भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1357

तेरहवाँ अध्याय 13/101-113 ] कभु स्तम्भ, कभु प्रभु भूमिते लोटाय। शुष्ककाष्ठसम पद-हस्त ना चलय ॥ 107 ॥ कभु भूमे पड़े, कभु श्वास हय हीन। याहा देखि' भक्तगणेर प्राण हय क्षीण ॥ 108 ॥ अनुवाद-उद्दण्ड नृत्य करते हुए महाप्रभुके शरीरमें अद्भुत विकार होने लगे और आठों सात्त्विक भाव एक साथ उदय हो गये। उनकी रोमावली पुलकित होकर खड़ी हो गयी और उसकी जड़ें फूल गयीं, उनके शरीरको देखकर ऐसा लगता था जैसे रुईके वृक्षमें चारों ओर काँटे हों। उनका एक-एक दाँत कटकटा रहा था और लोंगोंको भय लग रहा था मानो उनके सभी दाँत टूटकर गिर पड़ेंगे। सभी अङ्गोंसे पसीना निकलकर बह रहा था और साथ ही रक्त भी निकलने लगा। गद्गद् वाणीसे वे जगन्नाथ न बोलकर केवल 'जज गग' 'जज गग' ही बोल पा रहे थे। पिचकारीकी धारके समान महाप्रभुके नेत्रोंसे अश्रु बह रहे थे और आस-पास खड़े लोग उन अश्रुओंकी धारामें भीग रहे थे। वैवर्ण्यके कारण महाप्रभुकी गौरवर्ण (पीतवर्ण) देहकान्ति कभी अरुणवर्ण की और कभी मल्लिकाके पुष्पोंकी भाँति शुक्लवर्ण दिखायी देने लगती। कभी तो महाप्रभु चलते-चलते स्तम्भित हो जाते और कभी भूमिपर लोटने लगते। कभी उनके हाथ-पैर सूखी लकड़ीकी भाँति हो जाते जिससे वे हिल-डुल भी नहीं पाते। कभी वे भूमिपर गिर पड़ते और कभी श्वासहीन हो जाते जिसे देखकर भक्तोंके प्राण निकलनेवाले हो जाते ॥ 101-108 ॥ अनुभाष्य-महाप्रभुके शरीरमें एक ही समयमें आठों प्रकारके सात्त्विक भावोंका उदय हो रहा था। महाप्रभुके रोम पुलकित होनेपर लोमकूपका माँस रोमाञ्चके कारण घाव या फोड़े जैसा दीखने लगा। 'जज गग' - 'जगन्नाथ' बोलते हुए उच्चारण करते हुए महाप्रभुके मुखसे इस प्रकार अस्फुट-शब्द ही निकल रहे थे। 'जल-यन्त्र'-पिचकारी, अथवा जल-सींचनेवाला यन्त्र अथवा फव्वारा ॥ 101-105 ॥ महाप्रभुके मुखचन्द्रसे फेनामृत-धारा :- कभु नेत्रे-नासाय जल, मुखे पड़े फेन। अमृतेर धारा चन्द्रबिम्बे बहे येन ॥ 109 ॥ शुभानन्दके द्वारा पान :- सेइ फेन लञा शुभानन्द कैल पान। कृष्णप्रेमरसिक तेंहो महाभाग्यवान् ॥ 110 ॥ अनुवाद-कभी महाप्रभुके नेत्रों और कभी नाकसे जल निकलने लगता और कभी मुखचन्द्रसे फेन निकलता जिसे देखकर ऐसा लगता मानो चन्द्रमासे अमृतकी धारा बह रही हो। महाप्रभुके मुखचन्द्रसे निकली हुई फेनको श्रीशुभानन्दने पान कर लिया, क्योंकि वे महाभाग्यवान् श्रीकृष्णप्रेम रसके रसिक थे ॥ 109-110 ॥ अनुभाष्य- 'शुभानन्द'-आदिलीला 10/110 संख्या और मध्यलीला 13/39 संख्या देखें ॥ 110 ॥ नृत्यके अन्तमें महाप्रभुके द्वारा कान्तके साथ कान्ताके मिलनका गीत-श्रवण :- एइमत ताण्डव-नृत्य कैल कतक्षण। भाव-विशेषे प्रभुर प्रवेशिल मन ॥ 111 ॥ ताण्डव-नृत्य छाड़ि' स्वरूपेरे आज्ञा दिल। हृदय जानिया स्वरूप गाइते लागिल ॥ 112 ॥ श्रीस्वरूप दामोदरका गीत :- तथाहि पदम्- “सेइ त' पराण-नाथ पाइनु। याहा लागि' मदन-दहने झुरि' गेनु ॥” 113 ॥ ध्रु ॥ अनुवाद-इस प्रकार कुछ समय तक ताण्डव-नृत्य (अकेले पुरुषके द्वारा नृत्य) करते हुए महाप्रभुके मनमें विशेष भाव उदित हुआ। तब उन्होंने ताण्डव-नृत्यको रोककर श्रीस्वरूप दामोदरको गान करनेके लिये आदेश दिया। श्रीस्वरूप दामोदर महाप्रभुके हृदयके भावोंको । 513