भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1342, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1342

[ 13/5-11 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीजगन्नाथ, बलदेव और सुभद्रा, - इन तीन मूर्तियोंको रेशमकी डोरसे बाँधकर सेवकगण मन्दिरसे जिस प्रणालीके द्वारा सिंहद्वारके निकट रथपर चढ़ाते हैं, उसे 'पाण्डु-विजय' कहते हैं॥5॥ अनुभाष्य- 'पाण्डुविजय अथवा पाहाण्डि'-सिंहासनसे रथारोहण॥5॥ पाहाण्डिके दर्शनमें सपरिकर राजाकी सहायता :- आपनि प्रतारुद्र लञा पात्रगण। महाप्रभुर गणे कराय विजय-दर्शन ॥6॥ अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रने स्वयं और उनके परिचारकोंने महाप्रभुके भक्तोंके पाण्डु-विजयके दर्शनकी व्यवस्था की॥6॥ श्रीनिताइ-श्रीअद्वैतादिके साथ महाप्रभुका पाहाण्डि-दर्शन :- अद्वैत, निताइ आदि सङ्गे भक्तगण। सुखे महाप्रभु देखे ईश्वर-गमन ॥7॥ अनुवाद-श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि परिकरों और अन्य भक्तोंके साथ महाप्रभु आनन्दपूर्वक श्रीजगन्नाथकी यात्राका दर्शन करने लगे॥7॥ दयिताओंकी श्रीजगन्नाथदेवको रथपर चढ़ानेकी चेष्टा :- बलिष्ठ 'दयिता' गण-येन मत्त हाती। जगन्नाथ विजय कराय करि' हाताहाति ॥8॥ कतक दयिता करे स्कन्ध आलम्बन। कतक दयिता धरे श्रीपद्म-चरण ॥9॥ कटितटे बद्ध, दृढ़, स्थूल पट्टडोरी। दुइदिके दयितागण उठाया ताहा धरि' ॥10॥ उच्च दृढ़ तुली सब पाति' स्थाने स्थाने। एक तुली हैते त्वराय आर तुली आने ॥11॥ अनुवाद-मत्त हाथीकी भाँति बलवान् श्रीजगन्नाथके 'दयिता' सेवक श्रीजगन्नाथको अपने हाथोंपर उठाकर सिंहासनसे रथपर ले जा रहे थे। कुछ दयिता श्रीजगन्नाथके कन्धेके नीचे हाथका सहारा दे रहे थे और कुछ दयिता श्रीजगन्नाथके श्रीचरणकमलोंको पकड़कर उन्हें उठा रहे थे। श्रीजगन्नाथकी कमरमें रेशमकी मजबूत मोटी रस्सी बँधी थी और उनके दोनों ओरसे दयिता लोग उस रस्सीको पकड़कर उन्हें उठाकर चल रहे थे। सिंहासनसे रथ तक आनेके मार्गमें स्थान-स्थान पर मजबूत, मोटे रूईके गद्दे बिछाये हुए थे। दयिता लोग श्रीजगन्नाथको एक गद्देसे उठाकर जल्दीसे आगेवाले गद्दे तक ले जा रहे थे॥8-11॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'दयितागण'- 'दयित'-शब्दसे 'दयिता' शब्द बना है। श्रीजगन्नाथके दयिता-नामसे एक श्रेणीके सेवक हैं। ये जातिसे भद्र नहीं हैं, किन्तु इन्होंने श्रीजगन्नाथकी सेवा प्राप्त करके भद्र-वर्णका सम्मान प्राप्त किया है। स्नानके दिनसे आरम्भ करके रथके लौट आने तक दयिताओंका श्रीजगन्नाथपर (अर्थात् उनकी सेवामें) विशेष अधिकार रहता है। दयिताओंको 'क्षेत्रमाहात्म्य'में 'शबर' कहा गया है। उनमें जो ब्राह्मण हैं, उन्हें 'दयितापति' कहा जाता है। ये श्रीजगन्नाथदेवको अनवसर कालमें मिठाईका भोग देते हैं और प्रतिदिन प्रातःकालमें बालभोगमें मिठाई अर्पण करते हैं। ये अनवसर-कालमें 'श्रीजगन्नाथदेवको ज्वर हुआ है' कहकर उन्हें औषधि और पाँचन (मीठे रसका पाना) अर्पित करते हैं। मूल बात यह है कि श्रीजगन्नाथकी प्रतिष्ठासे पहले शबरोंके पास श्रीनीलमाधव-मूर्ति थी, उसी श्रीनीलमाधव-मूर्तिका बादमें 'श्रीजगन्नाथमें' परिणत होनेके कारण शबर-दयिताओंका श्रीजगन्नाथकी अन्तरङ्ग सेवामें अधिकार उत्पन्न हुआ है। 'तूली'-कपड़ेमें भरी हुई रूई, रूई की छोटी-छोटी गद्दियाँ (तकियेके समान)॥8-11॥ अनुभाष्य- 'पाति'-डालकर, बिछाकर; 'आर तुली'-अन्य गद्दीपर॥11॥ 498 ।