भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1359

तेरहवाँ अध्याय 13/118-124 ] ब्रजजनोंके प्रति आन्तरिक सौहार्दके वशीभूत होकर ही श्रीकृष्ण जा रहे हैं, अथवा उनका इसके अतिरिक्त कोई और उद्देश्य है, इस विषयमें सन्देहको दूर करनेके लिये श्रीमन्महाप्रभु रथके पीछेकी ओर चले गये। महाप्रभुके हृदयके भावको जानकर श्रीजगन्नाथदेव भी रुककर उनकी प्रतीक्षा करने लगे। विशेषतः, वृन्दावनेश्वरीके अभावमें व्रजभावके सौन्दर्यकी सम्भावना नहीं है। श्रीजगन्नाथको प्रतीक्षा करते देख गोपीभावके सामर्थ्यको समझकर श्रीगौरसुन्दरके उत्साहित होकर आगे बढ़नेपर श्रीजगन्नाथदेव भी लज्जित होकर धीरे-धीरे उनका अनुगमन करने लगे। श्रीराधादि-गोपीभावमें भावुक श्रीगौरका अनुगमन और श्रीगौरके लिये प्रतीक्षा करनेकी योग्यता श्रीजगन्नाथदेवमें ही देखी जाती है, इसलिये श्रीजगन्नाथके प्रति महाप्रभुके भाव और महाप्रभुके प्रति श्रीजगन्नाथके भाव, —दोनोंके इस प्रकारके भावोंकी ठेला-ठेलीमें या युद्धमें श्रीराधाभाव-विभावित महाप्रभु अथवा उनका प्रेम ही अधिक बलवान् है॥ 118-119 ॥ विरहके अन्तमें मिलन-स्थलीकी स्मृतिका द्योतक श्लोक-पाठ :- नाचिते नाचिते प्रभुर हैला भावान्तर। हस्त तुलि' श्लोक पड़े करि' उच्चैःस्वर ॥ 120 ॥ अनुवाद-नृत्य करते-करते महाप्रभुका भावान्तर हुआ और वे अपने हाथोंको ऊपर उठाकर उच्च स्वरसे एक श्लोक पढ़ने लगे॥ 120 ॥ काव्यप्रकाशमें (1/4), साहित्यदर्पणमें (1/10); पद्यावलीमें (382) :- यः कौमारहरः स एव हि वरस्ता एव चैत्रक्षपा- स्ते चोन्मीलितमालतीसुरभयः प्रौढ़ाः कदम्बानिलाः। सा चैवास्मि तथापि तत्र सुरतव्यापारलीलाविधौ रेवा-रोधसि वेतसीतरुतले चेतः समुत्कण्ठते ॥ 121 ॥ अनुवाद-एक नायिका अपनी एक सखीसे कहती है,- "जिसने कौमारावस्थामें मेरे चित्तका हरण किया था, अब वही मेरा वर है अर्थात् वैवाहिक पति है। उसके साथ कौमारावस्थामें प्रथम मिलनके समय जो चैत्रमाहकी ज्योत्स्नामयी रात्रि थी, अब भी वही चैत्रमाहका ज्योत्स्नामय रात्रिकाल है। प्रथम मिलनके समयकी भाँति खिली हुई मालती पुष्पोंकी भीनी-भीनी मधुर सुगन्धयुक्त वायु अब भी कदम्ब वनकी ओरसे प्रवाहित हो रही है; मैं भी वही हूँ; फिर भी उसी रेवा नदीके किनारे निर्जन सुशीतल प्रदेशमें बेंतके वृक्षके नीचे प्रथम मिलनके समयवाली सुरत-व्यापारलीला अर्थात् प्रेममय विहारके लिये मेरा मन उत्कण्ठित हो रहा है।" 121 ॥ महाप्रभुके हृदयके भावोंके रसज्ञ श्रीस्वरूप :- एइ श्लोक महाप्रभु पड़े बार बार। स्वरूप बिना अर्थ केह ना जाने इहार ॥ 122 ॥ अनुवाद-महाप्रभु बार-बार इस श्लोकको पढ़ रहे थे, परन्तु श्रीस्वरूप दामोदरके अतिरिक्त कोई भी इसके अर्थ (आन्तरिक भाव) को नहीं जानता था ॥ 122 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 1/58-59 संख्या देखें ॥ 121-122 ॥ इस श्लोकके अर्थकी मध्यलीलाके पहले अध्यायमें व्याख्या :- एइ श्लोकार्थ पूर्वे करियाछि व्याख्यान। श्लोकेर भावार्थ करि संक्षेपे आख्यान ॥ 123 ॥ अनुवाद- (ग्रन्थकार कह रहे हैं) - इस श्लोकके अर्थकी मैंने पहले व्याख्या की थी। अब संक्षेपमें ही इस श्लोकके भावोंको व्यक्त कर रहा हूँ॥ 123 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 1/53, 77-80, 82-84 संख्या देखें ॥ 123 ॥ बहुत समयके विरहके बाद कुरुक्षेत्रमें श्रीकृष्णके साथ गोपियोंका मिलन :- पूर्वे यैछे कुरुक्षेत्रे सब गोपीगण। कृष्णेर दर्शन पाञा आनन्दित मन ॥ 124 ॥ । 515