श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 13/111-119 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला जानकर गान करने लगे, — “मैंने उन्हीं प्राणनाथको पा लिया है, जिनके विरहमें मैं कामाग्निकी ज्वालामें जलकर म्लान हो रही थी॥” 111-113॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ताण्डव-नृत्य छोड़कर महाप्रभुके हृदयमें कुरुक्षेत्र-मिलनमें श्रीराधाके भाव उदित हुए थे। बहुत दिनोंके विरहके बाद, यह गीत स्वाभाविक रूपमें आकर उपस्थित हुआ॥ 113॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 1/53-56 संख्या देखें॥ 113॥ गीत श्रवण करनेसे महाप्रभुका नृत्य :— एइ धुया उच्चैःस्वरे गाय दामोदर। आनन्दे मधुर नृत्य करेन ईश्वर॥ 114॥ श्रीजगन्नाथका महाप्रभुके पीछे-पीछे चलना :— धीरे धीरे जगन्नाथ करेन गमन। आगे नृत्य करि' चलेन शचीर नन्दन॥ 115॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर इस पदका बार-बार उच्च स्वरसे गान करने लगे और महाप्रभु आनन्दपूर्वक उस गानकी लयके साथ नृत्य करने लगे। श्रीजगन्नाथका रथ धीरे-धीरे चलने लगा और शचीनन्दन श्रीगौरहरि उसके आगे नृत्य करते हुए चलने लगे॥ 114-115॥ सभी भक्तोंका श्रीजगन्नाथकी ओर मुख करके नृत्य और कीर्तन :— जगन्नाथे नेत्र दिया सबे नाचे, गाय। कीर्त्तनीया सह प्रभु पाछे पाछे याय॥ 116॥ अनुवाद—नृत्य एवं गान करते हुए सभी भक्त श्रीजगन्नाथको ही देख रहे थे। महाप्रभु तब कीर्तन करनेवाले भक्तोंके साथ यात्रामें सबसे पीछेकी ओर गये॥ 116॥ बहुत समयके विरहके बाद श्रीराधाभावमें भावित महाप्रभुका प्रियतम श्रीकृष्णके साथ मिलन :— जगन्नाथ-मग्न प्रभुर नयन-हृदय। श्रीहस्तयुगे करे गीतेर अभिनय॥ 117॥ श्रीराधाभाव-सुवलित महाप्रभुमें ही श्रीकृष्णकी अपेक्षा अधिक प्रेम :— गौर यदि पाछे चले, श्याम हय स्थिरे। गौर आगे चले, श्याम चले धीरे धीरे॥ 118॥ एइमत गौर-श्यामे, दोँहे ठेलाठेलि। स्वरथे श्यामरे राखे गौर महाबली॥ 119॥ अनुवाद—महाप्रभुके नेत्र और हृदय श्रीजगन्नाथमें निमग्न थे और गीतके भावोंके अनुरूप वे अपने दोनों श्रीहस्तकमलोंको चलाते हुए अभिनय करने लगे। जब श्रीगौरसुन्दर रथके पीछे चलते, तब श्यामसुन्दर (श्रीजगन्नाथ) रुक जाते और यदि श्रीगौरसुन्दर रथके आगे चलते, तो श्यामसुन्दर उनके नृत्यको देखते हुए धीरे-धीरे चलने लगते। इस प्रकार श्रीगौरसुन्दर एवं श्रीश्यामसुन्दर, दोनोंमें परस्पर खींचातानी हो रही थी। महाबली श्रीगौरसुन्दरने अपने प्रेमके द्वारा रथपर चढ़े हुए श्रीश्यामसुन्दरको वशीभूत कर रखा था॥ 117-119॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिस समय श्रीगौरचन्द्र गीतका अभिनय करते-करते (रथ के) पीछे चले जाते, तब श्रीजगन्नाथ स्थिर हो जाते; श्रीगौरचन्द्र जब आगे चलते, तब श्रीजगन्नाथ धीरे-धीरे आगे बढ़ते॥ 118॥ अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभुका भाव यह है—ब्रजेन्द्रनन्दन गोकुलवासिनियोंको छोड़कर द्वारका लीलामें मत्त हो गये थे, बादमें कुरुक्षेत्र मिलनमें उनका सङ्ग प्राप्त किया। यहाँपर, ब्रजेन्द्रनन्दनरूप श्रीजगन्नाथदेवको राधाभावमें विभावित श्रीगौरसुन्दर ऐश्वर्यलीला-क्षेत्र श्रीक्षेत्र-नीलाचलसे माधुर्य- लीलाभूमि गुण्डिचाकी ओर आकर्षण करके ले जा रहे हैं। श्रीराधा और गोपियोंके भावमें विभावित श्रीगौरहरिका रथके पीछे जानेका उद्देश्य यह था कि व्रजेन्द्रनन्दनने व्रजके भावोंको भूलकर उनका (श्रीराधादि गोपियोंका) अनादर किया है, तथापि उनकी चेष्टासे फिरसे श्रीकृष्णमें व्रजकी माधुरीके उदित होनेके कारण ऐश्वर्यलीलासे माधुर्यलीलाके उत्कर्षकी उपलब्धि होनेपर ही श्रीकृष्णकी रथ-विजय है। वास्तवमें श्रीराधादि 514 ।