्यञ्जनोंमेंसे कुछ खा लेते ॥ 169-172 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुको मिठाई प्रसादका परिवेशन :- स्वरूप-गोसाञि भाल मिष्टप्रसाद लञा। प्रभुके निवेदन करे आगे दाण्डाञा ॥ 173 ॥ "एइ महाप्रसाद अल्प करह आस्वादन। देख, जगन्नाथ कैछे करयाछेन भोजन ॥" 174 ॥ 486 ।