भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1353

तेरहवाँ अध्याय [right-aligned: 13/80 ]

है। किन्तु शङ्कराचार्यके अनुगत जनोंके द्वारा 'अहं ब्रह्मास्मि'-मन्त्रके द्वारा मुक्तिस्पृहा-रूप पिशाचीको आह्वान करनेपर भूतशुद्धि वहाँसे बहुत दूरीपर ही अवरुद्ध हो जाती है। “ज्ञानी जीवन्मुक्तदशा पाइनु करि माने। वस्तुतः बुद्धि शुद्ध नहे कृष्णभक्ति बिने॥” (चैःचः मध्यलीला 22/29)। उनका जो ब्रह्मध्यान है, वह ब्रह्म (?) होकर स्वयं ब्रह्मका परित्याग करनेके लिये ही है, ब्रह्म-पूजनके उद्देश्यसे नहीं है। किन्तु श्रुतियोंमें कहा गया है,—“ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति”–ब्रह्म होकर ही ब्रह्मकी प्राप्ति होती है; “सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता”—वह मुक्तात्मा सर्वज्ञ ब्रह्मके साथ समस्त सेवाभिलाष उपभोग करती है। श्रीमद्भगवद्गीता कहती है,—“ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभेत् पराम्।” श्रीमद्भागवतमें सर्ववेदान्तके साररूपमें जीवका परिचय व्यक्त करते हुए कहा गया है,—“सर्ववेदान्तसारं यद्ब्रह्मात्मैकत्वलक्षणम्” (भाः 12/13/12)। ब्रह्ममें जो लक्षण हैं, जीवात्मामें वही लक्षण वर्तमान हैं—दोनों सजातीय समतात्पर्यपर न होनेसे अद्वयज्ञान सिद्ध नहीं होता। (इस प्राकृत) भेद-जगत्में जो अवस्था है, यदि ज्ञेय पदार्थ (अद्वयज्ञान तत्त्व) भी उस प्रकार भेदजातीय हो, तब अद्वयज्ञानमें भी जड़भोग या त्यागमूलक चिन्त्य द्वैतवादकी तुच्छता आकर उपस्थित होगी। 'वे मेरे नित्य चेतनमय, आनन्दमय, ज्ञानमय प्रभु हैं, मैं उनके आनन्दका विधान करनेवाला चित्कण पदार्थ हूँ, उनसे पृथक् मेरा अवस्थान ही माया, अविद्या है'—यही ब्रह्मके साथ जीवका एकत्वका लक्षण है। इस स्थानपर ही अद्वयज्ञान प्रतिष्ठित होकर ब्रह्मके साथ जीवके नित्य सेव्य-सेवक, व्यापक-व्याप्य सम्बन्धको स्थापित करके जीवको परंब्रह्मके सान्निध्यमें लाता है—“ब्रह्म मां परमं प्रापुः” (भाः 11/12/13)। श्रुतिमें कथित उस 'अहं ब्रह्मास्मि'-मन्त्रमें जीवका जो स्वरूप-विज्ञान ग्रथित होकर रहता है, उसे ही “वेदान्तकृद्-वेदविदेव चाहम्” (गीः 15/15) अर्थात् मूल वेदान्तकारी और समस्त वेदोंके तात्पर्यको जाननेवाले भगवान् श्रीगौरसुन्दरने प्रकाश किया है—'अहं गोपीभर्तुः पदकमलयोर्दासदासानुदासोऽस्मि'—मैं गोपीनाथ श्रीकृष्णके चरणकमलयुगलके आश्रित दासके दासका अनुदास हूँ। 'मुकुन्दपदवीं' अर्थात् श्रीकृष्णके चरणकमल जिन्हें श्रुतियाँ विशेषरूपसे ढूँढ़ती रहती हैं और वे ही वेदान्तका एकमात्र चरम प्रतिपाद्य विषय हैं। महा-महा-वेदान्तिकोंमें भी अग्रगणीय, विशुद्ध-चेतनमें अवस्थिता, परमसिद्धा गोपियाँ सभी चिद्-इन्द्रियोंके द्वारा उस मुकुन्दपदवीकी ही सर्वोन्नत-रसमें (शृङ्गार-रसमें) सेवामें निमग्न हैं। परंब्रह्म श्रीकृष्ण स्वयं अखिल परमानन्द-अमृतसिन्धु होनेपर भी गोपियाँ उनके सर्व आनन्दका स्रोत हैं। श्रीकृष्ण सभीको उनके भजनके अनुरूप प्रतिदान देनेमें समर्थ होनेपर भी गोपियोंकी प्रीतिके अनुरूप प्रतिदानमें समर्थ नहीं हैं। गोपियोंके तुल्य अन्य कोई श्रीकृष्णके मर्मज्ञ भी नहीं हैं। तटस्था शक्तिसे उत्पन्न, बालके अग्रभागके दस हजारवें भागके जितने परिमाणके अणुचेतन पदार्थ जीवके आत्मगत विचारसे विविध रसोंमें अनेक प्रकारके परिचय सम्भव हैं। परन्तु समस्त गोपियोंमें सर्वश्रेष्ठा, मूल ह्लादिनी-स्वरूपिणी, परा ब्रह्मस्वरूपा, स्वरूपशक्ति श्रीवार्षभानवीके (श्रीराधाके) प्रियतमके दासदासानुदास रूपमें अपनेको सम्बन्धित करनेपर, जीव सर्व शिरोमणिरूपमें दैदीप्यमान होकर ब्रह्मा-शिवादिके भी वन्दनीयरूपमें परिगणित होते हैं। यही 'अहं ब्रह्मास्मि'-मन्त्रकी स्वरूपावधि (स्वरूपकी सीमा) है। उस आत्मजगत्में अविमिश्र-चेतनराज्यमें सभी कुछ चेतनमय हैं—उसमें अचेतनता, अनित्यता, तुच्छता, असम्पूर्णता या अभावका कोई स्थान नहीं है। दूसरी ओर यह अनात्म जगत्-मिश्रित चेतनराज्य है अर्थात् इस जड़ जगत्में चेतन आत्माएँ भी विद्यमान हैं। यहाँ जड़ जगत्में चेतनके विकासके लिये नित्यता, सम्पूर्णता, अकपटता, अव्यभिचारिता, ईशता, निर्गुणता, अविमिश्रता आदिकी अवस्थिति नहीं है—“नासतो विद्यते भावो

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