भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1355

तेरहवाँ अध्याय 13/84-93 ] महाप्रभुके अष्टसात्त्विक विकार :- स्तम्भ, स्वेद, पुलक, अश्रु, कम्प, वैवर्ण्य। नाना भावे विवशता, गर्व, हर्ष, दैन्य ॥ 84 ॥ आछाड़ खाञा पड़े भूमे गड़ि' याय। सुवर्ण-पर्वत यैछे भूमेते लोटाय ॥ 85 ॥ अनुवाद-नृत्य करते हुए महाप्रभुके शरीरमें स्तम्भ, स्वेद, पुलक, अश्रु, कम्प, वैवर्ण्य, विवशता, गर्व, हर्ष और दैन्य आदि प्रेमके विकार और भाव उदित हो रहे थे। पछाड़ खाकर जब महाप्रभु भूमिपर गिरकर लोट-पोट करने लगते, तो ऐसा प्रतीत होता मानो कोई सोनेका पर्वत भूमिपर लोट-पोट खा रहा हो ॥ 84-85 ॥ निताइके द्वारा रक्षा करनेकी चेष्टा :- नित्यानन्दप्रभु दुइ हात प्रसारिया। प्रभुरे धरिते चाहे आसपास धाञा ॥ 86 ॥ महाप्रभुके पीछे हरिध्वनिमें रत श्रीअद्वैत :- प्रभु-पाछे बुले आचार्य करिया हुँकार। 'हरिबोल' 'हरिबोल' बोले बार बार ॥ 87 ॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभु अपने दोनों हाथोंको पसारकर महाप्रभुको पकड़नेके लिये उनके आस-पास भाग रहे थे। श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुके पीछे-पीछे चलते हुए बार-बार उच्च स्वरसे 'हरिबोल' 'हरिबोल' बोलते हुए हुँकार कर रहे थे ॥ 86-87 ॥ महाप्रभुको लोगोंके स्पर्शसे रक्षाके लिये तीन दलोंके द्वारा घेरेका गठन :- लोक निवारिते हैल तिन मण्डल। प्रथम-मण्डले नित्यानन्द महाबल ॥ 88 ॥ काशीश्वर मुकुन्दादि यत भक्तगण। हाताहाति करि' हैल द्वितीय आवरण ॥ 89 ॥ बाहिरे प्रतापरुद्र लञा पात्रगण। मण्डल हञा करे लोक निवारण ॥ 90 ॥ अनुवाद-लोगोंकी भीड़को महाप्रभुसे दूर रखनेके लिये उन्होंने तीन चक्र (घेरे) बनाये। भीतरवाले पहले चक्रमें महाबलवान् श्रीनित्यानन्द प्रभु (बलके अधिष्ठात्री देवता श्रीबलदेव प्रभु) रक्षा कर रहे थे। उसके बाहर श्रीकाशीश्वर और श्रीमुकुन्दादि सब भक्तोंने अपने हाथोंको दोनों ओर फैलाकर दूसरे भक्तोंके हाथोंको पकड़कर दूसरा आवरण बनाया। सबसे बाहरी अर्थात् तीसरे चक्रमें राजा प्रतापरुद्रने अपने सैनिकोंको लेकर एक चक्र बनाकर लोगोंको रोक दिया ॥ 88-90 ॥ अनुभाष्य- 'महाबल'-श्रीबलदेव। 'तिनमण्डल'-लोगोंके द्वारा रौंदनेसे बचानेके लिये महाप्रभुको केन्द्रमें रखकर भक्तोंने चक्रके आकारमें उन्हें चारों ओरसे घेरकर तीन वृत्त (घेरे) बनाये। पहले-घेरेमें-अन्यान्य भक्तोंके साथ श्रीनित्यानन्द प्रभु थे, पहले घेरेको केन्द्रमें रखकर पुनः चक्राकारमें श्रीकाशीश्वर और श्रीमुकुन्दादिने दूसरा घेरा बनाया तथा दूसरे घेरेको केन्द्रमें रखकर अपने लोगोंके द्वारा आवृत करके राजा प्रतापरुद्रने तीसरा घेरा बनाया। तीसरे घेरेके द्वारा आवरण करके दूसरे, पहले और उसके भीतर श्रीमन्महाप्रभुको लोगोंकी भीड़से स्वतन्त्र कर दिया। इसका उद्देश्य यह था कि लोगोंकी भीड़से तीसरे घेरेके टूट जानेपर दूसरा और उसके भी उसी प्रकारसे टूट जानेपर पहला घेरा महाप्रभुकी रक्षाके कार्यमें आयेगा ॥ 88 ॥ हरिचन्दनके साथ राजाका महाप्रभुके नृत्यका दर्शन :- हरिचन्दनेर स्कन्धे हस्त आलम्बिया। प्रभुर नृत्य देखे राजा आविष्ट हञा ॥ 91 ॥ राजाके सामने श्रीवासकी महाप्रभु-नृत्य-दर्शन-सेवा :- हेनकाले श्रीनिवास प्रेमाविष्ट-मन। राजार आगे रहिं' देखे प्रभुर नर्त्तन ॥ 92 ॥ राजाको बिना बाधाके दर्शनका सुयोग देनेके लिये श्रीवासको हरिचन्दनकी नम्रभावसे हटानेकी चेष्टा :- राजार आगे हरिचन्दन देखे श्रीनिवास। हस्ते ताँरे स्पर्श कहे,-'हओ एकपाश ॥ '93 ॥ । 511