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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

नाभावो विद्यते सतः।" (गीता 2/16)। इसलिये इस ब्रह्माण्डगत सभी स्थूल-सूक्ष्मभाव चिद्-अचिद्-मिश्र होनेके कारण विद्वेष, अचेतनता, असम्पूर्णतासे रहित नहीं हो सकते। इसलिये श्रीचैतन्य महाप्रभुने उस सब स्थूल-सूक्ष्मभावोंको त्याग करनेका उपदेश दिया है,-'मैं ब्राह्मण नहीं, क्षत्रिय नहीं, वैश्य नहीं या शूद्र भी नहीं हूँ, अथवा आश्रम विचारसे मैं ब्रह्मचारी नहीं, गृहस्थ नहीं, वानप्रस्थ या संन्यासी भी नहीं हूँ।' "अहङ्कारविमूढात्मा कर्त्ताहमिति मन्यते" (गीता 3/43)-अशुद्ध अहङ्कारके द्वारा जीव विवेकरहित हो जाता है और 'मैं ही कर्त्ता हूँ'-इस अभिमानसे अपनी सुविधानुसार कभी भोगी और कभी त्यागी हो जाता है। उस अशुद्ध अहङ्कारवशतः वर्णाश्रम-विचारसे या 'जन्म-ऐश्वर्य-श्रुत-श्री' के परिमापसे जीवके समस्त अभिमान नितान्त जड़ीय अथवा अचिद्मिश्र, कुण्ठायुक्त हैं। इसलिये उन-उन अभिमानोंके वशवर्ती होकर सम्पूर्ण-चेतनराज्य-वैकुण्ठमें अभियान सम्भव नहीं होता। जीवके शुद्ध-अहङ्कारमें स्वयंको अद्वयज्ञान-परतत्त्वका सेवक मानकर जो केवल उनके दासके दासका दास अभिमान है, वह किसी प्रकारसे जड़ीय दीनता नहीं है। इस जगत्में दीनताका कारण दूर होनेपर दम्भ (घमण्ड) आकर उपस्थित हो जाता है, इसलिये वह दीनता दम्भका ही दूसरा रूप है। मायाके सङ्गसे 'अशुद्ध-अहङ्कार'-ग्रस्त जीव 'अहं ब्रह्मास्मि'-मन्त्रसे स्वयंको ब्रह्मके प्रतियोगी रूपमें ध्यान करके केवल दम्भमात्रको ही सञ्चय करता है। इस प्रकार वह भगवद्-चरणकमलोंमें अपराध करता रहता है और उसके फलस्वरूप उसका अधःपतन अनिवार्य हो जाता है। किन्तु “गोपीभर्तुः पदकमलयोर्दासदासानुदासः” या सम्राट कुलशेखर-रचित 'त्वद्भृत्य-भृत्य-परिचारक- भृत्यभृत्य-भृत्य भृत्य इति मां स्मर लोकनाथ"-इस रूपसे जो आत्मगत क्षुद्रातिक्षुद्र-अभिमान है, वह इस जगत्में तृणके भीतर जो सर्वापेक्षा क्षुद्र होनेका अभिमान निहित है, उससे भी अतीत है। वही आत्मगत दैन्य शुद्धभक्तिके अनुभाव-रूपमें मात्र प्रकाशित होता है और वह भक्तिका सम्वर्धन करते-करते उत्तरोत्तर वर्धित होकर श्रीकृष्णका आकर्षण करता है। तब दैन्यका कारण दूरीभूत होनेपर भी वह दैन्य नवनवायमान होकर श्रीकृष्ण-प्रीति उत्पादक विभूषणमें परिणत होता है॥ 80 ॥ महाप्रभुका अनुगमन करके भक्तोंका भगवान्‌को प्रणाम :- एत पड़ि' पुनरपि करिल प्रणाम। जोड़हाते भक्तगण वन्दे भगवान्॥ 81 ॥ अनुवाद-इन सब श्लोकोंको पढ़कर महाप्रभुने पुनः श्रीजगन्नाथको प्रणाम किया और समस्त भक्तोंने भी अपने हाथ जोड़कर श्रीजगन्नाथकी वन्दना की ॥ 81 ॥ महाप्रभुके उद्दण्ड नृत्यका वर्णन :- उद्दण्ड नृत्य प्रभु करिया हुँकार। चक्र-भ्रमि भ्रमे यैछे अलात-आकार ॥ 82 ॥ नृत्ये प्रभुर् याँहा याँहा पड़े पदतल। ससागर-शैल मही करे टलमल ॥ 83 ॥ अनुवाद-महाप्रभु हुँकार करते हुए ऊँचा-ऊँचा कूदकर नृत्य करते हुए चक्रकी भाँति गोल परिधिमें घूमने लगे, इस प्रकार वे अलातचक्रकी भाँति दिखने लगे। नृत्य करते समय महाप्रभुके चरण जहाँ-जहाँ पड़ते, पर्वत और सागर सहित पृथ्वी टलमल करने लगती ॥ 82-83 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'चक्र-भ्रमि भ्रमे यैछे अलात- आकार'-जलते हुए अङ्गारेके चक्रके समान महाप्रभु चक्रमें भ्रमण करनेवाले जैसे घूमने लगे ॥ 82 ॥ अनुभाष्य-अलातचक्र अर्थात् जलते हुए अङ्गारेको बहुत तेजीसे घुमानेपर वह जैसे एक पूरे जलते हुए चक्रकी भाँति प्रतीत होता है, किन्तु वह वास्तवमें जलता हुआ चक्र नहीं होता, उसी प्रकार महाप्रभु उद्दण्ड नृत्य करते-करते 'एक'-विग्रह होनेपर भी सर्वत्र 'व्यापक' रूपमें दिखलायी दिये थे॥ 82 ॥ 510 ।

तेरहवाँ अध्याय 13/84-93 ] महाप्रभुके अष्टसात्त्विक विकार :- स्तम्भ, स्वेद, पुलक, अश्रु, कम्प, वैवर्ण्य। नाना भावे विवशता, गर्व, हर्ष, दैन्य ॥ 84 ॥ आछाड़ खाञा पड़े भूमे गड़ि' याय। सुवर्ण-पर्वत यैछे भूमेते लोटाय ॥ 85 ॥ अनुवाद-नृत्य करते हुए महाप्रभुके शरीरमें स्तम्भ, स्वेद, पुलक, अश्रु, कम्प, वैवर्ण्य, विवशता, गर्व, हर्ष और दैन्य आदि प्रेमके विकार और भाव उदित हो रहे थे। पछाड़ खाकर जब महाप्रभु भूमिपर गिरकर लोट-पोट करने लगते, तो ऐसा प्रतीत होता मानो कोई सोनेका पर्वत भूमिपर लोट-पोट खा रहा हो ॥ 84-85 ॥ निताइके द्वारा रक्षा करनेकी चेष्टा :- नित्यानन्दप्रभु दुइ हात प्रसारिया। प्रभुरे धरिते चाहे आसपास धाञा ॥ 86 ॥ महाप्रभुके पीछे हरिध्वनिमें रत श्रीअद्वैत :- प्रभु-पाछे बुले आचार्य करिया हुँकार। 'हरिबोल' 'हरिबोल' बोले बार बार ॥ 87 ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभु अपने दोनों हाथोंको पसारकर महाप्रभुको पकड़नेके लिये उनके आस-पास भाग रहे थे। श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुके पीछे-पीछे चलते हुए बार-बार उच्च स्वरसे 'हरिबोल' 'हरिबोल' बोलते हुए हुँकार कर रहे थे ॥ 86-87 ॥ महाप्रभुको लोगोंके स्पर्शसे रक्षाके लिये तीन दलोंके द्वारा घेरेका गठन :- लोक निवारिते हैल तिन मण्डल। प्रथम-मण्डले नित्यानन्द महाबल ॥ 88 ॥ काशीश्वर मुकुन्दादि यत भक्तगण। हाताहाति करि' हैल द्वितीय आवरण ॥ 89 ॥ बाहिरे प्रतापरुद्र लञा पात्रगण। मण्डल हञा करे लोक निवारण ॥ 90 ॥ अनुवाद-लोगोंकी भीड़को महाप्रभुसे दूर रखनेके लिये उन्होंने तीन चक्र (घेरे) बनाये। भीतरवाले पहले चक्रमें महाबलवान् श्रीनित्यानन्द प्रभु (बलके अधिष्ठात्री देवता श्रीबलदेव प्रभु) रक्षा कर रहे थे। उसके बाहर श्रीकाशीश्वर और श्रीमुकुन्दादि सब भक्तोंने अपने हाथोंको दोनों ओर फैलाकर दूसरे भक्तोंके हाथोंको पकड़कर दूसरा आवरण बनाया। सबसे बाहरी अर्थात् तीसरे चक्रमें राजा प्रतापरुद्रने अपने सैनिकोंको लेकर एक चक्र बनाकर लोगोंको रोक दिया ॥ 88-90 ॥ अनुभाष्य- 'महाबल'-श्रीबलदेव। 'तिनमण्डल'-लोगोंके द्वारा रौंदनेसे बचानेके लिये महाप्रभुको केन्द्रमें रखकर भक्तोंने चक्रके आकारमें उन्हें चारों ओरसे घेरकर तीन वृत्त (घेरे) बनाये। पहले-घेरेमें-अन्यान्य भक्तोंके साथ श्रीनित्यानन्द प्रभु थे, पहले घेरेको केन्द्रमें रखकर पुनः चक्राकारमें श्रीकाशीश्वर और श्रीमुकुन्दादिने दूसरा घेरा बनाया तथा दूसरे घेरेको केन्द्रमें रखकर अपने लोगोंके द्वारा आवृत करके राजा प्रतापरुद्रने तीसरा घेरा बनाया। तीसरे घेरेके द्वारा आवरण करके दूसरे, पहले और उसके भीतर श्रीमन्महाप्रभुको लोगोंकी भीड़से स्वतन्त्र कर दिया। इसका उद्देश्य यह था कि लोगोंकी भीड़से तीसरे घेरेके टूट जानेपर दूसरा और उसके भी उसी प्रकारसे टूट जानेपर पहला घेरा महाप्रभुकी रक्षाके कार्यमें आयेगा ॥ 88 ॥ हरिचन्दनके साथ राजाका महाप्रभुके नृत्यका दर्शन :- हरिचन्दनेर स्कन्धे हस्त आलम्बिया। प्रभुर नृत्य देखे राजा आविष्ट हञा ॥ 91 ॥ राजाके सामने श्रीवासकी महाप्रभु-नृत्य-दर्शन-सेवा :- हेनकाले श्रीनिवास प्रेमाविष्ट-मन। राजार आगे रहिं' देखे प्रभुर नर्त्तन ॥ 92 ॥ राजाको बिना बाधाके दर्शनका सुयोग देनेके लिये श्रीवासको हरिचन्दनकी नम्रभावसे हटानेकी चेष्टा :- राजार आगे हरिचन्दन देखे श्रीनिवास। हस्ते ताँरे स्पर्श कहे,-'हओ एकपाश ॥ '93 ॥ । 511

[ 13/91-106 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सेवारत श्रीवासका पुनः पुनः सेवामें विघ्नहेतु क्रोध :- नृत्यावेशे श्रीनिवास किछुइ ना जाने। बार बार ठेले, तँहो क्रोध हैल मने ॥ 94 ॥ हरिचन्दनको थप्पड़ मारना और उसके फलस्वरूप हरिचन्दनका क्रोधित होना :- चापड़ मारिया तारे कैल निवारण। चापड़ खाञा क्रु अनुवाद-हरिचन्दनके कन्धेपर हाथ रखकर राजा प्रतापरुद्र महाप्रभुके नृत्यको देखकर उसमें आविष्ट हो रहे थे। उस समय श्रीवास पण्डित भी राजाके आगे खड़े होकर महाप्रभुके नृत्यको देखकर प्रेममें आविष्ट हो रहे थे। राजाके आगे श्रीवास पण्डितको देखकर हरिचन्दनने उन्हें अपने हाथके स्पर्शसे एक तरफ हटाते हुए कहा, - 'आप एक ओर हो जाइये।' परन्तु श्रीवास पण्डित तो महाप्रभुके नृत्यको देखनेमें इतने आविष्ट थे कि उन्हें कुछ भी पता नहीं चला। हरिचन्दनके द्वारा बार-बार ठेले जानेपर उनको क्रोध आ गया और हरिचन्दनको थप्पड़ मारकर उसे ठेलनेके लिये मना किया। थप्पड़ खाकर हरिचन्दनको भी क्रोध आ गया ॥ 91-95 ॥ अनुभाष्य - 'तारे'-हरिचन्दनको ॥ 95 ॥ हरिचन्दनको राजाके द्वारा मना करना :- क्रु आपनि प्रतापरुद्र निवारिल तारे ॥ 96 ॥ वैष्णवके द्वारा अपमान या आघात भी सौभाग्यसूचक :- “भाग्यवान् तुमि - इँहार हस्त-स्पर्श पाइला। आमार भाग्ये नाहि, तुमि कृतार्थ हैला ॥" 97 ॥ अनुवाद-हरिचन्दन क्रोधमें आकर श्रीवास पण्डितको कुछ कहना ही चाहता था, परन्तु स्वयं राजा प्रतापरुद्रने उसे यह कहकर रोक दिया, - "तुम बहुत भाग्यवान् हो जो तुमने इनके हाथोंका स्पर्श प्राप्त किया। मेरा ऐसा सौभाग्य नहीं है, तुम कृतार्थ हो गये हो ॥" 96-97 ॥ अनुभाष्य - 'ताँरे' - श्रीवासको ॥ 96 ॥ अपलक नेत्रोंसे निश्चलभावसे श्रीजगन्नाथको महाप्रभुके नृत्यका दर्शन करनेसे परमानन्द :- प्रभुर नृत्य देखि' लोके हैल चमत्कार। अन्य आछुक, जगन्नाथेर आनन्द अपार ॥ 98 ॥ रथ स्थिर कैल, आगे ना करे गमन। अनिमिष-नेत्रे करे नृत्य दरशन ॥ 99 ॥ महाप्रभुके नृत्य-दर्शनसे सुभद्रा एवं बलराम भी हर्षित :- सुभद्रा-बलरामेर हृदये उल्लास। नृत्य देखि' दुइ जनार श्रीमुखेते हास ॥ 100 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके नृत्यको देखकर लोग आश्चर्यचकित हो गये और यहाँ तक कि स्वयं श्रीजगन्नाथको भी अपार आनन्द हुआ। श्रीजगन्नाथने अपने रथको स्थिर कर दिया और वे अपलक-नेत्रोंसे महाप्रभुका नृत्य देखने लगे। श्रीसुभद्रा और श्रीबलरामके हृदयमें भी उल्लास हो रहा था और महाप्रभुका नृत्य देखकर उन दोनोंके मुखपर मुस्कुराहट छा गयी ॥ 98-100 ॥ अष्टसात्त्विक-भावसमूह सुशोभित महाप्रभुका रूप और लीला :- उद्दण्ड नृत्ये प्रभुर अद्भुत विकार। अष्टसात्त्विक-भाव उदय समकाल ॥ 101 ॥ माँस व्रण-सम रोमवृन्द पुलकित। शिमुलीर वृक्ष येन कण्टक-वेष्टित ॥ 102 ॥ एक एक दन्तेर कम्प देखिते लागे भय। लोके जाने, दन्त सब खसिया पड़य ॥ 103 ॥ सर्वाङ्गे प्रस्वेद, ताते रक्तोद्गम। 'जज गग' 'जज गग'-गद्गद-वचन ॥ 104 ॥ जलयन्त्र-धारा यैछे बहे अश्रुजल। आश-पाशे लोक यत भिजिल सकल ॥ 105 ॥ देहकान्ति गौरवर्ण देखिये अरुण। कभु कान्ति देखि' येन मल्लिका-पुष्पसम ॥ 106 ॥ 512 ।

तेरहवाँ अध्याय 13/101-113 ] कभु स्तम्भ, कभु प्रभु भूमिते लोटाय। शुष्ककाष्ठसम पद-हस्त ना चलय ॥ 107 ॥ कभु भूमे पड़े, कभु श्वास हय हीन। याहा देखि' भक्तगणेर प्राण हय क्षीण ॥ 108 ॥ अनुवाद-उद्दण्ड नृत्य करते हुए महाप्रभुके शरीरमें अद्भुत विकार होने लगे और आठों सात्त्विक भाव एक साथ उदय हो गये। उनकी रोमावली पुलकित होकर खड़ी हो गयी और उसकी जड़ें फूल गयीं, उनके शरीरको देखकर ऐसा लगता था जैसे रुईके वृक्षमें चारों ओर काँटे हों। उनका एक-एक दाँत कटकटा रहा था और लोंगोंको भय लग रहा था मानो उनके सभी दाँत टूटकर गिर पड़ेंगे। सभी अङ्गोंसे पसीना निकलकर बह रहा था और साथ ही रक्त भी निकलने लगा। गद्गद् वाणीसे वे जगन्नाथ न बोलकर केवल 'जज गग' 'जज गग' ही बोल पा रहे थे। पिचकारीकी धारके समान महाप्रभुके नेत्रोंसे अश्रु बह रहे थे और आस-पास खड़े लोग उन अश्रुओंकी धारामें भीग रहे थे। वैवर्ण्यके कारण महाप्रभुकी गौरवर्ण (पीतवर्ण) देहकान्ति कभी अरुणवर्ण की और कभी मल्लिकाके पुष्पोंकी भाँति शुक्लवर्ण दिखायी देने लगती। कभी तो महाप्रभु चलते-चलते स्तम्भित हो जाते और कभी भूमिपर लोटने लगते। कभी उनके हाथ-पैर सूखी लकड़ीकी भाँति हो जाते जिससे वे हिल-डुल भी नहीं पाते। कभी वे भूमिपर गिर पड़ते और कभी श्वासहीन हो जाते जिसे देखकर भक्तोंके प्राण निकलनेवाले हो जाते ॥ 101-108 ॥ अनुभाष्य-महाप्रभुके शरीरमें एक ही समयमें आठों प्रकारके सात्त्विक भावोंका उदय हो रहा था। महाप्रभुके रोम पुलकित होनेपर लोमकूपका माँस रोमाञ्चके कारण घाव या फोड़े जैसा दीखने लगा। 'जज गग' - 'जगन्नाथ' बोलते हुए उच्चारण करते हुए महाप्रभुके मुखसे इस प्रकार अस्फुट-शब्द ही निकल रहे थे। 'जल-यन्त्र'-पिचकारी, अथवा जल-सींचनेवाला यन्त्र अथवा फव्वारा ॥ 101-105 ॥ महाप्रभुके मुखचन्द्रसे फेनामृत-धारा :- कभु नेत्रे-नासाय जल, मुखे पड़े फेन। अमृतेर धारा चन्द्रबिम्बे बहे येन ॥ 109 ॥ शुभानन्दके द्वारा पान :- सेइ फेन लञा शुभानन्द कैल पान। कृष्णप्रेमरसिक तेंहो महाभाग्यवान् ॥ 110 ॥ अनुवाद-कभी महाप्रभुके नेत्रों और कभी नाकसे जल निकलने लगता और कभी मुखचन्द्रसे फेन निकलता जिसे देखकर ऐसा लगता मानो चन्द्रमासे अमृतकी धारा बह रही हो। महाप्रभुके मुखचन्द्रसे निकली हुई फेनको श्रीशुभानन्दने पान कर लिया, क्योंकि वे महाभाग्यवान् श्रीकृष्णप्रेम रसके रसिक थे ॥ 109-110 ॥ अनुभाष्य- 'शुभानन्द'-आदिलीला 10/110 संख्या और मध्यलीला 13/39 संख्या देखें ॥ 110 ॥ नृत्यके अन्तमें महाप्रभुके द्वारा कान्तके साथ कान्ताके मिलनका गीत-श्रवण :- एइमत ताण्डव-नृत्य कैल कतक्षण। भाव-विशेषे प्रभुर प्रवेशिल मन ॥ 111 ॥ ताण्डव-नृत्य छाड़ि' स्वरूपेरे आज्ञा दिल। हृदय जानिया स्वरूप गाइते लागिल ॥ 112 ॥ श्रीस्वरूप दामोदरका गीत :- तथाहि पदम्- “सेइ त' पराण-नाथ पाइनु। याहा लागि' मदन-दहने झुरि' गेनु ॥” 113 ॥ ध्रु ॥ अनुवाद-इस प्रकार कुछ समय तक ताण्डव-नृत्य (अकेले पुरुषके द्वारा नृत्य) करते हुए महाप्रभुके मनमें विशेष भाव उदित हुआ। तब उन्होंने ताण्डव-नृत्यको रोककर श्रीस्वरूप दामोदरको गान करनेके लिये आदेश दिया। श्रीस्वरूप दामोदर महाप्रभुके हृदयके भावोंको । 513

[ 13/111-119 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला जानकर गान करने लगे, — “मैंने उन्हीं प्राणनाथको पा लिया है, जिनके विरहमें मैं कामाग्निकी ज्वालामें जलकर म्लान हो रही थी॥” 111-113॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ताण्डव-नृत्य छोड़कर महाप्रभुके हृदयमें कुरुक्षेत्र-मिलनमें श्रीराधाके भाव उदित हुए थे। बहुत दिनोंके विरहके बाद, यह गीत स्वाभाविक रूपमें आकर उपस्थित हुआ॥ 113॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 1/53-56 संख्या देखें॥ 113॥ गीत श्रवण करनेसे महाप्रभुका नृत्य :— एइ धुया उच्चैःस्वरे गाय दामोदर। आनन्दे मधुर नृत्य करेन ईश्वर॥ 114॥ श्रीजगन्नाथका महाप्रभुके पीछे-पीछे चलना :— धीरे धीरे जगन्नाथ करेन गमन। आगे नृत्य करि' चलेन शचीर नन्दन॥ 115॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर इस पदका बार-बार उच्च स्वरसे गान करने लगे और महाप्रभु आनन्दपूर्वक उस गानकी लयके साथ नृत्य करने लगे। श्रीजगन्नाथका रथ धीरे-धीरे चलने लगा और शचीनन्दन श्रीगौरहरि उसके आगे नृत्य करते हुए चलने लगे॥ 114-115॥ सभी भक्तोंका श्रीजगन्नाथकी ओर मुख करके नृत्य और कीर्तन :— जगन्नाथे नेत्र दिया सबे नाचे, गाय। कीर्त्तनीया सह प्रभु पाछे पाछे याय॥ 116॥ अनुवाद—नृत्य एवं गान करते हुए सभी भक्त श्रीजगन्नाथको ही देख रहे थे। महाप्रभु तब कीर्तन करनेवाले भक्तोंके साथ यात्रामें सबसे पीछेकी ओर गये॥ 116॥ बहुत समयके विरहके बाद श्रीराधाभावमें भावित महाप्रभुका प्रियतम श्रीकृष्णके साथ मिलन :— जगन्नाथ-मग्न प्रभुर नयन-हृदय। श्रीहस्तयुगे करे गीतेर अभिनय॥ 117॥ श्रीराधाभाव-सुवलित महाप्रभुमें ही श्रीकृष्णकी अपेक्षा अधिक प्रेम :— गौर यदि पाछे चले, श्याम हय स्थिरे। गौर आगे चले, श्याम चले धीरे धीरे॥ 118॥ एइमत गौर-श्यामे, दोँहे ठेलाठेलि। स्वरथे श्यामरे राखे गौर महाबली॥ 119॥ अनुवाद—महाप्रभुके नेत्र और हृदय श्रीजगन्नाथमें निमग्न थे और गीतके भावोंके अनुरूप वे अपने दोनों श्रीहस्तकमलोंको चलाते हुए अभिनय करने लगे। जब श्रीगौरसुन्दर रथके पीछे चलते, तब श्यामसुन्दर (श्रीजगन्नाथ) रुक जाते और यदि श्रीगौरसुन्दर रथके आगे चलते, तो श्यामसुन्दर उनके नृत्यको देखते हुए धीरे-धीरे चलने लगते। इस प्रकार श्रीगौरसुन्दर एवं श्रीश्यामसुन्दर, दोनोंमें परस्पर खींचातानी हो रही थी। महाबली श्रीगौरसुन्दरने अपने प्रेमके द्वारा रथपर चढ़े हुए श्रीश्यामसुन्दरको वशीभूत कर रखा था॥ 117-119॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिस समय श्रीगौरचन्द्र गीतका अभिनय करते-करते (रथ के) पीछे चले जाते, तब श्रीजगन्नाथ स्थिर हो जाते; श्रीगौरचन्द्र जब आगे चलते, तब श्रीजगन्नाथ धीरे-धीरे आगे बढ़ते॥ 118॥ अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभुका भाव यह है—ब्रजेन्द्रनन्दन गोकुलवासिनियोंको छोड़कर द्वारका लीलामें मत्त हो गये थे, बादमें कुरुक्षेत्र मिलनमें उनका सङ्ग प्राप्त किया। यहाँपर, ब्रजेन्द्रनन्दनरूप श्रीजगन्नाथदेवको राधाभावमें विभावित श्रीगौरसुन्दर ऐश्वर्यलीला-क्षेत्र श्रीक्षेत्र-नीलाचलसे माधुर्य- लीलाभूमि गुण्डिचाकी ओर आकर्षण करके ले जा रहे हैं। श्रीराधा और गोपियोंके भावमें विभावित श्रीगौरहरिका रथके पीछे जानेका उद्देश्य यह था कि व्रजेन्द्रनन्दनने व्रजके भावोंको भूलकर उनका (श्रीराधादि गोपियोंका) अनादर किया है, तथापि उनकी चेष्टासे फिरसे श्रीकृष्णमें व्रजकी माधुरीके उदित होनेके कारण ऐश्वर्यलीलासे माधुर्यलीलाके उत्कर्षकी उपलब्धि होनेपर ही श्रीकृष्णकी रथ-विजय है। वास्तवमें श्रीराधादि 514 ।

तेरहवाँ अध्याय 13/118-124 ] ब्रजजनोंके प्रति आन्तरिक सौहार्दके वशीभूत होकर ही श्रीकृष्ण जा रहे हैं, अथवा उनका इसके अतिरिक्त कोई और उद्देश्य है, इस विषयमें सन्देहको दूर करनेके लिये श्रीमन्महाप्रभु रथके पीछेकी ओर चले गये। महाप्रभुके हृदयके भावको जानकर श्रीजगन्नाथदेव भी रुककर उनकी प्रतीक्षा करने लगे। विशेषतः, वृन्दावनेश्वरीके अभावमें व्रजभावके सौन्दर्यकी सम्भावना नहीं है। श्रीजगन्नाथको प्रतीक्षा करते देख गोपीभावके सामर्थ्यको समझकर श्रीगौरसुन्दरके उत्साहित होकर आगे बढ़नेपर श्रीजगन्नाथदेव भी लज्जित होकर धीरे-धीरे उनका अनुगमन करने लगे। श्रीराधादि-गोपीभावमें भावुक श्रीगौरका अनुगमन और श्रीगौरके लिये प्रतीक्षा करनेकी योग्यता श्रीजगन्नाथदेवमें ही देखी जाती है, इसलिये श्रीजगन्नाथके प्रति महाप्रभुके भाव और महाप्रभुके प्रति श्रीजगन्नाथके भाव, —दोनोंके इस प्रकारके भावोंकी ठेला-ठेलीमें या युद्धमें श्रीराधाभाव-विभावित महाप्रभु अथवा उनका प्रेम ही अधिक बलवान् है॥ 118-119 ॥ विरहके अन्तमें मिलन-स्थलीकी स्मृतिका द्योतक श्लोक-पाठ :- नाचिते नाचिते प्रभुर हैला भावान्तर। हस्त तुलि' श्लोक पड़े करि' उच्चैःस्वर ॥ 120 ॥ अनुवाद-नृत्य करते-करते महाप्रभुका भावान्तर हुआ और वे अपने हाथोंको ऊपर उठाकर उच्च स्वरसे एक श्लोक पढ़ने लगे॥ 120 ॥ काव्यप्रकाशमें (1/4), साहित्यदर्पणमें (1/10); पद्यावलीमें (382) :- यः कौमारहरः स एव हि वरस्ता एव चैत्रक्षपा- स्ते चोन्मीलितमालतीसुरभयः प्रौढ़ाः कदम्बानिलाः। सा चैवास्मि तथापि तत्र सुरतव्यापारलीलाविधौ रेवा-रोधसि वेतसीतरुतले चेतः समुत्कण्ठते ॥ 121 ॥ अनुवाद-एक नायिका अपनी एक सखीसे कहती है,- "जिसने कौमारावस्थामें मेरे चित्तका हरण किया था, अब वही मेरा वर है अर्थात् वैवाहिक पति है। उसके साथ कौमारावस्थामें प्रथम मिलनके समय जो चैत्रमाहकी ज्योत्स्नामयी रात्रि थी, अब भी वही चैत्रमाहका ज्योत्स्नामय रात्रिकाल है। प्रथम मिलनके समयकी भाँति खिली हुई मालती पुष्पोंकी भीनी-भीनी मधुर सुगन्धयुक्त वायु अब भी कदम्ब वनकी ओरसे प्रवाहित हो रही है; मैं भी वही हूँ; फिर भी उसी रेवा नदीके किनारे निर्जन सुशीतल प्रदेशमें बेंतके वृक्षके नीचे प्रथम मिलनके समयवाली सुरत-व्यापारलीला अर्थात् प्रेममय विहारके लिये मेरा मन उत्कण्ठित हो रहा है।" 121 ॥ महाप्रभुके हृदयके भावोंके रसज्ञ श्रीस्वरूप :- एइ श्लोक महाप्रभु पड़े बार बार। स्वरूप बिना अर्थ केह ना जाने इहार ॥ 122 ॥ अनुवाद-महाप्रभु बार-बार इस श्लोकको पढ़ रहे थे, परन्तु श्रीस्वरूप दामोदरके अतिरिक्त कोई भी इसके अर्थ (आन्तरिक भाव) को नहीं जानता था ॥ 122 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 1/58-59 संख्या देखें ॥ 121-122 ॥ इस श्लोकके अर्थकी मध्यलीलाके पहले अध्यायमें व्याख्या :- एइ श्लोकार्थ पूर्वे करियाछि व्याख्यान। श्लोकेर भावार्थ करि संक्षेपे आख्यान ॥ 123 ॥ अनुवाद- (ग्रन्थकार कह रहे हैं) - इस श्लोकके अर्थकी मैंने पहले व्याख्या की थी। अब संक्षेपमें ही इस श्लोकके भावोंको व्यक्त कर रहा हूँ॥ 123 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 1/53, 77-80, 82-84 संख्या देखें ॥ 123 ॥ बहुत समयके विरहके बाद कुरुक्षेत्रमें श्रीकृष्णके साथ गोपियोंका मिलन :- पूर्वे यैछे कुरुक्षेत्रे सब गोपीगण। कृष्णेर दर्शन पाञा आनन्दित मन ॥ 124 ॥ । 515

[ 13/124-135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीजगन्नाथ-दर्शनसे भी महाप्रभुका वैसा ही गोपी-भाव :- जगन्नाथ देखि' प्रभुर से भाव उठिल। सेइ भावाविष्ट हञा धुया गाओयाइल॥ 125 ॥ अनुवाद—पहले जैसे कुरुक्षेत्रमें सभी गोपियाँ श्रीकृष्णका दर्शन पाकर आनन्दित हो गयीं थीं, श्रीजगन्नाथको देखकर महाप्रभुमें भी वही भाव उदित हुआ। उसी भावमें आविष्ट होकर महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदरसे उस पदका बार-बार गान करवाया था॥ 124-125 ॥ राजवेशधारी श्रीकृष्णके प्रति गोपवधू श्रीमती राधिकाकी उक्ति :- अवशेषे राधा कृष्णे करे निवेदन। 'सेइ तुमि, सेइ आमि, सेइ नव सङ्गम॥ 126 ॥ तथापि आमार मन हरे वृन्दावन। वृन्दावने उदय कराओ आपन-चरण॥ 127 ॥ इँहा लोकारण्‍य, हाती, घोड़ा, रथध्वनि। ताँहा पुष्पारण्य, भृङ्ग-पिक-नाद शुनि॥ 128 ॥ एइ राजवेश, सङ्गे सब क्षत्रियगण। ताँहा गोपवेश, सङ्गे मुरली-वादन॥ 129 ॥ व्रजे तोमार सङ्गे येइ सुख-आस्वादन। सेइ सुखसमुद्ररे इँहा नाहि एक कण॥ 130 ॥ आमा लञा पुनः लीला करह वृन्दावने। तबे आमार मनोवाञ्छा हय त' पूरणे॥' 131 ॥ अनुवाद—अन्तमें श्रीमती राधिका श्रीकृष्णसे इस प्रकार निवेदन करने लगीं,—'आप भी वही हैं, मैं भी वही हूँ और हमारा मिलन भी नवनवायमान जैसा ही है। तथापि मेरे मनको तो वृन्दावनकी स्मृति हरण कर रही है, अतः आप वृन्दावनमें अपने चरण धरो अर्थात् वृन्दावनमें प्रवेश करो। यहाँपर लोगोंकी भीड़, हाथियों, घोड़ों और रथोंका कोलाहल है, परन्तु वृन्दावनमें पुष्पोंके वन तथा भ्रमर और कोयल की मधुर ध्वनि सुनायी देती है। यहाँ आपका राजवेश है और साथमें योद्धा भी हैं और वृन्दावनमें आपका गोपवेश होता है और वहाँ आप मुरलीवादन करते हैं। [इस स्थानपर रणभूमिका परिवेश है, प्रेमरसास्वादनके अनुकूल वातावरण नहीं है]। इसलिये व्रजमें आपके साथ जो सुखका आस्वादन है, उस सुख-समुद्रका यहाँ एक कण भी नहीं है। मुझे साथ लेकर पुनः उसी वृन्दावनमें आप लीला कीजिये, तभी मेरी मनोवाञ्छा पूर्ण होगी॥ 126-131 ॥ प्रथम अध्यायमें सूत्र-वर्णनके बीचमें यह वर्णित :— भागवते आछे यैछे राधिका-वचन। पूर्वे ताहा सूत्रमध्ये करियाछि वर्णन॥ 132 ॥ अनुवाद—(ग्रन्थकार कह रहे हैं—) भागवतमें जैसे श्रीमती राधिकाके वचन वर्णित हैं, उन्हीं वचनोंका मैंने पहले श्रीचैतन्यलीलाके सूत्ररूप वर्णनमें (मध्यलीलाके पहले अध्यायमें) उल्लेख किया है॥ 132 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 1/81 संख्या, 13/136 संख्या देखें॥ 132 ॥ भागवतके इन श्लोकोंका अर्थ श्रीस्वरूप और श्रीरूपके अतिरिक्त अन्योंके लिये अज्ञेय :- सेइ भावावेशे प्रभु पड़े आर श्लोक। सेइ सब श्लोकेर अर्थ नाहि बुझे लोक॥ 133 ॥ स्वरूप-गोसाञि जाने, ना कहे अर्थ तार। श्रीरूप-गोसाञि कैल से अर्थ प्रचार॥ 134 ॥ अनुवाद—श्रीमती राधिकाके भावावेशमें महाप्रभुने और कई श्लोक पढ़े। इन सब श्लोकोंके अर्थको साधारण लोग नहीं समझ सकते। यद्यपि श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी उन श्लोकोंके अर्थको जानते थे, तथापि उन्होंने किसीको भी उन्हें प्रकाशित नहीं किया। श्रीरूप गोस्वामीने ही उनके अर्थका प्रचार किया॥ 133-134 ॥ नृत्यके बीचमें नित्य-आस्वादित श्लोकोंका उच्चारण :— स्वरूप सङ्गे यार अर्थ करे आस्वादन। नृत्यमध्ये सेइ श्लोक करेन पठन॥ 135 ॥ 516 ।

तेरहवाँ अध्याय 13/133-140 ] अनुवाद—महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदरके साथ जिन श्लोकोंके भावोंका आस्वादन करते थे, उन्हीं श्लोकोंका नृत्य करते हुए पाठ करते ॥ 135 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 1/59-60, 69-72 और 76-84 संख्या देखें ॥ 133-135 ॥ गोपियोंकी अपने घरमें श्रीकृष्णको पानेकी आकाङ्क्षा :- श्रीमद्भागवत (10/82/48)— आहुश्च ते नलिन-नाभ पदारविन्दं योगेश्वरैर्हृदि विचिन्त्यमगाधबोधैः। संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बं गेहं जुषामपि मनस्युदियात् सदा नः ॥ 136 ॥ अनुवाद—[इसका शाब्दिक अर्थ है]—गोपियोंने कहा,—“प्रिय प्रभो! आपकी नाभि कमल-पुष्पके समान है। संसारकूपमें पतित जीवोंके लिये आपके चरणकमल ही एकमात्र आश्रय हैं। बड़े-बड़े ज्ञानी और योगी भी आपके चरणकमलोंकी आराधना करते हैं। वे ध्यानमें उनके दर्शनोंकी अभिलाषा रखते हैं, परन्तु यदा-कदा ही वे उनके दर्शन पाते हैं। यद्यपि हम गृह-शृंखलामें आबद्ध साधारण जीव हैं, किन्तु आपसे प्रार्थना करती हैं कि आपके ये चरणकमल हमारे हृदयमें भी उदित हों ॥” 136 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 1/81 संख्या देखें ॥ 136 ॥ कृष्णेन्द्रिय-प्रीतिवाञ्छामय शुद्ध हृदयरूपी वृन्दावनमें ही श्रीकृष्णके उदय होनेकी योग्यता :- “अन्येर हृदय—मन, मोर मन—वृन्दावन, 'मने' 'वने' एक करि' जानि। ताँहा तोमार पदद्वय, कराह यदि उदय, तबे तोमार पूर्ण कृपा मानि ॥ 137 ॥ अनुवाद—श्रीमती राधारानीके भावोंमें विभावित होकर महाप्रभु श्रीजगन्नाथसे कह रहे हैं,—“संसारके लोगोंका मन ही हृदय है, परन्तु मेरा मन और वृन्दावन एक है, क्योंकि मेरा मन वृन्दावनसे कभी पृथक् नहीं होता। मेरा मन वृन्दावन है, जहाँ आप परम सुख अनुभव करते हो। वृन्दावनका आनन्द लेनेके लिये आप अपने चरणकमल मेरे मनरूपी वृन्दावनमें रखोगे, तो मैं इसे आपकी पूर्ण कृपा मानूँगी ॥ 137 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अन्य लोगोंका मन ही हृदय है, किन्तु मेरा मन वृन्दावनसे पृथक् नहीं है। मैं मन और वृन्दावनको 'एक' ही जानती हूँ ॥ 137 ॥ अनुभाष्य—प्राकृत मानव सङ्कल्प और विकल्पात्मक धर्मसे युक्त हृदयको 'मन' मानता है। प्राकृत-भोगबुद्धि परित्याग करके मैं अपने श्रीकृष्ण-सेवापरायण चित्तको ही श्रीराधाकृष्णकी विहार भूमि 'वृन्दावन' मानती हूँ। प्राकृत-विषय-चेष्टारहित मनको वृन्दावनसे 'अभिन्न' मानती हूँ ॥ 137 ॥ शुद्ध हृदयमें श्रीकृष्णसङ्ग-लालसा :- प्राणनाथ, शुन मोर निवेदन। व्रज—आमार सदन, ताँहा तोमार सङ्गम, ना पाइले ना रहे जीवन ॥ 138 ॥ ध्रु ॥ अनुवाद—हे प्राणनाथ ! मेरा एक निवेदन सुनिये। व्रज मेरा घर है, वहाँ आपका सङ्ग प्राप्त नहीं करनेपर मेरा जीवन नहीं रहेगा ॥ 138 ॥ कृष्णेन्द्रिय प्रीतिवाञ्छामें ऐश्वर्यसूचक ज्ञान शिथिल :- पूर्वे उद्धव-द्वारे, एबे साक्षात् आमारे, योग-ज्ञाने कहिला उपाय। तुमि-विदग्ध, कृपामय, जानह आमार हृदय, मोरे ऐछे कहिते ना युयाय ॥ 139 ॥ ऐकान्तिक कृष्णप्रेममें उसके अतिरिक्त अन्य अभिनिवेश असम्भव :- चित्त काढ़ि तोमा हैते, विषये चाहि लगाइते, यत्न करि, नारि काढ़िबारे। तारे ध्यान शिक्षा कराह, लोक हासाञा मार, स्थानास्थान ना कर विचारे ॥ 140 ॥ । 517

[ 13/139-146 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ऐश्वर्य ज्ञानके अभ्यासमें गोपियोंकी विरक्ति :- नहे गोपी योगेश्वर, पदकमल तोमार, ध्यान करि' पाइबे सन्तोष। तोमार वाक्य-परिपाटी, तार मध्ये कुटिनाटी, शुनि' गोपीर आरो बाढ़े रोष ॥ 141 ॥ कृष्णविरहके ग्राससे ही उद्धारकी गोपियोंकी इच्छा, अपने संसार-बन्धनसे मुक्त होनेकी इच्छा नहीं :- देह-स्मृति नाहि यार, संसार-कूप काँहा तार, ताहा हैते ना चाहे उद्धार। विरह-समुद्र-जले, काम-तिमिङ्गिल गिले, गोपीगणे नेह' तार पार ॥ 142 ॥ व्रजलीला और स्वजनोंको भूलनेके कारण श्रीकृष्णको उलाहना देना :- वृन्दावन, गोवर्धन, यमुना-पुलिन, वन, सेइ कुञ्जे रासादिक लीला। सेइ व्रजेर जनगण, माता, पिता, बन्धुगण, बड़ चित्र, केमने पासरिला ॥ 143 ॥ श्रीकृष्णकी व्रजकी विस्मृतिको देखकर प्रियतमको दोष न देकर अपने भाग्यको धिक्कार :- विदग्ध, मृदु, सद्गुण, सुशील, स्निग्ध, करुण, तुमि, तोमार नाहि दोषाभास। तबे ये तोमार मन, नाहि स्मरे व्रजजन, से-आमार दुर्दैव-विलास ॥ 144 ॥ यशोदाका दुःख बतलाकर आवेदनके द्वारा श्रीकृष्णकी करुणाको उदित करानेकी चेष्टा; श्रीकृष्णके विरहकी अपेक्षा व्रजवासियोंकी मृत्युकी कामना :- ना देखि आपन-दुःख, देखि' व्रजेश्वरी-मुख, व्रजजनेर हृदय विदरे। किवा मार' व्रजवासी, किवा जीयाओ व्रजे आसि', केन जीयाओ दुःख सहाइबारे ? ॥ 145 ॥ श्रीकृष्णकी ऐश्वर्यलीलामें व्रजवासियोंकी अरुचि, फिर भी व्रजके त्याग और श्रीकृष्णके विरहमें मृतप्राय :- तोमार ये अन्यवेश, अन्य सङ्ग, अन्य देश, व्रजजने कभु नाहि भाय। व्रजभूमि छाड़िते नारे, तोमा ना देखिले मरे, व्रजजनेर कि हबे उपाय ? ॥ 146 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 139-146 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे कृष्ण! तुम जब मथुरामें थे, तब उद्धवके माध्यमसे 'ज्ञानयोग'का उपदेश भेजकर कि ज्ञानयोगसे तुम्हें प्राप्त किया जा सकता है, यह बात तुमने कही थी। अब इस कुरुक्षेत्रमें साक्षात् मिलन होनेपर भी उसी प्रकार 'ज्ञानयोग' बतला रहे हो। मेरा हृदय-प्रेममय है, इसमें ज्ञानयोगका स्थान नहीं है। ऐसा जाननेपर भी तुम्हारा इस प्रकार उपदेश देना उचित नहीं है। मैं तुमसे चित्त हटाकर विषयमें लगानेकी इच्छा करनेपर भी वैसा नहीं कर पाती। इसलिये तुम्हारे प्रति ऐसी अनुरक्ति ही जब मेरा स्वभाव है, तब मुझे ध्यानकी शिक्षा देना-केवल लोकहास्य मात्र है; इसलिये तुमने स्थान-अस्थानका विचार नहीं किया है। गोपियाँ कोई योगेश्वर नहीं है कि तुम्हारे चरणकमलोंका ध्यान करके आनन्द प्राप्त करेंगी। तुम्हारे वचनोंकी परिपाटी उचित होनेपर भी गोपियोंको (अपने) ध्यानके विषयमें शिक्षा देना-केवल कुटिनाटी (कपटता मात्र) है। इस (ध्यानकी शिक्षाकी आवश्यकताको) सुनकर गोपियोंमें अधिक अभिमान उत्पन्न होता है। गोपियोंकी स्वाभाविक रूपसे ही जब देहकी स्मृति नहीं है, तब 'संसार-कूप'के नामपर तो उनका कुछ है ही नहीं। इसलिये मुक्तिजनक ध्यानकी पद्धति उनके लिये विफल (मात्र) है। तुम्हारे विरह-समुद्रमें पड़ी हुई गोपियोंको केवल तुम्हारी सेवा-कामरूपी तिमिङ्गल (बहुत बड़ी विशेष मछली) निगल रही है, उससे अर्थात् उस विरहसे उनका उद्धार करो। आश्चर्यकी बात यह है कि, तुम अपने उन व्रजजनों अर्थात् माता, पिता, बन्धुओंको कैसे भूल गये? तुम विशुद्ध पुरुष, मृदु, सद्गुणोंके द्वारा सदैव सुशील, स्निग्ध, करुण हो, इसलिये तुम्हारे ऐसे व्यवहारमें दोषाभास भी नहीं है। फिर भी तुम व्रजजनोंको अब 518 ।

तेरहवाँ अध्याय 13/139-149 ] स्मरण नहीं करते हो, वह केवल हमारा ही दुर्दैवविलास श्रीकृष्णको व्रजमें आनेके लिये कातर होकर आवेदन :- (दुर्भाग्यका खेल) है। मैं अपने दुःखको नहीं देख रही तुमि—व्रजेर जीवन, व्रजराजेर प्राणधन, हूँ, (किन्तु सत्य तो यह है कि), ब्रजेश्वरी यशोदाका तुमि—व्रजेर सकल सम्पद्। दुःख देखकर व्रजवासियोंका हृदय वास्तवमें फट जाता कृपार्द्र तोमार मन, आसि' जीयाओ व्रजजन, है। तुम व्रजवासियोंको विरहके द्वारा कभी तो मरे हुए व्रजे उदय कराओ निज-पद ॥ 147 ॥ जैसा बना देते हो, कभी मिलनके द्वारा जीवित करते अनुवाद—हे कृष्ण! तुम व्रजके जीवन हो। व्रजराज हो,—किसलिये यह दुःख सहन करनेके लिये जीवित नन्द महाराजके प्राणधन हो। तुम तो समस्त व्रजकी रखते हो, इस विषयमें कुछ नहीं कह सकती। तुम्हारा एकमात्र सम्पत्ति हो। तुम्हारा मन कृपासे द्रवीभूत रहता यह माथुर राजवेशादि धारण करना, व्रजसे पृथक् है। तुम व्रजमें आकर व्रजवासियोंको सञ्जीवित करो। स्थानपर वास और महिषियोंका सङ्ग, यह व्रजवासियोंको कृपाकर व्रजमें पदार्पण करो ॥ 147 ॥ बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता। व्रजवासियोंकी यही श्रीकृष्णकी लज्जा, व्याकुलता एवं एक विचित्र बात है कि, वे व्रजभूमिको छोड़कर अन्यत्र श्रीराधाको सान्त्वना :- नहीं जा सकते, और दूसरी ओर, तुम्हें नहीं देखनेपर शुनिया राधिका-वाणी, व्रजप्रेम मने जानि, मर भी रहे हैं, इसलिये व्रजवासियोंके लिये क्या उपाय भावे व्याकुलित देह-मन। होगा, उसे तुम ही जानते हो ॥ 139-146 ॥ व्रजलोकेर प्रेम शुनि', आपनाके 'ऋणी' मानि', अनुभाष्य— 'उद्धव-द्वारे'—भाः दशम स्कन्ध, 47वाँ करे कृष्ण ताँरे आश्वासन ॥ 148 ॥ अध्याय देखें। श्रीकृष्णका सहैतुक प्रत्युत्तर :- 'विषय'—श्रीकृष्णसे भिन्न वस्तु अथवा कार्य। 'प्राणप्रिये, शून, मोर ए सत्य-वचन। 'कुटिनाटी'—कपटता। तोमा-सबार स्मरणे, झुरों मुञि रात्रिदिने, देहस्मृति या देहमें अभिनिवेश होनेसे 'संसार' होता मोर दुःख ना जाने कोन जन ॥ 149 ॥ ध्रु ॥ है—भाः 11/2/37, 11/3/6 आदि असंख्य भागवतके अनुवाद—श्रीमती राधिकाके वचन सुनकर श्रीकृष्णके श्लोक इसके प्रमाण हैं, अधिकताके भयसे वे यहाँ मनमें व्रजवासियोंके प्रति प्रेम जाग्रत हो उठा और उद्धृत नहीं किये जा रहे हैं। गोपियों (एवं सिद्ध उनके देह तथा मन व्याकुल हो गये। अपने प्रति महाभागवत अथवा परमहंसोंकी भी) देहस्मृति नहीं होती, व्रजवासियोंके प्रेमके विषयमें सुनकर वे स्वयंको ऋणी भाः 10/29/30, 33-34, 11/30/43, 10/32/22, 11/35/19 मानने लगे। तब श्रीकृष्ण श्रीमती राधिकाको आश्वासन आदि श्लोक देखें। देते हुए कहने लगे,—हे प्राणप्रिय राधिके! मैं सत्य 'काम'—भःरःसिः पूर्व विभाग, साधनभक्ति लहरीमें वचन कह रहा हूँ। तुम सबको स्मरण करके मैं गौतमीयतन्त्र-वाक्य—आदिलीला 4/162-214 संख्या एवं रात-दिन रोता हूँ। मेरे दुःखको कोई भी नहीं मध्यलीला 8/207-218 संख्या देखें। जानता ॥ 148-49 ॥ 'तिमिङ्गिल'—बड़ी व्हेल-मछलीको भी निगलनेमें अमृतप्रवाह भाष्य— 'झुरों'—रोता रहता हूँ॥ 149 ॥ जो समर्थ है, ऐसा बहुत बड़ा जलचर जन्तु। अनुभाष्य— 'ऋणी'—आदिलीला 4/179-180 संख्या 'नेह'—ले जाओ। देखें ॥ 148 ॥ 'तार'—विरह-समुद्रका ॥ 139-142 ॥ । 519

[ 13/150–155 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीकृष्णके द्वारा व्रजवासियोंकी विशेषतः गोपियों और श्रीराधिकाकी स्तुति :— व्रजवासी यत जन, माता, पिता, सखागण, सबे हय मोर प्राणसम। ताँर मध्ये गोपीगण, साक्षात् मोर जीवन, तुमि—मोर जीवनेर जीवन ॥ 150 ॥ व्रजवासियोंसे वियोग—श्रीकृष्णके ही दुर्भाग्यका फल :— तोमा-सबार प्रेमरसे, आमाके करिल वशे, आमि तोमार अधीन केवल। तोमा-सबा छाड़ाञा, आमा दूर-देशे लञा, राखियाछे दुर्देव प्रबल ॥ 151 ॥ अनुवाद—समस्त व्रजवासी—माता, पिता, सखादि सभी मेरे प्राणोंके समान हैं। उनमें भी गोपियाँ तो साक्षात् मेरे जीवन स्वरूप हैं और तुम तो मेरे जीवनका भी जीवन हो। तुम सबके प्रेमरसने मुझे वशमें कर रखा है, मैं तो केवल तुम्हारे अधीन हूँ। मेरा प्रबल दुर्देव (दुर्भाग्य) ही तुम सबसे छुड़ाकर, मुझे दूर देशमें ले गया है ॥ 150-151 ॥ परस्परका विच्छेद मृत्युजनक होनेपर भी परस्परकी प्रीतिके लिये कान्त और कान्ताको जीवन-धारणकी इच्छा :— प्रिया प्रिय-सङ्गहीना, प्रिय प्रिया-सङ्ग बिना, नाहि जीये,—ए सत्य प्रमाण। मोर दशा शोने यबे, ताँर एइ दशा हबे, एइ भये दुँहे राखे प्राण ॥ 152 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 152 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रियके सङ्गके बिना प्रिया स्त्री, प्रियाके सङ्गके बिना प्रिय पुरुष जीवन धारण नहीं कर सकते—यही सत्य प्रमाण है; तथापि (दोनों यही सोचकर) इसलिये जीवन धारण किये रहते हैं कि 'मेरी मृत्युको सुनकर उसकी भी मृत्यु होगी॥'152॥ विरह होनेपर भी प्रियका मङ्गल अथवा प्रीतिवाञ्छा ही यथार्थ प्रेमका परिचय :— सेइ सती—प्रेमवती, प्रेमवान् सेइ पति, वियोगे ये वाञ्छे प्रिय-हिते। ना गणे आपन-दुःख, वाञ्छे प्रियजन-सुख, सेइ दुइ मिले अचिराते ॥ 153 ॥ अनुवाद—वही सती ही प्रेमवती है तथा प्रेमवान् वही पति है, जो वियोगमें भी प्रियका हित चाहते हैं। वे अपने दुःखका विचार न करके केवल प्रियजनके सुखकी ही कामना करते हैं। ऐसे दोनों प्रेमियोंका शीघ्र ही मिलन होता है ॥ 153 ॥ श्रीराधाको प्रबोध प्रदान करनेकी छलना :— राखिते तोमार जीवन, सेवि आमि नारायण, ताँर शक्त्ये आसि निति-निति। तोमा-सने क्रीड़ा करि', पुनः याइ यदुपुरी, ताहा तुमि मानह मोर स्फूर्त्ति ॥ 154 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 154 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—तुम मेरी नित्यप्रिया हो और मेरे विरहमें तुम बचोगी नहीं—ऐसा जानकर मैं नारायणकी सेवा करते हुए उनकी विभुत्व-शक्तिके बलसे प्रतिदिन व्रजमें आकर तुम्हारे साथ क्रीड़ा करके पुनः यदुपुरी लौट जाता हूँ; इसलिये व्रजमें रहकर तुम सोचती हो कि तुम्हें मेरी स्फूर्त्ति हुई है ॥ 154 ॥ अनुभाष्य—'यदुपुरी'—द्वारकामें और मथुरामें ॥ 154 ॥ श्रीराधाप्रेमसे श्रीकृष्णका प्राकट्य :— मोर भाग्य मो-विषये, तोमार ये प्रेम हये, सेइ प्रेम—परम प्रबल। लुकाञा आमा आने, सङ्ग कराय तोमा सने, प्रकटेह आनिबे सत्वर ॥ 155 ॥ 520 ।

तेरहवाँ अध्याय 13/155-162 ] श्रीराधाको अपने व्रज-गमन-विषयमें आश्वासन-दान :- यादवेर विपक्ष, यत दुष्ट कंसपक्ष, ताहा आमि कैलुँ सब क्षय। आछे दुइ-चारि जन, ताहा मारि' वृन्दावन, आइलाम आमि, जानिह निश्चय ॥ 156 ॥ सेइ शत्रुगण हैते, व्रजजन राखिते, रहि राज्ये उदासीन हञा। येबा स्त्री-पुत्र-धने, करि राज्य-आवरणे, यदुगुणेर सन्तोष लागिया ॥ 157 ॥ 'व्रजमें आऊगाँ' कहकर श्रीराधासे श्रीकृष्णकी प्रतिज्ञा :- तोमार ये प्रेमगुण, करे आमा आकर्षण, आनिबे आमा दिन दश-विशे। पुनः आसिं वृन्दावने, व्रजबन्धु तोमा-सने, विलासिब रजनी-दिवसे ॥ '158 ॥ श्रीकृष्णोक्त श्लोक श्रवणसे श्रीराधाको विश्वास :- एत ताँरे कहिं कृष्ण, व्रजे याइते सतृष्ण, एक श्लोक पड़ि' शुनाइल। सेइ श्लोक शुनि' राधा, खण्डिल सकल बाधा, कृष्णप्राप्त्ये प्रतीति हइल ॥ 159 ॥ अनुवाद—नारायणकी कृपारूपी मेरे सौभाग्यसे मेरे प्रति तुम्हारा जो प्रेम है, वह प्रेम अति प्रबल है। वही मुझे गुप्तरूपसे व्रजमें लाकर तुम्हारे साथ मेरा सङ्ग कराता है। मुझे विश्वास है कि शीघ्र ही वह साक्षात् रूपमें भी मुझे वहाँ ले जायेगा। यादवोंके जो विपक्षी थे, कंस और उसके पक्षके जो दुष्ट राजा थे—मैंने उस सबका वध कर दिया है। अब तो केवल दो-चार दुष्ट लोग ही बचे हैं, निश्चय जानो कि उन्हें मारकर मैं वृन्दावनमें आ ही गया हूँ। उन शत्रुओंसे तुम व्रजवासियोंकी रक्षाके लिये ही मैं अपने राज्यमें रहता हूँ। परन्तु मैं उस राज्यके प्रति उदासीन हूँ। उस राज्यमें मेरे जो स्त्री-पुत्र-धन आदि हैं, उनका निर्वाह मैं केवल यादवोंकी सन्तुष्टिके लिये ही करता हूँ। तुम्हारा जो प्रेमरूपी गुण है, वही मुझे सदा वृन्दावनमें आकर्षित करता है और मुझे दस-बीस दिनोंमें व्रजमें ले जायेगा। पुनः वृन्दावनमें आकर मैं तुम्हारे और सब व्रजवधुओंके साथ रात-दिन विलास करूँगा।' श्रीराधासे इतना कहकर श्रीकृष्ण व्रजमें जानेके लिये आतुर हो गये। तब उन्होंने एक श्लोक कहा जिसे सुनकर श्रीराधाको विश्वास हो गया कि अब समस्त बाधाएँ दूर हो गयी हैं और उन्हें श्रीकृष्णप्राप्ति अवश्य होगी ॥ 155-159 ॥ अनुभाष्य—'येबा'—यद्यपि ॥ 157 ॥ गोपियोंका कृष्णप्रेम ही उनकी श्रीकृष्णप्राप्तिका कारण :- श्रीमद्भागवत (10/82/44)— मयि भक्तिर्हि भूतानाममृतत्वाय कल्पते। दिष्ट्या यदासीन्मत्स्नेहो भवतीनां मदापनः ॥ 160 ॥ अनुवाद—मेरे प्रति भक्ति ही जीवोंके लिये अमृत है। हे गोपियों! मेरे प्रति तुम्हारा जो स्नेह है, वही एकमात्र तुम लोगोंका मुझे प्राप्त करनेका कारण है ॥ 160 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/23 संख्या देखें ॥ 160 ॥ श्रीस्वरूपके साथ महाप्रभुका आस्वादन :- एइ सब अर्थ प्रभु स्वरूपेर सने। रात्रि-दिने घरे बसि' करे आस्वादने ॥ 161 ॥ अनुवाद—भागवतके श्लोकोंके इन सब भावोंका महाप्रभु श्रीस्वरूप दामोदरके साथ रात-दिन अपने वासस्थानमें बैठकर आस्वादन करते थे ॥ 161 ॥ श्रीजगन्नाथको देखकर राधाभावमें भावित महाप्रभुका श्लोक पाठ :- नृत्यकाले सेइ भावे आविष्ट हञा। श्लोक पड़ि' नाचे जगन्नाथ-मुख चाञा ॥ 162 ॥ अनुवाद—इन्हीं भावोंमें आविष्ट होकर महाप्रभु नृत्य कर रहे थे। श्रीजगन्नाथका मुख दर्शन करते हुए महाप्रभु नृत्य करते समय ये सब श्लोक पढ़ रहे थे ॥ 162 ॥ । 521

[ 13/163–172 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ग्रन्थकारके द्वारा श्रीस्वरूप दामोदरकी स्तुति :— स्वरूप-गोसाञिर भाग्य ना याय वर्णन। प्रभुते आविष्ट याँर काय, वाक्य, मन ॥ 163 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरके भाग्यका वर्णन नहीं किया जा सकता जो तन-मन और वचनसे महाप्रभुमें ही आविष्ट रहते थे॥ 163 ॥ कृष्णसेवारत महाप्रभु और श्रीस्वरूपकी इन्द्रियाँ अभिन्न :— स्वरूपेर इन्द्रिये प्रभुर निजेन्द्रियगण। आविष्ट हञा करे गान-आस्वादन ॥ 164 ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरकी इन्द्रियोंमें अपनी इन्द्रियोंको आविष्ट करके महाप्रभु उनके गानका आस्वादन कर रहे थे॥ 164 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—स्वरूप दामोदर जब इन सब भावोंका गान करते हैं, तब महाप्रभुकी नेत्र-कर्ण आदि अपनी इन्द्रियाँ स्वरूपकी इन्द्रियोंमें आविष्ट होकर गानका आस्वादन करने लगती हैं, अर्थात् दोनोंका एकचित्तता (चित्तका एक समान होना) और एकतानता (एक ही वस्तुके प्रति आकर्षित होना) सर्वोत्तम रूपसे उदित होता है॥ 164 ॥ कान्तकी उदासीनताके कारण मलिन-मुखवाली मानिनी श्रीराधाके भावोंमें आविष्ट महाप्रभु :— भावेर आवेशे कभु भूमिते बसिया। तर्जनीते भूमे लिखे अधोमुख हञा ॥ 165 ॥ अनुवाद—भावाविष्ट होकर महाप्रभु कभी भूमिपर बैठ जाते और नीचेकी ओर मुख करके अपनी तर्जनी अङ्गुलीके द्वारा भूमिपर कुछ लिखने लगते॥ 165 ॥ महाप्रभुकी अङ्गुलीमें चोट लगनेके भयसे श्रीस्वरूपकी सतर्कता :— अङ्गुलिते क्षत हबे जानि' दामोदर। भये निज-करे निवारये प्रभु-कर ॥ 166 ॥ अनुवाद—यह जानते हुए कि भूमिपर लिखनेसे महाप्रभुकी अङ्गुलीमें घाव हो जायेगा, श्रीस्वरूप दामोदरने अपने हाथोंसे उनको रोक दिया॥ 166 ॥ अनुभाष्य—'दामोदर'—श्रीस्वरूप॥ 166 ॥ श्रीस्वरूपके कीर्तनसे महाप्रभुके हृदयमें राधाभावके वैचित्य मूर्तिमान :— प्रभुर भावानुरूप स्वरूपेर गान। यबे येइ रस, ताहा करे मूर्त्तिमान ॥ 167 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके भावोंके अनुरूप ही श्रीस्वरूप दामोदर गान करते थे। जिस समय महाप्रभु जिस रसका आस्वादन करते थे, उसी समय उसके अनुरूप गान करके श्रीस्वरूप दामोदर उस रसको मूर्तिमान कर देते थे॥ 167 ॥ श्रीजगन्नाथके श्रीरूपका वर्णन :— श्रीजगन्नाथेर देखे श्रीमुख-कमल। ताहार उपर सुन्दर नयनयुगल ॥ 168 ॥ सूर्य्येर किरणे मुख करे झलमल। माल्य, वस्त्र, दिव्य, अलङ्कार, परिमल ॥ 169 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीजगन्नाथके मुखकमल और उसके ऊपर शोभायमान सुन्दर नेत्रोंको देखा। उनके श्रीअङ्गोंपर माला, वस्त्र और दिव्य अलङ्कार थे। सूर्यकी किरणोंसे श्रीजगन्नाथका मुखकमल झलमल कर रहा था और सारा वातावरण सुन्धित हो रहा था॥ 168-169 ॥ अनुभाष्य—'परिमल'—सुगन्ध॥ 169 ॥ महाप्रभुका दिव्य-उन्माद :— प्रभुर हृदये आनन्दसिन्धु उथलिल। उन्माद, झञ्झा-वात ततक्षणे उठिल ॥ 170 ॥ आनन्दोन्मादे उठाय भावेर तरङ्ग। नाना-भाव-सैन्ये उपजिल युद्ध-रङ्ग ॥ 171 ॥ भावोदय, भावशान्ति, सन्धि, शाबल्य। सञ्चारी, सात्त्विक, स्थायी स्वभाव-प्राबल्य ॥ 172 ॥ 522 ।

तेरहवाँ अध्याय 13/170-179 ] अनुवाद—महाप्रभुके हृदयमें आनन्दके सागरकी लहरें उठने लगीं और उसमें उसी समय उन्मादकी तीव्रताने तूफानका रूप ले लिया। आनन्दके उन्मादमें अनेक भावोंकी तरङ्ग उठने लगीं और उन भावोंमें विरोधी सेनाओं जैसा युद्ध होने लगा। महाप्रभुमें कभी भाव उदय होते और अत्यधिक रूपमें प्रकट होकर कभी शान्त हो जाते, तो कभी अनेक भावोंकी सन्धि होती और कभी एक भाव दूसरोंको दबाकर प्रबल होनेसे भाव-शाबल्य होता। इस प्रकार सञ्चारी, सात्त्विक और स्थायी भावोंने महाप्रभुके शरीरपर अत्यधिक प्रबलता धारण की ॥ 170-172 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'झञ्झावात'—बीच-बीचमें आनेवाली तेज हवा। 'भावोदय', 'भावशान्ति', 'सन्धि', 'शाबल्य'—भावोदय, भावशान्ति, भावसन्धि, भावशाबल्य ॥ 170-172 ॥ अनुभाष्य—'उन्माद'—मध्यलीला 2/66 संख्या देखें। भाव-सन्धि, भाव-शाबल्य आदिके लिये मध्यलीला 2/63 संख्या देखें ॥ 170-172 ॥ स्वर्णगिरिके साथ महाप्रभुकी देह और पुष्पवृक्षके साथ सात्त्विक भावोंकी उपमा :- प्रभुर शरीर येन शुद्ध-हेमाचल। भाव-पुष्पद्रुम ताहे पुष्पित सकल ॥ 173 ॥ महाप्रभुके प्रेम-दर्शनसे सभी श्रीकृष्णप्रेममें उन्मत्त :- देखिते आकर्षये सबार चित्त-मन। प्रेमामृतवृष्ट्ये प्रभु सिञ्चे सबार मन ॥ 174 ॥ जगन्नाथ-सेवक यत राजपात्रगण। यात्रिक लोक, नीलाचलवासी यत जन ॥ 175 ॥ प्रभुर नृत्य प्रेम देखि' हय चमत्कार। कृष्णप्रेम उपजिल हृदये सबार ॥ 176 ॥ अनुवाद—महाप्रभुका शरीर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह शुद्ध-स्वर्णका पर्वत था और उसपर भावरूपी पुष्पोंके वृक्ष सब पुष्पित हो रहे थे। इस प्रकार महाप्रभुके भावोंको देखकर सभीके चित्त और मन आकर्षित हो रहे थे। महाप्रभुने श्रीकृष्णप्रेमके अमृतकी वर्षा करके श्रीजगन्नाथके सेवक, राजकर्मचारी, यात्रीगण और सभी नीलाचलवासी आदि जितने भी लोग वहाँ उपस्थित थे, सभीके हृदयोंका सिञ्चन किया। महाप्रभुके नृत्य और प्रेमको देखकर सभीके मन चमत्कृत हुए और उनके दर्शनसे सभीके हृदयमें श्रीकृष्णप्रेम उदित हो गया ॥ 173-176 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 2/81-82 संख्या देखें ॥ 174-176 ॥ सभीका प्रेम-कलरव :- प्रेमे नाचे, गाय, लोक, करे कोलाहल। प्रभु-नृत्ये कैल यात्री चौगुण-मङ्गल ॥ 177 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णप्रेममें मत्त होकर सभी लोग नृत्य-गान करते हुए कोलाहल कर रहे थे। महाप्रभुके नृत्यसे यात्रियोंकी मङ्गलध्वनि चौगुनी हो गयी ॥ 177 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'चौगुण मङ्गल'—चार गुणा मङ्गलध्वनि ॥ 177 ॥ श्रीकृष्ण-बलरामके द्वारा भी महाप्रभुके नृत्यका दर्शन :- अन्येर कि काय, जगन्नाथ-हलधर। प्रभुर नृत्य देखि' सुखे चलिला मन्थर ॥ 178 ॥ दोनोंके द्वारा महाप्रभुके नृत्यको देखकर चलना स्थगित करना :- कभु सुखे नृत्यरङ्ग देखे रथ राखि'। से कौतुक ये देखिल, सेइ तार साक्षी ॥ 179 ॥ अनुवाद—अन्य लोगोंकी तो बात ही क्या, स्वयं श्रीजगन्नाथ और श्रीबलदेव भी महाप्रभुके नृत्यको देखनेके लिये धीरे-धीरे चलने लगे और कभी-कभी अपने रथको रोककर आनन्दसे महाप्रभुके नृत्यको देखते। इस कौतुकको जिसने देखा, वही उसका साक्षी है॥ 178-179 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मन्थर'—धीरे-धीरे ॥ 178 ॥ । 523

[ 13/180-190 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला नृत्य करते हुए महाप्रभुका राजाके आगे गिरने लगना :- एइमत नृत्य प्रभु करिते भ्रमिते। प्रतापरुद्रेर आगे लागिला पड़िते॥180॥ राजाके द्वारा महाप्रभुको पकड़ना, महाप्रभुकी बाह्यदशा :- सम्भ्रमे प्रतापरुद्र प्रभुरे धरिल। ताँहाके देखिते प्रभुर बाह्य हइल॥181॥ बाह्यदशामें लोकशिक्षक जगद्गुरु आचार्यलीलाकारी महाप्रभुका राजाके स्पर्श करनेसे स्वयंको धिक्कार :- राजा देखि' महाप्रभु करेन धिक्कार। “छि, छि, विषयीर स्पर्श हइल आमार॥”182॥ अनुवाद—महाप्रभु जब इस प्रकार नृत्य और भ्रमण कर रहे थे, तब वे राजा प्रतापरुद्रके आगे गिरने लगे। राजा प्रतापरुद्रने महाप्रभुको गिरते हुए देखकर उन्हें आदरपूर्वक पकड़ लिया, परन्तु राजाको देखते ही महाप्रभुको बाहरी ज्ञान हो आया। राजाको देखते ही महाप्रभु अपनेको धिक्कारते हुए कहने लगे,—“छि, छि, मुझे एक विषयीका स्पर्श हो गया है॥”180-182॥ आवेशेते नित्यानन्द हैला असावधान। काशीश्वर-गोविन्दादि छिला अन्यस्थान॥183॥ अनुवाद—उस समय श्रीनित्यानन्द प्रभु भी भावमें आविष्ट होनेके कारण असावधान हो गये थे और श्रीकाशीश्वर एवं श्रीगोविन्दादि महाप्रभुके सेवक भी किसी अन्य स्थानपर थे॥183॥ राजाकी दैन्यमयी श्रीकृष्णसेवा-दर्शनसे हृदयमें सन्तोष, भक्तिसाधकके हितके लिये बाहरसे रोषाभास :- यद्यपि राजारे देखि' हाड़िर सेवने। प्रसन्न हञाछे ताँरे मिलिबारे मने॥184॥ तथापि आपन-गणे करिते सावधान। बाह्य किछु रोषाभास कैला भगवान् ॥185॥ अनुवाद—यद्यपि राजाको श्रीजगन्नाथके झाडूदारका कार्य करते देखकर महाप्रभु प्रसन्न हुए थे और राजासे मिलना भी चाहते थे, तथापि अपने परिकरोंको सावधान करनेके लिये भगवान्ने बाहरसे कुछ क्रोधका आभास दिखलाया॥184-185॥ अनुभाष्य— 'हाड़िर सेवन'—रास्तेमें झाडूदारका कार्य; मध्यलीला 13/15-18 संख्या देखें। 'आपन-गण'—भवसागरसे पार जानेके इच्छुक, निष्किञ्चन, भगवद्-भजनोन्मुख अर्थात् प्रेमकी भूमिकामें आरूढ़ होनेके इच्छुककी लीला करनेवाले भक्तगण॥184-185॥ महाप्रभुके वाक्यको सुनकर राजाको भय, श्रीसार्वभौमका आश्वासन :- प्रभुर वचने राजार मने हैल भय। सार्वभौम कहे,—“तुमि ना कर संशय॥186॥ तोमार उपरे प्रभुर सुप्रसन्न मन। तोमा लक्ष्य करि' शिखायेन निजगण॥187॥ अवसर जानि' आमि करिब निवेदन। सेइकाले याइ' करिह प्रभुर मिलन॥”188॥ अनुवाद—महाप्रभुके वचन सुनकर राजाके मनमें भय उत्पन्न हुआ, परन्तु श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यने राजाको सान्त्वना देते हुए कहा,—“आप किसी भी प्रकारका संशय मत करें। महाप्रभु आपपर बहुत प्रसन्न हैं। आपको लक्ष्य करके वे अपने परिकरोंको शिक्षा देना चाहते हैं। उचित समय आनेपर मैं आपके विषयमें निवेदन करूँगा, तब आपको महाप्रभुसे मिलना सहज हो जायेगा॥”186-188॥ स्वयं महाप्रभुके द्वारा रथ-सञ्चालन :- तबे महाप्रभु रथ प्रदक्षिण करिया। रथ-पाछे याइ' ठेले रथे माथा दिया॥189॥ रथके चलते हुए देखकर लोगोंके द्वारा हरिध्वनि :- ठेलितेइ चलिल रथ 'हड़' 'हड़' करि'। चतुर्दिके लोक सबे बले 'हरि' 'हरि'॥190॥ 524 ।

तेरहवाँ अध्याय 13/189-200 ] अनुवाद—तब महाप्रभुने रथकी परिक्रमा की और रथके पीछे जाकर रथको अपने माथेसे ठेलने लगे। रथको ठेलते ही रथ 'हड़' 'हड़' शब्द करता हुआ आगे चलने लगा। चारों ओरसे सभी लोग 'हरि' 'हरि' बोलने लगे॥ 189-190 ॥ सुभद्रा-बलरामके रथके आगे सगण महाप्रभुका नृत्य :— तबे प्रभु निज-भक्तगण लञा सङ्गे। बलदेव-सुभद्राग्रे नृत्य करे रङ्गे ॥ 191 ॥ उसके बाद श्रीजगन्नाथके रथके आगे नृत्य :— ताँहा नृत्य करि' जगन्नाथाग्रे आइला। जगन्नाथ-आगे नृत्य करिते लागिला ॥ 192 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु अपने भक्तोंको साथ लेकर श्रीबलदेव एवं श्रीसुभद्राके रथोंके आगे आनन्दसे नृत्य करने लगे। कुछ देर वहाँ नृत्य करनेके बाद महाप्रभु श्रीजगन्नाथके सामने आये। तब श्रीजगन्नाथके रथके आगे नृत्य करने लगे॥ 191-192 ॥ बलगाण्डिपर रथका रुकना :— चलिया आइल रथ 'बलगाण्डि'-स्थाने। जगन्नाथ राखि' देखे डाहिने-वामे ॥ 193 ॥ वामे—'विप्रशासन', नारिकेल-वन। डाहिने त' पुष्पोद्यान येन वृन्दावन ॥ 194 ॥ आगे नृत्य करे गौर लञा भक्तगण। रथ राखि' जगन्नाथ करेन दरशन ॥ 195 ॥ अनुवाद—रथ चलते-चलते बलगाण्डि नामक स्थानपर पहुँच गया। वहाँ रथको रोककर श्रीजगन्नाथ दायें-बायें देखने लगे। बाईं ओर ब्राह्मणोंकी बस्ती और नारियलके वृक्षोंका वन था और दायीं और वृन्दावन जैसा सुन्दर पुष्पोंका उद्यान था। रथके आगे महाप्रभु अपने भक्तोंके साथ नृत्य कर रहे थे और श्रीजगन्नाथ रथको रोककर नृत्यका दर्शन करने लगे॥ 193-195 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'बलगाण्डि'-स्थाने—श्रद्धाबालु और अर्द्धासनी देवीके बीचमें जो स्थान है, उसका नाम 'बलगाण्डि' है॥ 193॥ अनुभाष्य—उड़ीसामें ब्राह्मणोंकी बस्तीको 'विप्रशासन' कहते हैं॥ 194॥ श्रीजगन्नाथके द्वारा उत्तम भोगोंका आस्वादन :— सेइ स्थले भोग लागे, आछये नियम। कोटि भोग जगन्नाथ करे आस्वादन ॥ 196 ॥ जगन्नाथेर छोट-बड़ यत भक्तगण। निज निज उत्तम-भोग करे समर्पण ॥ 197 ॥ अनुवाद—उस स्थानपर श्रीजगन्नाथको भोग लगता है, ऐसा नियम है। वहाँ असंख्य भोग श्रीजगन्नाथको अर्पित किये गये और उन्होंने सभीका आस्वादन किया। श्रीजगन्नाथके कनिष्ठसे उत्तम जितने भी भक्त हैं, सभीने अपने लाये हुए उत्तम भोग समर्पित किये॥ 196-197 ॥ छोटे-बड़े, प्रजा-राजा सभीके द्वारा भोग समर्पण :— राजा, राजमहिषीवृन्द, पात्र, मित्रगण। नीलाचलवासी यत छोट-बड़ जन ॥ 198 ॥ नाना-देशेर देशी यत यात्रिक जन। निज-निज-भोग ताँहा करे समर्पण ॥ 199 ॥ आगे-पाछे, दुइ पार्श्वे उद्यानेर-वने। येइ याहा पाय, लागाय,—नाहिक नियमे ॥ 200 ॥ अनुवाद—उस स्थानपर स्वयं राजा और उनकी महिषियाँ, राजमन्त्री, राजाके मित्रों एवं नीलाचलवासी सभी छोटे-बड़े लोगों तथा अनेक देशोंसे आये जितने भी यात्री थे, अपना-अपना भोग लाकर उन्होंने श्रीजगन्नाथको वहाँ समर्पित किया। रथके आगे-पीछे, दोनों ओर उद्यानोंमें, जिसे जहाँ स्थान मिला, उसने वहींसे श्रीजगन्नाथको भोग लगाया, वहाँ किसी विशेष स्थानसे भोग लगानेका नियम नहीं है॥ 198-200॥ । 525

[ 13/201-207 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भोगके समय लोगोंका एकत्रित होना, विश्राम करनेके लिये महाप्रभुका निकटस्थ उद्यानमें जाना :- भोगेर समय लोकेर महा भीड़ हैल। नृत्य छाड़ि' महाप्रभु उपवने गेल॥ 201॥ प्रेमावेशे महाप्रभु उपवन पाञा। पुष्पोद्याने गृहपिण्डाय रहिला पड़िया॥ 202॥ शीतल वायुसे परिश्रम दूर होना :- नृत्य-परिश्रमे प्रभुर देहे घन घर्म। सुगन्धि शीतल-वायु करेन सेवन॥ 203॥ अनुवाद—भोगके समय वहाँ लोगोंकी बहुत भीड़ हो गयी, इसलिये महाप्रभु नृत्य छोड़कर उपवनमें चले गये। प्रेमावेशमें महाप्रभु उपवनमें जाकर एक पुष्प-उद्यानमें एक चबूतरेके ऊपर लेट गये। नृत्यके परिश्रमसे महाप्रभुका शरीर पसीनेसे तर-बतर हो गया था। इसलिये महाप्रभु उस उपवनमें प्रवाहित हो रही सुगन्धित, शीतल वायुका आनन्द लेने लगे॥ 201-203॥ कीर्त्तनकारियोंका वृक्षोंके नीचे विश्राम :- यत भक्त कीर्त्तनीया आसिया आराम। प्रतिवृक्षतले सबे करेन विश्राम॥ 204॥ अनुवाद—जितने भी भक्त सङ्कीर्त्तन कर रहे थे, वे सब उस उपवनमें आकर प्रत्येक वृक्षके नीचे विश्राम करने लगे॥ 204॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आराम'—उद्यानमें (उपवन, वृक्षवाटिका, बागान)॥ 204॥ महाप्रभुका इस प्रकार महासङ्कीर्त्तन :- एइ त' कहिल प्रभुर महासङ्कीर्त्तन। जगन्नाथेर आगे यैछे करिल नर्त्तन॥ 205॥ श्रीरूप गोस्वामीके चैतन्याष्टकमें रथके आगे महाप्रभुके नृत्यका वर्णन :- रथाग्रेते प्रभु यैछे करिला नर्त्तन। श्रीचैतन्याष्टके रूप-गोसाञि करयाछे वर्णन॥ 206॥ अनुवाद—(ग्रन्थकार कह रहे हैं)—यहाँ तक मैंने महाप्रभुके महासङ्कीर्त्तनका और जैसे उन्होंने श्रीजगन्नाथके रथके आगे नृत्य किया, उसका वर्णन किया है। श्रीरूप गोस्वामीने स्वरचित श्रीचैतन्याष्टकमें श्रीजगन्नाथके रथके आगे महाप्रभुने जिस प्रकारसे नृत्य किया था, उसका वर्णन किया है॥ 205-206॥ स्तवमालामें प्रथम चैतन्याष्टक (7) श्लोकमें श्रीरूप गोस्वामी-वाक्य :- रथारूढस्यारादधिपदवि नीलाचलपते- रदभ्रप्रेमोर्मिस्फुरितनटनोल्लासविवशः। सहर्षं गायद्भिः परिवृत-तनुर्वैष्णवजनैः स चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम् ॥ 207॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 207॥ अमृतप्रवाह भाष्य—रथपर आरूढ़ नीलाचलपतिके सम्मुख अधिक प्रेमकी लहरोंसे स्फुरित नाट्योल्लाससे विवश होकर आनन्दके सहित सङ्कीर्त्तनकारी एवं वैष्णवोंके द्वारा जो आवृत (घिरे हुए) हैं, वे श्रीचैतन्यदेव क्या पुनः मेरे दृष्टिपथ पर आयेंगे?॥ 207॥ तेरहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य—श्रीरूप गोस्वामीने तीन 'श्रीचैतन्याष्टकों'की रचना की है, उनमेंसे प्रथम अष्टकका सातवाँ श्लोक— रथारूढ़स्य (रथोपरि स्थितस्य) नीलाचलपतेः (जगन्नाथ- देवस्य) आरात् (समीपे) अधिपदवि (प्रधानपथे) अदभ्र- प्रेमोर्मिस्फुरित-नटनोल्लासविवशः (अदभ्रेण अधिकेन प्रेमोर्मिणा प्रेमतरङ्गेण स्फुरितः प्रतिबिम्बितः यः नटनोल्लासः नर्त्तन- विलास-हर्षः, तेन विवशः श्रम-विह्वलः) सहर्षं (सानन्दं) गायद्भिः (कीर्त्तनपरैः) वैष्णव-जनैः (भक्तवृन्दैः) परिवृतः-तनुः (वेष्टितविग्रहः एवम्भूतः) सः चैतन्यः (गौरचन्द्रः) पुनरपि किं मे (मम) दृशोः पदं (नयनपथं) यास्यति (प्राप्स्यति)? श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। श्रील प्रबोधानन्द सरस्वती त्रिदण्डिपादने स्वकृत 'श्रीराधारससुधानिधि'में भी— “निन्दन्तं पुलकोत्करेण विकसत्प्रप्रसूनच्छविं प्रोद्धींकृत्य 526 ।

तेरहवाँ अध्याय 13/207-209 ] भुजद्वयं हरि-हरीत्युच्चैर्वदन्तं मुहुः। नृत्यन्तं द्रुतमश्रुनिर्झरचयैः श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। सिञ्चन्तमुर्वीतलं गायद्भिर्निजपार्षदैः परिवृतं श्रीगौरचन्द्रं स्तुमः ॥ ” चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 209 ॥ अर्थात् “जो सात्त्विक भावोंसे उदित पुलकादि इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे रथाग्रे नर्त्तनं समूहके द्वारा परिशोभित श्रीअङ्गशोभाके द्वारा विकसित नाम त्रयोदश-परिच्छेदः। कदम्ब-पुष्पकी शोभाको भी निन्दित कर रहे हैं, अनुवाद—श्रीजगन्नाथके रथके आगे महाप्रभुके नृत्यकी सुविशाल दोनों भुजाओंको ऊपर उठाकर उच्च स्वरसे लीलाको जो व्यक्ति सुनेगा, उसे महाप्रभुकी प्राप्ति होगी बार बार 'हरि-हरि' बोल रहे हैं, चञ्चल चरणोंसे नृत्य और सुदृढ़ विश्वासके साथ प्रेमाभक्ति प्राप्त होगी। करते-करते अश्रु-प्रवाह धाराके द्वारा धरतीका सिञ्चन श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा कर रहे हैं, पार्षदोंके द्वारा परिवेष्टित कीर्त्तनरस-विनोदी करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन उन श्रीगौरचन्द्रको मैं प्रणाम करता हूँ॥” 207 ॥ कर रहा है ॥ 208-209 ॥ तेरहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त ॥ रथके आगे महाप्रभुके नृत्य-श्रवणसे प्रेमभक्तिकी प्राप्ति :- श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें रथके आगे नृत्य इहा येइ सुने, सेइ श्रीचैतन्य पाय। नामक तेरहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। सुदृढ़ विश्वास-सह प्रेमभक्ति हय ॥ 208 ॥ ॥ 527

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चौदहवाँ अध्याय कथासार—बलगाण्डि-उद्यानमें महाप्रभु प्रेमावेशमें थे, तब राजा प्रतापरुद्रदेव अकेले वैष्णव वेश धारण करके वहाँ आये और भागवतके श्लोकोंका पाठ करते-करते महाप्रभुके चरणोंको दबाने लगे। प्रेमावेशमें महाप्रभुने उनका आलिङ्गन करके कृपा की। भक्तोंके साथ महाप्रभुने बलगाण्डि-भोगके प्रसादकी सेवा की। उसके बाद रथके न चलनेपर, राजाने अनेक मतवाले हाथियोंको लगाया, परन्तु वे भी रथको नहीं चला पाये। तब महाप्रभुने स्वयं अपने सिरसे रथको धकेलकर उसे चलाया और फिर भक्तगण उस समय रस्सी खींचने लगे। गुण्डिचाके निकट आइटोटामें महाप्रभुका विश्राम स्थान हुआ। श्रीजगन्नाथके सुन्दराचलमें वास करनेपर महाप्रभुको वृन्दावनकी लीलाओंकी स्फूर्ति हो आई। इन्द्रद्युम्न सरोवरमें महाप्रभुकी अपने भक्तों सहित जल-क्रीड़ा हुई। नवरात्र-यात्रामें महाप्रभु जगन्नाथ-वल्लभ उद्यानमें रहे और पञ्चमीके दिन 'हेरा-पञ्चमी' लीलाके दर्शनमें (महाप्रभुका श्रीस्वरूप दामोदरके साथ) लक्ष्मी और गोपियोंके स्वभावको लेकर अनेक वार्तालाप हुआ था। श्रीस्वरूपके मुखसे राधिकाके भावोंकी सर्वोत्कर्षताके विषयमें सुनकर महाप्रभुको परमानन्द हुआ। पुनर्यात्राके समय कीर्त्तनादि होनेके बाद कुलीनग्रामवासी श्रीराम force वसु और सत्यराज खाँको प्रत्येक वर्ष (श्रीजगन्नाथके रथके लिये) रेशमी डोरी' लानेके लिये श्रीमन्महाप्रभुने आज्ञा दी। —(अमृतप्रवाह भाष्य) 'हेरा-पञ्चमी'के दर्शनमें नृत्य करते हुए श्रीगौरसुन्दर :— गौरः पश्यन्नात्मवृन्दैः श्रीलक्ष्मीविजयोत्सवम्। श्रुत्वा गोपीरसोल्लासं हृष्टः प्रेम्णा ननर्त्त सः॥1॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अपने भक्तों सहित लक्ष्मीदेवीके विजयोत्सवका दर्शन करके और गोपियोंका रासोल्लास श्रवण करके प्रसन्नचित्त होकर श्रीगौरचन्द्रने नृत्य किया था॥1॥ अनुभाष्य— सः गौरः आत्मवृन्दैः (स्वपार्षदगणैः) श्रीलक्ष्मी-विजयोत्सवं पश्यन् गोपीरसोल्लासं (गोपीनां पारकीयरसातिशयं) श्रुत्वा हृष्टः सन् प्रेम्णा (परमया प्रीतया) ननर्त्त। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥1॥ जय जय गौरचन्द्र श्रीकृष्णचैतन्य। जय जय नित्यानन्द जयाद्वैत धन्य॥2॥ जय जय श्रीवासादि गौड़ेर भक्तगण। जय श्रोतागण,—याँर गौर प्राणधन॥3॥ अनुवाद—श्रीगौरचन्द्र श्रीकृष्णचैतन्यकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो और धन्य श्रीअद्वैताचार्य प्रभुकी जय हो। श्रीवासादि गौड़-भक्तोंकी जय हो, जय हो तथा ग्रन्थके श्रोताओंकी जय हो, श्रीगौरचन्द्र जिनके प्राणधन हैं॥2-3॥ महाप्रभुके विश्रामके समय राजाका प्रवेश :— एइमत प्रभु आछेन प्रेमेर आवेशे। हेनकाले प्रतापरुद्र करिल प्रवेशे॥4॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु प्रेमके आवेशमें जब विश्राम कर रहे थे, उस समय राजा प्रतापरुद्रने पुष्पोद्यानमें प्रवेश किया॥4॥ । 529