श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनाभावो विद्यते सतः।" (गीता 2/16)। इसलिये इस ब्रह्माण्डगत सभी स्थूल-सूक्ष्मभाव चिद्-अचिद्-मिश्र होनेके कारण विद्वेष, अचेतनता, असम्पूर्णतासे रहित नहीं हो सकते। इसलिये श्रीचैतन्य महाप्रभुने उस सब स्थूल-सूक्ष्मभावोंको त्याग करनेका उपदेश दिया है,-'मैं ब्राह्मण नहीं, क्षत्रिय नहीं, वैश्य नहीं या शूद्र भी नहीं हूँ, अथवा आश्रम विचारसे मैं ब्रह्मचारी नहीं, गृहस्थ नहीं, वानप्रस्थ या संन्यासी भी नहीं हूँ।' "अहङ्कारविमूढात्मा कर्त्ताहमिति मन्यते" (गीता 3/43)-अशुद्ध अहङ्कारके द्वारा जीव विवेकरहित हो जाता है और 'मैं ही कर्त्ता हूँ'-इस अभिमानसे अपनी सुविधानुसार कभी भोगी और कभी त्यागी हो जाता है। उस अशुद्ध अहङ्कारवशतः वर्णाश्रम-विचारसे या 'जन्म-ऐश्वर्य-श्रुत-श्री' के परिमापसे जीवके समस्त अभिमान नितान्त जड़ीय अथवा अचिद्मिश्र, कुण्ठायुक्त हैं। इसलिये उन-उन अभिमानोंके वशवर्ती होकर सम्पूर्ण-चेतनराज्य-वैकुण्ठमें अभियान सम्भव नहीं होता। जीवके शुद्ध-अहङ्कारमें स्वयंको अद्वयज्ञान-परतत्त्वका सेवक मानकर जो केवल उनके दासके दासका दास अभिमान है, वह किसी प्रकारसे जड़ीय दीनता नहीं है। इस जगत्में दीनताका कारण दूर होनेपर दम्भ (घमण्ड) आकर उपस्थित हो जाता है, इसलिये वह दीनता दम्भका ही दूसरा रूप है। मायाके सङ्गसे 'अशुद्ध-अहङ्कार'-ग्रस्त जीव 'अहं ब्रह्मास्मि'-मन्त्रसे स्वयंको ब्रह्मके प्रतियोगी रूपमें ध्यान करके केवल दम्भमात्रको ही सञ्चय करता है। इस प्रकार वह भगवद्-चरणकमलोंमें अपराध करता रहता है और उसके फलस्वरूप उसका अधःपतन अनिवार्य हो जाता है। किन्तु “गोपीभर्तुः पदकमलयोर्दासदासानुदासः” या सम्राट कुलशेखर-रचित 'त्वद्भृत्य-भृत्य-परिचारक- भृत्यभृत्य-भृत्य भृत्य इति मां स्मर लोकनाथ"-इस रूपसे जो आत्मगत क्षुद्रातिक्षुद्र-अभिमान है, वह इस जगत्में तृणके भीतर जो सर्वापेक्षा क्षुद्र होनेका अभिमान निहित है, उससे भी अतीत है। वही आत्मगत दैन्य शुद्धभक्तिके अनुभाव-रूपमें मात्र प्रकाशित होता है और वह भक्तिका सम्वर्धन करते-करते उत्तरोत्तर वर्धित होकर श्रीकृष्णका आकर्षण करता है। तब दैन्यका कारण दूरीभूत होनेपर भी वह दैन्य नवनवायमान होकर श्रीकृष्ण-प्रीति उत्पादक विभूषणमें परिणत होता है॥ 80 ॥ महाप्रभुका अनुगमन करके भक्तोंका भगवान्को प्रणाम :- एत पड़ि' पुनरपि करिल प्रणाम। जोड़हाते भक्तगण वन्दे भगवान्॥ 81 ॥ अनुवाद-इन सब श्लोकोंको पढ़कर महाप्रभुने पुनः श्रीजगन्नाथको प्रणाम किया और समस्त भक्तोंने भी अपने हाथ जोड़कर श्रीजगन्नाथकी वन्दना की ॥ 81 ॥ महाप्रभुके उद्दण्ड नृत्यका वर्णन :- उद्दण्ड नृत्य प्रभु करिया हुँकार। चक्र-भ्रमि भ्रमे यैछे अलात-आकार ॥ 82 ॥ नृत्ये प्रभुर् याँहा याँहा पड़े पदतल। ससागर-शैल मही करे टलमल ॥ 83 ॥ अनुवाद-महाप्रभु हुँकार करते हुए ऊँचा-ऊँचा कूदकर नृत्य करते हुए चक्रकी भाँति गोल परिधिमें घूमने लगे, इस प्रकार वे अलातचक्रकी भाँति दिखने लगे। नृत्य करते समय महाप्रभुके चरण जहाँ-जहाँ पड़ते, पर्वत और सागर सहित पृथ्वी टलमल करने लगती ॥ 82-83 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'चक्र-भ्रमि भ्रमे यैछे अलात- आकार'-जलते हुए अङ्गारेके चक्रके समान महाप्रभु चक्रमें भ्रमण करनेवाले जैसे घूमने लगे ॥ 82 ॥ अनुभाष्य-अलातचक्र अर्थात् जलते हुए अङ्गारेको बहुत तेजीसे घुमानेपर वह जैसे एक पूरे जलते हुए चक्रकी भाँति प्रतीत होता है, किन्तु वह वास्तवमें जलता हुआ चक्र नहीं होता, उसी प्रकार महाप्रभु उद्दण्ड नृत्य करते-करते 'एक'-विग्रह होनेपर भी सर्वत्र 'व्यापक' रूपमें दिखलायी दिये थे॥ 82 ॥ 510 ।