श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1356, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 13/91-106 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सेवारत श्रीवासका पुनः पुनः सेवामें विघ्नहेतु क्रोध :- नृत्यावेशे श्रीनिवास किछुइ ना जाने। बार बार ठेले, तँहो क्रोध हैल मने ॥ 94 ॥ हरिचन्दनको थप्पड़ मारना और उसके फलस्वरूप हरिचन्दनका क्रोधित होना :- चापड़ मारिया तारे कैल निवारण। चापड़ खाञा क्रु अनुवाद-हरिचन्दनके कन्धेपर हाथ रखकर राजा प्रतापरुद्र महाप्रभुके नृत्यको देखकर उसमें आविष्ट हो रहे थे। उस समय श्रीवास पण्डित भी राजाके आगे खड़े होकर महाप्रभुके नृत्यको देखकर प्रेममें आविष्ट हो रहे थे। राजाके आगे श्रीवास पण्डितको देखकर हरिचन्दनने उन्हें अपने हाथके स्पर्शसे एक तरफ हटाते हुए कहा, - 'आप एक ओर हो जाइये।' परन्तु श्रीवास पण्डित तो महाप्रभुके नृत्यको देखनेमें इतने आविष्ट थे कि उन्हें कुछ भी पता नहीं चला। हरिचन्दनके द्वारा बार-बार ठेले जानेपर उनको क्रोध आ गया और हरिचन्दनको थप्पड़ मारकर उसे ठेलनेके लिये मना किया। थप्पड़ खाकर हरिचन्दनको भी क्रोध आ गया ॥ 91-95 ॥ अनुभाष्य - 'तारे'-हरिचन्दनको ॥ 95 ॥ हरिचन्दनको राजाके द्वारा मना करना :- क्रु आपनि प्रतापरुद्र निवारिल तारे ॥ 96 ॥ वैष्णवके द्वारा अपमान या आघात भी सौभाग्यसूचक :- “भाग्यवान् तुमि - इँहार हस्त-स्पर्श पाइला। आमार भाग्ये नाहि, तुमि कृतार्थ हैला ॥" 97 ॥ अनुवाद-हरिचन्दन क्रोधमें आकर श्रीवास पण्डितको कुछ कहना ही चाहता था, परन्तु स्वयं राजा प्रतापरुद्रने उसे यह कहकर रोक दिया, - "तुम बहुत भाग्यवान् हो जो तुमने इनके हाथोंका स्पर्श प्राप्त किया। मेरा ऐसा सौभाग्य नहीं है, तुम कृतार्थ हो गये हो ॥" 96-97 ॥ अनुभाष्य - 'ताँरे' - श्रीवासको ॥ 96 ॥ अपलक नेत्रोंसे निश्चलभावसे श्रीजगन्नाथको महाप्रभुके नृत्यका दर्शन करनेसे परमानन्द :- प्रभुर नृत्य देखि' लोके हैल चमत्कार। अन्य आछुक, जगन्नाथेर आनन्द अपार ॥ 98 ॥ रथ स्थिर कैल, आगे ना करे गमन। अनिमिष-नेत्रे करे नृत्य दरशन ॥ 99 ॥ महाप्रभुके नृत्य-दर्शनसे सुभद्रा एवं बलराम भी हर्षित :- सुभद्रा-बलरामेर हृदये उल्लास। नृत्य देखि' दुइ जनार श्रीमुखेते हास ॥ 100 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके नृत्यको देखकर लोग आश्चर्यचकित हो गये और यहाँ तक कि स्वयं श्रीजगन्नाथको भी अपार आनन्द हुआ। श्रीजगन्नाथने अपने रथको स्थिर कर दिया और वे अपलक-नेत्रोंसे महाप्रभुका नृत्य देखने लगे। श्रीसुभद्रा और श्रीबलरामके हृदयमें भी उल्लास हो रहा था और महाप्रभुका नृत्य देखकर उन दोनोंके मुखपर मुस्कुराहट छा गयी ॥ 98-100 ॥ अष्टसात्त्विक-भावसमूह सुशोभित महाप्रभुका रूप और लीला :- उद्दण्ड नृत्ये प्रभुर अद्भुत विकार। अष्टसात्त्विक-भाव उदय समकाल ॥ 101 ॥ माँस व्रण-सम रोमवृन्द पुलकित। शिमुलीर वृक्ष येन कण्टक-वेष्टित ॥ 102 ॥ एक एक दन्तेर कम्प देखिते लागे भय। लोके जाने, दन्त सब खसिया पड़य ॥ 103 ॥ सर्वाङ्गे प्रस्वेद, ताते रक्तोद्गम। 'जज गग' 'जज गग'-गद्गद-वचन ॥ 104 ॥ जलयन्त्र-धारा यैछे बहे अश्रुजल। आश-पाशे लोक यत भिजिल सकल ॥ 105 ॥ देहकान्ति गौरवर्ण देखिये अरुण। कभु कान्ति देखि' येन मल्लिका-पुष्पसम ॥ 106 ॥ 512 ।